अमृत वाणी - संत वाणी - 23 Nitya Oswal द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 23

“जे जे भेटे भूत, ते ते मानिजे भगवंत।
हा भक्तीचा पैं गा गाभा, जाणिजे सर्वथा॥”
— संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी)
( अनुवाद: “इस चराचर संसार में तुम्हें जो भी जीव या प्राणिमात्र मिले, उसे साक्षात ईश्वर का ही रूप मानो। संत ज्ञानेश्वर जी कहते हैं कि संसार के हर छोटे-बड़े जीव के प्रति मन में आदर और सम्मान का भाव रखना ही सच्ची भक्ति का असली मर्म (सार) है।”)

संत ज्ञानेश्वर जी के इस क्रांतिकारी विचार को अक्सर लोग बहुत सतही ढंग से समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि ज्ञानेश्वर जी हमें संसार के व्यावहारिक नियम छोड़कर हर अच्छे-बुरे इंसान के सामने बस हाथ जोड़कर झुकने को कह रहे हैं। कुछ लोग इस विरोधाभास में पड़ जाते हैं कि “यदि समाज के दुष्ट, हिंसक और अन्यायी लोग भी ईश्वर ही हैं, तो क्या हमें उनके अत्याचार को चुपचाप सहना चाहिए? क्या यह वाणी हमें कायर बनाती है?” 

लेकिन असल में यह संदेश कायरता का नहीं है। यह समाज से व्यक्तिगत नफरत, ईर्ष्या और ऊंच-नीच के भेदभाव को जड़ से मिटाने की सबसे बड़ी चेतावनी और प्रेरणा है।

वाणी का मर्म
यहाँ ‘भूत’ और ‘भगवंत’ के माध्यम से ज्ञानेश्वर जी किसी अंधविश्वास की बात नहीं कर रहे, बल्कि हमें जीवन का शाश्वत नियम समझा रहे हैं:
•‘भूत’ का वास्तविक अर्थ : प्राकृत और संस्कृत व्याकरण में ‘भूत’ का अर्थ कोई डरावना भूत-प्रेत नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है— “हर वह जीव जो पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से प्रकट हुआ है।” इसमें हर मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग और वनस्पति शामिल हैं।

• भक्ति का सार : ज्ञानेश्वर जी सचेत करते हैं कि केवल मंदिरों या तीर्थों में जाकर मूर्तियां ढूंढना सच्ची भक्ति नहीं है। असली भक्ति तब शुरू होती है, जब मंदिर से बाहर कदम रखते ही आपकी आंखों में हर इंसान और जीव के लिए सम्मान का भाव जाग जाए।

व्यवहारिक उदाहरण 
इसे विज्ञान और प्रकृति के नियम से बहुत आसानी से समझा जा सकता है। एक विशाल समुद्र को देखिए—उसमें लाखों लहरें उठती हैं। कोई लहर बहुत ऊंची होती है, तो कोई बहुत छोटी। लेकिन क्या कोई भी लहर समुद्र के पानी से अलग हो सकती है? बिल्कुल नहीं। सभी लहरों का मूल तत्व ‘जल’ ही है।

ठीक इसी प्रकार, इस संसार रूपी महासागर में हम सभी इंसान अलग-अलग लहरों की तरह हैं। हमारे रंग, रूप, जाति, भाषा, पद और अमीर-गरीब होने के आकार अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारे भीतर जो प्राण-ऊर्जा (चेतना) धड़क रही है, वह एक ही परमात्मा का अंश है। जब तक हमारी सांसें चल रही हैं, हम सब उसी एक ईश्वर के चलते-फिरते रूप हैं। इसलिए किसी दूसरे मनुष्य को खुद से अछूत, पराया या छोटा समझना वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों रूप से बहुत बड़ी नासमझी है।

इसे ‘स्वर्णकार और राजा’ के इस श्रेष्ठ दृष्टांत से समझें
एक समय की बात है, एक बहुत प्रतापी लेकिन घमंडी राजा ने अपने महल में देश के सबसे बड़े स्वर्णकार (सुनार) को बुलाया। राजा ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए सुनार के सामने शुद्ध सोने के तीन बर्तन रख दिए। पहला बर्तन एक बहुत ही सुंदर और पूजनीय ‘ईश्वर की मूर्ति’ थी, दूसरा बर्तन एक साधारण ‘दूध का कटोरा’ था, और तीसरा बर्तन एक तुच्छ ‘कूड़ेदान’ था।

राजा ने घमंड से सुनार से पूछा, “इन तीनों बर्तनों को देखो। एक पूजनीय है, एक साधारण है, और एक बेहद तुच्छ है। क्या तुम्हारी नजर में इन तीनों की कीमत में कोई अंतर है?”

उस ज्ञानी स्वर्णकार ने हाथ जोड़कर बहुत ही सुंदर उत्तर दिया, “हे राजन! एक राजा के रूप में आपकी दृष्टि केवल इनके ‘आकार और उपयोग’ पर है, इसलिए आपको इनमें ऊंच-नीच और अंतर दिखाई दे रहा है। लेकिन एक स्वर्णकार के रूप में मेरी दृष्टि केवल इनके ‘मूल तत्व’ पर है। चाहे यह भगवान की मूर्ति हो, कटोरा हो या कूड़ेदान हो—यह तीनों अंदर से विशुद्ध सोने के ही बने हैं। यदि इन्हें पिघला दिया जाए, तो इनका आकार नष्ट हो जाएगा, लेकिन सोना वही रहेगा। मेरे लिए तीनों की कीमत एक समान है।”

यह सुनते ही राजा का सारा राजसी अहंकार पल भर में टूट गया और उसे बोध हो गया कि इंसानों के शरीर रूपी बर्तन चाहे जैसे हों, सबके भीतर की आत्मा एक ही परमात्मा का रूप है।

विरोधाभास का समाधान 
अब व्यावहारिक जीवन जीने वाले किसी भी व्यक्ति के मन में यह सवाल उठ सकता है कि अगर हर इंसान में भगवान ही बसा है, तो क्या हमें अपराधियों, चोरों या समाज को नुकसान पहुंचाने वाले दुष्ट लोगों के आगे घुटने टेक देने चाहिए? क्या हमें उनका विरोध बंद कर देना चाहिए?

संत ज्ञानेश्वर जी हमें कर्म छोड़ने या अन्याय के आगे झुकने की सीख कभी नहीं देते। वह बस यह समझा रहे हैं कि समाज की व्यवस्था और सुरक्षा के लिए किसी व्यक्ति के ‘गलत कर्म’ का विरोध जरूर करें, उसे कानूनन सजा भी दिलाएं, लेकिन अपने मन में उसके प्रति ‘व्यक्तिगत नफरत’ या बदले की आग मत पालें। यह वाणी हमें सिखाती है कि बुराई से पूरी ताकत से लड़ो, लेकिन बुराई करने वाले इंसान के भीतर छुपी सुधार की संभावना को कभी मत मारो। यही वह सोच है जो समाज को हिंसक और क्रूर होने से बचाती है।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ अहंकार और जाति-भेद का अंत : जब हर जीव के भीतर एक ही परमात्मा का वास है, तो अपनी जाति, कुल, पद या पैसों का घमंड करके किसी दूसरे इंसान को खुद से नीचा समझना ईश्वर का सीधे तौर पर अपमान करने जैसा है।

★ प्रकृति और बेजुबानों के प्रति करुणा : इस वाणी का मर्म केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। यदि आज आपके पास ताकत और अधिकार हैं, तो उनका उपयोग पेड़ों को काटने या बेजुबान जानवरों पर क्रूरता करने में नहीं, बल्कि प्रकृति को सहेजने में करें।

★डिजिटल कर्म (आज के संदर्भ में) : आज जब मोबाइल हमारे हाथ में है, तो सोशल मीडिया पर किसी की अलग राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा होने के कारण उसे गाली देना, कीड़े-मकोड़े समझना या ट्रोल करना बंद करें। याद रखें, स्क्रीन के उस पार भी वही ‘भगवंत’ (चेतना) बैठी है। अपनी असहमति को भी हमेशा मर्यादा और आदर के साथ साझा करें, क्योंकि हमारे शब्द कभी नष्ट नहीं होते।

आज की पावन प्रार्थना
“हे परमेश्वर, मुझे ऐसी सद्बुद्धि और शक्ति दें कि मैं रंग, जाति, धर्म या विचारों के भेद से ऊपर उठकर हर इंसान के अस्तित्व का दिल से सम्मान कर सकूँ। मेरे मन में हर प्राणिमात्र के प्रति दया बनी रहे और मैं अपनी वाणी या कर्म से किसी भी जीव को कभी कोई कष्ट न पहुँचाऊँ।” 🙏