अमृत वाणी - संत वाणी - 22 Nitya Oswal द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 22

हम अक्सर समाज में रहने के लिए दूसरों को खुश करने की कोशिशों में लगे रहते हैं। लोग हमारी थोड़ी सी झूठी तारीफ या चापलूसी कर देते हैं, तो हम फूले नहीं समाते और उनके मानसिक गुलाम बन जाते हैं। इसके विपरीत, यदि कोई हमारी आलोचना करता है, तो हम अंदर से टूट जाते हैं। हमारा रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथों में चला जाता है। इस मानसिक गुलामी और विवेक की कमी को दूर करते हुए समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं:

“शब्दांचे गौरव बहुत मानिती।
अंतरींचे गुज काहीच न जाणती॥”
— समर्थ रामदास स्वामी (दासबोध)

(अर्थ: जो लोग केवल बाहरी मीठे शब्दों, झूठे गौरव और चापलूसी को ही सब कुछ मान लेते हैं, वे जीवन के आंतरिक रहस्य और सच्चाई को कभी नहीं जान पाते। ऐसा मनुष्य अज्ञानी रह जाता है।)

इस ओजस्वी वाणी को सुनकर लोग अक्सर एक अजीब विरोधाभास में उलझ जाते हैं। वे सोचते हैं कि “यदि हम लोगों की बातों को मानना या समाज में अपनी तारीफ सुनना बंद कर देंगे, तो हमारे आपसी रिश्ते कैसे चलेंगे? क्या दूसरों का आदर करना या उनके मीठे शब्दों की सराहना करना गलत है? क्या हमें सबके प्रति रूखा और अविश्वासी हो जाना चाहिए?”

लेकिन यहाँ अपनों के प्रति रूखा होने की बात बिल्कुल नहीं है। समर्थ रामदास जी हमें समाज से कटने के लिए नहीं कह रहे हैं। विरोधाभास तब दूर होता है जब आप ‘सच्चे आदर’ और ‘झूठी चापलूसी’ के बीच का अंतर समझ लेते हैं। वे हमें उस मानसिक जाल से बचा रहे हैं जहाँ हम अपनी योग्यता और अपने आत्मसम्मान को दूसरों के सर्टिफिकेट (प्रशंसा) पर टिका देते हैं। यह वाणी हमें बाहर के खोखले शब्दों पर जीने के बजाय, अपने भीतर की सच्चाई और विवेक (Wisdom) को जगाने की प्रेरणा देती है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप आज के समय के एक बहुत ही व्यावहारिक और सीधे उदाहरण से समझ सकते हैं। फर्ज़ कीजिए कि आपके पास एक बहुत कीमती, असली सोने का हार या कोई बहुमूल्य रत्न है। आप उसे पूरी तरह जानते हैं कि यह असली है। अब रास्ते में चलते हुए आपको कोई अज्ञानी व्यक्ति मिलता है और वह उस रत्न को देखकर कहता है कि “यह तो मामूली कांच का टुकड़ा है, इसकी कोई कीमत नहीं है।” क्या उसकी यह बात सुनकर आप दुखी हो जाएंगे? क्या आप उस कीमती रत्न को सड़क पर फेंक देंगे? बिल्कुल नहीं। आप मुस्कुराएंगे और आगे बढ़ जाएंगे, क्योंकि आपको उसकी असलियत पता है।

अब इसके विपरीत कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में सचमुच कांच का एक बेकार टुकड़ा है, और कोई चालाक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए आकर आपसे कहता है कि “वाह! यह तो दुनिया का सबसे कीमती हीरा है, आप तो बहुत भाग्यशाली हैं।” क्या उसकी इस झूठी बात को मानकर वह कांच सचमुच हीरा बन जाएगा? और क्या आप खुद को सचमुच अमीर मानकर घमंड में डूब जाएंगे? यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप बहुत बड़े धोखे का शिकार हो जाएंगे।

समर्थ रामदास स्वामी जी कहते हैं कि हमारा यह जीवन, हमारा चरित्र और हमारी आत्मा भी उस असली रत्न की तरह है। जब तक आपके भीतर अपने खुद के गुण-दोषों को पहचानने का ‘विवेक’ नहीं जागा होता, तब तक आपका रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथों में रहता है। कोई कड़वा बोलकर आपको कांच कह देता है तो आप उदास हो जाते हैं, और कोई चापलूसी करके आपको हीरा कह देता है तो आप अहंकार में डूब जाते हैं। विज्ञान और मनोविज्ञान भी यही कहता है कि जो लोग अपनी पहचान के लिए दूसरों की राय (External Validation) पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं, उनका मानसिक संतुलन सबसे पहले बिगड़ता है। असली मानसिक शक्ति और आत्मसम्मान किसी के खोखले शब्दों में नहीं, बल्कि खुद के आंतरिक सत्य को जानने में है।

मन की शंका का सीधा समाधान
अब यहाँ एक बहुत ही व्यावहारिक सवाल उठता है: “रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जहाँ हमें दफ्तर में अपने बॉस को खुश रखना होता है, समाज में तालमेल बिठाना होता है, वहाँ हम दूसरों की राय से पूरी तरह बेअसर कैसे रह सकते हैं? क्या ऐसा करने से लोग हमें घमंडी या अक्खड़ नहीं समझने लगेंगे?”

इस शंका का समाधान समर्थ रामदास स्वामी के ‘दासबोध’ में बहुत सुंदर ढंग से दिया गया है। वे कहते हैं कि संसार में रहते हुए सबके साथ बहुत ही चतुर, कुशल और मर्यादित व्यवहार करो। किसी से अकारण दुश्मनी मत मोल लो। लेकिन अपने मन के भीतर एक ‘फिल्टर’ लगाकर रखो। जब कोई आपकी प्रशंसा करे, तो उसे अपने दिमाग पर मत चढ़ने दो; और जब कोई आपकी आलोचना करे, तो उसे अपने दिल में मत उतरने दो। जब आप अंदर से स्थिर होते हैं, तो आप दफ्तर या समाज की राजनीति में उलझे बिना, अपने काम को और भी अधिक बुद्धिमानी और निडरता से पूरा कर पाते हैं। आपका व्यवहार घमंडी नहीं, बल्कि अत्यंत गरिमापूर्ण और सधा हुआ बन जाता है।

आज की ज़िंदगी के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ अहंकार की तृप्ति से बचें : जब भी कोई आपकी बहुत ज़्यादा तारीफ करे, तो 2 सेकंड रुककर खुद से पूछें कि “क्या मैं सचमुच ऐसा हूँ या यह केवल सामने वाले का स्वार्थ है?” इससे आप चापलूसी के जाल से बच जाएंगे। 
★ सलेज प्रतिक्रिया : यदि कोई आपके बारे में कुछ गलत कहता है, तो तुरंत गुस्सा होने या सफाई देने के बजाय शांत रहें। आपकी चुप्पी सामने वाले के कड़वे शब्दों के प्रभाव को उसी समय खत्म कर देगी।
★ आत्म-अवलोकन : अपनी कमियों और अपनी ताकतों को खुद पहचानना सीखें। जब आप खुद को गहराई से जानते हैं, तो दुनिया की कोई भी राय आपकी आंतरिक शांति को हिला नहीं सकती।

आज की पावन प्रार्थना
“हे सर्वशक्तिमान परमात्मा! मुझे इतनी आंतरिक शक्ति और विवेक दीजिए कि मेरा मन कभी दूसरों की झूठी प्रशंसा या कड़वी आलोचना का गुलाम न बने। मेरे भीतर आत्मसम्मान और सत्य को पहचानने की समझ जगाए रखिए, ताकि मैं हर परिस्थिति में शांत और स्थिर रहकर अपना कर्म कर सकूँ।”🙏