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खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 7

महाराणा अमर सिंह : प्रताप के अधिकारी पुत्र
(1597-1620 ईसवी)

मेवाड़ के अत्यधिक शक्तिशाली तथा साहसी महाराणाओं में से एक अमर सिंह की कथा है, जिन्हें संयोगवश हिंदू धर्म के महानतम सुपुत्र महाराणा प्रताप की धर्मशील परंपरा को आगे बढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अमर सिंह, महाराणा प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र थे। किसी भी स्तर पर वह प्रताप से कम नहीं थे।

अमर सिंह एक अत्यंत संवेदनशील तथा सम्माननीय व्यक्ति थे।

उनमें साहस का लेशमात्र भी अभाव नहीं था तथा उनमें तुर्क, इस्लामी आक्रांताओं को प्रत्युत्तर देने की प्रबल इच्छा भी थी।

विभिन्न इतिहासकारों ने प्रताप के देवलोक गमन की परिस्थितियों के विषय में बहुत कुछ लिखा है, किंतु एक कथा का उल्लेख करना महत्त्वपूर्ण है। हिंदुओं के दुर्भाग्य के उस दिन, आखेट के समय प्राण घातक आघात लगने से प्रताप की रीढ़ की हड्डी में चोट लग गई। प्रताप को काल ने घेरना आरंभ किया तथा भयंकर शारीरिक कष्ट में वे मृत्यु शय्या पर पहुंच गए। पर किसी बात में प्रताप के प्राण अटके थे। प्रताप अशांत थे। सभी सरदारों-सामंतों ने एकत्र होकर प्रताप से उनके दुःख का कारण जानना चाहा तो प्रताप ने वह घटना कह सुनाई–

“एक समय हम अरावली पर्वतमालाओं में जीवन व्यतीत करते हुए एक निर्जन स्थान पर अपना डेरा डाले हुए थे कि वर्षा शुरू हो गई। वहाँ हमारे साथ 'अमरा' (अमर सिंह) अपने परिवार और कुछ विश्वस्तों के साथ तंबुओं में रह रहा था। 'अमरा' पत्नी के साथ एक तंबू में था, तब मुझे उसकी पत्नी के साथ उसका वार्तालाप सुनाई दे गया। वह कह रही थी, “हमारे दुःख के दिन कभी समाप्त होंगे या नहीं?”

अमर ने उत्तर दिया, “क्या किया जा सकता है ? दाजीराज सा (मेवाड़ राजपरिवार में पिता के लिए संबोधन) के प्रण के सामने कौन कुछ कह सकता है ?”

इस घटना का उल्लेख करते हुए प्रताप ने अपने सलाहकारों एवं सामंतों से कहा कि अमर सिंह में मुझे अपने जितना दृढ़ निश्चय नहीं दिखता। उन्हें शंका थी कि आज नहीं तो कल, कदाचित् वह तुर्कों के समक्ष समर्पण कर देगा। अपने सुखों के लिए कदाचित् वह अपने परिवार की मर्यादा और सम्मान को तिलांजलि दे सकता है।

अमर सिंह तुरंत मृत्युशय्या पर लेटे अपने पिता के समक्ष पहुँचे। अपने पिता के सम्मान की रक्षा की शपथ लेते हुए उन्होंने कभी भी मुगलों के समक्ष समर्पण न करने का प्रण लिया। वहाँ उपस्थित मेवाड़ के सभी सामंतों ने भी अपनी-अपनी खड्ग हाथ में लेकर शपथ ली कि वे अपनी मृत्युपर्यंत, अमर सिंह के साथ बने रहेंगे। उनके इस दृढ़ निश्चय और प्रण को देखते हुए प्रताप को भरोसा हो गया। अपने पुत्र तथा मेवाड़ के स्वामिभक्त सामंतों को आशीष देकर उस रात वे शांतिपूर्वक सो गए।

महाराणा प्रताप के देह त्याग का वर्णन हिंदुओं के लिए चाहे कितना ही कष्टदायक हो, प्रकृति जनित नियमों से तो स्वयं योगेश्वर कृष्ण भी बँधे थे, तो हम मनुष्यों का क्या सामर्थ्य !

थोडी कल्पना का सहारा लेते हुए और हिंद मान्यताओं के अनुसार हम प्रताप के स्वर्गारोहण का वृत्तांत लिखने की चेष्ठा कर रहे हैं।

'राणा रासो' में प्रताप की इस कथा का प्रकरण इस प्रकार उल्लिखित है–
“महाराणा प्रताप अपनी शय्या से उठे, उन्होंने गंगाजल से स्नान किया। उन्होंने अपने साथियों एवं परिवार की ओर प्रेमपूर्वक देखा। वे अपने पुत्र अमर सिंह एवं पौत्र करण सिंह के साहस और कर्तव्यनिष्ठता के प्रति आश्वस्त हो चुके थे। महाराणा प्रताप ने पद्मासन में बैठकर अपने ललाट की तीनों रेखाओं के मध्य ध्यान लगाकर भगवान् विष्णु का स्मरण किया। उन्हें नीलवर्णी भगवान् के साक्षात् दर्शन हुए और राणा उस छवि के दर्शन कर भाव-विभोर हो गए। महाराणा प्रताप ने प्राणवायु का एक गहन निश्वास भरा और इस नश्वर संसार के सभी प्राणिक बंधनों से मुक्त होकर उस महायोगी की आत्मा श्रीहरि के चरणों में लीन हो गई।”

19 जनवरी, 1597 ईसवी को सत्तावन वर्ष की आयु में भारतवर्ष के सबसे महान हिंदू राजा, महाराणा प्रताप सिंह, जिन्होंने अपनी मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए उस समय के सबसे शक्तिशाली, राक्षसी साम्राज्य से आमने-सामने का युद्ध किया और धर्म व राष्ट्र को उन नराधम आक्रांताओं से बचाए रखा, वह महाराणा प्रताप अपने मरणधर्मा शरीर को छोड़कर देवलोक सिधार गए।

प्रताप के देहत्याग पर टॉड की पंक्तियाँ भी उल्लेखनीय हैं–
“इस प्रकार एक महिमाशाली राजपूत राजा का जीवन समाप्त हुआ, जिन्हें आज भी हर सिसोदिया राजपूत ही नहीं, बल्कि हर हिंदू अपना आदर्श मानता है, और तब तक मानता रहेगा, जब तक कि कोई नया संघर्ष, राष्टप्रेम की इस ज्वाला को ही न बुझा दे। ईश्वर करे, वह बुरा दिन कभी न आए। पर यदि दर्भाग्यवश वह दिन आता भी है तो कम-से-कम ब्रिटेन का उसमें कोई योगदान न हो।”

टॉड के ये शब्द हमारी चेतना में प्रताप की महानता को प्रगाढ़ता से स्थापित करने के लिए पर्याप्त हैं।

परलोक सिधारने से पूर्व मेवाड़ के साहसी लोगों के पिता तुल्य महाराणा ने अपनी प्रजा में साहस का संचार किया और पराजय की मानसिकता से निकालकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया। प्रताप ने अपने जीवन व कर्म से वे आदर्श स्थापित किए, जिनसे पीछे हटना उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए असंभव था।

एक सत्पुरुष व महिलाओं और निर्बलों के रक्षक। उन्होंने अपने धर्म और प्रजा पर बर्बर इस्लामी आक्रांताओं के अत्याचार होते देखे और ऐसा प्रत्युत्तर दिया कि उनकी मृत्यु के पाँच सौ वर्षों के पश्चात् भी हिंदू समाज उनकी स्मृति और उनके कर्मों से प्रेरित होता है।

श्रीराम की भाँति ही एक मर्यादापूर्ण योद्धा, जिन्होंने अपने युद्ध कौशल व अपने शस्त्रों का दुरुपयोग अपने टुच्चे स्वार्थ के लिए नहीं, वरन् धर्म की स्थापना एवं सम्मान की रक्षा हेतु किया। इसमें कोई संशय नहीं कि उन्हें भी वही गति प्राप्त हुई होगी, जो भीष्म, पांडवों, पुरु, बाप्पा रावल, कुंभा और सांगा जैसे धर्मशील योद्धाओं को प्राप्त हुई थी।

उस महान दिन बाप्पा रावल के वंश के पूर्वजों ने उल्लासित हो गर्जना की होगी, जब उनके वंश का एक सपूत, हिंदू धर्म को दमन के कुचक्र से मुक्त कर गया। वह सपूत, जो कर्तव्य पथ पर चल कर, निज कर्म को पूरा कर, सदा के लिए मेवाड़ की पवित्र भूमि में समाहित हो गया।

उस युगपुरुष की इहलीला के पटाक्षेप पर मृत्यु भी रोई होगी कि मेवाड़ अब अनाथ हो चला। जब कृष्ण व राम जैसे अवतारी पुरुष भी जीवन-चक्र की अवहेलना नहीं कर सके थे तो प्रताप भी प्रकृति के नियमों के अधीन थे; मरणधर्मा शरीर को निवृत्त कर अपनी आगे की यात्रा पर वे चले गए।

मूल्यवान् बात यह है कि उन्होंने एक ऐसा जीवन जिया, जो उनकी स्मृति व उनके सिद्धांतों को अमर बना गया। इसलिए प्रताप आज भले ही हमारे साथ शरीर से न हों, पर उनकी प्राण-ऊर्जा, उनका दृढ़ संकल्प, उनका विरक्त व्यक्तित्व आज भी हिंदू समाज को पोषण दे रहा है।

कुछ महापुरुष होते हैं, जो अपने कृतित्व व सात्त्विक आचरण के कारण काल का भी अतिक्रमण कर जाते हैं और कालजयी हो जाते हैं। जब तक सत्य-सनातन हिंदू धर्म पृथ्वी पर है, प्रताप जीवित रहेंगे: क्योंकि प्रताप कभी मरे नहीं। प्रताप कभी मर सकते नहीं। धन्य है हिंदू समाज, जिसे ऐसे देवपुरुष का सान्निध्य मिला। प्रताप ने निर्वाण से पूर्व मेवाड को एक सुयोग्य व सबल राजा देकर सिसोदिया राजाओं के सातत्य का दायित्व भी पूर्ण कर दिया।

अड़तीस वर्ष की आयु में कुँवर अमर सिंह को मेवाड के महाराणा का महती दायित्व प्राप्त हुआ। जैसे-जैसे हम उनके कर्मों और जीवन चरित्र का निरूपण करेंगे, हम जानेंगे कि अमर सिंह ने अपने पिता द्वारा स्थापित आदर्शों का पूरी निष्ठा के साथ पालन व निर्वहन किया।

प्रताप के देवलोक गमन के पश्चात् अकबर ने मेवाड़ पर अपने आक्रमणों को नए सिरे से शुरू किया, यद्यपि तीन वर्ष तक अमर सिंह ने प्रताप द्वारा स्थापित नीतियों और आदर्शों पर चलते हुए मेवाड़ के सामरिक और आर्थिक उत्थान पर ध्यान केंद्रित किया।

अमर सिंह ने मालपुरा, गुजरात, मालवा, ईडर और आबू में मुगल थानों एवं काफिलों पर आक्रमण कर उन्हें लूटकर उनकी संपत्ति को हस्तगत किया। अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने हेतु उन्होंने गोड़वाड़, मुलतान तथा पंजाब से कुशल तोपचियों को बुलवा कर उनकी सहायता से मेवाड़ की सेना को आग्नेयास्त्रों से सुसज्जित किया।

अमर सिंह के इस निर्णय से मेवाड़ और मुगलों में 47 वर्षों से चले आ रहे संघर्ष में एक बड़ा परिवर्तन होने वाला था, जिसके परिणामस्वरूप उनके प्रपौत्र राज सिंह के समक्ष औरंगजेब को घोर पराजय का सामना करना पड़ा। अमर सिंह मेवाड़ के ऐसे पहले राजा थे, जो उत्तम तकनीक के शस्त्रास्त्र अन्य राज्यों से मेवाड़ में लाए और अत्याधुनिक तोपों का मेवाड़ में ही निर्माण कर मेवाड़ की सैन्य शक्ति को बल दिया।

मेवाड़ अब मुगलों से स्वयं की रक्षा नहीं कर रहा था, वरन् मुगलों पर बढ़-चढ़कर आंक्रमण कर रहा था। अमर सिंह अब भी प्रताप की उस परंपरा का निर्वहन कर रहे थे और मेवाड़ के पर्वतीय क्षेत्रों में नगरों एवं ठिकानों का निर्माण कर रहे थे। इनमें से प्रमुख ग्राम और नगर थे सायरा तथा कुंभलगढ़। मेवाड़ का प्रमुख शत्रु अकबर, दो दशकों तक मेवाड़ को भूल चुका था, क्योंकि दिवेर की भयंकर पराजय के बाद कोई मुगल सेनापति मेवाड़ पर आक्रमण करने पर राजी ही नहीं था।

अकबर दो दशकों तक गुजरात, मालवा, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पंजाब तथा अन्य भागों में उठ रहे विद्रोहों का दमन करने में ही व्यस्त रहा। अकबर के प्रमुख सलाहकार भगवानदास, टोडरमल, तानसेन इत्यादि काल के ग्रास बन गए और वह एकाकी रह गया था।

15 सितंबर, 1599 ईसवी को अकबर ने अपने बड़े पुत्र सलीम को अजमेर का सूबेदार बनाया। उसे अमर सिंह को पकड़कर मेवाड को पराजित करने का दायित्व सौपा। अकबर ने जयपुर के मान सिंह को बंगाल से बुलाकर सलीम की सहायता करने का निर्देश दिया। मान सिंह मेवाड के राजपूतों से न तो युद्ध करना चाहते थे और न ही वे सलीम को पसंद करते थे क्योंकि मान सिंह अपनी बहन के पुत्र खुसरो को अकबर के पश्चात् मुगल साम्राज्य का सम्राट् बनते देखना चाहते थे। 

मेवाड के सौभाग्यवश, सलीम मादक पदार्थों का आदी तथा व्यभिचारी था, अतः उसमें युद्ध तथा रक्तपात करने की कोई इच्छा ही नहीं थी। सलीम ग्वालियर के आस-पास निरर्थक ही घूमता रहा। इससे मान सिंह मन-ही-मन प्रसन्न हुए। उन्होंने अजमेर में रहकर शांत मन से सलीम को भोग-विलास में लिप्त रहकर समय नष्ट करने दिया।।

अबुल फजल ने सलीम के विषय में लिखा है, “सलीम मुगल साम्राज्य का अयोग्य पुत्र सिद्ध हुआ।”

अकबर सलीम से क्षुब्ध था और उसने सलीम को अमर सिंह को समाप्त करने के आदेश दिए। अमर सिंह ने इस अंतराल में ऊँटाला, मोही, कोशीथल, बगर, मंडल, मदारिया इत्यादि थानों को लूटकर हस्तगत कर लिया। ऊँटाला दुर्ग के विजय की कथा अद्भुत है। ऊँटाला की विजय बताती है की राजपूत अपने सम्मान की रक्षा के लिए किस सीमा तक जा सकते थे।

शत्रु पर आक्रमण करने हेतु सेना की प्रथम टुकड़ी, जो सबसे आगे रहती थी, उसे 'हरावल' कहा जाता था और उसके पीछे वाली टुकड़ी को 'चंदावल'। राव चूँडा के वंशज चूँडावत राजपूत, पीढ़ियों से चली आ रही व्यवस्था के अनुसार सदैव हरावल में ही लड़ते थे तथा प्रताप के भ्राता शक्ति सिंह के वंशज शक्तावत राजपूत, चंदावल में। एक समय चूँडावतों एवं शक्तावतों में विवाद हो गया कि सदा चूँडावत ही क्यों हरावल में लड़ने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे ?

अमर सिंह ने दोनों की मध्यस्थता करते हुए कहा कि ऊँटाला के दुर्ग में जो भी पहले प्रवेश करेगा, भविष्य में वही हरावल में युद्ध करने का सौभाग्य प्राप्त करेगा। बल्लू शक्तावत तथा रावत जैत सिंह चुंडावत ने दुर्ग पर एक साथ आक्रमण कर दिया।

बल्लू शक्तावत ने महावत को उस दुर्ग के मुख्य द्वार पर हाथी चढ़ाने के लिए कहा, जहाँ से मुगल तीरों और गोलियों की निरंतर वर्षा कर रहे थे। महावत ने यह कहते हुए असमर्थता जताई कि हाथी के दाँत नहीं हैं तथा दुर्ग के द्वार पर लगे नुकीले भालों के कारण द्वार को हाथी तोड़ने से असफल हो रहा है। बल्लू सिंह उन भालों के समक्ष खड़े हो गए और महावत को स्वयं पर हाथी चढाने का आदेश देते हए कहा, “यह हाथी मुझ पर चढ़ा दो, अन्यथा मैं तुम्हारा वध कर दूंगा”। महावत ने आदेश की पालना की। बल्लू सिंह का क्षत-विक्षत शरीर हाथी के लिए सहायक हुआ और दुर्ग का द्वार भरभराकर ध्वस्त हो गया।

इधर रावत जैत सिंह ने रस्सियों की सहायता से दुर्ग की दीवार पर चढ़ना प्रारंभ किया, किंतु एक मुगल सैनिक ने उन्हें गोली मार दी। गोली लगने से आहत सामंत ने अपने साथी से कहा कि मेरा मस्तक काटकर दर्ग में फेंक दो। साथियों ने वही किया। इस प्रकार चुंडावत तथा शक्तावत, दोनों ही कल के योद्धा एक ही समय पर दुर्ग में प्रवेश कर गए। अमर सिंह ने दोनों ही शाखाओं के योद्धाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की और चुंडावत ही हरावल में युद्ध करने के अधिकारी बने रहे।

व्यभिचारी और हत्यारे अकबर तथा उसके पुत्रों को ऐसे महान राजपूत योद्धाओं के साहस और बलिदान का क्या बोध हो सकता था, जिन्होंने अपने मान हेतु एक दुर्ग को हस्तगत करने के लिए बलिदान का एक ऐसा उदाहरण दिया, जो तुर्क-मुगल इत्यादि किसी के लिए भी एक असंभव स्वप्न के समान था।

अमर सिंह ने कुछ ही समय में मुगलों के 30 थानों को हस्तगत कर लिया; इसके साथ ही मेवाड़ पर अधिकार करने का अकबर का स्वप्न केवल स्वप्न ही रह गया। यद्यपि ऐसा कहा जा सकता है कि मेवाड़ ने यह विजय बल्लू सिंह शक्तावत, रावल जैत सिंह चूँडावत तथा तेज सिंह खंगारोत जैसे साहसी योद्धाओं के बलिदान के कारण प्राप्त की थी।

अंततः सलीम से निराश व कुपित होकर अकबर ने सलीम के पुत्र खुसरो को आगे किया, क्योंकि उसमें युद्ध-कौशल था तथा बादशाह के प्रति अटूट निष्ठा भी। अकबर ने एक और चाल चली।

अकबर ने प्रताप के सौतेले भ्राता सगर को अपनी ओर मिलाकर उसे चित्तौड़ का किलेदार बनाकर, मेवाड़ का महाराणा बनाने का स्वप्न दिखाया।

सगर चित्तौड़ आया और अपने महान पूर्वजों के सिंहासन पर बैठ भी गया, किंतु उसे कभी मेवाड़ की जनता द्वारा प्रेम और सम्मान नहीं मिला। सात वर्षों तक मेवाड़ ने सगर के इस मिथ्याराज को सहन किया। कर्नल टॉड, सगर के इस अध्याय को बड़े सटीक शब्दों में बताते हैं–

“सगर, यद्यपि अपने भ्राता तथा भतीजे पर किसी शिलाखंड की भाँति कठोर था, फिर भी वह उन महान बलिदानी योद्धाओं के उस मंदिर से आते मूक अभिशापों व अपशब्दों को सहन नहीं कर सकता था, जो उस मंदिर की रक्षा में वीरगति को प्राप्त हुए थे।

उन साहसी राजाओं के शवों पर खड़े स्तंभ उसके स्वयं के अपमान के सबसे बड़े द्योतक थे। उस धरती पर चलते हुए उसे सदैव ऐसा प्रतीत होता था कि सभी उँगलियाँ केवल उसी की ओर उठ रही हैं। प्रतिपल उसे उन महामनाओं के शौर्य और स्वयं की अयोग्यता का स्मरण होता था।”

सगर इसी लज्जावश चित्तौड़ छोड़ जहाँगीर के दरबार में गया।

उसने उस मुगल की उपस्थिति में अपनी कटार निकालकर अपनी गरदन पर फिराकर आत्महत्या कर ली। एक द्रोही के लिए यही उचित अंत था।

इसके साथ ही राजपूतों में फूट डालने की इस चाल का भी अंत हो गया।

दिल्ली में खसरो, मेवाड पर आक्रमण करने के लिए बडी सेना इकट्ठी कर रहा था, किंतु भाग्य बीच में आ गया और 15 अक्तूबर, 1605 को अकबर, विष के प्रभाव से मृत्यु को प्राप्त हुआ। ‘अकबरनामा’ में इसका उल्लेख है–

‘जहाँ अल्लाह का करम रहता है, वो रहता है, 
जो कुछ नहीं हो रहा है, वो भी हो जाता है, 
जो यकीनन होना है, वो भी होते-होते रुक जाता है।’

मेवाड़ को अपने अधीन होते देखना अकबर के भाग्य में नहीं था। अपने मोक्ष के सात वर्ष पश्चात् भी प्रताप ने अकबर को मेवाड़ विजय से वंचित रखा। अकबर की मृत्यु की कथा भी उसके जीवन जितनी ही विश्वासघातों से युक्त है। टॉड, बूँदी राजघराने द्वारा लिखे गए इतिहास का उल्लेख करते हुए कहते हैं–

“मान सिंह अकबर के विश्वासपात्र थे। अकबर उन्हें 'बेटा' कहकर बुलाता था।

मान सिंह, जहाँगीर के योग्य पुत्र खुसरो को अकबर के बाद अगला बादशाह बनाना चाहते थे। दूसरी ओर अकबर ने जहाँगीर को अपना उत्तराधिकारी चुन रखा था। मुगल सेना में आंतरिक संघर्ष के भय से अकबर ने मान सिंह को भोजन में विष देकर मारने का विचार किया, क्योंकि मान सिंह आमने-सामने के द्वंद्व में भारी पड़ने वाले योद्धा थे।”

कई लेखक और इतिहासकारों, जैसे कि मिस्टर ब्रेवरीज और विन्सेंट स्मिथ लिखते हैं कि जिन शत्रुओं को अकबर बल से नहीं जीत पाता था, उन्हें कपटपूर्वक विषैले भोजन एवं विषैले वस्त्रों की सहायता से मार्ग से हटाया करता था।

साधारणतया, वह ऐसे लोगों को मीठी-मीठी बातों में बहलाकर उन्हें भोजन हेतु आमंत्रित करता और अपने विश्वासपात्र रसोईयों की सहायता से उन्हें विषाक्त भोजन देकर उनकी हत्या कर देता था। किंतु उस दिन, भाग्यवश, जो भोजन उसने मान सिंह को मारने के प्रयोजन से बनवाया था, उसके रसोइयों द्वारा वह भोजन अकबर को ही परोस दिया गया। इस विष के प्रभाव से उसे भोजन खाने के तीन दिवस के भीतर ही खूनी दस्त लगे और फिर 15 अक्तूबर, 1605 को भारत का सबसे कपटी, व्यभिचारी मुसलमान राजा, हिंदुओं का सबसे घातक शत्रु, अपने ही बनाए कुचक्र में फँसकर नरक में चला गया।

जैसा छल और षड्यंत्र से भरा जीवन उसने जिया था, ठीक वैसे ही अपमानजनक अंत को वह प्राप्त भी हुआ। उस समय का लेखा-जोखा रखने वाले लोगों ने लिखा है कि दुर्गंध के कारण कोई उसके निकट भी जाने से कतराता था। अपने अंत समय में अकबर में मुसलमानों का धार्मिक मंत्र, कलमा पढ़ने तक की शक्ति नहीं बची थी और वह मौन ही संसार से विदा हुआ। इस तरह षड्यंत्रों के भरोसे जीवन व्यतीत करने वाले एक कपटी बादशाह को यमदूत उस अंधकार में खींचकर ले गए, जहाँ 40,000 निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार करने के लिए, उसे स्वनिर्मित नरक में जलना था।

अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहाँगीर दिल्ली का राजा बना, किंतु उसके अपने पुत्र खुसरो ने 1607 ईसवी में उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जहाँगीर ने खुसरो के इस विद्रोह का भैरोंवाल, पंजाब के युद्ध में दमन कर दिया तथा बंदी बनाकर उसे अंधा कर दिया। इसके पश्चात् जहाँगीर ने मुहब्बत खाँ (यह मुहब्बत खाँ जन्म से सिसोदिया था और प्रताप के भाई सगर का पुत्र था, किंतु धर्म परिवर्तन के पश्चात् मुहब्बत खाँ बन गया) को अमर सिंह का दमन करने भेजा। मुहब्बत खाँ की पराजय की कथा भी अद्भुत है–

जहाँगीर (1605-1627 ईसवी)
12,000 अश्वारोही, 500 सैनिक, 17 तोपों, 60 सैन्य हाथी और 20 लाख रुपए लेकर मुहब्बत खाँ ने मेवाड़ में अपने कदम रखे और राजपूतों के थानों को ध्वस्त करते हुए ऊँटाला के दुर्ग तक आ पहुँचा। यहाँ रावत मेघसिंह और गोविंदासोत चूँडावत ने मेवाड़ी सैनिकों की केवल 500 सैनिकों की टुकड़ी लेकर तुर्कों पर अचानक आक्रमण से अचंभित करने की योजना बनाई। एक दर्जन के आस-पास मेवाड़ी सैनिक, चरवाहों के रूप में गाय-भैंसों का एक बड़ा रेवड़ लेकर मुहब्बत खाँ की सेना के निकट पहुँचे। मेवाड़ी सैनिकों ने पशुओं के सींगों पर तरबूज में पटाखे भरकर, उनमें आग लगाकर तुर्क पड़ाव में छोड़ दिया। 500 मेवाड़ी सैनिकों ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए तुर्कों पर भालों एवं तीरों से हमला करना प्रारंभ किया।

एक बडी सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया है, यह मान कर मुहब्बत खाँ की विचलित सेना उत्तर दिशा में अजमेर की ओर भागने लगी। यहाँ से कुछ मील दूर ही अमर सिंह मेवाड़ की पूरी सेना लिये प्रतीक्षा कर रहे थे और देखते-ही-देखते पूरी तुर्क सेना को समाप्त कर दिया गया। उनके समस्त शस्त्रास्त्र एवं मूल्यवान् सामग्री मेवाडी सेना द्वारा छूट ली गई तथा तुर्कों द्वारा जीते गए समस्त थानों को पुनः प्राप्त कर लिया गया।

जहाँगीर ने अगली बार अब्दुल रहीम खानखाना के भाई को मेवाड़ पर चढ़ाई करने भेजा। अमर सिंह और तुर्क सेना का सामना 1607 ईसवी में दिवेर के निकट एक घाटी में हुआ। वहाँ एक भीषण युद्ध के पश्चात् तुर्क सेना पराजित हो गई। इस युद्ध का श्रेय मुख्यतः कानाजी को दिया गया, जो अमर सिंह के काका लगते थे। कालांतर में इन्हीं कानाजी के वंशज 'कानावत' कहलाए। एक छोटे संघर्ष के पश्चात् दिवेर का युद्ध हुआ।

रानकपुर के निकट मुगल अब्दुल्ला के नेतृत्व में लड़ी मुगल सेना मानो क्षण भर में समाप्त हो गई। यद्यपि यह विजय मेवाड को महँगी पडी। सभी प्रथम पंक्ति के सरदार दूदा सांगावत, नारायणदास, सूरजमल, आसकरण सिसोदिया जैसे वीर इन युद्धों में काम आए। पूरणमल शक्तावत, हरिदास राठौड़, भोपत झाला, कहीर दास कच्छावा, केसुदास चौहान, मुकुंद और जयमलोत राठौड़ इत्यादि भी इन विजय अभियानों में वीरगति को प्राप्त हुए।

अपनी इन पराजयों से विचलित जहाँगीर ने अपने पुत्र परवेज को अमर सिंह के पीछे एक नई सेना और भरपूर गोला-बारूद देकर राणा को पराजित करने के लिए भेजा। जहाँगीर ने अजमेर के सूबेदार का मनसब बढ़ाया और परवेज को निम्न निर्देशों के साथ मेवाड़ भेजा, “यदि राणा अथवा उसका पुत्र करण सिंह, सम्मानपूर्वक मिलने आएँ तो उनसे ससम्मान मिलना तथा उनके साम्राज्य को कोई हानि न पहुँचे।”

अमर सिंह ने सामने से परवेज पर हमला किया और खमनौर की घाटी की रक्तरंजित धरा पर मुगल सेना का स्वागत किया। मुगल पराजित हुए और साथ ही अजमेर को भी लूटा गया। इस युद्ध के विषय में मुगल इतिहासकार भी लिखते हैं कि यह पूरी तरह से मेवाड़ की विजयश्री का दिन था। मुगल इतिहासकार लिखते हैं कि परवेज घाटियों में खो गया था, उसके शिविर में विद्रोह की स्थितियाँ उत्पन्न हो गईं, उसकी रसद का रास्ता काट दिया गया तथा निरंतर होने वाले मेवाड़ी सेना के आक्रमणों से उसकी सेना लगभग समाप्त हो गई।

तब जहाँगीर ने परवेज के पुत्र को मेवाड़ के अभियान की बागडोर सौंपी, जिसे मुहब्बत खाँ ने स्वयं युद्ध कला में प्रशिक्षित किया था। उसकी सेना को भी अमर सिंह द्वारा मुँह की खानी पड़ी। अमर सिंह का विजय अभियान निरंतर 18 वर्ष चला। किंतु मुगल किसी रक्तबीज की भाँति बढ़ते गए।

मेवाड के वीर पुत्र जितना मुगलों को काट-काटकर उनके शवों का अंबार लगाते उससे अधिक मुगल, युद्ध में अपनी जान झोंकने हेतु उपस्थित हो जाते। इस कट्टरवादी और धर्मांध सेना की धार अनवरत बहती रही। प्रत्येक विजय के पीछे, मेवाड की सेना अपने साहसी सपूतों को खोती रही और उसके शत्रु कीटाणुओं की भाँति बढ़ते रहे।

प्रताप के देवलोक गमन के पश्चात् अमर सिंह के नेतृत्व में सत्रह बड़े युद्ध लडे गए तथा सभी सत्रह युद्ध मेवाड़ ने जीते। यद्यपि इन युद्धों में हुई विजय के लिए मेवाड़ को अपने कई शौर्यवान योद्धाओं की बलि देनी पड़ी। ऊपर से मेवाड़ के पास न तो नए संसाधन उत्पन हुए और न ही वीरगति को प्राप्त (हिंदू योद्धा कभी शहीद नहीं होते हैं। शहीद अरबी मूल का शब्द है जिसका अर्थ है– साक्षी या गवाह। मुसलमानों का अल्लाह साक्षी होता है कि अमुक मुसलमान ने इस्लाम की राह में प्राण गँवाए। केवल मुसलमान शहीद होता है। किसी हिंदू को शहीद कहना उसका सबसे बड़ा अपमान है।) योद्धाओं के स्थान पर नए योद्धाओं की भर्ती हो पाई।

उधर जहाँगीर भी अपने कई महत्त्वपूर्ण सेनानायकों को खो चुका था, जैसा कि उसने अपने संस्मरणों में लिखा है। मेवाड़ के युद्धों में, फरीद खाँ बर्लास व सिकंदर मोईन करावल की शहादत का उल्लेख जहाँगीर बहुत भारी मन से करता है। बर्लास अपने वंश का अंतिम सेनापति था तथा करावल के शव को मेवाड़ से आगरा मँगवाकर जहाँगीर ने अपने हाथों से गाड़ा। जयपुर के वीर नायक, माधो सिंह, जगन्नाथ कछावा व मान सिंह भी इहलोक से जा चुके थे। जहाँगीर मेवाड़ से संधि करने को आतुर था।

1613 ईसवी में जहाँगीर ने अपने सबसे योग्य पुत्र, खुर्रम (शाहजहाँ) को मेवाड़ पर आक्रमण हेतु एक बड़ी सेना लेकर भेजा। खुर्रम एक चतुर सेनापति सिद्ध हुआ। उसने अपनी सेना को छोटी-छोटी टुकड़ियों में बाँट दिया और मेवाड़ के थानों को एक-एक करके हस्तगत करने लगा, जिससे अमर सिंह को पीछे हटते हुए अरावली की पहाड़ियों में जा बसने के लिए विवश होना पड़ा। इसके पश्चात् खुर्रम ने मेवाड़ की सेना की रसद और सामरिक सामग्री पहुँचने के रास्ते बंद कर दिए। इन आक्रमणों से विचलित मेवाड़ी सेना गुरिल्ला पद्धति से युद्ध करने लगी।

पूरा उत्तरी मेवाड़ मुगलों के नियंत्रण में आ गया। कुंभलगढ़ और उदयपुर समेत मेवाड़ के सभी महत्त्वपूर्ण नगर अमर सिंह हार चुके थे; परिणामतः उन्हें अरावली के जंगलों में रहना पड़ा। इसके पश्चात् जो परिस्थितियाँ रहीं, उनमें अमर सिंह, उनके पुत्र करण सिंह एवं मेवाड के सभी महत्त्वपूर्ण सामंतों और प्रजा तक ने मिल-जुलकर संघर्षमय जीवन जिया। मेवाड़ के ये सभी लोग इस्लामी आक्रांताओं से केवल इसलिए संघर्ष कर पाए, क्योंकि इसमें उन्हें अमर सिंह और उनके सामंतों का दूरदर्शितापूर्ण नेतृत्व प्राप्त था।

भामाशाह, एक कुशल सेनापति और वित्त व्यवस्थापक थे उन्होंने प्रताप के पश्चात् अमर सिंह के साथ भी 1600 ईसवी में अपनी मृत्युपर्यंत, उसी तत्परता एवं निष्ठा के साथ कार्य किया, जैसा वे प्रताप के समय में करते थे। उन्होंने मेवाड के राजकोष को पोषित किया और अपनी मृत्यु से केवल एक रात पहले मेवाड के समस्त बही-खाते, दुर्गों एवं गुफाओं में छुपे हुए धन के मानचित्र, सभी अपने महाराणा को समर्पित कर दिए।

अपनी मृत्यु के पश्चात् भी भामाशाह ने मेवाड़ के सामरिक संघर्ष को पोषित करने हेतु धन की समुचित व्यवस्था बनाए रखी थी। अमर सिंह ने भामाशाह के पुत्र जीवा शाह को मेवाड़ का मुख्य कोषाधिकारी नियुक्त किया, जिन्होंने जीवनपर्यंत अपने पिता की ही तरह मेवाड़ की सेवा की।

खुर्रम द्वारा मेवाड़ के सभी वित्त-व्यापार इत्यादि को रोक देने के बाद कुछ ही माह में मेवाड़ के सामंतों ने प्रजा में फैल रहे असंतोष को भाँप लिया तथा इस विषय में चर्चा करने वे महाराणा के पास पहुँचे। उन्होंने सम्मिलित स्वर में उनसे निवेदन किया-

“हमारे पास अब न तो मुगलों से लड़ने हेतु संख्या है और न ही साधन, अतः मेवाड़ की संप्रभुता बनाए रखने हेतु संधि से उपयुक्त और कोई समाधान नहीं दिख रहा।”

महाराणा अमर सिंह ने अपने पिता को उनके अंतिम समय में वचन दिया था कि वे स्वयं कभी, किसी भी परिस्थिति में समर्पण नहीं करेंगे, किंतु उन्हें भी अपनी संघर्षरत सेना एवं प्रजा में फैलते असंतोष की प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनाई दे रही थी।

उन्होंने अपने सामंतों से तनिक रुकने को कहा। तब तक उन्होंने मुगलों के सेनापति और प्रताप के शुभचिंतक अब्दुल रहीम खानखाना के लिए एक दोहा लिखा। राणा ने लिखा–

गोड़ कछावा राठवड़, गोखां जोख करंत। 
कहजो खांनांखान नै, वनचर हुआ फिरंत॥

अर्थात् गौड़, कच्छावा और राठौड़ राजपूत, मुगलों से संधि करके ठंडी हवाओं का आनंद ले रहे हैं, किंतु हे खानखाना! केवल हम सिसोदिया हैं, कि वनों में पशुओं की भाँति विचरण करने को बाध्य हैं।

रहीम को जब यह संदेश प्राप्त हुआ था, तब वह दक्षिण भारत में युद्धरत थे।

उनका प्रत्युत्तर था–
धर रहसी रहसी धरम, खप जाशी खुरसाण। 
अमर विशंभर ऊपरा, राखौ निहचो राण ॥

अर्थात् धरती रहेगी और धर्म भी रहेगा, मुगल मारे जाएँगे। विश्वंभर महादेव स्वर्ग से आपको देख रहे हैं, थोड़ा सा धीरज रखिए राणाजी!

मेवाड़-मुगल शत्रुता की गाथा से हम थोड़ा विराम लेकर इन महामनाओं की आत्मिक और बौद्धिक विशालता का भी स्वाद लें, जहाँ शत्रु राजा को उसकी प्रतिद्वंद्वी सेना का ही एक सेनापति संबल और विश्वास से ओत-प्रोत शब्दों में ज्ञान की बात कह रहा है! समझ व प्रेम की इन ऊँचाइयों को आत्मसात् करने का हम प्रयास कर सकते हैं, ताकि हमारा समसामयिक जीवन भी इन महापुरुषों के प्रतिबिंब में आलोकित व सुगंधित हो सके।

रहीम के साथ इस प्रकार का संवाद होने के पश्चात् अमर सिंह ने मुगलों से एक वर्ष तक और संघर्ष किया। इन परिस्थितियों में मेवाड़ के सामंतों ने अमर सिंह से आज्ञा लिये बिना ही राजकुमार करण सिंह से संवाद किया। सामंतों ने करण सिंह से विनयपूर्वक निवेदन किया–

“न खाने को अन्न है, न पहनने को वस्त्र न शस्त्र हैं और न ही साधन परिवारों में 4-4 पीढ़ियों के पुरुष अपने बलिदान दे चुके हैं।

कभी-कभी तो एक ही घर में पिता का बारहवाँ और पुत्र का जन्म एक साथ होता है। यदि कोई बालक मुसलमानों के हाथ लग जाए तो उन्हें यौन दुराचार हेतु प्रयोग किया जाता है। हमारी पत्नियों और बालकों के जीवन से अधिक हमें इस प्रकार के दुराचार का भय विचलित कर देता है।

पिछले 47 वर्षों में हमारे लोगों ने सभी प्रकार के कष्ट उठाए, किंतु समाधान होता दिख नहीं रहा। मेवाड़ के पुत्रों ने दशकों लंबा यह संघर्ष मात्र गूलर के फल व जंगली आम खाकर किया है, किंतु अब तो वन के वृक्ष भी सूखने लगे हैं।” करण सिंह ने शांतिपूर्वक सब सुना। उन्होंने सामंतों को उनकी सेवा और निष्ठा के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने सामंतों को समझाया कि दाजीराज सा ने मृत्यु शय्या पर महाराणा को वचन दिया था कि जब तक स्वयं जीवित हैं, वे मुगलों के साथ किसी प्रकार से संधि नहीं करेंगे।

सामंत झाला हरिदास तथा शुभकरण पँवार ने उत्तर दिया, “यदि मेवाड़ के सामंत ही युद्ध करने से मना कर देंगे तो अकेले महाराणा क्या कर पाएँगे?” दोनों ही सामंतों ने करण को सलाह दी कि वे उन्हें खुर्रम से संधि की शर्तों पर बात करने दें। यदि वे सम्मानजनक होंगी तो मेवाड को अपने साधन और सेना एकत्र करने के लिए समय मिल जाएगा और इसमें कोई बुरी बात नहीं है।

मेवाड की पद व्यवस्था में राजकुमार, उमराव और रावतों से नीचे के पदों में आता है। अतः मुगल सोचेंगे कि राजकुमार संधि कर रहा है, किंतु मेवाड के अनुसार यह केवल एक छोटे सामंत के द्वारा संधि प्रस्ताव के रूप में ही देखा जाएगा। मेवाड़ का अपने लिए सदैव तत्पर रहने वाले सामंतों के प्रति यह सम्मान ही था, जिसके आधार पर राजकुमार भी पद में, मेवाड के निष्ठावान सामंतों से कम गिने जाते थे। मेवाड़ में वरीयता और निष्ठा का अद्भुत सम्मान होता था। कदाचित हमारे वर्तमान नेतागणों तथा जन नायकों को इस परिपाटी से शिक्षा लेनी चाहिए। दोनों ही सामंतों ने करण को आश्वस्त किया कि एक बार उन दोनों को जहाँगीर के दरबार में उपस्थित होने दिया जाए, ताकि उससे संधि की शर्तों पर बात की जा सके। यदि शर्तें सम्मानजनक नहीं हुईं तो वे दोनों ही अपनी मृत्युपर्यंत युद्ध हेतु तत्पर रहने का वचन देते हैं।

राजकुमार करण सिंह ने अमर सिंह की अनुमति के बिना ही दोनों सामंतों को जहाँगीर से मिलने अजमेर भेज दिया। जहाँगीर मेवाड़ से हो रहे इन युद्धों से तंग आ चुका था और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे विद्रोहों का दमन करने में उसके अपने साधन भी शनैः शनैः क्षीण होते जा रहे थे।

1615 ईसवी में महाराणा प्रताप के देवलोकगमन के 18 वर्ष पश्चात 17 प्रमुख युद्ध लड़ने और उनमें विजय प्राप्त करने के बाद, मेवाड़ ने जहाँगीर के साथ संधि की। दोनों ही सामंतों को पूरे स्वागत-सत्कार के साथ मुगलों ने दरबार में बुलवाया। जहाँगीर ने महाराणा अमर सिंह को स्वयं पत्र लिखा और उनके प्रति अपना सम्मान दर्शाया।

इस पत्र के साथ उसने महाराणा हेतु ढाका के मलमल की एक शॉल एवं एक वस्त्र पर केसर से बना अपने हाथ के पंजे की छाप लगाकर पत्र भेजा, जिसका अर्थ था कि मुगल इस संधि में लिखे गए प्रत्येक शब्द का सदैव सम्मान करेंगे। इसके अतिरिक्त जहाँगीर ने अपने पुत्र खुर्रम को आदेश दिया कि इस संधि में जिन शर्तों पर भी राणा अपनी सहमति दें, उसके आधार पर अपनी सहमति स्वरूप वह स्वयं भी राजसी मुहर लगाए।

यह सब कुछ महाराणा अमर सिंह की जानकारी के बिना हो रहा था। वे स्वयं गोगुंदा में थे।

राजकुमार करण सिंह ने संधि और उसकी शर्तों के विषय में अपने पिता को सब कुछ बताया तथा उन्हें इस सम्मानजनक संधि को स्वीकार करने की सलाह दी। 

अमर सिंह का मुँह, दुःख और क्षोभ से क्लांत हो गया। राणाजी ने मौन धारण कर लिया।

कुछ समय के पश्चात् अमर सिंह ने कहा, “यदि आप सभी ने अपना मन बना ही लिया है, तो इस विषय में मैं और क्या कहूँ? मैं दाजीराज सा (प्रताप) को दिए अपने वचन को कदापि भंग नहीं करना चाहता था, किंतु ईश्वर ने अंततः मुझे यह दिन दिखा दिया।” अमर सिंह दुःखी मन से एकांतवास में चले गए। अपने जीवन काल में ही राज-काज के सब निर्णय उन्होंने करण सिंह पर छोड़ दिए।

यह संधि यद्यपि मेवाड़ के लिए आवश्यक थी और उस समय की माँग भी थी और इसे पर्याप्त सम्माजनक शर्तों पर ही किया गया।

फिर भी यह संधि, मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा अमर सिंह के असामयिक निधन का प्रमुख कारण बनी। अमर सिंह इस दंश को सह ना सके कि उनके जीवनकाल में मेवाड़ ने मुगलों की प्रभुसत्ता को स्वीकार कर लिया।

अमर के गर्वीले चरित्र पर यह बोझ असहनीय था कि उन्हें उन मुस्लिम आक्रांताओं के समक्ष झुकने का अपमान झेलना पड़ा, जिनसे उनके पूर्वजों ने विगत 800 वर्षों से स्वाभिमान तथा सम्मान की लड़ाई लड़ी थी। मेवाड़ और मुगलों में हुई इस संधि के मुख्य बिंदु थे–

1. राणा अपनी पसंद की जगह पर खुर्रम से मिलेंगे।

2. राणा के पुत्र करण सिंह को उनके प्रतिनिधि के रूप में मुगल दरबार में भेजा जाएगा।

3. मेवाड़ के राजकुमार को मुगल दरबार में अन्य राजकुमारों से उच्च स्थान प्राप्त होगा तथा यह स्थान जहाँगीर के बिल्कुल निकट होगा।

4. मेवाड़ के राणा को कभी मुगल दरबार में उपस्थित नहीं होना पड़ेगा।

5. चित्तौड़ का दुर्ग, राणा को पुनः दे दिया जाएगा, किंतु उसे कभी सुधारा नहीं जाएगा और न ही किलेबंदी की जाएगी।

6. राणा अपने एक हजार अश्वारोही मुगल सेना में देंगे।

अतः 8वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक लगभग एक सहस्र वर्षों के लिए इस्लामी आक्रांताओं से लड़ने के पश्चात् मेवाड़ और मुगलों में संधि हो गई।

कुछ इतिहासकार इस संधि को मेवाड़ के समर्पण के रूप में देखते हैं, किंतु यह उचित नहीं है और उस समय को एक संकीर्ण सोच से देखने का ही परिणाम है। अपने मन से मेवाड़ ने कभी भी समर्पण नहीं किया। इस शांतिकाल का उपयोग मेवाड़ ने अपने साधनों एवं सेना को एकत्र करने हेतु किया था।

1567 ईसवी में अकबर के चित्तौड के घेरे से आरंभ हुए इस संघर्ष का इतिहास विलक्षण शौर्य, आश्चर्यजनक निष्ठा, अतुलनीय बलिदान व अद्भुत एकाग्रता एवं चरित्र की रोमांचक घटनाओं में गुथा गया था। यदि भारत के शेष राजपूत राज्य, धर्म व स्वाधीनता के लिए इसका आधा भी समर्पण दिखाते तो न कोई मुगल यहाँ होता, न उनका काला इतिहास।

मेवाड़-मुगल संधि की मुख्य बात यह थी कि राणा को स्वयं कभी मुगल दरबार में उपस्थित नहीं होना था और न ही उन्हें बादशाह को झुककर अभिवादन करना था। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि मेवाड़ के महाराणा का मुगलों के सामने झुकना या उनको झुककर अभिवादन करना न केवल मेवाड़, वरन् पूरे भारत के आत्मसम्मान पर प्रश्नचिह्न लगा देता। इसके अतिरिक्त अमर सिंह ने मुगलों से विवाह संबंधों को सिरे से अस्वीकार कर दिया था। यह भी मुगलों की सत्ता पर एक प्रहार था, क्योंकि विधर्मी मुगल, विवाह संबंधों के माध्यम से राजपूत राजाओं को अपने अधीन बना लेते थे।

अतः अमर सिंह ने अच्छी तरह से विचारकर इस संधि को मौन स्वीकृति दी थी, ताकि लगभग 800 वर्षों तक उनके पूर्वजों और उनकी प्रजा ने जो संघर्ष का समय भुगतकर भी अपने आत्मसम्मान की रक्षा की थी, वह संघर्ष व्यर्थ न हो जाए।

इस संधि के अतिरिक्त मेवाड़ के पास केवल एक ही मार्ग था, प्रत्यक्ष युद्ध।

उससे भविष्य के सभी मार्ग व संभावनाएँ बंद हो जातीं और मेवाड़ को पुनः खड़े होने का भी कोई अवसर ही नहीं मिलता। मेवाड़ ने इस्लामी कट्टरपंथियों से संघर्ष के इतिहास में सदैव पुनः अपने आप को एक सशक्त राज्य के रूप में स्थापित किया था और इस संधि को एक ऐसे समय के रूप में देखा जा सकता है, जिसके पश्चात् मेवाड़ को पुनः अपनी सत्ता तथा सम्मान को स्थापित करने का अवसर मिला था।

मेवाड़ और मुगलों के बीच के इस शांतिकाल में मेवाड़ को अपनी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने और हिंदुओं के सबसे कुटिल शत्रु, यानी औरंगजेब से संघर्ष करने हेतु अपनी प्रजा को तैयार करने के लिए समय मिल गया।

इतिहास में इस संधि के लिए अमर सिंह को उदार दृष्टि से देखना चाहिए। यद्यपि यह संधि उस समय की भूराजनीतिक परिस्थितियों के कारण एक थोपा हुआ प्रकरण था, किंतु राजपूतों के आत्मसम्मान तथा हिंदुओं की स्वाधीनता से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया गया। इसी संधि के कारण मेवाड ने मात्र पाँच ही दशक में पुनः स्वयं को स्थापित कर लिया।

मेवाड के लिए इस संधि के दो मुख्य लाभ रहे, जिनका उल्लेख आवश्यक है। पहला है, चितौड़ का पुनः प्राप्त होना, जिसे अकबर ने पचास वर्ष पहले हिंदुओं से छीना था। दूसरा, अमर सिंह द्वारा मुगलों से उत्तम तकनीक से निर्मित तोपें बनाने हेतु कारीगर लिये गए। चित्तौड, मेवाड और उसकी प्रजा के लिए एक सांकेतिक व मनोवैज्ञानिक महत्त्व का स्थान रखता था और मेवाड की जनता ने चित्तौड के पुनर्ग्रहण को किसी उत्सव की भाँति उल्लास से मनाया।

दूसरा, मेवाड़ी सैनिकों को मुगल आग्नेयास्त्रों का प्रशिक्षण मिलने से भविष्य में औरंगजेब के साथ हुए युद्ध में विजय प्राप्त करना और भी सुगम हो गया।

मेवाड़ पर हो रहे आक्रमणों को एक सम्मानजनक और लाभदायी संधि में परिवर्तित कर राज्य और प्रजा दोनों के लिए ही मेवाड़ के बुद्धिमान और शौर्यवान सामंतों एवं महाराणा अमर सिंह ने उचित निर्णय लिया।

मेवाड़ की गाथाओं और हिंदू लेखकों द्वारा लिखित ग्रंथों में इस परिवर्तन के उल्लेख के अतिरिक्त जहाँगीर की आत्मकथा 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' में भी महाराणा अमर सिंह एवं उनके पुत्र कर्ण सिंह के विषय में सम्मानजनक उल्लेख किया गया है–

18 फरवरी, 1615 को मेवाड़ के राजकुमार करण सिंह, शहजादा खुर्रम के साथ अजमेर पहुँचे और जहाँगीर ने स्वयं आकर राजकुमार का स्वागत किया। मुगल दरबार में ब्रिटिश राजदूत और जेम्स प्रथम के प्रतिनिधि थॉमस रो के अनुसार, जहाँगीर स्वयं अपने सिंहासन से उठा और उसने राजकुमार करण सिंह का स्वागत किया तथा उनके ललाट का चुंबन लिया इसके पश्चात् जहाँगीर ने उनको अपनी बाईं तरफ एक स्थान पर बिठाया, जो अन्य राजकुमारों एवं दरबारियों से ऊँचा स्थान था।

जहाँगीर ने भी अपने संस्मरणों में लिखा है–
“करण ने अपने राज्य में पर्वतों में घूमते हुए जो जीवन जिया है, उसके हिसाब से वह काफी शर्मीला है, और उसे दरबार के तौर-तरीकों का अनुभव भी नहीं है, मैं स्वयं उससे जुड़ने के लिए और उसे विश्वास दिलाने के लिए उसके और उसके परिवार के प्रति सम्मान व्यक्त करता हूँ तथा उसे कुछ-न-कुछ देता रहता हूँ।

“दूसरे ही दिन मैंने उसे एक जड़ाऊ कटार दी थी। तीसरे दिन मैंने उसे इराक से मँगवाया हुआ एक बेहतरीन नस्ल का सजीला घोड़ा उपहार में दिया। उसी दिन मैं उसे मलिका के दरबार में भी ले गया, जहाँ बेगम नूरजहाँ ने उसके लिए बेहतरीन खिलत (वे वस्त्र, जो किसी राजा की ओर से सम्मानपूर्वक दिए जाते हैं।) बनवाए, कई हठी घोड़े और बेशकीमती जवाहरात भी दिए। उसी दिन मैंने उसे मोतियों का एक बहुमूल्य हार भी दिया और एक दिन एक हाथी दिया। मेरी इच्छा थी कि मैं उसे एक से बढ़कर एक बेहतरीन चीजों से नवाजूँ। मैंने उसे तीन शाही बाज और सिखाई हुई तीन चीलें, कवच और शानदार जिरह-बख्तर भी दिया। महीने के आखिरी दिन मैंने उसे खूबसूरत गलीचे, तकिए, इत्र, सोने के बरतन और गुजरात से मँगवाई हुए खूबसूरत बैलों की एक जोड़ी भी दी।”

करण सिंह के साथ हुए इस राजसी व्यवहार से पता चलता कि सम्मान और साहस कितना मूल्यवान् होता है! जो राजा मुगलों की सेवा में थे, उनके साथ कभी ऐसा राजसी व्यवहार नहीं हुआ, जैसा जहाँगीर ने करण सिंह के साथ किया।

जहाँगीर द्वारा करण सिंह को दिए गए सम्मान के विषय में ब्रिटिश एजेंट थॉमस रो लिखते हैं– “राजा पुरु का असली उत्तराधिकारी मुगलों के बीच खड़ा था, पिछले बरस तक तो कोई इन्हें डरा भी नहीं सका था, लेकिन सच कहें तो उसे हराया नहीं गया, बल्कि खरीदा जा रहा है। जिस पर हथियार न चलें, उसे उपहार दे दो! सिकंदर द्वारा निर्मित स्तंभ आज भी दिल्ली में है, जो कि राम की पुरातन राजधानी रही, पौरस के वंशज की राजधानी।”

थॉमस रो ने एक ही वक्तव्य में श्रीराम से लेकर राजा पुरु और मेवाड़ के महाराणाओं की ख्याति कह दी थी, जो कि आज भी बिना किसी रोक-टोक के मेवाड़ में यशस्वी महाराणाओं के रूप में विद्यमान है। 

दुःख की बात यह है कि यद्यपि हम विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता के वंशज हैं, पर हम स्वयं ही शौर्य व आत्मसम्मान की इस परंपरा से अनभिज्ञ हैं। आज यदि हम जीवित हैं और सुखी हैं तो उसके पीछे हमारे उन महान पूर्वजों का विवेक एवं बलिदान है, जिन्होंने भयंकर संघर्ष के समय में भी मन स्थिर रखा और अभूतपूर्व शौर्य से युद्ध लड़े।

करण सिंह मेवाड़ लौट आए और कुछ समय पश्चात् उनके पुत्र जगत् सिंह भी जहाँगीर के दरबार में गए। उनके साथ भी वही यथोचित व्यवहार हुआ, जो करण सिंह के साथ हुआ था।

करण सिंह के मेवाड़ लौटने के साथ ही मेवाड़ की आर्थिक और सामाजिक संपन्नता तीव्र गति से बढ़ने लगी। प्रजा अब पर्वतीय क्षेत्रों से उतरकर मैदानी क्षेत्रों में पुनः बसने लगी। कृषि और व्यापार पुनः पल्लवित होकर बढ़ने लगे थे। देवला और डूंगरपुर पर आधिपत्य के साथ ही मेवाड़ के भूभाग का विस्तार भी होने लगा था। अब नए नगरों, जैसे खेराड़, फूलिया, बदनोर, मांडलगढ़, झीरम, नीमच और भैंसरोडगढ़ इत्यादि को भी मेवाड़ में सम्मिलित कर लिया गया था।

चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करना और उसके खोए स्वरूप तथा प्रतिष्ठा को लौटाना मेवाड़ की प्रजा के मानस पर एक सकारात्मक प्रभाव लाया, क्योंकि उनके पूर्वजों ने अपना सर्वस्व बलिदान देकर उसकी रक्षा की थी। जैसे ही अमर सिंह और मुगलों में संधि हुई, भाग्य ने महाराणाओं की कथा में एक सुखद बदलाव करना शुरू कर दिया था।

यह संधि ऐसा विश्राम थी, जिसे मेवाड़ के महान राजवंश ने अपने बाहुबल पर अर्जित किया था।

यह संधि कुल पाँच दशकों तक चली और इस काल में मेवाड़ ने वह सुख की साँस ली, जिसका वह अधिकारी था।

मेवाड के महाराणाओं एवं उनकी प्रजा को क्या पता था कि उनके भाग्य में मुगलों के साथ एक अंतिम भीषण संघर्ष अभी शेष है। ईश्वर ने मेवाड को अपनी शक्तियों और सामर्थ्य को बढाने एवं थोडा विश्राम कर लेने का एक अवसर दिया था, ताकि वे महाराणा जगत् सिंह के परम साहसी पुत्र राज सिंह के नेतृत्व में हिंदू धर्म के सबसे कपटी शत्रु औरंगजेब से पूरी शक्ति के साथ संघर्ष कर सकें। मेवाड़ द्वारा मुगलों पर अंतिम और निर्णायक युद्ध की यह गाथा अधिकांश लोगों को ज्ञात ही नहीं है। वह युद्ध जिसने दिल्ली सल्तनत के शाह औरंगजेब के शासन की जड़ें हिला दीं; परिणामतः मुगल साम्राज्य सदा के लिए अपने पतन की ओर चला गया। इसी संधि के कारण महाराणा राज सिंह का शासन आने तक राजपूतों में एकता होने का वह महती कार्य संभव हुआ, जो औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके वंश के पतन का प्रमुख कारण बना। मेवाड़ की उस संधि के समय में अमर सिंह शांतिकाल में शासन कर रहे थे तथा करण सिंह एवं जगत् सिंह मुगलों द्वारा प्रसन्न किए जा रहे थे। अमर सिंह ने भी करण सिंह एवं जगत् सिंह को विभिन्न बहुमूल्य उपहार देकर जहाँगीर के दरबार में भेजा, ताकि उनकी ओर से इस संधि का उचित सम्मान रखा जा सके।

किंतु अमर सिंह का विदग्ध मन, मुगलों द्वारा दिया गया कोई भी सम्मान या उपहार स्वीकार नहीं कर सकता था। अमर सिंह अपने पिता, प्रताप को दिए गए वचन के भार से मुक्त नहीं हो पा रहे थे, जो रघुकुल का उच्चतम आदर्श और परंपरा थी। इस विषय को गोस्वामी तुलसीदासजी ने बड़े सहज एवं सुंदर शब्दों में कहा है–
रघुकुल रीति सदा चली आई।
प्राण जाहुँ पर वचन न जाई।

अर्थात् रघु के वंश में यह रीति सदैव रहेगी, चाहे प्राण गँवाने पड़ें, किंतु रघु के वंशज वचन का निर्वहन करना नहीं छोड़ सकते।

यद्यपि मेवाड़ ने मुगलों के साथ संधि में कुछ नहीं खोया, केवल अपनी प्रजा के लिए अधिक क्षेत्र और प्रभाव ही प्राप्त किया था, किंतु अमर सिंह पर उस वचन का नैतिक भार किसी भी लाभ से अधिक था। मेवाड़ ने प्रताप की शपथ पूरी करते हुए, बहुमूल्य एवं सबसे महत्त्वपूर्ण चित्तौड़ को प्राप्त कर लिया था, किंतु अमर सिंह अब भी बार-बार अपने पिता को दिए वचन पर ही अटक जाते थे। प्रत्येक पल, अमर सिंह मुगल शासन के मित्र बनने के विचार मात्र से ही इतने उद्वेलित होते थे कि उनकी आत्मा एकाकीपन की अंधकारमय वीथियों में ही भ्रमण करती रहती थी।

सज्जनता के परिचायक उन अमर सिंह को नमन, जो कुछ कम सम्मान से श्रेयस्कर, कुछ भी नहीं होने को मानते थे। अतः उन्होंने उस राजसिंहासन को छोड़ने का मन बना लिया, जिस पर आसीन रहना उनके लिए असंभव हो गया था। उन्होंने अपने करण सिंह के माथे पर तिलक लगाया और मेवाड़ के सम्मान का दायित्व करण सिंह को सौंपकर पिछोला झील के किनारे बनी नौचौकी पर एकांतवास में चले गए। अमर सिंह मेवाड़ के अत्यंत शौर्यवान और शक्तिशाली राजकुमार थे, जिन्होंने दिवेर के युद्ध में अपने शौर्य से सबको चमत्कृत कर दिया था। मेवाड़ के अन्य राजाओं के विपरीत वे श्यामवर्णी थे।

अमर सिंह, प्रताप और अपने वंश के उत्तराधिकारी होने के सर्वथा योग्य थे। उनमें वे सभी मानसिक शारीरिक एवं वैचारिक गुण थे, जो एक हिंदू राजा में ऐसे कठिन समय में होने चाहिए, जैसा कि मेवाड़ ने संघर्ष के दिनों में देखा। वे मितभाषी थे, एकांतप्रिय थे, किंतु सैन्य कौशल में अत्यंत प्रवीण थे। वे कर्मठ एवं दयालु राजा थे, जो सभी प्रकार के लोगों, मतों एवं संस्कृतियों का सम्मान करते थे।

साठ वर्ष की आयु में उन्होंने कुल चालीस वर्ष तो केवल मुगलों से दिन-रात संघर्ष करते हुए व्यतीत किए थे। मेवाड़ पर अपने शासन के 23 में से 18 वर्षों तक उन्होंने केवल अकबर और जहाँगीर की सेनाओं से युद्ध करने में व्यतीत किए और प्रत्येक युद्ध को अपनी और मेवाड़ की विजय में परिणत किया। इस दृष्टि से अमर का मुगलों से संघर्ष काल प्रताप की तुलना में दुगुना था।

प्रताप का संघर्ष, 1574 ईसवी से 1583 ईसवी तक लगभग नौ वर्ष का ही था। अमर सिंह के शासनकाल के अंतिम पाँच वर्ष, युद्ध से त्रस्त और थके मेवाड़ के लिए सुख और संपन्नता का समय रहा।

अत्यंत सहिष्णु और संवेदनशील पुरुष होने के कारण उनके मन में अपने पिता को दिए वचन के भंग होने का ऐसा प्रभाव पड़ा कि 30 अक्तूबर, 1620 ईसवी को उनकी बोझिल आत्मा इस लोक को छोड़ श्रीहरि के चरणों में लीन हो गई।

प्रताप के सबसे योग्य, किंतु कम प्रसिद्ध पुत्र, अमर सिंह पिछोला के किनारे मोक्ष को प्राप्त हुए।

उनकी अस्थियाँ भी उनके पूर्वजों की अस्थियों की भाँति, मेवाड़ की माटी में मिला दी गई। प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र और उनके उत्तराधिकारी अमर सिंह ने जीवनपर्यंत मेवाड़ के ध्वज को अद्भुत संतुलन और सम्मान के साथ सर्वोपरि रखा, जो उनसे अपेक्षित था।

उनके द्वारा मुगलों के साथ की गई सम्मानजनक संधि के कारण मेवाड़ को पुनः स्वयं को सामरिक और आर्थिक रूप से सक्षम होने का समय दिया, जिसके फलस्वरूप उनके प्रपौत्र राज सिंह ने औरंगजेब के अत्याचारों से देश को मुक्त करवाया और 1707 ईसवी में औरंगजेब के साथ मुगल साम्राज्य सदा के लिए समाप्त हो गया।