अमृत वाणी - संत वाणी - 15 Nitya Oswal द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 15

हम अक्सर किसी व्यक्ति के बाहरी ठाट-बाट, महंगे कपड़ों, सोने के गहनों या उसकी मीठी-मीठी चिकनी बातों को देखकर उसे बहुत महान और अच्छा इंसान मान लेते हैं। लेकिन कई बार उस चमक-दमक के पीछे एक बहुत ही कड़वा, कपटी और स्वार्थी स्वभाव छिपा होता है। इसके विपरीत, एक सच्चा और ईमानदार इंसान बाहर से बहुत सीधा और साधारण दिख सकता है। इस इंसानी स्वभाव के अंतर को संत वेमना ने प्रकृति के अद्भुत उदाहरण से समझाया है:

“सोना टूटे तो जुड़े, सौ बार जुड़े सहर्ष।
कनककुंभ सौ कनक के, माटी घट एक कर्ष॥” 

( यानी: सोना सौ बार भी टूटे तो अपनी कीमत नहीं खोता और फिर जुड़ जाता है, लेकिन कपटी इंसान मिट्टी के घड़े की तरह एक बार टूटने पर हमेशा के लिए बिखर जाता है। )

इसे उनके एक और प्रसिद्ध लोक-दोहे (तेलुगु विप्रचित्त) के सरल रूप में ऐसे समझा जा सकता है:

“बातों में जो मिठास है, जरूरी नहीं वो दिल में हो।
सोना तो बस चमकता है, पर असली सुगंध तो चंदन में हो॥”
— संत वेमना

इस बात को पढ़कर लोग अक्सर एक अजीब उलझन में पड़ जाते हैं। वे सोचते हैं कि क्या संत वेमना हमें दुनिया के हर इंसान पर शक करना सिखा रहे हैं? क्या हमें हर मीठा बोलने वाले व्यक्ति को कपटी या धोखेबाज़ मान लेना चाहिए?

लेकिन यहाँ किसी पर शक करने की बात नहीं है। संत वेमना हमें नकारात्मक नहीं बना रहे, बल्कि हमें ‘विवेक’ (Discernment) सिखा रहे हैं। वे हमें समझा रहे हैं कि असली इंसानियत कपड़ों या पैसों की चमक में नहीं, बल्कि उसके चरित्र और उसकी ईमानदारी में होती है। यह वाणी हमें धोखा खाने से बचाती है और जीवन को गहराई से देखना सिखाती है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। बाजार में दो तरह के फल मिलते हैं—एक होता है मोम (Wax) की परत चढ़ा हुआ चमकदार सेब, जो बाहर से बिल्कुल परफेक्ट और खूबसूरत दिखता है। लेकिन जब आप उसे काटते हैं, तो वह अंदर से पूरी तरह बेस्वाद या सड़ा हुआ हो सकता है। दूसरी तरफ एक देसी अमरूद या फल होता है, जो बाहर से थोड़ा दाग-धब्बो वाला और साधारण दिखता है, लेकिन अंदर से वह पूरी तरह मीठा, रसीला और सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

आज का आधुनिक समाज भी इसी ‘वैक्स कोटिंग’ (दिखावे) पर चल रहा है। लोग सोशल मीडिया पर बहुत खुश और अच्छे होने का नाटक करते हैं, लेकिन असल जिंदगी में उनके भीतर भारी कड़वाहट होती है। न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान के अनुसार, जो लोग बाहर से बहुत ज्यादा दिखावा करते हैं, वे अक्सर अंदर से बहुत असुरक्षित (Insecure) होते हैं। असली और मानसिक रूप से स्वस्थ इंसान कभी अपनी अच्छाई का ढिंढोरा नहीं पीटता, उसका शांत स्वभाव ही उसकी पहचान होता है।

मन की शंका का सीधा समाधान 
अब यहाँ एक तार्किक सवाल उठता है: “आज के इस कॉर्पोरेट और प्रोफेशनल युग में जहाँ ‘फर्स्ट इम्प्रेशन’ (पहला प्रभाव) ही सब कुछ माना जाता है, जहाँ अच्छा दिखना और खुद को प्रमोट करना जरूरी है, वहाँ हम इस सीधेपन के साथ कैसे जी सकते हैं? क्या लोग हमें पिछड़ा हुआ नहीं समझेंगे” संत वेमना तरक्की करने या अच्छा दिखने से मना नहीं कर रहे हैं। विरोधाभास तब दूर होता है जब आप ‘प्रेजेंटेशन’ (प्रस्तुति) और ‘कैरेक्टर’ (चरित्र) का अंतर समझ लेते हैं। आप दफ्तर में अच्छे कपड़े पहनिए, आत्मविश्वास से बात करिए, वह आपका काम है। लेकिन आपके भीतर की नीयत साफ़ होनी चाहिए। यदि आप बाहर से बहुत सभ्य हैं लेकिन भीतर दूसरों को गिराने की राजनीति कर रहे हैं, तो आपकी वह तरक्की कांच के महल जैसी है जो एक दिन ढह जाएगी। जब आपकी नीयत और आपके शब्द एक समान होते हैं, तो आपकी आत्मा मजबूत होती है, और यही मजबूती आपको जीवन में स्थायी सफलता देती है।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ दिखावे से दूरी: किसी के महंगे मोबाइल, गाड़ी या ब्रांडेड कपड़ों को देखकर उसकी इंसानियत का अंदाजा मत लगाइए। व्यक्ति को उसके व्यवहार और उसकी नीयत से परखिए।

★ पारदर्शिता (Transparency): अपने जीवन में दो चेहरे मत रखिए। जो आप अंदर से हैं, वही बाहर से रहें। बनावटी जिंदगी जीने में बहुत मानसिक ऊर्जा खर्च होती है, सीधेपन में परम शांति है।

★ गुणों की कद्र: अपने आस-पास के उन सीधे और सच्चे लोगों का सम्मान करें जो शायद बहुत पढ़े-लिखे या अमीर नहीं हैं, लेकिन संकट के समय हमेशा नि:स्वार्थ भाव से आपके साथ खड़े रहते हैं।

आत्म-संकल्प
“हे परमात्मा! मैं आज यह दृढ़ संकल्प लेता हूँ कि मैं जीवन में कभी भी बाहरी चकाचौंध और दिखावे के जाल में नहीं फसूँगा। मैं खुद को अंदर से इतना सच्चा और साफ बनाऊँगा कि मुझे किसी झूठे मुखौटे की जरूरत न पड़े। आज से मेरी असली पहचान मेरी सादगी, ईमानदारी और पवित्र नीयत होगी।” 🙏