अमृत वाणी - संत वाणी - 13 Nitya Oswal द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अमृत वाणी - संत वाणी - 13

हम अक्सर जिंदगी में उन चीजों को हासिल करने के लिए दिन-रात दौड़ रहे हैं, जिन्हें हम मरने के बाद साथ नहीं ले जा सकते। इस अंधी दौड़ में हम बाहर से तो बहुत अमीर या कामयाब दिखते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही अकेले और बेचैन होते हैं। गुरु नानक देव जी ने इस मानवीय स्वभाव को एक बेहद सरल और गहरे सत्य से समझाया है:

“मनुख बिनु बूझे बिरथा आया।
कचहु कंचनु कहु की कीआ, निहचलु कछु न पाइआ।”
— श्री गुरु ग्रंथ साहिब (गुरु नानक देव) 

इस वाणी को पढ़कर लोग अक्सर यह गलत मतलब निकाल लेते हैं कि गुरु नानक जी हमें दुनिया का सुख भोगने से मना कर रहे हैं या हमें सब कुछ छोड़कर संन्यासी बनने के लिए कह रहे हैं। लोगों को लगता है कि यदि सब कुछ ‘बिरथा’ (व्यर्थ) ही है, तो फिर हम मेहनत क्यों करें, घर-बार क्यों चलाएं?

लेकिन यहाँ कोई वैराग्य का डर नहीं है। गुरु जी कर्म छोड़ने के लिए नहीं कह रहे हैं, बल्कि हमें उस मूर्खता से बचा रहे हैं जहाँ हम ‘कांच’ (कचहु) जैसी अस्थायी चीजों को ‘सोना’ (कंचनु) समझकर अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा देते हैं। यह दोहा हमें जीवन का सही संतुलन सिखाता है।

व्यावहारिक उदाहरण 
हम एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे एक मकड़ी दिन-रात मेहनत करके अपने थूक से एक बहुत ही सुंदर और जटिल जाला बुनती है। वह उस जाले को ही अपना महल और अपनी पूरी दुनिया समझ बैठती है। लेकिन जैसे ही घर की सफाई होती है, एक झटके में वह जाला साफ हो जाता है। वह मकड़ी भूल जाती है कि जाला उसका घर नहीं, सिर्फ शिकार पकड़ने का एक साधन था।

ठीक यही भूल इंसान करता है। मकान, बैंक बैलेंस, गाड़ियाँ और समाज में हमारा पद—ये सब जीवन जीने के साधन (Comforts) थे, जीवन का अंतिम लक्ष्य (Purpose) नहीं। जब हम इन अस्थायी साधनों को ही अपनी स्थायी पहचान मान लेते हैं, तो हमारे भीतर अहंकार और डर पैदा होता है। आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि इंसान का सबसे बड़ा तनाव यह है कि वह उन चीजों को खोने से डरता है जो उसकी अपनी हैं ही नहीं। जो स्थिर (निहचलु) है— जैसे प्रेम, संतोष, सेवा और ईश्वर की चेतना— उसे हम कभी समय ही नहीं देते।

मन की शंका का सीधा समाधान
अब यहाँ एक तार्किक सवाल उठता है : “यदि संपत्ति, मान-सम्मान और परिवार सब कुछ एक दिन छूट जाना है, तो क्या हम अपनी इच्छाओं को मार दें? क्या हम तरक्की करना बंद कर दें?”

गुरु नानक देव जी का बहुत ही सुंदर दर्शन है— “अंजन माहि निरंजनि रहीऐ” यानी संसार के कीचड़ और मोह-माया के बीच रहकर भी खुद को बेदाग रखना। आपको बिजनेस करना है, खूब पैसा कमाना है, परिवार की जिम्मेदारियां उठानी हैं, लेकिन नाव की तरह। नाव पानी के ऊपर रहे तो सुंदर सफर तय करती है, लेकिन अगर पानी नाव के भीतर आ जाए तो नाव डूब जाती है। ठीक वैसे ही, जब तक संसार आपके बाहर है, सब बहुत सुंदर है; लेकिन जिस दिन संसार आपके मन के भीतर घुसकर लालच बन जाता है, आपकी आंतरिक शांति डूब जाती है।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ दिखावे की होड़ बंद : दूसरों को नीचा दिखाने या अपनी झूठी शान साबित करने के लिए महंगी चीजें खरीदना बंद करें।

★ वंद छको (साझा करना) : जो भी कमाएं, उसमें से एक हिस्सा नि:स्वार्थ भाव से समाज और जरूरतमंदों की सेवा में लगाएं। यही वह कमाई है जो कभी ‘कांच’ नहीं बनती।

★ आंतरिक ऑडिट (Self-Audit) : रात को सोने से पहले 2 मिनट खुद से पूछें कि आज मैंने अपनी आत्मा और मन की शांति के लिए क्या किया?

आज का संकल्प (My Resolution)
“हे मालिक! मैं अपनी जिम्मेदारियों को पूरी शिद्दत से निभाऊँगा और खूब तरक्की करूँगा। लेकिन मैं कांच जैसी अस्थायी चीजों के पीछे अंधा होकर अपने मन की शांति को कभी नहीं खोऊँगा। आज से मेरी असली दौलत मेरा संतोष और मेरी इंसानियत होगी।” 🙏