मक्खी बैठे शहद पर, पंख रहे लपटाए।
रज्जब विकल होय धुने सिर, हाथ मले पछताए॥
संत रज्जब जी समझाते हैं कि जिस प्रकार एक छोटी सी मक्खी मीठे शहद के लालच में आकर उस पर बैठ तो जाती है, लेकिन उसका लालच इतना बढ़ जाता है कि वह उसमें पूरी तरह डूब जाती है और उसके पंख उसी शहद में लथपथ होकर चिपक जाते हैं। अंत में वह मक्खी चाहकर भी उड़ नहीं पाती और तड़प-तड़प कर, अपना सिर धुनकर और हाथ मलकर केवल पछतावे के साथ अपने प्राण गंवा देती है; ठीक वैसी ही दशा इस संसारी जीव की है जो माया के क्षणिक सुखों में इस कदर अंधा हो जाता है कि अंत में केवल पश्चाताप ही उसके हाथ लगता है।
वाणी से जुड़ा संत का प्रसंग
इस अमर वाणी का मर्म संत रज्जब जी के जीवन के उस कालखंड से जुड़ा है जब वे अपने गुरु दादू दयाल जी के सानिध्य में रहकर साधना कर रहे थे। रज्जब जी चूंकि एक बहुत ही अमीर और रसूखदार पठान परिवार से थे, इसलिए वैराग्य लेने के बाद भी कभी-कभी उनके पुराने मित्र और रिश्तेदार उनके पास आते थे और उन्हें उनकी पुरानी मखमली जिंदगी, धन-दौलत और सुंदर स्त्रियों के वैभव की याद दिलाकर वापस संसार में लौटने की मिन्नतें करते थे। एक बार उनके कुछ पुराने मित्रों ने उनसे कहा कि रज्जब, तुम इस फकीरी में क्यों अपनी जवानी बर्बाद कर रहे हो, संसार में ईश्वर ने इतने सुंदर भोग और सुख बनाए हैं, उनका आनंद लो। रज्जब जी ने उन मित्रों को कोई सीधा उत्तर नहीं दिया, बल्कि वे उन्हें पास में रखे एक शहद के बर्तन के पास ले गए जहाँ बहुत सारी मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। उन्होंने मित्रों को दिखाया कि कुछ मक्खियाँ शहद के किनारे पर बैठकर थोड़ा सा रस चखकर तुरंत उड़ जाती हैं, लेकिन कुछ मूर्ख मक्खियाँ सीधे शहद के बीच में कूद जाती हैं और उनके पंख चिपक जाते हैं, जिसके बाद वे वहीं तड़पकर मर जाती हैं। रज्जब जी ने मित्रों से बहुत ही करुणापूर्वक कहा कि भाइयों, मैं संसार के सुखों का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन मैं उस बीच में डूबी हुई मक्खी की तरह इस माया के दलदल में फंसना नहीं चाहता जो अंत में केवल तड़पन देती है, मैं तो किनारे बैठकर रस लेने वाली उस मुक्त आत्मा की तरह जीना चाहता हूँ जो जब चाहे परमात्मा के आकाश में उड़ सके।
इस प्रसंग ने सिद्ध किया कि संयम ही असली सुरक्षा है।
व्यावहारिक उदाहरण
इस गहरे सत्य को आज के 21वीं सदी के आधुनिक जीवन के व्यावहारिक उदाहरण से बहुत आसानी से समझा जा सकता है। आज का इंसान स्मार्टफोन, इंटरनेट और ‘सोशल मीडिया ऐप्स’ (जैसे इंस्टाग्राम, रील्स या गेमिंग) के जाल में फंसा हुआ है। शुरुआत में व्यक्ति इन ऐप्स का उपयोग केवल मनोरंजन या थोड़े से आनंद के लिए एक या दो मिनट के लिए करता है। लेकिन धीरे-धीरे इसकी आदत और लालच उसे इस कदर जकड़ लेता है कि वह चौबीस घंटे अपने फोन की स्क्रीन से चिपका रहता है। परिणाम यह होता है कि वह अपने परिवार को समय नहीं दे पाता, अपनी पढ़ाई या करियर को बर्बाद कर लेता है, और मानसिक रूप से डिप्रेशन तथा एंग्जायटी का शिकार हो जाता है। जब जीवन का कीमती समय हाथ से निकल जाता है, तब वह इंसान भी उसी शहद में फंसी मक्खी की तरह अपना सिर पकड़कर रोता है और हाथ मलता है कि काश मैंने समय रहते खुद को इस आभासी दुनिया के एडिक्शन (लत) से बचा लिया होता।
गहरे अर्थ की विस्तृत व्याख्या
इस वाणी, प्रसंग और व्यावहारिक उदाहरण के माध्यम से संत रज्जब जी हमें संसार की वस्तुओं का उपयोग करने से मना नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हमारे भीतर बैठी ‘अंधी आसक्ति और गुलामी’ पर प्रहार कर रहे हैं। इस संसार में भोजन, वस्त्र, धन और साधन हमारे जीवन को सुलभ बनाने के लिए हैं, ठीक वैसे ही जैसे नाव पानी में तैरने के लिए बनी होती है। लेकिन जब वही पानी नाव के भीतर भरने लगता है, तो नाव डूब जाती है।
जब तक मनुष्य संसार की चीजों का इस्तेमाल एक मालिक की तरह करता है, तब तक वह पूरी तरह सुरक्षित और शांत रहता है। लेकिन जैसे ही वह उन चीजों का गुलाम बन जाता है, जब धन और वासनाएँ उसके दिमाग पर हावी हो जाती हैं, तो उसका विवेक पूरी तरह नष्ट हो जाता है। जीवन का असली रस ‘उपभोग’ में नहीं बल्कि ‘उपयोग और अनासक्ति’ में है, जहाँ आप संसार में रहते हुए भी अंदर से पूरी तरह मुक्त रहते हैं।
विरोधाभास का समाधान
संसार में अक्सर लोग इस वाणी को सुनकर यह विरोधाभास पाल लेते हैं कि यदि संसार के सुख शहद की तरह फंसाने वाले ही हैं, तो फिर क्या हमें अच्छे भोजन, अच्छे मकान या पारिवारिक सुखों का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए और एक सूखी, नीरस जिंदगी जीनी चाहिए; तो इसका बहुत ही सटीक समाधान यह है कि अध्यात्म जीवन को नीरस बनाना नहीं सिखाता, बल्कि उसे परम आनंद से भरना सिखाता है। संत कबीर ने भी कहा था कि ‘सहज सहज सब कोई कहे, सहज न चीन्हे कोइ।’ इसका तात्पर्य यह है कि आप संसार के सुंदर से सुंदर वैभव का आनंद जरूर लें, लेकिन किनारे पर बैठी सजग मक्खी की तरह, जिसके पंख पूरी तरह साफ और आजाद हों। यदि आज आपके पास धन है, तो उसका सुख लें, लेकिन यदि कल वह धन चला जाए, तो आपके भीतर रोने या सिर धुनने की नौबत नहीं आनी चाहिए। जब आपका मन किसी भी बाहरी परिस्थिति का गुलाम नहीं होता, तभी आप इस विरोधाभास से ऊपर उठकर सच्चे योगी बन पाते हैं।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ सीमाओं को तय करना सीखें : संसार की किसी भी वस्तु, साधन या सुख का आनंद लेते समय अपनी सीमाओं (Boundaries) को हमेशा याद रखें, ताकि कोई भी साधन आपकी लत या कमजोरी न बन सके।
★ आसक्ति और गुलामी से बचें : धन, पद या डिजिटल गैजेट्स का उपयोग अपनी जरूरत के अनुसार करें, लेकिन उनके इस कदर आदी न हों कि उनके बिना आपका मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति ही डगमगा जाए।
★ सजगता और विवेक को जगाएं : रोज़ाना कुछ समय निकालकर आत्म-निरीक्षण करें कि कहीं आप भी जीवन के किसी हिस्से में शहद में फंसी मक्खी की तरह तो नहीं धंस रहे हैं, और समय रहते अपने मन के पंखों को आजाद करें।
आज की पावन प्रार्थना
“हे प्रभु! मुझे संसार के लालच और बुरी आदतों से मुक्त करो। मेरे भीतर ऐसी समझ जगाओ कि मैं दुनिया की चीजों का इस्तेमाल तो करूँ, लेकिन कभी उनका गुलाम न बनूँ। नाम-सिमरन से मेरे मन को पवित्र रखो, ताकि मेरा ध्यान इस मायावी दुनिया से हटकर हमेशा आपके प्रेम में लगा रहे। 🙏”