अमृत वाणी - संत वाणी - 14 Nitya Oswal द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अमृत वाणी - संत वाणी - 14

हम इंसानों की एक बहुत अजीब आदत है। हम उस कल के बारे में सोच-सोचकर आज घुटते रहते हैं, जो अभी तक आया ही नहीं है। हमारा आधा जीवन उन मुसीबतों के बारे में चिंता करने में बीत जाता है, जो असल में कभी हमारे जीवन में आती ही नहीं। हम अपने विचारों के पिंजरे में खुद ही कैद हो जाते हैं। इस मानसिक बीमारी को बहुत गहराई से समझते हुए कबीर जी कहते हैं:

“चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाय।
वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाय॥”
— संत कबीरदास

इस बात को पढ़कर लोग अक्सर एक गहरे विरोधाभास में उलझ जाते हैं। वे सोचते हैं कि कबीर जी शायद हमें भविष्य के प्रति लापरवाह होने के लिए कह रहे हैं। लोग सोचते हैं कि “यदि हम चिंता ही नहीं करेंगे, तो अपने करियर, अपने बच्चों और अपनी सुरक्षा के लिए योजना कैसे बनाएंगे? क्या हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना ही सही है?”

लेकिन यहाँ कोई लापरवाही नहीं है। कबीर जी यहाँ ‘चिंतन’ (Planning) और ‘चिंता’ (Worrying) के बीच का बारीक फर्क समझा रहे हैं। वे योजना बनाने से मना नहीं कर रहे, बल्कि उस बेकाबू चिंता से आगाह कर रहे हैं जो एक ‘डाकिनी’ (डायन) की तरह इंसान को अंदर ही अंदर खोखला कर देती है। यह वाणी हमें डराती नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी से आज़ाद होने का रास्ता दिखाती है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। जब एक हिरण के पीछे कोई शेर पड़ता है, तो हिरण का दिमाग तुरंत संकट के हार्मोन्स रिलीज करता है ताकि वह तेजी से भाग सके। जैसे ही हिरण बचकर सुरक्षित स्थान पर पहुँचता है, उसका दिमाग शांत हो जाता है और वह वापस आराम से घास चरने लगता है। वह यह सोचकर तनाव में नहीं आता कि “कल अगर फिर शेर आ गया तो मेरा क्या होगा?” 

लेकिन इंसान का दिमाग चौबीसों घंटे इसी काल्पनिक ‘शेर’ के डर में जीता रहता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यही कहता है कि 90% शारीरिक बीमारियों की जड़ ‘क्रोनिक स्ट्रेस’ (लगातार रहने वाला तनाव) है। जब आप हर समय चिंता में डूबे रहते हैं, तो शरीर में जहर जैसा एसिड बनने लगता है, जो धीरे-धीरे हमारे दिल, पेट और दिमाग को कमजोर कर देता है। कबीर जी ने सदियों पहले वैज्ञानिक रूप से सही कहा था कि इस मानसिक बीमारी पर दुनिया के किसी हकीम या डॉक्टर की दवा काम नहीं कर सकती, क्योंकि इसका इलाज अस्पताल में नहीं, आपके अपने नजरिए में है।

विरोधाभास का समाधान 
अब यहाँ एक तार्किक सवाल उठता है: “जीवन में सचमुच बहुत सी मुश्किलें होती हैं—पैसों की तंगी, नौकरी का दबाव, परिवार की सेहत। ऐसे में भला कोई चिंता कैसे न करे? क्या चाहकर भी तनाव को रोकना मुमकिन है?”

विरोधाभास तब दूर होता है जब आप इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं कि चिंता करने से आज तक दुनिया की एक भी समस्या हल नहीं हुई है, बल्कि आपकी सोचने की क्षमता प्रभावित होती हैं। जो मुश्किलें आज आपके सामने हैं, वे आपकी परीक्षा हैं। उन पर ‘ऐक्शन’ लेना आपके हाथ में है, लेकिन उनके डर में डूब जाना आपके हाथ में नहीं होना चाहिए। कबीर जी कहते हैं कि जब आप पूरी ईमानदारी से अपना कर्म कर देते हैं, तो परिणाम को उस ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति पर छोड़ दीजिए जिसने आपकी सांसों का जिम्मा संभाला हुआ है। भरोसा रखना ही चिंता की सबसे बड़ी दवा है।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ आज में जिएं (Live in Now): जब भी मन बहुत आगे की सोचकर घबराने लगे, तो गहरी सांस लें और अपने आस-पास की चीजों को देखें। खुद को याद दिलाएं कि “इस वर्तमान पल में सब कुछ बिल्कुल ठीक है।”

★ समस्या को लिखें: चिंता दिमाग में घूमकर बड़ी लगती है। उसे कागज़ पर लिख लें और उसके सामने दो कॉलम बनाएं—‘मैं क्या कर सकता हूँ’ और ‘जो मेरे हाथ में नहीं है।’ जो हाथ में नहीं है, उसे सोचना बंद करें।

★ भरोसे का अभ्यास: यह याद रखें कि आपके जीवन में पहले भी कई मुश्किलें आई थीं, लेकिन समय के साथ आप उन सब से बाहर निकल आए। यह वक्त भी वैसे ही गुजर जाएगा।

आज का आत्म-संकल्प
“हे परमात्मा! मैं आज यह दृढ़ संकल्प लेता हूँ कि मैं कर्म पूरी ताकत से करूँगा, लेकिन कल के अनजाने डरों और चिंताओं को अपनी खुशियाँ चुराने की इजाज़त कभी नहीं दूँगा। जब मेरी हर सांस पर आपका पहरा है, तो मैं पूरी तरह महफूज़ हूँ। आज से मेरा मन शांत, स्थ- र और पूरी तरह सुरक्षित है।” 🙏