हॉल का नज़ारा एकदम अलग था। धूप खिड़की से छनकर आ रही थी और फर्श पर चारों तरफ रंगों के निशान और बिखरे हुए स्केच थे। रणविजय अभी-अभी उस मासूम बच्ची के साथ एक अजनबी सा रिश्ता महसूस करने लगा था। तभी उसकी माँ हॉल में आई। बच्ची को रणविजय की गोद में या यूँ कहें कि रणविजय को एक बच्ची के साथ खेलते देख, माँ की आँखें भर आईं।
माँ धीरे से उनके पास आईं और रणविजय के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आवाज़ में एक ममता भरी टीस थी, "बेटा... देख इसे। कितनी रौनक है न घर में? तू कब समझेगा? शादी कर ले... तेरी भी अपनी एक नन्ही सी परी होती। काश तू मेरी बात समझ पाता।"
'शादी' का नाम सुनते ही रणविजय की आँखों की चमक गायब हो गई। जैसे कोई ठंडी लहर अचानक धधकती आग में बदल गई हो। उसके दिमाग में अंकिता का वो चेहरा आ गया, जिसे उसने चार साल पहले हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन वो उसके हाथ से रेत की तरह फिसल गई थी।
रणविजय झटके से खड़ा हुआ। उसके चेहरे की वो मासूमियत, जो कुछ पल पहले आरोही के साथ थी, वो गायब हो गई थी। उसकी आँखों में एक ऐसी बर्फ़ीली नफरत थी कि हॉल का तापमान जैसे गिर गया। उसने अपनी माँ की तरफ देखा भी नहीं, बस अपनी कड़क आवाज़ में बोला, "माँ, मैंने कहा था न, इस टॉपिक को दोबारा मत छेड़ना!"
उसका पारा हाई हो चुका था। वो बिना पीछे देखे हॉल से निकल गया। उसके कदमों की आहट इतनी ज़ोरदार थी कि जैसे वो ज़मीन को ललकार रहा हो।
आरोही, जो अभी तक मजे से खेल रही थी, वो सकपका गई। वो चुपचाप बैठी रही, फिर अपनी तोतली आवाज़ में अपनी दादी से पूछा, "दादी... अंकल को क्या हो गया? वो ऐसे गुस्से में क्यों चले गए? क्या मैंने कुछ गलत ड्राइंग बनाई क्या?"
दादी ने उसे गले से लगा लिया, "नहीं बेटा, तूने कुछ गलत नहीं किया।"
खेलते-खेलते, उस कोलाहल के बीच भी, आरोही की आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। वो सोफे पर ही एक छोटा सा गोला बनकर सो गई। वो कोहिनूर सी मासूम बच्ची अब गहरी नींद में थी। हॉल में अब सिर्फ सन्नाटा था, लेकिन हवा में अभी भी रणविजय के उस गुस्से की गूँज बाकी थी। वो गुस्सा, जो अंकिता के नाम से जुड़ा था और जिसे रणविजय ने आज तक कहीं दफ़न नहीं होने दिया था।
घर के सभी लोग किसी ज़रूरी काम से बाहर निकल गए थे। बच्ची को सुलाने की जिम्मेदारी रणविजय की माँ ने ली, लेकिन अचानक उन्हें भी किसी काम से निकलना पड़ा, तो उन्होंने सोते हुए आरोही को रणविजय के कमरे में ही सुला दिया।
रणविजय वॉशरूम में था। जैसे ही वो बाहर निकला, उसके कदम ठिठक गए। उसके बेड पर, उसकी अपनी चादरों में, वह नन्ही सी परी—आरोही—बेफिक्र होकर सो रही थी। रणविजय का पारा एक पल के लिए चढ़ा—'ये बच्ची मेरे कमरे में?'—लेकिन जैसे ही उसने उस मासूम चेहरे को देखा, वो सारा गुस्सा कहाँ उड़ गया, उसे पता ही नहीं चला। वो चुपचाप अपनी फाइल लेकर वहीं बेड के किनारे बैठ गया और काम करने लगा।
दो घंटे बीत गए। अचानक एक छोटी सी सिसकी सुनाई दी। आरोही अपनी आँखें मलते हुए उठी और डर के मारे बिलख-बिलख कर रोने लगी। रणविजय, जो पूरी दुनिया के लिए एक खतरनाक माफिया था, आज उस बच्ची के सामने पसीने-पसीने हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस रोती हुई बच्ची को कैसे चुप कराए।
"अरे... चुप हो जाओ! तुम क्यों रो रही हो?" उसने घबराकर पूछा।
"मम्मा... मुझे मम्मा के पास जाना है!" आरोही फूट-फूटकर रोने लगी।
रणविजय ने अपना फोन निकाला, "ठीक है, चुप हो जाओ। मम्मा को फ़ोन कर देता हूँ। नंबर बताओ।"
आरोही ने अपनी तोतली उंगलियों से रणविजय के फ़ोन पर नंबर टाइप किया। घंटी बजी और दूसरी तरफ से आवाज़ आई, "हेलो?"
आरोही सिसकते हुए बोली, "मम्मा... मम्मा मुझे भूख लगी है, मुझे आपकी याद आ रही है, जल्दी आ जाओ!"
रणविजय की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने सुना कि अंकिता ने प्यार से कहा, "बस आधे घंटे में आ रही हूँ बेटा, चुप हो जाओ।" रणविजय उस आवाज़ को सुनकर जम गया—ये आवाज़... कहीं जानी-पहचानी थी? लेकिन फोन कट गया और उसका ध्यान वापस आरोही पर चला गया। उसने तुरंत भागकर किचन से खाना मंगवाया और उसे अपने हाथों से खिलाने लगा।
खिलाते-खिलाते उसने धीरे से पूछा, "आरोही, घर में कौन-कौन है?"
"मम्मा है, नानी है और मामा है," आरोही ने चबाते हुए कहा।
रणविजय ने एक गहरी सांस ली और पूछा, "और पापा?"
आरोही ने मासूमियत से कंधा उचकाया, "पापा काम से बाहर गए हैं। मम्मा को पता है कहाँ हैं।"
रणविजय की आँखों में चमक आई, "तुमने अपने पापा को कभी देखा है?"
"नहीं," उसने सादगी से जवाब दिया।
रणविजय के मन में शक का तूफ़ान उठने लगा था। उसने फिर पूछा, "तुम्हारी मम्मा का नाम क्या है?"
आरोही बोलने ही वाली थी, "मेरी मम्मा का नाम अ..."
तभी रणविजय के फोन पर एक ज़रूरी कॉल आ गया। आरोही उछलकर नीचे हॉल की तरफ भागी। रणविजय उसके पीछे-पीछे बात करते हुए नीचे आया।
वह पल, जहाँ सब बदल गया
हॉल में आरोही खेल रही थी, तभी उसे प्यास लगी। उसने आवाज़ लगाई, "अंकल, मुझे प्यास लगी है।" रणविजय पानी लेने के लिए किचन की ओर मुड़ा। ठीक उसी पल अंकिता घर में दाखिल हुई। उसने अंदर आते ही आरोही से पूछा, "बेटा, सब कहाँ गए? तुम अकेले कैसे बैठी हो?"
आरोही ने मासूमियत से कहा, "नहीं मम्मा, मैं अकेली नहीं हूँ। अंकल मेरे साथ हैं, वो अभी मेरे लिए पानी लेने गए हैं।"
अंकिता के हाथ काँप गए। उसने तुरंत एक कागज़ का टुकड़ा उठाया, उस पर लिखा—“मेरी बेटी को संभालने के लिए शुक्रिया”—और उसे टेबल पर रखकर, अंकिता ने फुर्ती से आरोही का हाथ पकड़ा और बिना एक पल गँवाए वहाँ से निकल गई। रणविजय पानी का गिलास लेकर बाहर आया, तो हॉल खाली था। बस टेबल पर वो चिट्ठी पड़ी थी।
ऑफिस की वो मीटिंग
दिन बीतते गए। रणविजय की कंपनी 'रेवेरा डिज़ाइन्स' में एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च होने वाला था। पूरा ऑफिस तैयार था। कॉन्फ्रेंस हॉल में अंधेरा था, जहाँ मुख्य कुर्सी (Head Chair) पर रणविजय बैठा हुआ था। चारों तरफ बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स और कंपनी के लोग बैठे थे। आज का प्रोजेक्ट अंकिता ही संभाल रही थी।
अंकिता ने जैसे ही हॉल में कदम रखा, उसे पता नहीं था कि जिस 'बॉस' को वो प्रेजेंटेशन देने जा रही है, वो और कोई नहीं बल्कि रणविजय है। उसने पीले रंग की नेट की साड़ी पहनी थी, जिसमें वो बेहद खूबसूरत लग रही थी।
अंकिता प्रेजेंटेशन देने के लिए आगे बढ़ी। जैसे ही उसने बोलना शुरू किया, रोशनी थोड़ी तेज़ हुई। रणविजय की नज़रें अंकिता पर पड़ीं। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ!
रणविजय उसे देखता ही रह गया। चार साल की तपिश, नफरत और इंतज़ार—सब एक पल में आँखों में तैर गया। उसे लगा जैसे उसकी दुनिया ठहर गई हो। वह अंकिता को देख रहा था और उसके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी छा गई।
अंकिता ने अपनी बात खत्म की और जैसे ही उसने हेड चेयर की तरफ देखा, वह अंधेरे के कारण चेहरा न देख सकी। अंकिता ने 'थैंक यू' कहा और अपनी जगह बैठ गई।
रणविजय ने भारी आवाज़ में चिल्लाकर कहा, "सब डील फाइनल है! सब बाहर जाओ! अंकिता, तुम यहीं रुको।"
सबके जाने के बाद, कमरे में सिर्फ वो दोनों थे। अंकिता डर के मारे काँप रही थी, उसे लगा कुछ गलत होने वाला है। वह जैसे ही जाने के लिए उठी, रणविजय बिजली की तरह उसकी ओर बढ़ा। उसने अंकिता का हाथ पकड़ा और उसे अपनी गोद में खींच लिया।