भारत के महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के एक और परम सिद्ध, निश्छल और विट्ठल भगवान के अनन्य भक्त संत गोरा कुम्हार जी (संत गोरोबा) की एक अत्यंत प्रसिद्ध और मर्मस्पर्शी अमृत वाणी यहाँ दी गई है। यह वाणी किसी भी मनुष्य की योग्यता को केवल उसके बाहरी दावों से न परखकर, जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपे हुए उसके आचरण और चरित्र से पहचानना सिखाती है।
संत गोरा कुम्हार जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के खोखलेपन और पाखंड को छोड़कर, सत्य की कसौटी पर कसकर जीवन को प्रामाणिक बनाने का मार्ग दिखाती है।
“मुंग्यांनी खाल्ला डोंगर, नाथांनी केला अंगीकार।
कोण तो जाणे याचा विचार, गोरा कुंभार बोले साच॥”
संत गोरा कुम्हार जी कहते हैं कि जिस तरह छोटी-छोटी चींटियों ने अज्ञानता और अहंकार के बहुत बड़े पहाड़ को धीरे-धीरे अपनी निरंतर साधना से खाकर समाप्त कर दिया, ठीक उसी तरह जब हमारे भीतर का ‘मैं’ पूरी तरह मिट जाता है, तभी साक्षात विट्ठल नाथ (परमात्मा) हमारा अंगीकार करते हैं। इस गहरे विचार को हर कोई आसानी से नहीं समझ सकता, लेकिन गोरा कुम्हार अपने जीवन के अनुभव से यह सच कहता है कि परीक्षा की भट्टी में तपे बिना कोई भी इंसान या बर्तन कभी पक्का नहीं हो सकता।
अक्सर लोग संतों की ऐसी गूढ़ वाणियों को सुनकर गहरे भ्रम में पड़ जाते हैं कि क्या फिर हमें भगवान की कृपा पाने के लिए केवल चुपचाप दुखों को सहना पड़ेगा? क्या भक्ति का मार्ग केवल कठिन परीक्षाओं का मार्ग है? लेकिन संत गोरा कुम्हार जी यहाँ जीवन की चुनौतियों का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हमें इंसानी स्वभाव के एक बहुत बड़े सच से रूबरू करा रहे हैं। इस संसार में जब कोई व्यक्ति थोड़ा सा ज्ञान पा लेता है, तो वह सोचता है कि वह पूरी तरह पक्का और ज्ञानी हो चुका है। संत कहते हैं कि जैसे कच्चे मिट्टी के बर्तन में पानी ठहर नहीं सकता और वह टूट जाता है, वैसे ही बिना विकारों और अहंकार को मिटाए मनुष्य का चरित्र कभी पक्का नहीं हो सकता। जीवन की असली परीक्षा संकट और विपरीत परिस्थितियों में आपके धैर्य और आचरण से तय होती है।
गहरे अर्थ की व्याख्या
इंसानी मन की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह खुद को हमेशा दूसरों के सामने बहुत धार्मिक, ज्ञानी और पक्का दिखाने की कोशिश करता है। लेकिन जब जीवन में दुखों या कठिनाइयों की भट्टी जलती है, तो उसका वह दिखावा ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। संत गोरा कुम्हार इसी ढोंग पर चोट करते हैं। वे कहते हैं कि असली मनुष्यता और भक्ति केवल बातों में नहीं है। जैसे एक कुम्हार मिट्टी के बर्तन को चाक पर चढ़ाने और उसे आकार देने के बाद सीधे बाजार में नहीं बेचता, बल्कि उसे आग की भट्टी में तपाता है और फिर थपकी मारकर देखता है कि वह पक्का है या कच्चा, ठीक उसी तरह परमात्मा भी मनुष्य को संकटों की भट्टी में तपाकर उसके धैर्य और निष्ठा को परखते हैं। जो इंसान हर परिस्थिति में समभावी और शांत रहता है, उसी का हृदय साक्षात ईश्वर का निवास स्थान बनता है।
व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप आज के आधुनिक और व्यावसायिक जीवन के उदाहरण से बहुत सरलता से समझ सकते हैं। मान लीजिए एक नवयुवक है जिसने बहुत बड़ी यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री ली है और वह किताबों के आधार पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाने में बहुत चतुर है। लेकिन जब उसे असल में एक बड़ी कंपनी को संभालने की जिम्मेदारी दी जाती है और अचानक बाज़ार में कोई भयंकर मंदी आ जाती है, तो वह घबरा जाता है, तनाव में आ जाता है और गलत फैसले लेने लगता है। उसका वह किताबी ज्ञान उस संकट के समय कच्चा साबित होता है। इसके विपरीत, एक ऐसा साधारण और पुराना कर्मचारी होता है जिसके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं होती, लेकिन उसने वर्षों तक काम की कठिनाइयों को झेला होता है। वह मंदी के समय भी शांत रहकर कंपनी को संभाल लेता है। असली ज्ञान संकटों की भट्टी में तपकर ही बाहर आता है, केवल किताबों से नहीं।
इसके विपरीत, खुद संत गोरा कुम्हार जी के जीवन का एक बहुत ही अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाला प्रसंग आता है। वे मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे और हर समय भगवान विट्ठल के भजन में इतने लीन रहते थे कि उन्हें अपनी देह का भी होश नहीं रहता था। एक दिन वे अपने पैरों से मिट्टी गूंध रहे थे और भजन गा रहे थे। तभी उनका छोटा बच्चा रेंगता हुआ उस मिट्टी के पास आ गया। गोरोबा भजन के आनंद में इतने डूबे थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनका पैर उनके बच्चे पर पड़ गया और वह मिट्टी में ही दब गया। जब उनकी पत्नी घर लौटी और उसने यह भयंकर दृश्य देखा, तो वह फूट-फूट कर रोने लगी और उसने गुस्से में गोरा कुम्हार को बहुत भला-बुरा कहा। इस परम दुख और विपत्ति की घड़ी में भी गोरोबा के मुख से भगवान का नाम नहीं छूटा। उन्होंने इस असहनीय पीड़ा को भी ईश्वर की ही मर्जी मानकर स्वीकार कर लिया। बाद में उनकी इसी अटूट श्रद्धा और निष्काम भाव को देखकर स्वयं भगवान विट्ठल ने उनके मृत बच्चे को दोबारा जीवित कर दिया और उनके हाथों को दिव्य शक्ति दी।
विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका उठ सकती है कि क्या फिर हमें जानबूझकर दुखों को आमंत्रित करना चाहिए और परीक्षाओं का इंतजार करना चाहिए? गोरा कुम्हार जी जीवन को कठिन बनाने की बात नहीं करते। वे सिर्फ यह समझा रहे हैं कि जब भी जीवन में कोई संकट या विपरीत परिस्थिति आए, तो घबराकर अपने आचरण को मत बदललो। सफल होने का मतलब यह नहीं है कि आपके जीवन में कभी मुश्किलें न आएं। असली समझदार व्यक्ति वह है, जो सुख में कभी घमंड नहीं करता और दुख के समय अटूट धैर्य रखकर खुद को और मजबूत बनाता है, क्योंकि वह जानता है कि यह समय भी उसे अंदर से पक्का करने के लिए ही आया है।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति के चरित्र की असलियत केवल सुख के दिनों में नहीं जानी जा सकती। चाहे कोई समाज में कितना भी बड़ा होने का दावा करे, जब तक वह संकट की घड़ी में अपने धैर्य और ईमानदारी पर टिका नहीं रहता, उसका चरित्र कच्चा है।
★ जब हमारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है कि जीवन की हर कठिनाई हमें अंदर से और अधिक मजबूत और परिपक्व बनाने के लिए आती है, तो हमारे मन का यह भारी बोझ उतर जाता है कि “मेरे साथ ही ऐसा बुरा क्यों हो रहा है।” हर परिस्थिति में ईश्वर के विधान पर भरोसा रखना और अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है।
आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे जीवन की भट्टी में भी अडिग रहने का धैर्य और आंतरिक परिपक्वता दें। मेरे मन का कच्चापन और अहंकार दूर करें ताकि हर सुख-दुख में मैं पूरी तरह पक्का और शांत रह सकूं। 🙏”