अमृत वाणी - संत वाणी - 33 Nitya Oswal द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 33

गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गाँव के परम सिद्ध, त्यागी और साक्षात् अन्नपूर्णा के परम भक्त संत जलाराम बापा की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रसिद्ध अमृत वाणी यहाँ दी गई है। यह वाणी जीवन में केवल धन इकट्ठा करने की होड़ को छोड़कर, भूखे को अन्न खिलाने और निस्वार्थ सेवा करने का असली आध्यात्मिक रहस्य सिखाती है।

संत जलाराम बापा की यह वाणी किसी भी प्रकार के कंजूसी और संचय के अहंकार को तोड़कर, परोपकार के सच्चे मार्ग पर चलना सिखाती है।

“देने को टुकड़ा भला, लेने को हरि नाम।
जलाराम इस संसार में, यही तुम्हारा काम।।”

संत जलाराम बापा कहते हैं कि इस नश्वर संसार में मनुष्य के जीवन का केवल दो ही मुख्य उद्देश्य होने चाहिए। पहला, यदि ईश्वर ने तुम्हें सामर्थ्य दी है तो अपने द्वार पर आए किसी भी भूखे या ज़रूरतमंद जीव को भोजन का एक टुकड़ा अवश्य दो। दूसरा, अपने होठों पर सदा उस परमपिता परमात्मा का नाम (हरि नाम) बनाए रखो। इसके अलावा संसार की बाकी सारी चीज़ें यहीं छूट जाने वाली हैं।

अक्सर लोग इस सीधे वचन को सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं कि क्या इस आधुनिक और प्रतिस्पर्धी युग में केवल दान-पुण्य करना और नाम जपना ही काफी है? क्या हमें अपनी सुख-सुविधाओं और भविष्य के लिए धन संचय नहीं करना चाहिए? लेकिन जलाराम बापा यहाँ धन कमाने या परिवार की ज़िम्मेदारियां निभाने से मना नहीं कर रहे हैं। वे केवल इंसानी मन के भीतर छिपे उस ‘लोभ’ और ‘असुरक्षा के डर’ पर चोट कर रहे हैं जो मनुष्य को अमीर होने के बाद भी एक कंजूस भिखारी की तरह जीने पर मजबूर कर देता है। इस संसार में जब कोई व्यक्ति बहुत संपन्न हो जाता है, तो वह और अधिक जोड़ने के चक्कर में अपनों का और गरीबों का हक मारना शुरू कर देता है। संत कहते हैं कि असली अमीरी तिजोरी भरने में नहीं, बल्कि किसी की भूख मिटाकर उसके चेहरे पर संतोष लाने में प्रकट होती है।

गहरे अर्थ की व्याख्या
इंसानी मन की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह खुद को बहुत भाग्यशाली और सुरक्षित मानने के लिए केवल धन-दौलत इकट्ठा करने में अपनी पूरी ज़िंदगी लगा देता है। लोग सोचते हैं कि जितना बड़ा बैंक बैलेंस होगा, उनका भविष्य उतना ही सुरक्षित होगा। जलाराम बापा इसी भ्रम को तोड़ते हैं। वे कहते हैं कि इस दुनिया से तुम एक सूई भी साथ लेकर नहीं जा सकोगे। तुम्हारी असली कमाई केवल वही है जो तुमने अपनी नेक कमाई में से किसी भूखे का पेट भरने के लिए खर्च की है। जब आप किसी भूखे को ‘टुकड़ा’ (भोजन) देते हैं, तो आप केवल एक इंसान की भूख नहीं मिटा रहे होते, बल्कि उसके भीतर बैठे साक्षात् नारायण को भोग लगा रहे होते हैं। जब जीवन में इस सेवा भाव के साथ ‘हरि नाम’ का सुमिरन जुड़ जाता है, तो मनुष्य के मन के सारे अंतर्विरोध और अशांति अपने आप शांत हो जाते हैं।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप आज के समय के बहुत ही सीधे और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए एक बहुत बड़ा व्यापारी है जिसके पास करोड़ों की संपत्ति है, बड़े-बड़े आलीशान बंगले और गाड़ियां हैं। लेकिन उसका स्वभाव ऐसा है कि वह अपने घर के नौकरों को बासी खाना देता है, त्योहारों पर भी किसी गरीब को एक रुपया देने में उसका दिल दुखता है, और वह हमेशा इसी चिंता में डूबा रहता है कि उसका पैसा कहीं डूब न जाए। वह रात को बिना नींद की गोली खाए सो नहीं पाता। इसके विपरीत, एक मध्यमवर्गीय परिवार का इंसान है जिसकी आमदनी बहुत सीमित है, लेकिन उसके घर के दरवाजे से कभी कोई साधु या भूखा खाली हाथ नहीं लौटता। वह जो भी रुखा-सूखा खुद खाता है, उसमें से एक हिस्सा दूसरों के साथ बांटता है और सदा भगवान का शुक्रिया अदा करता है। इन दोनों में से असली राजा कौन है? वही साधारण इंसान, क्योंकि उसके पास जो आंतरिक शांति और संतोष है, उसे वह अमीर व्यापारी अरबों रुपए देकर भी नहीं खरीद सकता।

इसके विपरीत, खुद संत जलाराम बापा के साक्षात् जीवन का एक बहुत ही विस्मयकारी और रोंगटे खड़े कर देने वाला प्रसंग आता है। वीरपुर में जलाराम बापा का एक सदाव्रत (अन्नक्षेत्र) चलता था जहाँ हर आने-जाने वाले को मुफ्त भोजन कराया जाता था। एक दिन साक्षात् भगवान एक बूढ़े, बीमार और लाचार साधु का रूप धरकर उनके द्वार पर आए। बापा ने बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा की और उन्हें भोजन कराया। भोजन करने के बाद उस बूढ़े साधु ने जलाराम बापा से कहा कि “मैं बहुत बीमार और असमर्थ हूँ, मुझे आगे की यात्रा के लिए तुम्हारी पत्नी वीरबाई की सेवा की आवश्यकता है, क्या तुम अपनी पत्नी को मेरे साथ भेजोगे?” किसी भी साधारण मनुष्य के लिए यह परीक्षा असंभव थी, लेकिन जलाराम बापा ने इसे ईश्वर की इच्छा माना। उन्होंने बिना किसी संशय के अपनी पत्नी से पूछा, और माँ वीरबाई ने भी हंसते हुए साधु की सेवा के लिए साथ चलना स्वीकार कर लिया। जब वे दोनों कुछ दूर जंगल में पहुंचे, तो साधु ने माँ वीरबाई को अपनी झोली और लाठी पकड़ने को कहा और अचानक गायब हो गए। तभी आकाशवाणी हुई कि “जलाराम, मैं तुम्हारी निष्काम सेवा और त्याग की परीक्षा ले रहा था।” आज भी वीरपुर के उस मंदिर में उसी साधु की झोली और लाठी की पूजा की जाती है। इसे ही सेवा की पराकाष्ठा कहते हैं।

विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका उठ सकती है कि क्या फिर हमें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता छोड़ देनी चाहिए और जो कुछ भी हमारे पास है उसे पूरी तरह दान कर देना चाहिए? जलाराम बापा घर-बार छोड़ने या उदासीन होने को नहीं कहते। वे सिर्फ यह समझा रहे हैं कि अपनी आवश्यकताओं और अपने लालच के बीच के अंतर को समझो। परिवार का भरण-पोषण करना आपका कर्तव्य है, लेकिन धन के मोह में अंधा होकर दूसरों की तकलीफों से आंखें मूंद लेना घोर पाप है। असली समझदार व्यक्ति वह है, जो ईमानदारी से धन कमाता है, अपने परिवार को अच्छी सहूलियतें देता है, और अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा समाज के कल्याण और भूखों के अन्न के लिए हमेशा सुरक्षित रखता है।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति की भलाई केवल उसके बड़े-बड़े दावों या बाहरी ज्ञान से नहीं मापी जा सकती। चाहे कोई कितना भी सफल होने का दावा करे, जब तक उसके भीतर किसी भूखे के लिए अन्न देने की करुणा नहीं है, उसका जीवन अधूरा है।

★ जब हमारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है कि इस संसार में हम जो कुछ भी दे रहे हैं वह सब परमात्मा का ही दिया हुआ है और हम केवल एक माध्यम हैं, तो हमारे मन का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “मैं किसी पर उपकार कर रहा हूँ।” ईश्वर का नाम लेना और सदा विनम्र रहकर समाज की सेवा करना ही जीवन का सबसे बड़ा सच है।

आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे ऐसा उदार हृदय और श्रद्धा दें कि मेरे द्वार से कभी कोई भूखा या लाचार जीव खाली हाथ न लौटे। मेरे भीतर का लोभ और घमंड दूर करें ताकि मैं आपकी दी हुई समृद्धि को दूसरों की सेवा में लगा सकूं और सदा आपके नाम का सुमिरन कर सकूं। 🙏”