खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 5 Hind Gaurav द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 5

हल्दीघाटी का युद्ध : स्वतंत्रता अभियान का आरंभ

प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना एवं जयपुर के मान सिंह तथा आसिफ खाँ के नेतृत्व में इस्लामी साम्राज्यवादी मुगल सेना के मध्य हुए इस युद्ध के विषय में बहुत से इतिहासकारों एवं लेखकों द्वारा बहुत-कुछ लिखा गया है।

यह लेख उस युग प्रवर्तक दिन की तैयारी, उस दिन की सैन्य रणनीति, घटनाओं तथा इस युद्ध के परिणामों पर भिन्न-भिन्न स्रोतों से पुष्टि करने के बाद, उस दिन के तथ्यों को व्यवस्थित करने का प्रयास है।

मेवाड़ के सिंहासन पर प्रताप का राज्यारोहण 32 वर्ष की परिपक्व आयु में हुआ। तब तक उन्हें मेवाड़ की सेना के सैन्य कौशल का पूर्ण अनुभव हो चुका था। भाँति-भाँति के इस्लामी आक्रांताओं के साथ हुए अपने पूर्वजों के संघर्ष की गाथाओं का ज्ञान उन्हें श्रुति द्वारा उत्तराधिकार में मिला था।

चित्तौड़ के तीसरे साका-जौहर के समय, एक ही दिन में अकबर द्वारा 40,000 निरापराध नागरिकों की हत्या की पीडा का दंश भी उन्होंने अपने हृदय में सँजो रखा था। उन्हें ज्ञात था कि किस प्रकार से मुगलों के आग्नेयास्त्रों ने पिछले सभी युद्धों में एकदम से युद्ध का सारा पासा ही मुगलों के पक्ष में पलट दिया था। अकबर द्वारा चतुराई से अन्य राजपूत राजाओं को अपनी ओर मिला लेने की धूर्तता का भी उन्हें पूर्ण बोध था।

अकबर द्वारा मेवाड को अपने अधीन करने के उन्माद का प्रताप को स्पष्ट बोध था कि अकबर मेवाड़ को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाएगा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात, प्रताप को ज्ञात था कि इस बर्बर आक्रमण का प्रत्युत्तर देने का यह महती दायित्व उनके अकेले कंधों पर आ चुका है। समूचे भारतवर्ष के हिंदू राजा या तो अकबर से संधि कर चुके थे या राजा हेमचन्द्र की भाँति उससे लड़कर मारे जा चुके थे, या ग्वालियर के रामशाह तँवर की भाँति राज्य गँवाकर भटकने को विवश हो गए थे। यदि प्रताप को अपनी सैन्यशक्ति तथा शस्त्रों के कम होने का आभास था, तो उन्हें अपनी व अपने सहायकों की शक्ति का भी ज्ञान था। उनकी प्रजा तथा भील समाज का सहयोग तथा मेवाड़ की भौगोलिक स्थितियों से भली-भाँति परिचित होना उनका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अस्त्र था। सेना के त्वरित गमनागमन तथा विशेष स्थानों से तुर्कों पर प्रहार करने हेतु उपयुक्त स्थानों का उन्हें भली-भाँति पता था।

इन सबसे महत्त्वपूर्ण बात थी, प्रताप के प्रति मेवाड़ के सामंतों की निष्ठा। प्रताप के परिजन भी जब प्रताप से विमुख हो गए तो ये सामंत छाया की तरह प्रताप के साथ रहे और कभी उनके नेतृत्व पर प्रश्न नहीं उठाया।

प्रताप ने हल्दीघाटी को अकबर के साथ एक लंबे युद्ध के प्रारंभिक बिंदु की तरह चुना, ताकि वे मेवाड़ को पुनः प्राप्त कर सकें। युद्धभूमि के चयन तथा प्रताप की सेना के विवरण को जानकर ही लगता था कि यह युद्ध लंबे समय तक चलने वाला होगा। प्रताप जानते थे कि हल्दीघाटी में युद्ध के लिए मुगलों को मेवाड़ में घुसना होगा, जहाँ उनकी तोपें इत्यादि निष्फल थीं।

1572 ईसवी से, जब वे मेवाड़ की राजग‌द्दी पर विराजे, तब से लेकर 1576 के हल्दीघाटी के युद्ध तक, प्रताप ने अन्य राजपूत सरदारों तथा घरानों से संपर्क किया, संसाधन एकत्र किए, छिपने के स्थान चुने व भीलों का एक कसा हुआ, गुप्त सूचना तंत्र स्थापित किया। अकबर द्वारा भेजे गए शांतिदूतों को वार्ताओं में उलझाए रखकर वे अपने सामंतों तथा सेनानायकों के साथ आने वाले युद्ध पर मंत्रणा करते रहे।

1572 ईसवी से 1583 ईसवी के दिवेर के युद्ध के बीच के कालखंड का अध्ययन करें तो हम जान सकते हैं कि प्रताप एक दूरदर्शी नायक तथा एक कुशल रणनीतिज्ञ थे। वे एक निर्भीक योद्धा थे, जिन्होंने प्रत्येक संभावना पर पूर्ण मनोयोग के साथ विचार किया। इसीलिए अप्रत्याशित घटनाओं तथा कठिनाइयों के उपरांत भी अपनी योजनाओं को कुशलता के साथ कार्यान्वित किया।

अब कुछ बिंदुओं पर विचार करते हैं तथा जानते हैं कि हल्दीघाटी कोई बिना विचारे, त्वरित युद्ध नहीं था, वरन् यह प्रताप तथा अकबर की सेनाओं के बीच प्रथम संघर्ष था। प्रताप ने अपने प्रतिद्वंद्वी को जाना-समझा तथा उसके अनुरूप अपनी भविष्य की योजनाएँ बनाकर उन्हें कार्यान्वित किया, जिससे अंततः वे मुगल आक्रांताओं को 1583 ईसवी में हुए दिवेर के निर्णायक युद्ध में पराजित कर मेवाड़ की पवित्र धरा को स्वतंत्र कर पाए।

यह अत्यंत दुःखद है कि भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लिखी गई इतिहास की सभी पुस्तकों में हल्दीघाटी को प्रताप की शौर्यगाथा का शिखर बताकर मिथ्या प्रचार किया गया है। सत्य यह है कि हल्दीघाटी का युद्ध प्रताप के विजय अभियान का एक महत्त्वपूर्ण सोपान मात्र था। इन्हीं इतिहासकारों ने प्रताप को एक असहाय पलायनकर्ता के रूप में भी दरशाया है, जबकि प्रताप एक स्वतंत्र महाराणा के रूप में जिए, शासन किया तथा चित्तौड के अतिरिक्त मेवाड की धरती का कोना-कोना मुगल आक्रांताओं से छीन लिया। 1597 ईसवी में प्रताप का देहावसान भी एक स्वतंत्र शासक के रूप में हुआ। वे अपने पीछे मेवाड़ का एक सक्षम, समृद्ध तथा सशक्त राज्य अपने ज्येष्ठ पुत्र अमर सिंह के हाथों में छोड़कर गए।

अकबर के संधि प्रस्ताव
अब हम अकबर तथा उसके गिरोह द्वारा 1572 ईसवी से 1576 ईसवी के मध्य प्रताप के साथ किए गए संधि प्रयासों को देखते हैं।

प्रताप ने मुगलों के इन संधि प्रयासों को जान-बूझकर लटकाया, ताकि वे युद्ध से पहले अपनी सेना तथा संसाधनों को तैयार कर लें।

अगस्त 1572 ईसवी में संधि प्रस्ताव लेकर मुगलों का पहला दूत जलाल खाँ कोरची प्रताप के पास पहुँचा। किंतु प्रताप द्वारा उसकी पूर्ण उपेक्षा करने पर वह दो महीने मेवाड़ में रुककर अकबर के पास लौट गया। प्रताप द्वारा संधि प्रस्ताव ठुकराने की बात उसने अकबर से लगा-बुझाकर कह सुनाई।

अकबर द्वारा मान सिंह के हाथों सबसे विख्यात संधि प्रस्ताव भेजा गया था तथा इसी घटना से प्रताप का सच्चा चरित्र देखने को मिलता है। 1573 ईसवी में मान सिंह मात्र 23 वर्ष के थे, जब उन्हें यह प्रस्ताव लेकर भेजा गया। उनके साथ गए बहुत वरिष्ठ मुसलमान सेनानायकों के प्रतिनिधिमंडल में शाह कुली खाँ, मुराद खाँ सैयद अब्दुल्ला, राजा गोपाल, जगन्नाथ आदि प्रमुख थे। मान सिंह, डुंगरपुर होते हुए मेवाड की ओर आए थे। मान सिंह ने रावल आसकरण को हराकर उसकी सेना तथा नगर को ध्वस्त कर दिया था। इस कारण आसकरण को पर्वतों में जाकर छिपना पड़ा।

प्रताप के गुप्तचर पुरबिया दुरसा तथा सिसोदिया नेता, मान सिंह की सब गतिविधियों की सूचना प्रताप को दे रहे थे। सलूबर के जागीरदार ने मान सिंह की आवभगत की तथा प्रताप को सावधान किया कि मान सिंह पूरी तरह मुगलों से प्रभावित है: उसकी किसी बात पर विश्वास न किया जाए। ऐसा अनुमान है कि प्रताप के अंतर्मन में कहीं यह आशा थी कि मान सिंह के राजपूत स्वाभिमान को जगाकर उन्हें मित्र बनाया जा सकता है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि मान सिंह के दादा, राजा भारमल, मेवाड राज्य को अग्रज मानते थे। एक निर्बल उदय सिंह के कारण उन्हें मेवाड से संबंध विच्छेद करना पड़ा। 1562 ईसवी में मेवात के नवाब मिर्जा मुहम्मद द्वारा आक्रमण के समय मेवाड़ से सहायता न मिलने पर भारमल ने अपनी निष्ठा मेवाड़ से अकबर को स्थानांतरित कर दी।

प्रताप देखना चाहते थे कि क्या मान सिंह अपने पिता व दादा से भिन्न सोच रखते थे? प्रताप, गोगुंदा के पहाड़ों से निकलकर आए तथा उदयसागर की पाल पर मान सिंह तथा प्रताप का मिलना निश्चित हुआ। किंतु प्रताप ने स्वयं मिलने के स्थान पर अपने ज्येष्ठ पुत्र, कुँवर अमर सिंह को मान सिंह के साथ भोजन करने भेजा।

उन्होंने अपने मित्र तथा प्रमुख सरदार डोडिया भीम सिंह के द्वारा मान सिंह को कहलवा दिया कि महाराणा का पेट दर्द है, अतएव वे मान सिंह के साथ भोजन करने में असमर्थ हैं। मान सिंह बात समझ गए। उन्होंने भीम सिंह को प्रत्युत्तर दिया, “मुझे पेटदर्द की एक अच्छी दवा पता है, यदि प्रताप वही चुनना चाहते हैं तो फिर ठीक है। मैं सदैव मेवाड़ का हितैषी रहा हूँ, किंतु आज के बाद से आपको सावधान रहना होगा, क्योंकि अब से आपका कुसमय प्रारंभ हो चुका है।”

प्रताप को जब मान सिंह की इस उक्ति का पता चला तो उन्होंने प्रतिसंदेश कहलवाया, “यदि तुम्हें मुझसे युद्ध करना है तो मैं तुम्हें मालपुरा में मिलूँगा, किंतु यदि तुम्हारे फूफा अकबर के मन में मुझसे युद्ध की इच्छा है, तो युद्ध का स्थान उसे ही चुन लेने दो।”

उदयसागर की पाल पर मान सिंह तथा भीम सिंह डोडिया के बीच हुआ वार्तालाप मेवाड़ के इतिहास में लिखित है तथा लोककथाओं का अंग भी।

इस वार्तालाप के अंत में भीम सिंह कहते हैं, “यदि मैं तुम्हारे हाथी के निकट पहुँचा तो तुम हाथी की नहीं, मेरे भाले की सवारी करोगे, यदि ऐसा नहीं हुआ तो मेरा नाम भी भीम सिंह नहीं।”

मेवाड़ तथा जयपुर के राजपूतों के बीच यह वार्ता अब बहुत कटु स्तर तक जा पहुँची थी। प्रताप ने वे बर्तन तक उदयसागर में फिंकवा दिए, जिनमें मान सिंह ने भोजन किया था तथा उस स्थान को भी गंगाजल से शुद्ध करवाया, जहाँ मान सिंह बैठे थे।

लोक कथाओं के अनुसार, मान सिंह उदयपुर होते हुए वापस लौटे, जहाँ प्रताप स्वयं उनसे मिले तथा तुर्कों के साथ शांति हेतु तीन मुख्य बिंद रखे, जिन्हें मेवाड़ के इतिहास व लोकगाथाओं में ‘तीन च’ लिखा गया है, जिनका अर्थ अधोलिखित है–

1. मेवाड़ कभी भी तुका की ‘चाकरी’ नहीं करेगा, अर्थात् अकबर के दरबार में पेश नहीं होगा।

2. मेवाड़ कभी तुर्कों को ‘चौथ’ नहीं देगा, अर्थात् कर नहीं देगा।

3. मेवाड़ कभी तुकों को अपनी ‘छोकरी’ नहीं देगा, अर्थात् मुसलमानों से विवाह का संबंध नहीं बनाएगा।

वस्तुतः प्रताप ने मान सिंह को एक ऐसा प्रस्ताव दिया था, जिसे मान सिंह स्वीकार ही नहीं कर सकते थे। वे रुष्ट व निराश होकर वहाँ से आगरा चले गए। मुगलों की ओर से तीसरा संधि प्रस्ताव लेकर पहुँचे आमेर के राजा भगवानदास, जो मान सिंह के पिता थे। ये वही भगवानदास थे, जिन्होंने 1568 में चित्तौड़ के साके में अकबर का साथ दिया था तथा अपने राजपूत भाइयों से द्रोह किया था।

प्रताप के मन में इनके लिए केवल घृणा थी। प्रताप ने फिर भी उन्हें गोगुंदा में आमंत्रित किया था। अग्रज होने के नाते सम्मान भी दिया, किंतु उन्होंने वही तीन बिंदु उन्हें भी कह सुनाए। प्रताप ने भगवान दास के साथ भोजन नहीं किया।

सितंबर 1573 ईसवी में भगवान दास भी खाली हाथ लौटे। इसके पश्चात् अक्तूबर 1573 ईसवी में, अंततः अकबर ने एक अंतिम संधि प्रयास के रूप में राजा टोडरमल को प्रताप के पास भेजा।

प्रताप ने टोडरमल का गोगुंदा में स्वागत किया। प्रताप ने टोडरमल को एक हाथी भेंट किया, जिसे विनम्रता के साथ उन्होंने लेने से मना कर दिया। टोडरमल भी प्रताप को संधि हेतु समझाने में विफल हुए; इसी के साथ अकबर द्वारा बार-बार भेजे जाने वाले संधि-प्रस्तावों की कड़ी का अंत हो गया। मेवाड़-मुगल युद्ध अब अधिक दूर नहीं था।

यह सोचने की बात है कि अकबर द्वारा मेवाड़ को बार-बार संधि-प्रस्ताव क्यों भेजे गए ? क्योंकि जैसा चमचे इतिहासकारों ने लिखा है, यह युद्ध तो एक विशाल तथा सक्षम, मुगल साम्राज्य और एक छोटे से हिंदू राज्य के बीच था। फिर अकबर शांति क्यों चाहता था ?

1. बार-बार भेजे गए संधि-प्रस्तावों से पता चलता है कि यह जो विशाल मुगल साम्राज्य था, वह केवल वामपंथी इतिहासकारों की कपोल कल्पना में ही था, जिसका कारण उनकी अपनी भ्रांत धारणाएँ हैं। सत्य में अकबर का राज्य केवल राजपूतों व अन्य राजाओं के साथ भिन्न-भिन्न संधियों के फलस्वरूप कामचलाऊ व्यवस्था मात्र था। एक ऐसा जुगाड़ था, जो कभी भी खंडित हो सकता था। अकबर एक अस्थिर चित्त का इस्लामी भेड़िया था, जो कई बार हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा प्रकट कर बैठता था। अबुल फज्ल लिखता है, ‘एक बार सूरत में किसी विषय पर अकबर मान सिंह पर क्रोधित हो गया। मदिरा के प्रभाव में उन्मत्त अकबर ने मान सिंह को गिराकर उनका गला दबाना चाहा। सैयद मुजफ्फर नाम के एक सेनापति ने मान सिंह को छुड़ाया।’

अकबर जानता था कि उसके साम्राज्य का प्रपंच, ताश के पत्तों का एक निर्माण है, जो एक राजा के सम्यक् विरोध से भी ढह सकता है। अकबर का दुर्भाग्य यह रहा कि वे राजा महाराणा प्रताप निकले ! चातुर्य, शौर्य, संगठन, त्याग, धैर्य व धर्मनिष्ठा के अद्भुत मिश्रण, प्रताप ने अकबर का अंदेशा उचित सिद्ध किया। प्रताप के विरोध के कारण ही अकबर हिंदुओं को मिटा नहीं पाया।

2. मुगल साम्राज्य की झूठी अवधारणा इसलिए भारतीय जनमानस में समा गई, क्योंकि अधिकतर भारतीय इतिहासकारों ने फारसी, तुर्क तथा अन्य मुसलमान लेखकों द्वारा लिखित संस्मरणों को अपने लेखन का आधार बनाया है। ये मुसलमान लेखक अपने बादशाहों की चाटुकारिता में असत्य भी लिखते थे तथा हिंदू राजाओं के प्रति पूर्वाग्रह से भरे हुए थे। इसीलिए इनकी निष्पक्षता पर पूर्ण संदेह है।

जिस प्रकार की भाषा एवं तथ्यों का प्रयोग फारसी, तुर्क व अरब इतिहासकारों ने किया है, वह न तो सभ्य है, न ही प्रामाणिक, बल्कि अतिशयोक्तियों तथा तत्कालीन मुसलमान शासकों की चापलूसी से भरी है। उदाहरणार्थ, अबुल फज्ल लिखता है कि प्रताप को अकबर के वचनों पर विश्वास नहीं था, अतः उन्होंने स्वयं जाने की अपेक्षा अमर सिंह को अकबर के दरबार में भेजा था। यह सर्वथा बेसिर-पैर की बात है। यदि कुँवर अमर सिंह अकबर के पास गए होते तो फिर प्रताप तथा अकबर के मध्य युद्ध की स्थिति कभी आनी ही नहीं चाहिए थी।

टॉड या श्यामलदास तो प्रताप के सैंकड़ों वर्षों के बाद इतिहास लिख रहे थे, उनकी त्रुटियाँ तो भूलवश हो सकती हैं। अबुल फजल तो प्रताप का समकालीन था। इतनी निर्लज्जता से इतना बड़ा असत्य बोलना इस्लामी इतिहासकारों को नग्न कर देता है।

अतः ऐसा कहा जा सकता है कि तथाकथित महान मुगल साम्राज्य, निर्माणाधीन प्रकल्प था व मुसलमानों का अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार था।

सत्य यह है कि तुर्कों तथा मेवाड़ के बीच एक प्रकार से समानता थी। अकबर के संधि प्रस्ताव उसकी चतुराई का प्रमाण अवश्य थे, जिसके आधार पर वह मेवाड़ से संधि करके उसे शनैः शनैः समाप्त करने के सपने देख रहा था।

3. चित्तौड़ पर आक्रमण के समय अकबर ने मेवाड़ के योद्धाओं, आमजन के शौर्य तथा बलिदान का स्वाद चख लिया था। मेवाड़ के केवल 8,000 सशस्त्र सैनिकों ने 30,000 तुर्क सेना को हताहत कर दिया तथा चित्तौड़ विजय करना केवल इसीलिए संभव हो पाया, क्योंकि उस समय तुर्कों की संख्या मेवाड़ से दस गुना अधिक थी।

अकबर एक धूर्त व्यक्ति था, जिसने मेवाड़ की सैन्य शक्ति तथा उनके आत्मोत्सर्ग की क्षमता को अपनी आँखों से देखा था। अकबर साक्षी था मेवाड़ के उस अमर बलिदान का, कि जब मेवाड़ी वीरों के पास संसाधन समाप्त हुए तो किस प्रकार महिलाओं ने जौहर किया तथा पुरुषों ने साका। अकबर के लिए प्रताप से युद्ध करने के लिए मेवाड़ के पर्वतीय क्षेत्र में घुसना, अपनी तुर्क सेना को मृत्यु के मुख में प्रवेश करवाने जैसा था। फलतः उसने संधि का मार्ग चुना। अकबर समझ चुका था कि यदि साका-जौहर जैसी एक और घटना मेवाड़ में पुनः घटी, तो उसका राज्य भरभराकर गिर जाएगा। 1568 के साके-जौहर के समय उदय सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ एक निर्बल नेतृत्व के कारण भ्रम में था। पर इस बार यदि वैसा नरसंहार हुआ तो पूरा हिंदू समाज प्रताप के नेतृत्व में उठ खड़ा होगा। राजपूत आपसी मतभेद भुलाकर उसका नाश कर देंगे।

यह संभावना मात्र अकबर के लिए प्रताप से संधि का प्रयास करने को पर्याप्त थी।

4. अफगानिस्तान, पंजाब, बंगाल, बिहार तथा गुजरात में उसके शासन में हो रहे विद्रोहों से अकबर त्रस्त था। वह मेवाड़ के साथ नया मोर्चा नहीं खोलना चाहता था। मारवाड़ के राजा चंद्रसेन से अकबर निरंतर युद्ध रत रहा तथा उन्हें पराजित करने के बाद ही उसका ध्यान मेवाड़ की ओर जा पाया। बहरम खाँ, जो अकबर का संरक्षक था, अब अकबर का शत्रु बन, विद्रोह कर चुका था। अकबर ने बहरम खाँ की पत्नी, अपने पालक तथा संरक्षक की पत्नी को अपनी भोग दासी बना लिया था। हिंदुओं में गुरु की पत्नी माँ स्वरूप होती है। तुर्क अकबर, यह घटिया सभ्यता हमारे पवित्र देश में लेकर आया। बहरम खाँ एक शिया मुसलमान था तथा अकबर के सुन्नी धर्मगुरु सतत अकबर को बहरम के विरुद्ध भड़काते थे। 

अकबर, हिंदू सेनापतियों पर बहुत अधिक निर्भर हो गया था तथा मेवाड़ के समर्पण से उस पर दबाव काफी कम हो सकता था। इसीलिए प्रताप को संधि के प्रस्ताव भेजता रहा।

5. अकबर, प्रताप को अपना सामर्थ्य दिखाकर, बिना लड़े ही उन्हें पराजित करना चाहता था। 1572 तक, जब महाराणा उदय सिंह की मृत्यु हुई, तब तक अकबर ने मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों के साथ संधि करने या हस्तगत करके वर्चस्व स्थापित कर लिया था। एक समय तो प्रताप के अधिकार में केवल 300 वर्ग मील का बंजर व अनुपजाऊ क्षेत्र रह गया था।

अकबर ने सोचा कि प्रताप इन मुश्किलों का सामना नहीं कर पाएँगे, अंततः समर्पण कर देंगे। हम कह सकते हैं कि अकबर के संधि प्रस्ताव प्रताप पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए थे। किंतु अकबर जैसे कामांध हत्यारे को प्रताप की धर्मनिष्ठा के बारे में क्या पता था ? अकबर तो सदियों पुरानी इस्लामी चाल ही काम में ले रहा था, जिसके अनुसार काफिरों की निष्ठा खरीदकर भी इस्लाम का प्रसार करना उचित बताया गया है। पर सामने थे आठ सौ वर्षों के संघर्ष के वाहक, पौरुष के साक्षात् अवतार, महाराणा प्रताप सिंह, जो स्वतंत्रता व धर्मरक्षा के सामने सत्तासुख को मिट्टी के ढेले से अधिक नहीं मानते थे। अकबर तो अपने रेगिस्तानी मजहब की सीख पर ही चल रहा था कि इस्लाम के विस्तार के लिए काफिरों व काफिरों के नेतृत्व की निष्ठाएँ खरीद लो। अकबर को प्रताप के संकल्प तथा सामर्थ्य का कुछ पता नहीं था, अतः अकबर की अनभिज्ञता भी समझ में आती है।

6. जगमाल तथा सगर-प्रताप के दो सौतेले भाई, प्रताप को छोड़कर अकबर से जा मिले थे। अकबर उनकी सहायता से प्रताप के परिवार में गृहयुद्ध करवाना चाहता था। किंतु सामंतों, परिवार व मेवाड़ की जनता केवल प्रताप से प्रेम करती थी। इन सबने अकबर के विरुद्ध प्रताप का ही साथ दिया, फिर चाहे जो भी कष्ट सहन करना पड़ा हो।

मेवाड़ के भील, प्रताप की सेना की रीढ़ की हड्डी सिद्ध हुए। वे आजीवन प्रताप के गुप्तचर, रक्षक, पोषक व संदेशवाहक बने रहे। भीलों की निष्ठा, जो सदियों से मेवाड़ के प्रति थी तथा प्रताप के समय भी रही, अनुकरणीय थी। मेवाड़ की पूरी प्रजा ने 'शुष्क भूमि नीति' का पालन कर दस वर्षों तक असह्य कष्ट सहे, पर प्रताप का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रकार अकबर के सारे प्रपंच, भीलों व मेवाड़ के महान लोगों के संकल्प के चलते विफल हो गए।

7. अकबर जानता था कि अरावली के दरों में उसका तोपखाना निष्फल रहेगा। उसके दादा बाबर द्वारा उपयोग की गईं ‘तुलघुमा’ व ‘अराबा’ जैसी युक्तियाँ मेवाड़ की पहाड़ियों में प्रभावहीन रहेंगी, इसलिए भी वह संधि करने को आतुर था। इधर, प्रताप व उनके सामंत, चित्तौड़ के हत्यारे से प्रतिकार लेने को आतुर थे, सो संधि प्रस्तावों के साथ खेलते हुए, प्रताप व उनके सहयोगी एक लंबे युद्ध की तैयारी में लगे रहे।

8. अकबर, मेवाड़ के साथ आमने-सामने का संघर्ष, मेवाड़ की धरती पर टालना चाहता था। उसे पता था कि मेवाड़ की सेना को अरावली में पराजित करना असंभव है। वह जानता था कि अरावली में प्रताप को बंदी बनाना या पराजित कर, उनकी हत्या करना असंभव था। उल्टे मेवाड़ के हाथों अकबर की पराजय एक भयानक दुःस्वप्न की भाँति होती, क्योंकि अकबर के सहायक हिंदू राजा विद्रोह कर सकते थे।

युद्ध की तैयारी
अब हम प्रताप द्वारा आमेर की राजपूत तथा दिल्ली की तुर्क सेनाओं पर आक्रमण हेतु की गई तैयारी पर बात करते हैं। यहाँ से आरंभ होती है उस महान हिंदू राजा की गाथा, जिसने अपनी मातृभूमि तथा प्रजा की रक्षा हेतु अपनी योजनाएँ इतनी कुशलता से बनाई कि सफलता, सदैव उनकी दासी बनकर रही।

एक कुशल नेता, जो अपने सरदारों, सेना तथा आमजन के साथ पूरा सामंजस्य बनाकर चलते थे, एक ऐसे राजा, जिन्हें अपनी तथा अपने शत्रु की शक्ति तथा क्षीणता का भली-भाँति बोध था। एक पूर्ण पुरुष, जिनका भाग्य ने कभी साथ नहीं दिया, न ही समय ने कोई उदारता दिखाई तथा न ही जीवन ने उन पर कोई अनुकंपा की, पर इन सबके उपरांत भी उन्होंने अपनी प्रजा तथा मातृभूमि की सेवार्थ अपने जीवन का सर्वस्व समर्पित कर दिया।

एक ऐसे योगी, जिन्होंने भावुकतावश कभी भी भय की छाया नहीं खोजी, पिता की ओर से सम्मान न मिलने पर भी कभी बुरा नहीं माना, भाई-बंधुओं में क्लेश के बाद भी उन्हें उतना ही प्रेम दिया, एक वीर योद्धा की तरह जीवन जिया तथा कभी अपने कष्टों के लिए भाग्य को दोष नहीं दिया। एक कर्मयोगी, जिन्होंने मृत्युपर्यंत मेवाड़ की स्वाधीनता के अपने एकमात्र लक्ष्य हेतु अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। एक साधक, जिन्हें हिंदू धर्म तथा सनातन मूल्यों का ज्ञान था तथा इन्हीं नैतिक मूल्यों पर चलकर उन्होंने विजयश्री प्राप्त की।

1568 ईसवी में चित्तौड़ के तीसरे साके से 1576 ईसवी में हल्दीघाटी के युद्ध तक, अकबर तथा प्रताप, दोनों ही अपने-अपने लक्ष्य साध रहे थे। अकबर अफगानिस्तान तथा बंगाल में हुए विद्रोहों का दमन कर रहा था, तो प्रताप आस-पास के सभी छोटे-बड़े राजाओं से संधि तथा संबंध स्थापित कर रहे थे। वे एक ऐसी संयुक्त सेना का निर्माण कर रहे थे, जो भविष्य में अकबर तथा आमेर के राजपूतों की संयुक्त सेनाओं से टकराकर उन्हें पराजित कर पाती। अपने उन राजपूत भाइयों से लड़ने में, जो कि अकबर के साथ जा मिले थे, निस्संदेह प्रताप का हृदय दुःखी था। उन्होंने भारी मन से अपने लोगों से युद्ध का निर्णय लिया, क्योंकि स्वाधीनता का मूल आदर्श तथा धर्म की रक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण साध्य थे।

इस युद्ध हेतु प्रताप की जो तैयारियाँ तथा योजना थी, उनका लेखा-जोखा निम्नलिखित है—

1. प्रताप ने अत्यंत सूझ-बूझ से तुर्क आक्रांता को गुरिल्ला युद्ध-पद्धति से थकाकर मेवाड़ की पग-पग भूमि पर पुनः अपना अधिकार करने की ठानी थी। जब प्रताप के पिता, महाराणा उदय सिंह ने चित्तौड़ छोड़कर उदयपुर में बसने का विचार किया, तो वहाँ उनका स्वागत पोनरवा के ठाकुर राव हरपाल ने किया था। हरपाल, राजपरिवार को पोनरवा के सघन वनों में ले गए, जहाँ उनका गढ़ स्थापित था। इसके पश्चात् प्रताप तथा उनके साथ राजपरिवार की महिलाओं को छप्पन व कमलनाथ के पर्वतीय क्षेत्र में रखा गया। वहाँ भोजन-पानी की पर्याप्त व्यवस्था थी, सो प्रताप अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त थे। योद्धा खंडित चित्त से युद्ध नहीं लड़ सकता, इसलिए परिवार को सुरक्षित कर, प्रताप निःशंक होकर युद्ध में जुट गए।

2. प्रताप तथा उनके मंत्रियों द्वारा लिया गया सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय था–मायरा, जोवारवाला तथा मचीनपुर की गुफाओं की खोज, जहाँ उन्होंने अपने विश्वस्त सामंतों को सैन्य सामग्री, शस्त्र तथा धन छुपाने का आदेश दिया था। यहाँ पर प्रताप के शौर्यवान पूर्वजों, मुख्यतः महाराणा हम्मीर, कुंभा तथा सांगा की दूरदर्शिता का पता चलता है, जिन्होंने मेवाड़ के साम्राज्य के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था की थी। इन्हीं दूरदर्शी महाराणाओं के धन से प्रताप को इस महासमर के कठिन समय में अपने राज्य को सँभालने में महती सहायता मिली।

हमें मेवाड़ के सरदारों-सामंतों के बुद्धि-कौशल तथा सुनियोजित युद्ध कला पर भी गर्व होना चाहिए, जिन्होंने अकबर के आक्रमण से पूर्व ही चित्तौड़ से राजकोष को हटा लिया था। किसी को भनक लगे बिना कैसे उन अदम्य साहसी लोगों ने इस राजकोष को वहाँ से सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया होगा, यह भी विचारणीय है।

3. अरावली की दुर्गम पर्वत-श्रृंखला में ऐसे कई स्थान थे, जो ऊँचाई में अधिक नहीं थे तथा जहाँ पानी इत्यादि की पर्याप्त व्यवस्था थी। इन पर्वतों के मध्य पठारी भूमि, कृषि हेतु पर्याप्त मात्रा में थी तथा उपजाऊ इतनी थी कि वर्ष पर्यंत वहाँ पर किसी-न-किसी प्रकार की फसल प्राप्त की जा सकती थी। ऐसे सभी क्षेत्र आपस में आने-जाने के लिए संकीर्ण घाटियों अथवा पगडंडियों के माध्यम से जुड़े थे। इन घाटियों में मेवाड़ की सेना छिप भी सकती थी और विश्राम भी कर सकती थी। इन स्थानों तक आने वाले रास्ते इतने दुर्गम थे कि हजार लोगों को रोकने को केवल 20-30 सैनिक ही पर्याप्त होते थे। ऐसे सभी स्थानों को चिह्नित कर उनका नामकरण किया गया।

4. प्रताप ने अपने परदादा, महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित गढ़ तथा गढ़ियों को सैनिकों की विश्रामस्थली की तरह उपयोग में लिया, जिससे सैनिक अपने अगले गुरिल्ला युद्ध पर जाने से पहले पुनः विश्राम कर पाएँ। इनमें गोगूंदा सर्वोत्तम गढ़ था, क्योंकि यह हल्दीघाटी से अधिक दूरी पर नहीं था। उन्होंने जोशी पूना की अगुआई में अपनी अश्वारोही सेना को हल्दीघाटी में तैनात रखा तथा पर्वतों की कंदराओं एवं पेड़ों पर आदिवासी भील योद्धाओं को रख छोड़ा, ताकि दुश्मन पर दोहरी मार की जा सके।

5. ‘शुष्क भूमि नीति’ के चलते उन्होंने गाँवों में बसी अधिकांश जनता को केलवाड़ा, कुंभलगढ़ इत्यादि उपजाऊ धरती वाले स्थानों पर पुनर्स्थापित कर दिया। मेवाड़ के समतल स्थानों को पूर्णतः निर्जन कर दिया गया। खेतों को उजाड़ दिया गया, कुओं में विष डाल दिया गया, जिससे आने वाली मुगल सेना को भूख व प्यास से मरने की परिस्थिति उत्पन्न हो जाए। इस नीति से तुर्कों से होने वाली जनहानि से तथा माता-बहनों की अस्मिता की भी रक्षा हो सकी।

6. प्रताप ने अपनी सेना एवं युद्ध के योग्य नागरिकों के लिए शस्त्र प्रशिक्षण की भी उचित व्यवस्था की थी। इसका दायित्व ग्वालियर के राजा रामशाह तँवर को सौंपा गया था। ये वही रामशाह तँवर थे, जिनके राज्य ग्वालियर को अकबर ने हथिया लिया था तथा वे ग्वालियर को पुनः प्राप्त करने की आशा से महाराणा उदय सिंह से आ मिले थे। उसी समय से रामशाह तँवर को मेवाड़ का सेनापति तथा रणनीति का प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया गया था। उन्हें मेवाड़ की सेवा हेतु उनके परिवार तथा सेना की एक टुकड़ी के भरण-पोषण के लिए 800 रुपए प्रतिदिन मिलते थे।

चित्तौड़ के तीसरे साके के पश्चात् रामशाह के साथ उनके तीन पुत्र शालिवाहन, भवानी तथा प्रताप भी मेवाड़ की सेनाओं को शिक्षण व रणनीति सिखाने में लगे थे, जो अरावली पर्वत-श्रृंखला में बिखरी हुई थी।

मेवाड़ के भील समुदाय को लेकर गुप्तचरों का एक सशक्त तंत्र बनाया गया, जो प्रताप के अत्यंत विश्वासपात्र लोग थे। भील, वनों की संपदा पर निर्भर एक ऐसी जनजाति है, जिन्हें वेश बदलने, वनों में तुरंत अदृश्य हो जाने, कई-कई दिनों तक बिना सामान्य भोजन-पानी के जीवित रहने तथा वन में उत्पन्न होने वाले खाद्य-अखाद्य को खाकर जीवनयापन कर लेने में महारत थी। प्रताप का गुप्त सूचना तंत्र, हल्दीघाटी तथा दिवेर के युद्ध में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ, क्योंकि इन्हीं की सहायता से प्रताप को शत्रुओं की वस्तुस्थिति, उनका संख्या बल योजनाओं इत्यादि के विषय में प्रामाणिक जानकारी मिलती थी।

8. प्रताप ने सिरोही के राजा मान सिंह के साथ मित्रतापूर्ण संधि तथा अपने श्वसुर ईडर के राजा नारायणदास से सहायता का भी वचन लिया था। प्रताप को अपनी कमियों का भी पता था, जैसे कि तोपखाना। उन्होंने इसका निराकरण हाकिम खाँ सूरी तथा उसके 800 अफगान सैनिकों को भाड़े पर रख कर किया। हाकिम खान सूरी, शेर शाह सूरी का संबंधी था तथा मुगलों से घृणा करता था। उसकी निष्ठा खरीदना प्रताप की चतुरता का प्रमाण है।

प्रताप ने स्वयं राजसी वैभव का त्याग करके अपनी सेना तथा प्रजा के साथ वनों में रहने का प्रण लिया था। उन्होंने शपथ ली थी कि जब तक मेवाड़ की भूमि से मुगलों का समूल नाश नहीं कर देंगे, तब तक वे धरती पर शयन करेंगे और धातु के पात्रों में भोजन नहीं करेंगे तथा राजसी ठाट-बाट से दूर रहेंगे। प्रताप की इस शपथ से उनकी सेना तथा प्रजा इतनी प्रभावित हुई कि मेवाड़ के इस कुसमय में जन-जन ने तुर्कों के विरुद्ध हुए युद्ध में बढ़-चढ़कर भाग लिया। आमजनों की इस सम्मिलित सेना में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, चारण, भील सहित सभी 36 जातियों तथा जनजातियों ने अपनी मातृभूमि के रक्षार्थ इस युद्ध में प्रताप का साथ दिया।

प्रताप को संख्या तथा वचनबद्धता में भी जितनी सहायता प्राप्त हुई, वह अद्भुत थी। यह स्वामिभक्ति तथा वचनबद्धता तब तक बनी रही, जब तक प्रताप का अकबर से युद्ध चलता रहा, यानी 1576 ईसवी में हल्दीघाटी से 1583 ईसवी में दिवेर के युद्ध तक।

मान सिंह मुगलों के सेनापति
इधर अकबर की ओर से क्या प्रयास किए जा रहे थे, उस पर कुछ बात कर लेते हैं। अकबर ने 1576 ईसवी में अजमेर आकर अपना डेरा जमाया। मुसलमान मंत्रियों के समझाने के विपरीत, अकबर ने मान सिंह को प्रताप के विरुद्ध इस अभियान का नेतृत्व सौंपा। मुगलों की सेना में आसिफ खाँ, सैयद अहमद, हाशिम बारहा, जगन्नाथ कच्छावा, सैयद राजू, मिहतर खाँ, माधो सिंह, राव लूणकरण, मुजाहिद बेग इत्यादि भी थे।

‘मुंतखिब उल तवारीख’ का लेखक अल बदायूँनी भी मुगलों की सेना के साथ गया था। उसने हल्दीघाटी के युद्ध का वर्णन साक्षी के रूप में लिखा है, यद्यपि उसने केवल मुसलमानों के दृष्टिकोण से ही अपना संस्मरण लिखा है। मान सिंह, जिन्हें अकबर पुत्रवत् मानता था, उनका चयन मुगलों की इस सेना का नेतृत्व करने के लिए किया गया। इसके प्रमुख कारण निम्नानुसार हैं–

1. मान सिंह अत्यंत शौर्यवान तथा कुशल योद्धा थे। एक ऐसे हिंदू सेनापति थे, जिन्हें युवावस्था में ही कई युद्ध लड़ने का अनुभव था।

2. यह अकबर के द्वारा रचा गया एक सफल षड्यंत्र था, जिसमें उसने आमेर तथा मेवाड़ दोनों राजपरिवारों को एक-दूसरे के विरुद्ध कर दिया। अकबर का मंतव्य केवल प्रताप तथा मान सिंह की सेनाओं को एक-दूसरे से मरवाना नहीं था। वह दो महत्त्वपूर्ण राजपूत घरानों के बीच स्थायी वैमनस्य के बीज बोकर उसकी फसल काटना चाहता था।

3. अकबर जानता था कि यदि उनका नेतृत्व कोई मुसलमान करेगा तो जयपुर के राजपूत शस्त्र उठाने में हिचकिचाएँगे। अतः उसने उन्हीं के राजपूत राजकुमार, मान सिंह को सेनापति नियुक्त कर दिया तथा राजपूतों को राजपूतों से लड़वाने में सफल रहा। हम अकबर से, उसकी इस घातक चाल के लिए घृणा कर सकते हैं, पर कहना पड़ेगा कि यह एक बहुत ही सफल प्रयोग था, जिसने 150 वर्षों तक मुगल शासन को भारत में अक्षुण्ण बनाए रखा। 

4. अकबर को यह भी ज्ञात था कि मेवाड़ की सेना तथा राजा, दोनों ही हिंदू-धर्मध्वजधारी हैं तथा हिंदू धर्म की रक्षार्थ कोई भी बलिदान देने में नहीं हिचकेंगे। अतः मेवाड़ के सैनिक, हिंदू राजपूतों से आधे मन से ही लड़ेंगे और प्रताप को पराजित करना सहज होगा।

5. अकबर जानता था कि राजपूत राजाओं में मेवाड़ का वर्चस्व और सम्मान है तथा महाराणा सांगा के शासन काल तक जयपुर मेवाड़ को सहयोग कर दिया करता था और मेवाड़ की वरिष्ठता भी स्वीकार करता था। अकबर ने जयपुर तथा मेवाड़ घरानों में परस्पर प्रतिद्वंद्विता का लाभ उठाया तथा दो राजपूत राजाओं को एक-दूसरे का शत्रु बना दिया। 20 अप्रैल, 1576 ईसवी को मान सिंह ने मेवाड़ के मांडलगढ़ की ओर बीस हजार की सेना लेकर कूच किया। वह मांडलगढ़ में दो महीने तक रुके तथा उन्होंने अजमेर से अपनी सेना हेतु भोजन इत्यादि सामग्री तथा संसाधन जुटाए। मांडलगढ़ से उन्होंने खमनौर की ओर प्रस्थान किया, जो कि हल्दीघाटी से छह किलोमीटर की दूरी पर है। मान सिंह के मांडलगढ़ आगमन की सूचना मिलते ही प्रताप भी आगे बढ़े। एक बार तो प्रताप ने शत्रु से वहीं निपटने का मन बनाया, किंतु उनके सामंतों तथा सरदारों ने उन्हें ऐसा न करने का आग्रह किया, जिसके दो प्रमुख कारण थे–

1. मान सिंह की इतनी बड़ी सेना से समतल मैदान में युद्ध करना मृत्यु को निमंत्रण देना होगा, अतः दुश्मन को पर्वतीय क्षेत्र में खींचकर लाना होगा, जो कि मेवाड़ की सेना के अनुकूल रहेगा।

2. मान सिंह तो मुगल प्रतिनिधि बनकर रह गए थे। इस बार का युद्ध केवल दो राजाओं की सेनाओं का नहीं था, वरन् इस युद्ध के परिणाम पर हिंदुओं तथा मेवाड़ का भविष्य निर्भर था। यह समय अत्यधिक सावधानी का था, क्योंकि प्रताप के लिए पराजय अब विकल्प ही नहीं रह गई थी।

प्रताप अपने सरदारों की बातों को मान, उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे। जब मान सिंह भी खमनौर तक पहुँच गए तो यह निश्चित हो गया था कि युद्धस्थल हल्दीघाटी ही होगा। प्रताप ने अपनी सेना को कुंभलगढ़ से गोगुंदा भिजवा दिया था, जो कि हल्दीघाटी से तीस किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है।

युद्ध से कुछ दिन पूर्व राजा रामशाह तँवर के गोगुंदा स्थित निवास पर मेवाड़ की युद्ध परिषद् की बैठक हुई, जहाँ आगामी युद्ध पर विस्तार से मंत्रणा की गई। इसमें ग्वालियर के तंवर वंश के सरदार रामशाह तँवर तथा उनके तीन पुत्रों शालिवाहन, भवानी तथा प्रताप के साथ रामशाह के किशोर वय पौत्र धर्मागत भी थे।

इस युद्ध मंत्रणा हेतु मेवाड़ के प्रमुख सामंत, राव संग्राम सिंह, झाला बीदा, झाला मान, भीम सिंह डोडिया, दुर्गा सिंह परमार, हरिदास चौहान, नाथा चौहान, प्रज्ञा दास भाकरोट, आलम राठौर, नेत सिंह सारंगदेवोत, कृष्णदास चूँडावत तथा भामाशाह अपने भाई ताराचंद के साथ उपस्थित थे। मेवाड़ के राजपरिवार तथा प्रताप के कई निकट संबंधी भी वहाँ उपस्थित थे, जैसे कि मान सिंह सोनगरा (प्रताप के मामा), कुंपा राठौर (जयमल राठौर के पुत्र) व कल्याण सिंह चूँडावत (पत्ता चूँडावत के पुत्र)। सभी वरिष्ठ जनों का मत था कि मेवाड़ की सेना को पर्वतीय क्षेत्र से बाहर नहीं निकलना चाहिए तथा मुगल सेना को पहाड़ों में अंदर आने देना चाहिए।

रामशाह, नेत सिंह, कृष्णदास तथा अन्य वरिष्ठ जनों का मानना था कि जयपुर के राजपूत योद्धाओं के अतिरिक्त मुगल सेना को पर्वतीय क्षेत्र में युद्ध करने का कोई अनुभव नहीं है, अतः उन्हें तो मेवाड़ की सेना वहीं परलोक पहुँचा देगी। इसके विपरीत, युवा सरदारों का मानना था कि युद्ध पहाड़ों की अपेक्षा मैदान में होना चाहिए।

फिर सब सेनानायकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि मेवाड़ की सेना हल्दीघाटी से निकलकर मुगल सेना पर तीन दिशाओं से आक्रमण करेगी तथा बनास नदी के तट पर खमनौर के मैदानी क्षेत्र में युद्ध करेगी, परंतु घाटी से दूर नहीं जाएगी। यह निर्णय वरिष्ठ सरदारों द्वारा पूर्व में लिये गए निर्णय के एकदम विपरीत था, जिसके अनुसार मुगल सेना हल्दीघाटी के भीतर आने दिया जाना था तथा अरावली के पर्वतों तथा वनों की आड़ में छापामार युद्ध करना था।  

प्रताप ने युवा सरदारों के निर्णय को मान दिया, क्योंकि उनके मन में भी शत्रु को मेवाड़ की सैन्य शक्ति का वीभत्स रूप दिखाने की एक योजना थी। यदि उन्होंने मुगल सेना को पराजित कर दिया तो अन्य हिंदू राजा स्वतः ही मेवाड़ से मिल जाएँगे। इसके विपरीत, यदि मेवाड़ की पराजय होती है, तो भी अकबर तथा अन्य राजाओं को कम-से-कम यह संदेश चला जाए कि मेवाड़ कभी तुर्कों के आगे समर्पण नहीं करेगा।

केवल पर्वतों में छुपे रहने से तो प्रताप और मेवाड़ के युवा योद्धाओं को मुगलों के रक्त से अपनी खड्ग की प्यास बुझाने का अवसर कहाँ से मिलता।

प्रताप, मान सिंह तथा उसके राजपूत योद्धाओं को भी परखना चाहते थे कि वे अपने राजपूत भ्राताओं से विमुख होकर एक विधर्मी ध्वज के नीचे कैसे लड़ते हैं? प्रताप को कहीं आशा थी कि जयपुर की सेना में जो राजपूत सैनिक हैं, कम-से-कम उनके मन में तो अपने मेवाड़ी राजपूत भ्राताओं की निर्मम हत्या का विचार हिचकिचाहट पैदा करेगा !

हल्दीघाटी के इस युद्ध के समय प्रताप के सबसे शौर्यवान तथा ज्येष्ठ पुत्र, कुँवर अमर सिंह को युद्ध से दूर रखा गया। अपनी सेना से दो-तीन गुना बड़ी सेना से भीषण युद्ध के लिए निकलते समय प्रताप ने निर्णय लिया कि यदि वे इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो जाएँ तो पीछे कुँवर अमर सिंह इस संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए जीवित रहें।

इधर गोगुंदा में ही, युद्ध के लिए निकासी से पूर्व इस बात का निर्णय हो चुका था कि यदि मुगल सेना मेवाड़ की सेना पर हावी होती है तो मेवाड़ की सेना पुनः पर्वतीय क्षेत्रों में अपने ठिकानों में लौट जाएगी तथा किसी भी स्थिति में प्रताप को सभी ओर से शत्रुओं से सुरक्षित रखना होगा। यह भी निर्णय लिया गया कि यदि मुख्य सेनापतियों में से कोई भी प्रताप को युद्ध स्थल छोडने के लिए कहता है तो प्रताप को वहाँ से जाना ही होगा, प्रताप को अकारण ही अपना बलिदान नहीं देना है। 

भीलों की सेना को पेडों तथा कंदराओं में छुपकर मुगल सेना पर रस्सी से बने एक प्रकार के उपकरण, यानी गोफण से पत्थरों की वर्षा करनी थी। इस प्रकार फेंके गए पत्थर किसी गोली की भाँति जाकर शत्रु सेना को लगते थे तथा उसे भीषण हानि पहुँचाते।

मेवाड़ के राजकीय इतिहास तथा कर्नल टॉड द्वारा मेवाड़ के सैन्यबल की संख्या बीस हजार, तथा मान सिंह के नेतृत्व में अस्सी हजार की सेना बताई गई है। जबकि मुसलमान लेखकों ने प्रताप की सेना 3,000 तथा मान सिंह की 5,000 बताई है।

पहली बात, यह निश्चित है कि चित्तौड़ के साके के समय जो 8,000 मेवाड़ के सैनिक लड़े थे, वे पूरी मेवाड़ी सेना के अंशमात्र थे, तो प्रताप के पास 20,000 सैनिक होना कोई असंभव बात नहीं थी। दूसरी बात, हल्दीघाटी का युद्ध सामरिक दृष्टि से बड़ा युद्ध था। जिस स्तर के सेनानायक दोनों तरफ से लड़ रहे थे, उनकी सेनाओं का जोड़ भी 20,000 के पक्ष में बैठता है। तीसरी बात, जैसा कि हम जानेंगे, यह युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे से लेकर खमनौर होते हुए बनास नदी तक लड़ा गया। इतने विस्तृत युद्ध में मात्र 3,000 की सेना होने की बात समझ नहीं आती है।

बदायूँनी के लेखन का विरोधाभास भी बहुत कुछ बता रहा है। एक तरफ वह मान सिंह को ‘इस्लाम की तलवार’ की संज्ञा देता है, दूसरी तरफ वह मेवाड़ की सेना 3,000 बताता है! इतनी कम सेना का अर्थ यह था कि हल्दीघाटी कोई युद्ध न होकर एक छोटी-मोटी भिड़ंत थी।

प्रताप के विरोध की महिमा को कम करने के लिए मुसलमान लेखक द्वारा हल्दीघाटी को छोटा संघर्ष बताना एक मनोवैज्ञानिक पैंतरा था।

संख्या चाहे जो भी रही हो, एक बात निश्चित है कि प्रताप अपनी सेना से दो-तीन गुना बड़ी सेना से युद्ध करने उतरे थे। पर्वतीय क्षेत्र के निकट युद्ध करने की उनकी रणनीति उनके लिए निर्णायक रूप से लाभकारी रहनेवाली थी। प्रताप ने अपनी सेना का पड़ाव लोसिंग नामक गाँव में डाला, जो कि खमनौर से केवल 10 मील दक्षिण-पश्चिम में था तथा मान सिंह ने खमनौर के निकट मोटेला ग्राम में अपना पड़ाव डाला। अब ये दोनों ही सेनाएँ एक-दूसरे से केवल छह मील की दूरी पर रह गई थीं।

यहाँ एक प्रसंग का उल्लेख आवश्यक है। भील गुप्तचरों ने प्रताप को सूचित किया कि मान सिंह मात्र सौ घुड़सवारों के साथ लोसिंग के निकट वन में भटक गए हैं। कुछ सलाहकारों ने वहीं मान सिंह को मार डालने की बात प्रताप से कही। झाला बीदा ने इसका विरोध किया। उनके मतानुसार एक तुच्छ लाभ के बदले में जयपुर तथा मेवाड़ के बीच स्थायी वैमनस्य उत्पन्न हो जाएगा, जिसे फिर भुलाना असंभव होगा। प्रताप ने बीदा से सहमति जताई तथा मान सिंह को सुरक्षित लौट जाने दिया।

प्रताप का यह निर्णय हिंदुओं के भविष्य के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ। प्रताप की तीन पीढियों के बाद जयपुर व मेवाड़ के राजपूत पुनः एकजुट हो गए। औरंगजेब ने जब प्रताप के पड़पोते महाराणा राजसिंह के शासनकाल में मेवाड़ पर पुनः आक्रमण किया, तब जयपुर ने ही मेवाड का परोक्ष रूप से साथ दिया।

युद्ध का दिन
मेवाड़ की सेना दो भागों में आक्रमण करती थी, अग्रिम दस्ते को ‘हरावल दस्ता’ कहा जाता था तथा पृष्ठ भाग के दस्ते को ‘चंदावल दस्ता।’ हल्दीघाटी के युद्ध को समझने हेतु हमें दोनों सेनाओं के इन्हीं दोनों दस्तों के व्यूह को समझना होगा।

18 जून, 1576 को महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के रास्ते होते हुए खुले रणक्षेत्र में आ गए। यह हल्दीघाटी के उत्तर से आने वाले रास्ते के अंत में था, जिसे अब ‘बादशाही बाग’ कहते हैं। मान सिंह ने सर्वाधिक अनुभवी, 80 बारहा सैयद सैनिकों को प्रताप तथा उनकी सेना के निकास द्वार पर लगाया। प्रताप ने अपनी सेना को तीन भागों में विभक्त किया। वाम पक्ष में मेवाड़ का हरावल दस्ता, जिसका नेतृत्व झाला मान, जैत सिंह, झाला बीदा तथा मान सिंह सोनगरा कर रहे थे। दक्षिण अथवा दाईं ओर से नेतृत्व कर रहे थे राम शाह तँवर, उनके तीन पुत्र तथा एक पौत्र। उनके साथ थे भामा शाह तथा उनके अनुज ताराचंद। ताराचंद अद्वितीय खड्गधारी थे। उनके विषय में प्रसिद्ध है कि वे दोनों हाथों से एक साथ खड्ग चला सकते थे।

मध्य हरावल के नेतृत्व का दायित्व था भीम सिंह डोडिया, रावल कृष्ण दास, रावत सांगा, रामसिंह तथा हाकिम खान सूरी पर। मध्य में चंद्रावल दस्ते में थे पूँजा राणा, पुरोहित गोपीनाथ, पुरोहित जगन्नाथ, कल्याण पड़िहार, जयमल बच्छावत, जैसा चारण तथा केशव चारण। संख्या कम होने के कारण मेवाड़ के पास केवल एक चंदावल दस्ता था। प्रताप को इस व्यूह के मध्य में रखा गया था। मुगल सेना भी इसी तरह से सुसज्जित थी।

मुगल सेना का दायाँ भाग सैयद बारहा सैनिकों का था, जो अपने शौर्य तथा अनुभव के कारण प्रसिद्ध थे। वाम भाग का नेतृत्व कर रहा था गाजी खाँ, उसके साथ राव लूणकरण, जगन्नाथ कच्छावा व आसिफ खाँ थे। मान सिंह को मध्य में सुरक्षित रखा गया था, किंतु उनकी रक्षा हेतु मुगलों का हरावल दस्ता भी था। इस युद्ध में निर्णायक रही मुगलों की दो आरक्षित टुकड़ियाँ। इनमें आगे की आरक्षित सेना का नाम था ‘अल्तमश’, जिसके नायक थे माधो सिंह। उसे जहाँ भी मुगल सेना क्षीण पडती, सहयोग देने का आदेश था। पृष्ठ भाग की आरक्षित सेना का नायक था चालाक मिहतर खाँ।

18 जून, 1576 को प्रातः ग्यारह बजे के आस-पास खमनौर के निकट के मैदान में यह युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध का जो भी परिणाम होता, उसका स्पष्ट प्रभाव इस उपमहाद्वीप के हिंदुओं पर पड़ना निश्चित था। सर्वप्रथम, महाराणा प्रताप सिंह हल्दीघाटी के मुहाने से अकेले निकलकर खुले में मुगल सेना के सामने खड़े हो गए। कुछ क्षणों मैं हाकिम खाँ व भामाशाह उनके दोनों ओर आ गए। प्रताप ने भयंकर क्रोध व घृणा से मुगल सेना पर दृष्टि डाली।

बदायूँनी लिखता है, “कीका राणा ने नफरत से हमारी ओर देखा। गरमी ऐसी पड़ रही थी कि खोपड़ी में मगज (बुद्धि) पिघल रहा हो।”

शंखनाद के साथ हिंदू सेना ने मुगल सेना पर धावा बोल दिया। अबुल फजल ने अपने संस्मरणों में लिखा है, “दोनों ही सेनाएँ युद्ध से प्रेम करती थीं तथा जीवन से घृणा। उन्होंने जीवन से बढ़कर अपने स्वाभिमान का मूल्य मान लिया था।”

मेवाड़ के मध्य भाग में हरावल दस्ते द्वारा प्रथम आक्रमण किया गया। यह आघात हाकिम खाँ सूर और उनके अफगान सैनिकों ने मुगलों के हरावल पर किया तथा मुगलों को भीषण हानि पहुँचाई।

प्रताप ने काजी खाँ पर हल्ला बोल दिया, जो हल्दीघाटी के मुख पर अपने सैनिकों के साथ खड़ा था। इन्हें परलोक पहुँचाकर प्रताप ने सैयद हाशिम बारहा पर हमला किया। फिर उन्होंने जगन्नाथ कच्छावा तथा आसिफ खाँ के नेतृत्व वाली मुगल सेना की ओर अपना अश्व मोड़ लिया। प्रताप के भीषण तथा औचक घात से सभी सेनानायक विकल हो उठे।

प्रताप तथा उनकी सेना ने इन्हें घेरकर पथरीले तथा कँटीली झाड़ियों वाले मैदान की ओर धकेल दिया। यहाँ से आसिफ खाँ ने मुगल सेना के मध्य में मान सिंह के निकट जाकर अपने प्राण बचाए।

जगन्नाथ कच्छावा अत्यंत शौर्यवान तथा कुशल योद्धा था, किंतु वह भी अपने अश्व से गिरते-गिरते बचा; उसे बचाने हेतु मुगलों की आरक्षित सेना को लेकर माधो सिंह को आना पड़ा।

प्रताप ने इस आरक्षित सेना को भी काटना आरंभ कर दिया तथा सैयद बारहा सैनिकों के अतिरिक्त मुगलों की मध्य की सेना तितर-बितर हो गई। इधर मेवाड़ की दाईं वाहिनी ने मुगलों की वाम वाहिनी पर आक्रमण करके उसे ध्वस्त कर दिया तथा उन्हें अपने प्राणों की रक्षा हेतु पीछे पलायन करना पड़ा। साँभर के राजपूत सैनिक, जिनका नेतृत्व राव लूणकरण कर रहा था, वह भेड़ों के झुंड के समान भाग कर मुगलों की दक्षिण वाहिनी, जिसका नेतृत्व बारहा सैयद कर रहे थे, के पीछे छुप गए।

मेवाड़ की वाम वाहिनी लेकर झाला बीदा ने सैयदों पर भयंकर हमला किया तथा उन्हें पूर्णतया परास्त किया। किंतु घायल व आहत होकर भी ये सैयद रणक्षेत्र में रहे। इन्होंने भागने की अपेक्षा मृत्यु को अंगीकार करना उचित समझा। बदायूँनी ने लिखा है, “यदि सैयद अपना स्थान छोड़ देते तो उस दिन मुगल सेना को भयंकर हानि हो सकती थी।”

यहाँ एक प्रसंग है, जिसके माध्यम से इस्लामी आक्रांताओं की विकृत मनोदशा से हिंदू समाज को अवगत करवाना आवश्यक है।

इस प्रसंग को स्वयं बदायूँनी ने अपने संस्मरणों में लिखा है, जिससे हिंदुओं को भारत पर इस्लामी आक्रमणों के सत्य का ज्ञान हो जाएगा तथा उनका यह भ्रम भी दूर हो जाएगा कि इस्लामी सभ्यता मुसलमानों व गैर-मुसलमानों में भेद नहीं करती है।

जब दोनों ही ओर से सेनाएँ ऐसे तुमुल युद्ध में व्यस्त थीं तो दोनों ही पक्षों के वाम-मध्य तथा दक्षिणी वाहिनियों में युद्धरत आमेर तथा मेवाड़ के सैनिकों के बीच अंतर कर पाना असंभव हो चला था। दोनों ओर के सभी राजपूत केसरिया बाना पहनकर युद्ध में जाते थे तथा कद-काठी व मूँछों के कारण एक जैसे ही दिख रहे थे। ऐसे में अल बदायूँनी, आसिफ खाँ से पूछता है, “मुझे तो दोनों ही ओर राजपूत सैनिक दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने केसरिया दुपट्टा अनहिन वस्त्र बाँधा हुआ है, अब ऐसे में आमेर तथा मेवाड़ के राजपूतों में से शत्रु तथा मित्र को पहचानेंगे कैसे?”

इसके उत्तर में आसिफ खाँ ने कहा, “तुम तो मुक्त हस्त से बाण चलाओ, बाण किसी भी राजपूत को लगे, मरेगा तो काफिर ही, जीतेगा तो इस्लाम ही।”

काश, उस समय तथा आज के हिंदू, आसिफ खाँ के इस उत्तर का वास्तविक अर्थ समझ पाते ! यदि हिंदू समाज को समझ आ जाए कि हम एक ऐसे हत्यारे समाज से युद्धरत हैं, जिनके कोई नैतिक मूल्य हैं ही नहीं; यदि हिंदुओं को आसिफ खाँ के इन शब्दों का उचित अर्थ समझ में आए कि उनके लिए पारस्परिक मित्रता, वचनबद्धता तथा व्यक्तिगत निष्ठा इस्लाम के विस्तार के सम्मुख कोई मूल्य ही नहीं रखते।

यदि आज भी हिंदू समझ पाते कि विश्व में इस्लाम के विस्तार को लेकर जो यह मनोविकृति है, उसके रहते इन इस्लामी उपद्रवियों से किसी भी प्रकार की सहभागिता, सहयोग अथवा शांति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि हिंदुओं को इन इस्लामी आक्रांताओं के वास्तविक लक्षण ज्ञात होते तो किंचित् हमारा प्रतिरोध और भी अधिक दृढ़ और सुनियोजित होता!

यदि हिंदुओं ने इस्लामी आक्रमणों का प्रत्युत्तर अपने धर्म की रक्षार्थ विचार करके दिया होता और मानसिक रूप से विक्षिप्त, इन अनैतिक उन्मादियों को एक इंच भूमि का भी अंश नहीं दिया होता, तो कदाचित् आज हमारे इस राष्ट्र का स्वरूप कुछ और ही होता।

वापस युद्ध पर आते हैं। शत्रु की दोनों वाहिनियों को पराजित तथा ध्वस्त करने के पश्चात् मेवाड़ की सेना ने मुगल सेना पर पुनः भीषण प्रहार किया। रामशाह तंवर तथा उनके पुत्रों ने मान सिंह पर आक्रमण किया। मान सिंह ने वीरतापूर्वक रामशाह से एकल युद्ध किया। यह युद्ध इतना भीषण था कि उनके साथ लड़ने वाले योद्धा भी रुक कर उनका युद्ध देखने लगे थे।

एक अन्य मुसलमान लेखक मुल्ला शीरी, जिसने सदैव इस्लामी योद्धाओं का ही गुणगान किया है, उसे भी मान सिंह के शौर्य के विषय में लिखना ही पड़ा– “आज एक हिंदू, इस्लाम की तलवार बन गया।”

भागते हुए सलीम चिश्ती के पुत्र और फतेहपुर सीकरी के शेखजादे शेख मंसूर पर प्रताप ने अपने बाण से प्रहार किया। बाण उसके कूल्हे में लगा और इसी कारण वह जीवन भर लँगड़ाकर चला।

काजी खाँ नाम के एक मुगल सेनानायक का हाथ कट गया और युद्धस्थल से भागते हुए जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “जब दुश्मन हावी हो तो लड़ाई से भागना हमारे रसूल की सुन्नत है।”

वह इस्लाम के पैगंबर, मोहम्मद बिन अब्दुल्ला, से प्रेरणा लेकर पलायन कर रहा था। अब मेवाड़ की सेना ने मुगल सेना की तीनों वाहिनियों को पूर्णतया परास्त कर दिया था और मुगल सेना तीन-चार किलोमीटर तक उत्तर दिशा की ओर भाग खड़ी हुई। कई सैनिकों ने तो बनास नदी को भी पार कर लिया। यहीं पर हल्दीघाटी के युद्ध में दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ आया।

आपस में इशारों से बात होने के पश्चात् मेवाड़ के सेनानायकों ने मुगलों का उत्तर दिशा में पीछा किया और खमनौर गाँव के निकट एक खुले स्थान में पहुँच गए।

इसका उल्लेख नहीं मिलता कि भागती मुगल सेना का पीछा करने के निर्णय में प्रताप की सहमति थी या नहीं। यदि मेवाड़ की सेना पहाड़ों के निकट ही रहती तथा अति उत्साह में खुले में न आती तो इस युद्ध की ही नहीं, समूचे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की दिशा कुछ और ही होती।

इसके ठीक विपरीत, विचित्र संयोग है कि सांगा के समय में लड़े गए बयाना के युद्ध में यदि सांगा ने बाबर का पीछा किया होता तो मुगल चुनौती सर्वदा के लिए समाप्त हो जाती। हल्दीघाटी में मुगलों का पीछा करने के कारण बाजी पूरी तरह उलट गई। मेहतर खाँ नाम के एक मुगल सेनानायक ने भयभीत तथा भागती मुगल सेनाओं को पुनः एकत्र करने के लिए एक युक्ति लगाई। उसने अपने तुरही-नगाड़े वालों को आदेश दिया कि वे सेना में शोर मचा दें कि अकबर स्वयं बड़ी सेना लेकर आ पहुँचा है।

इस्लामी आक्रांता इस तरह के मिथ्याचार से युद्ध को अपने पक्ष में कर लेने के अभ्यस्त थे। ऐसी ढिंढोरी और सहायता आने की सूचना सुनकर मुगल सैनिकों में विश्वास जागा और वे फिर से युद्ध करने को तैयार हो गए।

मेवाड़ के सैनिक अकबर के आगमन से आश्चर्य और संदेह से भ्रम में पड़ गए। उन्हें लगा कि यदि और भी सेना आ गई तो अब हम उनका प्रतिकार कैसे कर पाएँगे? मेहतर खाँ की युक्ति काम कर गई और पुनः खमनौर के रणक्षेत्र में युद्ध प्रारंभ हो गया।

खमनौर में उस दिन भयंकर रक्तपात हुआ। विदीर्ण योद्धा निकट ही एक कुंड में जा-जाकर गिरने लगे और शीघ्र ही उस कुंड का जल इन योद्धाओं के रक्त से लाल हो गया। इस कुंड को ‘रक्त तलाई’ अर्थात् रक्त का तालाब कहा गया। अब दोनों ही सेनाएँ आमने-सामने बड़े ही वीभत्स तरीके से युद्ध करने लगीं और शीघ्र ही मुगल-मेवाड़ सैनिकों के बीच 3:1 का अनुपात हो गया था।

अब मृत्यु का तांडव आरंभ हुआ और मेवाड़ के रणबांकुरे, मृत्यु के साथ कदम-से-कदम, सुर-से-सुर और ताल-से-ताल मिलाते हुए नाचे। संहार के अतिरिक्त मेवाड़ के योद्धाओं के लिए सब कुछ विस्मृत हो गया।

एक ही लक्ष्य था, प्रताप को बिना हानि के निकलने देना।

रामशाह तँवर, अपने तीन पुत्रों व पोते धर्मागत समेत बलिदान हुए। ग्वालियर घराने की तीन पीढ़ियाँ एक दिन में काल कलवित हो गईं।

जगन्नाथ कच्छावा ने जयमल राठौड़ के पुत्र रामदास राठौड़ को मार गिराया। झाला बीदा तथा केशव और जैसा चारण भी युद्ध में काम आए। इस समय भीम सिंह डोडिया, जिनका मान सिंह से व्यक्तिगत वैमनस्य था, जब मान सिंह शांति वार्ता हेतु आए थे, तब उसने चिल्लाकर कहा– “मैं भीम सिंह डोडिया आ चुका हूँ, अब बचकर दिखाओ।”

उन्होंने अपना भाला जोर से मान सिंह की ओर फेंका, जो मान सिंह के हौदे में धँस गया, पर इस वार से मान सिंह बच गए। एक दर्जन से अधिक मुगल सैनिक भीम सिंह पर टूट पड़े और भीम सिंह को काफी घायल कर दिया। यह देख प्रताप ने तुरंत अपना घोड़ा उस ओर मोड़ लिया, जहाँ भीम सिंह युद्ध कर रहे थे।

प्रताप ने चेतक को एड़ लगाई और देखते-ही-देखते चेतक के दोनों आगे के पैर मान सिंह के हाथी के मस्तक पर थे। घोड़ा अपने पिछले पैरों पर खड़ा था; तब प्रताप ने अश्व पर बैठे-बैठे ही मान सिंह पर अपने भाले से घात किया और गरज कर बोल उठे, “ले, आ गया प्रताप सिंह! जहाँ तक तुझसे हो सके, वीरता दिखा।”

एक बार पुनः मान सिंह प्रताप के वार से भयभीत हो झुककर हौदे में छुप गए और भाला जाकर उनके हौदे के पिछले भाग में लगा। प्रताप के वार से मान सिंह का हाथी घायल हो गया तथा युद्ध से हटा लिया गया। मान सिंह के हाथी की सूँड़ में सीधी तलवार बँधी थी, जिसे ‘खाँडा’ कहते हैं। हाथी के उस खाँडे से चेतक के एक पिछले पैर की मांसपेशी कट गई। प्रताप के शरीर पर भी अब तक आठ घाव हो चुके थे। यद्यपि इस पर भ्रम है, कुछ लेखक दो घावों की बात करते हैं–एक भाले से व एक तीर से।

भीम सिंह को प्रताप नहीं बचा पाए।

घायल घोड़े पर प्रताप के लिए लड़ना असंभव हो गया था तथा हाकिम खाँ ने चेतक को बलपूर्वक घाटी की ओर मोड़ दिया, ताकि प्रताप युद्ध क्षेत्र से बाहर निकल जाएँ।

दोपहर तीन बजे तक मेवाड की सेना पूरी तरह थक चुकी थी और प्रताप ने अपने सेनानायकों को पर्वतों की ओर लौट जाने का आदेश दिया। राणा पुंजा के नेतृत्व में सर्वप्रथम भीलों ने पर्वतों का आश्रय लिया।

मुगलों ने लौटते प्रताप को चिह्नित कर लिया। घायल चेतक लँगड़ाकर अपने स्वामी को शत्रु से दूर पर्वतों की ओर ले जा रहा था। कम-से-कम दो दर्जन मुगल धनुर्धारियों ने प्रताप पर बाण बरसाने आरंभ कर दिए और इतने ही सैनिकों ने प्रताप पर सीधा हमला भी बोल दिया।

ऐसे में हाकिम खाँ सुर और झाला मान ने अपने स्वामी की रक्षा हेतु आत्मोत्सर्ग का सर्वोच्च बलिदान देने का निर्णय लिया।

हाकिम खाँ, महाराणा पर हो रही बाणवर्षा के बीच आ खड़े हुए। झाला मान ने प्रताप के सिर से उनका राजचिह्न उतारकर स्वयं पहन लिया, जिससे शत्रु उन्हें ही प्रताप समझें। प्रताप कुछ समझ पाते, उससे पूर्व ही झाला मान सिंह ने अपनी तलवार प्रताप को दी और उनकी दोनों तलवारें स्वयं हाथ में लेकर मुगलों की ओर चीखते हुए चल पड़े, “आओ नीच विधर्मियो ! मैं हूँ प्रताप, तुम्हारा सर्वनाश करने वाला!”

मुगल सैनिक झाला मान को प्रताप समझ उन पर टूट पड़े। झाला मान शरीर सौष्ठव, रूप-रंग इत्यादि में काफी हद तक प्रताप जैसे ही दिखते थे।

हाकिम खाँ और झाला मान दोनों ही अपने महाराणा के प्राणों की रक्षा करते हुए, मन में प्रसन्नता लिये, मुगलों से युद्ध करते-करते वीरगति को प्राप्त हुए। प्रसन्नता इस बात की कि उनके नायक महाराणा प्रताप अब भी जीवित थे और स्वतंत्रता का यह संग्राम समाप्त नहीं हुआ।

अब हम दोनों सेनाओं के युद्धक हाथियों के विषय में भी बात कर लेते हैं। प्रताप के हाथी लूणा का युद्ध हुआ मुगल सेना के हाथी गजमुक्ता के साथ, और इस युद्ध में दोनों ही हाथियों ने कई सैनिकों को कुचल दिया। लूणा का महावत गोली खाकर हौदे में ही ढेर हो गया, लूणा हाथी मेवाड़ के खेमे में लौट आया। तब प्रताप के सर्वश्रेष्ठ हाथी रामप्रसाद को लाया गया और रामप्रसाद ने मुगलों को कुचल-कुचलकर पस्त कर दिया। इस समय मुगलों ने रामप्रसाद के प्रत्युत्तर में ‘रण मदार’ नाम के हाथी को उतारा।

जब रामप्रसाद, रण मदार पर भारी पड़ रहा था, तब उसके महावत को एक तीर लगा और वह मारा गया। राम प्रसाद बहुत बलशाली व समझदार हाथी था। जिसकी प्रसिद्धि स्वयं अकबर के कानों तक भी पहुँची थी। रामप्रसाद ने महावत के बिना भी मुगलों को कुचलना जारी रखा। मुगल हाथी सेना का सेनापति हसैन खाँ अवसर पाकर रामप्रसाद पर चढ़ गया और उसे काबू में कर मगलों की ओर ले गया।

इस सुंदर जीव को आसिफ खाँ ने अकबर को भेंट कर दिया तथा अकबर इस भेंट को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ था। अकबर ने इस हाथी का पुनः नामकरण करके ‘पीरप्रसाद’ रख दिया। ऐसी कथा है कि उस दिन से रामप्रसाद ने खाना-पीना त्याग दिया था और कुछ ही दिवस में युवावस्था में ही उसकी मृत्यु भी हो गई।

एक पशु की भी ऐसी निष्ठा थी प्रताप के प्रति।

उधर मान सिंह ने प्रताप के रणभूमि से पलायन को अनदेखा कर दिया और वे लडते रहे। तब आसिफ खाँ ने अपने दो नायकों को प्रताप के पीछे उन्हें समाप्त करने हेतु भेजा। इस समय एक अद्भुत प्रसंग घटा, जिसका उल्लेख करना कई कारणों से आवश्यक हो जाता है।

प्रताप के अनुज शक्ति सिंह, जो किशोरावस्था में उनसे अलग हो गए थे, उन मुगल सैनिकों के पीछे-पीछे चल पड़े। जैसे ही दोनों मुगल नायक प्रताप के निकट पहुँचे, शक्ति सिंह ने मेवाड़ी में चिल्लाकर प्रताप को ‘ओ नीले घोड़े रा असवार’ संबोधित किया, जिसका अर्थ है ‘ओ नीले घोड़े के सवार।’

प्रताप ने पीछे मुड़कर देखा कि शक्ति सिंह ने उन दोनों मुगलों का वध कर दिया है। शक्ति सिंह अब प्रताप के पास आए तो उनकी आँखों में दुःख व प्रेम के आँसू थे। यह प्रसंग हल्दीघाटी से पाँच किलोमीटर की दूरी पर ‘बिलोचा’ गाँव में घटा। दोनों सहोदरों ने आलिंगन किया और शक्ति सिंह ने अपना घोड़ा प्रताप को दे दिया, ताकि वे शत्रु से दूर जा पाएँ।

बिलोचा ग्राम में प्रताप का घोड़ा चेतक भी अपने पिछले पैरों में लगे घाव और गरमी से त्रस्त होकर गिर पड़ा; उसने प्रताप के हाथों में ही अपनी अंतिम श्वास ली। दोनों बंधुओं ने चेतक का बिलोचा गाँव में अंतिम संस्कार कर दिया। आज भी लोग वहाँ चेतक की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। प्रताप ने दक्षिण की ओर अपनी यात्रा चालू रखी और कोल्यारी गाँव में जाकर शरण ली। वहाँ स्थानीय लोगों ने उनकी सेवा-शुश्रूषा की।

हल्दीघाटी में मारे जाने वाले सैनिकों की संख्या को लेकर सभी इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। फारसी और मुगल इतिहासकारों ने संख्या 500 बताई है, जिनमें से 180 मुस्लिम और 320 हिंदू थे, जबकि ‘एनल्स ऑफ मेवाड़’ तथा कर्नल टॉड ने कुल संख्या 16,000 बताई है।

जो भी संख्या रही हो, यह एक प्रमाणित तथ्य है कि प्रताप के नेतृत्व में हुए इस युद्ध में मृतकों की संख्या मेवाड़ के पक्ष में 2:1 के अनुपात में रही। यदि मुस्लिम इतिहासकारों की गणना मानी जाए तो मारे गए हिंदुओं में से आधे तो मुगल सेना के ही थे। दूसरी ओर, मेवाड़ के वीरगति प्राप्त सेनानायकों की संख्या मुगलों से कहीं अधिक थी, क्योंकि मुगलों के प्रमुख सेनानायक अब भी जीवित थे। किंतु मेवाड़ के रामशाह तँवर और उनके परिवार के सभी योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए; झाला मान, भीम सिंह डोडिया, झाला बीदा, हाकिम खाँ, मान सिंह सोनगरा, रामदास मेडतिया और भी कई शौर्यशाली वीरों ने मातृभूमि के रक्षार्थ बलिदान किया।

मेवाड़ के जो नायक बचकर निकलने में सफल रहे, उनके नाम हैं रावत किशनदास, गोपालदास मेडतिया, भामा शाह, ताराचंद तथा राणा पूँजा।

हल्दीघाटी के युद्ध का परिणाम अगर देखें तो दोनों ही सेनाएँ विदीर्ण और हताहत हुई थीं और दोनों ने ही अपने शौर्य और रणकौशल का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था। हम यहाँ कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि हल्दीघाटी के इस युद्ध में मेवाड़ की विजय हुई–

1. मुगल सेना को अपनी सैन्यशक्ति से केवल चौथाई शक्तिशाली मेवाड़ी सेना ने अत्यंत ही लज्जाजनक तरीके से पराजित किया था और मुगल सेना इतनी हताहत तथा थकी हुई थी कि प्रताप और उनकी सेना का पर्वतों में सौ मीटर तक भी पीछा नहीं कर पाई।

2. अकबर ने मान सिंह को सीधा आदेश दिया था कि इस युद्ध के अंत में प्रताप को या तो जीवित पकड़ा जाए या रणभूमि में मार दिया जाए, किंत मान सिंह ऐसा कर नहीं पाए और उनकी पराजय हुई।

3. आगरा लौटने पर अकबर ने इस पराजय के परिणामस्वरूप आसिफ खाँ और मान सिंह की ड्योढ़ी नीची करने का दंड दिया। दोनों के पदनाम-प्रभाव तथा अधिकार इत्यादि भी कम कर दिए गए।

4. मुगल सेना मेवाड़ के किसी भी सेनानायक को जीवित नहीं पकड़ पाई और न ही उनके अस्त्रास्त्रों अथवा किसी धन पर अधिकार कर पाई, सिवाय युद्ध के उस अद्भुत हाथी रामप्रसाद के।

5. जून 1576 में लड़े इस युद्ध के तीन महीने बाद प्रताप के हस्ताक्षरित ताम्रपत्र मिले हैं, जिनमें प्रताप ने इस युद्ध में वीरगति प्राप्त सामंतों के परिवारों को जागीरें दी हैं। प्रताप के हस्ताक्षरित सथाणा, पीपली व मोही गाँवों के तीन ताम्रपत्र अगस्त व सितंबर 1576 में जारी किए गए। इतिहास लेखन में राजस्व के अभिलेख सर्वाधिक विश्वसनीय माने जाते हैं। यदि प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध में हारे थे तो युद्ध के तीन माह बाद जागीरें कैसे वितरित कर रहे थे ?

6. नवंबर, 1576 में अकबर स्वयं एक बड़ी सेना लेकर खमनौर होता हुआ गोगूँदा पर आक्रमण करने आता है। प्रताप के सभी वरिष्ठ सेनापति वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, सो उन्हें पश्चिम की ओर आबू में शरण लेनी पड़ी। प्रश्न यह है कि यदि हल्दीघाटी मुगल जीते थे तो युद्ध के छह माह बाद ही अकबर उसी स्थान पर हमलावर क्यों हुआ ?

7. सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हल्दीघाटी के इस युद्ध के पश्चात् मुगल सेना की जो दुर्दशा हुई, उसके विषय में अधिकतर इतिहासकारों ने नहीं लिखा है।

मान सिंह प्रताप को खोजते हुए गोगूँदा पहुँचे, जहाँ केवल 20 दुर्ग रक्षकों को मारकर मुगलों ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। ये दुर्ग रक्षक वे वृद्ध और दुर्बल लोग होते थे, जिन्हें केवल मोक्ष की आकांक्षा रहती थी। मान्यता थी कि दुर्ग की रक्षा में प्राण देने वाले मोक्ष को प्राप्त होते हैं। चूँकि वार्धक्य के कारण ये सैनिक अधिकतर बिस्तरों में विश्राम ही करते थे, इन्हें ‘माचातोड़’ सैनिक भी कहा जाता था।

मान सिंह ने दुर्ग पर अधिकार तो कर लिया, किंतु प्रताप ने पहले से ही दुर्ग और गोगुंदा गाँव खाली करवा दिया था तथा प्रजाजनों को आस-पास की पर्वतमाला में छुप जाने को कह दिया था। प्रताप की सेना ने गोगुंदा आने-जाने के सभी रास्तों को बंद कर दिया और मान सिंह को गोगुंदा के जंगलों में बंदी बना लिया।

यहाँ प्रताप का विलक्षण कर्मयोगी चरित्र उजागर होता है। अपने परिजनों, मित्रों व मुख्य सेनानायकों को खोने के शोक, दुःख या अवसाद का संज्ञान न लेकर प्रताप पुनः युद्ध में जुट गए। उनके शरीर के घाव अभी हरे थे, पर वह महापुरुष मातृभूमि की सुरक्षा में जुट गया। भूख-प्यास से त्रस्त मान सिंह और उसकी सेना कुछ दिन गोगुंदा में पड़ी रही, किंतु वहाँ उन्हें न तो पीने को पानी मिला, न ही खाने को अन्न। प्रताप के आदेशानुसार ग्रामीणों ने पहले से ही सभी संसाधनों को समाप्त कर दिया था। मान सिंह अपने सैनिकों के साथ तीन महीने तक गोगुंदा में फँसे रहे तथा उनके सैकड़ों सैनिक भूख व बीमारी में मारे गए।

मान सिंह की सेना को जंगली आमों व अपने ही अश्वों को मारकर खाने को बाध्य होना पड़ा। चार महीने गोगुंदा में पड़े रहने के बाद मान सिंह और आसिफ खाँ अकबर के पास आगरा लौट गए। दोनों वहाँ अकबर द्वारा अपमानित किए गए। अकबर स्वयं उनसे कई माह मिला तक नहीं। 

अब बात करते हैं प्रताप की रणनीति और हल्दीघाटी के युद्ध में उनकी उपलब्धियों की–

1. प्रताप ने अकबर और उसके सेनानायकों को एक स्पष्ट संदेश दे दिया कि प्रताप अपनी स्वाधीनता व देश की रक्षा भली-भाँति कर सकते हैं। यह न केवल मुगलों के लिए महत्त्वपूर्ण संदेश था, वरन् मेवाड़ के सामंतों और प्रजा तथा पूरे देश के हिंदुओं के लिए भी था, कि उनका राजा किसी भी मूल्य पर अपना शीश नहीं झुकाएगा।

2. प्रताप का मुगलों के साथ यह पहला प्रत्यक्ष युद्ध था। इस युद्ध में प्रताप ने भविष्य के लिए मुगलों के रणकौशल और नीतियों का भली-भाँति अध्ययन कर लिया था।

3. हल्दीघाटी के युद्ध से पहले रामशाह, तँवर मेवाड़ की सेना को पर्वतों से बाहर आए बिना मुगलों को हल्दीघाटी में आने देने के बाद घेर कर मारने की योजना बना रहे थे। किंतु युवा सरदारों के आग्रह के कारण पर्वतों से निकल कर मैदान में लड़ने के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया। हल्दीघाटी के रक्तपात के पश्चात् प्रताप ने सबक सीखा। प्रताप अब मुगलों से प्रत्यक्ष युद्ध की अपेक्षा उन्हें गुरिल्ला युद्ध से पराजित करने का मन बना चुके थे। प्रताप और उनके सामंतों को भली-भाँति समझ आ गया कि आमने-सामने की टक्कर आत्महत्या के समान होगी। मुगलों को एक हजार घावों से पराजित करना होगा।

4. हल्दीघाटी ने मेवाड के महाराणा प्रताप सिंह को संपूर्ण भारतवर्ष के एकमात्र हिंदू नायक के रूप में स्थापित कर दिया था। प्रताप की योजना आरंभ से ही मुगलों के विरुद्ध एक लंबा युद्ध लडने की थी। इसीलिए युद्ध से पलायन के पश्चात्, न तो प्रताप और न ही उनके जीवित बचे नायकों अथवा सेना में किसी प्रकार का पश्चात्ताप अथवा क्लेश था।

प्रताप के नाम की ख्याति न केवल राजपूताना, वरन देश के अन्य भागों में भी होने लगी थी। उनका कीर्तिगान चहुँ दिशाओं में हिंदुओं तक पहुँचने लगा। यहाँ तक कि मुगल दरबार में भी कभी प्रत्यक्ष, कभी परोक्ष स्वरों में हिंदू राजाओं व कवियों द्वारा प्रताप की प्रशंसा होती थी।

राणा सांगा के पश्चात्, प्रताप एकमात्र राजा थे, जिन्होंने मुगलों के विरुद्ध राजपूतों की सेना एकत्र कर युद्ध किया था। यह प्रताप का दृढ़ निश्चय ही था, जिसके चलते भले ही बड़े राजपूत राजाओं ने उनका साथ न दिया हो, परंतु सभी छोटे सरदारों, सामंतों और ठिकानेदारों ने उनके समर्थन में तलवार उठाई। प्रताप मुगल विरोध और हिंदू विद्रोह के रूपक बन चुके थे।

हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् कभी विपरीत रहे बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही, जालौर तथा ईडर के राजाओं ने भी मेवाड़ से मित्रतापूर्ण संधि कर ली। मुगलों को मेवाड़ से निष्कासित करने के अभियान की नींव पड़ चुकी थी और हल्दीघाटी के बाद नवीन उत्साह से मेवाड़ के लोग अपने राणा के साथ खड़े हो गए थे।

हल्दीघाटी के युद्ध में हिंदुओं की दृष्टि से एक ही भारी भूल हुई– मेवाड़ी सेना का मुगलों के पीछे खुले में आ जाना। इस भूल का भारी मूल्य मेवाड़ ने प्रथम श्रेणी के योद्धाओं को खोकर चुकाया। यदि मेवाड़ के इन नायकों का संहार नहीं हुआ होता तो कदाचित् इस हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की दिशा सर्वथा भिन्न होती। पर नियति को यह स्वीकार न था। तथापि हम गर्व के साथ हल्दीघाटी के युद्ध को निश्चित रूप से प्रताप की विजय कह सकते हैं।

थर्मोपल्ली, तटीय ग्रीस में एक घाटी है, जहाँ ग्रीक सेना ने 480 वर्ष ईसा पूर्व में फारसी आक्रांताओं का सामना किया था। जेम्स टॉड, हल्दीघाटी की तुलना थर्मोपल्ली के युद्ध से करते हैं। थर्मोपल्ली के युद्ध में ग्रीक राजा लियोनायडस नायक के रूप में उभरे, उसी प्रकार हल्दीघाटी के युद्ध से प्रताप नायक बन कर उभरे तथा ‘हिंदुआ सूरज’ की उपाधि से विभूषित हुए तथा वे साहस और शौर्य का जीवंत प्रतीक बन गए।

फारसी सेना के आगे जैसे ग्रीक सेना संख्या में बेहद कम थी, वैसे ही मेवाड की सेना भी तुर्कों के समक्ष कम संख्या में थी। किंतु यह तुलना यहीं समाप्त हो जाती है।

क्योंकि थर्मोपल्ली के युद्ध का परिणाम ग्रीक सेना की पराजय थी व राजा लियोनायडस वीरगति को प्राप्त हुआ था। जबकि हल्दीघाटी का युद्ध मेवाड ने जीता और प्रताप अजेय हो, मुगलों के चंगुल से निकल गए थे।

हल्दीघाटी के इसी युद्ध से दिवेर के युद्ध की आधारशिला रखी गई।

हल्दीघाटी का युद्ध मुगल आक्रांता अकबर के विरुद्ध संघर्ष का कीर्तिदायक प्रारंभ था, तो दिवेर का युद्ध उस संघर्ष की सफल व विजयदायिनी निष्पत्ति थी।

दिवेर में प्रताप ने मुगलों द्वारा मेवाड़ में बार-बार घुसपैठ के प्रयासों का ही पटाक्षेप कर दिया। उन्होंने 1583 ईसवी में चित्तौड़ के अतिरिक्त मेवाड़ की पग-पग भूमि को स्वाधीन कर, 1597 ईसवी में अपने मोक्षपर्यंत स्वाभिमानी राजा की तरह शासन किया तथा एक भरा-पूरा राज्य अपने पुत्र कुँवर अमर सिंह को सौंपकर देवलोक को पधारे।