अमृत वाणी - संत वाणी - 37 Nitya Oswal द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 37

“संसार की चिंता छोड़ो और यह खोजो कि यह चिंता करने वाला ‘मैं’ कौन हूँ? जब तक अहंकार जीवित है, तब तक प्रश्न और समस्याएँ रहेंगी। अहंकार के विलीन होते ही केवल अनंत शांति शेष रह जाती है।”

आधुनिक युग के महान संत महर्षि रमण का यह उपदेश सुनने में बहुत सरल लगता है, लेकिन इसे समझने में लोग अक्सर बड़ी भूल कर बैठते हैं। लोग सोचते हैं कि यदि मैं संसार की चिंता करना ही छोड़ दूँगा, तो मेरे बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की दवाई और घर के खर्चों का क्या होगा? क्या संत हमें पूरी तरह स्वार्थी और उदासीन होने को कह रहे हैं? इस गलतफहमी के कारण लोग इस गहरे मार्ग से दूर भागते हैं। लेकिन महर्षि रमण यहाँ जिम्मेदारियों को छोड़ने की नहीं, बल्कि उस ‘मानसिक बोझ’ को उतारने की बात कर रहे हैं जो हमें भीतर से खोखला कर रहा है। यहाँ चिंता छोड़ने का मतलब ‘लापरवाह’ या ‘कामचोर’ होना नहीं है; चिंता करना एक मानसिक बीमारी है जो हमारी कार्यक्षमता को घटाती है, जबकि ज़िम्मेदारी निभाना एक कर्तव्य है। महर्षि हमें ‘निश्चिंत’ होकर अपना फर्ज पूरा करना सिखा रहे हैं।

गहरे अर्थ की व्याख्या (प्याज के छिलके का उदाहरण)
यहाँ ‘मैं’ का अर्थ हमारा वह ‘झूठा अहंकार’ (Ego) है जो सोचता है कि यह पूरा घर, यह दफ़्तर और यह दुनिया सिर्फ मेरे भरोसे चल रही है; अगर मैं नहीं रहूँगा तो सब बर्बाद हो जाएगा। महर्षि रमण कहते हैं कि जब भी आपको तनाव या एंग्जायटी (Anxiety) हो, तो बाहर के लोगों से लड़ने के बजाय अपने भीतर मुड़कर देखें और पूछें— “चिंता किसे हो रही है? दुखी कौन है?” जैसे प्याज के छिलके उतारते-उतारते अंत में केवल खालीपन बचता है, वैसे ही अपने भीतर से ‘मेरा शरीर’, ‘मेरा मन’, ‘मेरी भावनाएँ’ के छिलके उतार दो। अंत में जो ‘जानने वाला’ बचेगा, वही तुम्हारा असली ‘मैं’ (आत्मा) है। जब यह सब कुछ अपने नियंत्रण (Control) में रखने का घमंड टूटता है, तो मन में एक अद्भुत शांति का जन्म होता है। छिलके उतारने का मतलब अपनी भावनाओं या परिवार के प्रति प्रेम को फेंकना नहीं है, न ही इसका मतलब पत्थर बन जाना है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि जीवन के दुखों और घाटे को सीधे अपनी आत्मा से मत चिपकाओ। यह समझो कि “घाटा मेरे बिज़नेस (बाहरी छिलके) को हुआ है, मुझ ‘चेतना’ को नहीं।” इससे समस्याओं की ताकत तुरंत आधी हो जाती है।

व्यावहारिक उदाहरण (सिनेमा हॉल और प्रोजेक्टर की रोशनी)
इसे समझने के लिए सिनेमा हॉल का उदाहरण सबसे सटीक और सरल है। मान लीजिए आप एक थिएटर में बैठकर कोई बहुत भावुक फिल्म देख रहे हैं। एक अज्ञानी इंसान (अहंकार) पर्दे (Screen) पर चल रही फिल्म की कहानी में इतना खो जाता है कि उसे ही सच मान लेता है। पर्दे पर जब बाढ़ आती है या आग लगती है, तो वह अंदर से डर जाता है और रोने लगता है। वह अपने दिमाग में चलने वाली चिंताओं, नुकसान या भविष्य के डर की ‘फिल्म’ को ही अपना ‘मैं’ मान लेता है और चौबीसों घंटे तड़पता रहता है। इसके विपरीत, एक ज्ञानी इंसान (आत्म-बोधी) फिल्म का पूरा आनंद लेता है, लेकिन वह जानता है कि पर्दे पर चाहे कितनी भी भयंकर आग लग जाए, सिनेमा का पर्दा कभी जलता नहीं है। फिल्म खत्म होते ही पर्दा फिर से वैसा ही सफेद और साफ हो जाता है। उसका ध्यान पीछे से आ रही प्रोजेक्टर की सफेद रोशनी पर होता है। महर्षि रमण कहते हैं कि आपके विचार, आपकी बीमारियाँ, आपका घाटा या मुनाफा सिर्फ पर्दे पर चलने वाली ‘फिल्म’ हैं। आपका असली ‘मैं’ वह प्रोजेक्टर की शुद्ध सफेद रोशनी (आत्मा) है, जिसके बिना यह जीवन रूपी फिल्म दिख ही नहीं सकती।

विरोधाभास का समाधान
अब यहाँ किसी के मन में सवाल उठ सकता है— “यदि मैं सिर्फ पीछे से देखने वाली ‘प्रोजेक्टर की रोशनी’ या ‘दृष्टा’ हूँ, तो जब मुझे चोट लगेगी या जीवन में चुनौतियाँ आएँगी, तब तो मुझे कष्ट होगा ही? और क्या काम के समय खुद से यह पूछने पर कि ‘मैं कौन हूँ’, मेरा ध्यान काम से नहीं भटक जाएगा?” इस विरोधाभास को बहुत गहराई से समझिए। महर्षि रमण यहाँ काम छोड़ने या दर्द को नकारने की बात बिल्कुल नहीं कर रहे हैं। वे समझा रहे हैं कि ‘दर्द’ (Pain) शरीर का स्वभाव है, लेकिन ‘दुःख’ (Suffering) मन का स्वभाव है। जब आप खुद को ‘फिल्म का पात्र’ मानने के बजाय पीछे बैठी ‘प्रोजेक्टर की रोशनी’ मान लेते हैं, तो आप कहते हैं— “यह परिस्थिति केवल पर्दे पर चल रही है, मैं (चेतना) इससे पूरी तरह अछूता हूँ।” इससे आपकी मानसिक शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि आप बिना किसी मानसिक बोझ के सर्वश्रेष्ठ काम कर पाते हैं। यह आत्म-बोध आपके काम में बिना कोई बाधा डाले आपके अहंकार को हल्का कर देता है और आपका डर खत्म हो जाता है। जैसे एक डॉक्टर मरीज़ का इलाज पूरी ज़िम्मेदारी से करता है (कर्म), लेकिन मरीज़ की जान बचाना पूरी तरह उसके हाथ में नहीं होता (परिणाम)। जब आप दफ्तर या घर में व्यवस्था बनाए रखने के लिए काम तो करते हैं, लेकिन परिणाम को जबरदस्ती अपने हक में मोड़ने की जिद छोड़ देते हैं, तो आपका तनाव तुरंत मिट जाता है।

जीवन के लिए मुख्य सीख
‘मेरा’ और ‘मैं’ का अंतर समझें : दिन भर में जब भी आप किसी चीज़ का इस्तेमाल करें, तो सजग रहें कि यह ‘मेरा’ पद है, ‘मेरा’ व्यापार है, ‘मेरा’ परिवार है, लेकिन मैं (चेतना) इन सभी सांसारिक दृश्यों से अलग और स्वतंत्र हूँ।
विचारों को पकड़ना सीखें : जब भी आपको किसी पर बहुत तेज गुस्सा आए या भविष्य का डर सताए, तो तुरंत उसमें बहने के बजाय मन ही मन पूछें— “यह गुस्सा किसे आ रहा है? मुझे आ रहा है। तो यह ‘मैं’ कौन हूँ जो इस समय तड़प रहा हूँ?” यह सवाल गुस्से की बिजली को तुरंत काट देगा।
मौन का अभ्यास : रोज़ रात को बिस्तर पर लेटने के बाद आँखें बंद करें और खुद से कहें— “अब पर्दे पर चल रही दिनभर की फिल्म खत्म हो चुकी है। अब मैं इस शरीर और विचारों को ढीला छोड़ रहा हूँ। अब मैं केवल एक शांत और शुद्ध रोशनी हूँ।”

आज का संकल्प
“मैं आज यह पूरी सरलता से समझ चुका हूँ कि मैं यह बदलने वाला शरीर या अशांत मन नहीं हूँ। मैं अपनी सभी ज़िम्मेदारियों को बिना किसी भीतरी बोझ के, पूरी विनम्रता और निश्चिंतता के साथ पूरा करूँगा। 🙏”