संत बुल्ले शाह जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के बाहरी दिखावे और किताबी ज्ञान के घमंड को छोड़कर दिल की सफाई और खुदा (परमात्मा) के प्रति सच्चे प्रेम का मार्ग दिखाती है।
“पढ़ पढ़ इल्म हजार किताबें, कदी अपने आप नूं पढ़िया नईं।
जा जा वड़दे मंदिर मसीती, कदी मन अपने विच वड़िया नईं।
ऐवें लड़दा एं रोज शैतान दे नांल, कदी नफ्स अपने नांल लड़िया नईं।
बुल्ले शाह असमानी उड्डियां फड़दा एं, जेड़ा घर बैठा ओहनूं फड़िया नईं।।”
दोहे का हिंदी अर्थ : तुमने हजारों किताबें और ग्रंथ पढ़ लिए और बहुत सारा ज्ञान (इल्म) इकट्ठा कर लिया, लेकिन कभी अपने खुद के भीतर झांककर खुद को समझने की कोशिश नहीं की। तुम भगवान को ढूंढने के लिए रोज़ मंदिर और मस्जिदों में तो जाकर बैठ जाते हो, पर कभी अपने मन के भीतर उतरकर नहीं देखा कि वहाँ कितनी गंदगी छिपी है। तुम रोज बाहर की बुराइयों और शैतान से लड़ने का दिखावा करते हो, लेकिन तुम्हारे भीतर जो तुम्हारा खुद का लालच, वासना और अहंकार (नफ्स) बैठा है, उससे तुम कभी नहीं लड़ते। बुल्ले शाह कहते हैं कि तुम आसमान में उड़ते हुए परिंदों को पकड़ने यानी बड़ी-बड़ी और ऊंची बातें करने का दावा करते हो, पर जो परमात्मा तुम्हारे खुद के दिल के घर में बैठा है, उसे तुमने आज तक नहीं पहचाना।
अक्सर लोग इस रूहानी वाणी को सुनकर गहरे संशय में पड़ जाते हैं कि क्या बुल्ले शाह जी यहाँ पढ़ाई-लिखाई, ज्ञान अर्जित करने या धार्मिक स्थलों पर जाने का विरोध कर रहे हैं? क्या किताबें पढ़ना या मंदिर-मस्जिद जाना पूरी तरह व्यर्थ है? लेकिन बाबा बुल्ले शाह यहाँ ज्ञान या इबादत के स्थानों का अपमान नहीं कर रहे हैं। वे केवल इंसानी मन के उस विरोधाभास को उजागर कर रहे हैं जहाँ इंसान धार्मिक तो बन जाता है, पर उसके भीतर इंसानियत पैदा नहीं होती। इस संसार में जब कोई व्यक्ति बहुत सी किताबें पढ़ लेता है या रोज धार्मिक स्थलों के चक्कर काटता है, तो उसके भीतर एक अदृश्य अहंकार जन्म ले लेता है कि “मैं दूसरों से ज्यादा जानता हूँ और मैं बहुत बड़ा आस्तिक हूँ।” संत कहते हैं कि जब तक तुम्हारा यह ज्ञान तुम्हारे आचरण को सरल नहीं बनाता, तब तक तुम्हारी यह सारी पढ़ाई और इबादत अधूरी है।
गहरे अर्थ की व्याख्या
इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह बाहर की दुनिया को बदलने और सुधारने में अपनी पूरी ताकत लगा देता है, लेकिन अपने भीतर चल रहे विचारों के युद्ध से हमेशा भागा रहता है। बाबा बुल्ले शाह इसी ढोंग पर सीधा वार करते हैं। वे कहते हैं कि असल बंदगी (भक्ति) अपनी रूह को साफ करने में है। यदि आपके दिल में दूसरों के लिए नफ़रत, जाति का घमंड और बेइंसाफी भरी है, तो आपके द्वारा रटी गई हजारों आयतें, चौपाइयां या मंत्र बिल्कुल बेअसर हैं। बाहर की दुनिया में किसी को हराना या खुद को ज्ञानी साबित करना बहुत आसान है, लेकिन अपनी खुद की बुराइयों से लड़ना और अपने मन को पूरी तरह शांत करना ही सबसे बड़ा अध्यात्म है। जब मनुष्य अपने भीतर छिपे इस कपट को मार देता है, तभी उसके दिल का बंद द्वार खुलता है और उसे हर जर्रे में खुदा का नूर दिखाई देने लगता है।
व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप आज के आधुनिक और सामाजिक जीवन के एक बहुत ही सीधे उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए एक व्यक्ति है जिसने बहुत बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल की हैं, वह समाज के नियमों का बहुत बड़ा जानकर है और हर दिन धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी करता है। लेकिन जब वही व्यक्ति अपने वास्तविक जीवन में आता है, तो वह छोटी-छोटी बातों पर अपने परिवार से झगड़ता है, अपने पड़ोसियों के प्रति ईर्ष्या रखता है और किसी गरीब को देखकर कड़वे शब्द बोलता है। उसकी यह बड़ी-बड़ी डिग्रियां और उसका यह किताबी ज्ञान उसके इस खराब व्यवहार को कभी ढक नहीं सकते। लोग उसके इस दोहरे चरित्र को देखकर उसके ज्ञान पर हंसते हैं। ज्ञान की असली सार्थकता तो तब है जब आप कम पढ़े-लिखे होकर भी दूसरों के दर्द को समझें और अपनी जुबान से किसी का दिल न दुखाएं।
इसके विपरीत, खुद बाबा बुल्ले शाह जी के साक्षात् जीवन का एक बहुत ही सुंदर और विस्मयकारी प्रसंग आता है। बुल्ले शाह जी एक बहुत ऊंचे और प्रतिष्ठित 'सैयद' परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिन्हें समाज में बहुत आदरणीय माना जाता था। लेकिन जब वे ईश्वर की तलाश में निकले, तो उन्होंने एक बहुत ही साधारण और निम्न समझे जाने वाले वर्ग के संत ‘इनायत शाह जी’ को अपना गुरु मान लिया। उनके इस फैसले से उनका पूरा परिवार और समाज नाराज हो गया कि एक ऊंचे कुल का व्यक्ति किसी साधारण इंसान के आगे कैसे झुक सकता है। बुल्ले शाह जी ने अपने परिवार के इस झूठे घमंड को पूरी तरह ठुकरा दिया और अपने गुरु के चरणों में बैठकर कहा कि खुदा को पाना है तो इस कुल और जाति के अहंकार को मिटाना ही होगा। उन्होंने रास्ते पर नाच-नाच कर अपने भीतर के उस ‘मै’ (अहंकार) को पूरी तरह मार दिया। इसी परम आत्म-शुद्धि ने उन्हें एक साधारण इंसान से उठाकर सूफी संत बना दिया।
विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका उठ सकती है कि क्या फिर हमें पढ़ना-लिखना छोड़ देना चाहिए और समाज के नियमों से पूरी तरह दूर हो जाना चाहिए? बुल्ले शाह जी शिक्षा या व्यवस्था का विरोध नहीं करते। वे सिर्फ यह समझा रहे हैं कि अपनी डिग्री या अपने ज्ञान को ही सब कुछ मानकर घमंड मत पालो। ज्ञानी होना या ऊंचे पद पर होना कोई गुनाह नहीं है, बशर्ते आपके भीतर का इंसान भी उतना ही सरल और साफ हो। असली समझदार व्यक्ति वह है, जो दुनिया की किताबें पढ़ने के साथ-साथ हर रोज़ रात को सोते समय अपने मन की किताब को भी पढ़ना जानता है कि आज उसने कितने सही और कितने गलत काम किए।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति की पवित्रता उसके द्वारा पढ़े गए ग्रंथों या उसकी बाहरी धार्मिक आदतों से नहीं आंकी जा सकती। चाहे कोई समाज में कितना भी बड़ा विद्वान होने का दावा करे, जब तक उसके भीतर दया और विनम्रता नहीं है, उसका चरित्र अधूरा है।
★ जब हमारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है कि अपने खुद के मन को जीतना ही दुनिया की सबसे बड़ी जीत है, तो हमारे मन का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “मैं दूसरों से ज्यादा समझदार हूँ।” अपने भीतर की बुराइयों से लड़ना, हर इंसान से बिना किसी भेदभाव के मोहब्बत करना और सादगी से जीना ही जीवन का सबसे बड़ा सच है।
आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे अपने खुद के भीतर झांकने और अपनी कमियों को देखने की समझ दें। मेरे भीतर का यह किताबी और धार्मिक अहंकार दूर करें ताकि मैं केवल बाहर की दुनिया से न लड़ूँ, बल्कि अपने मन को साफ कर हर इंसान में आपकी ही पावन छवि देख सकूं। 🙏”