Mafia King - 4 Sah Ankita द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Mafia King - 4

रणविजय ने अंकिता को बिस्तर पर धक्का दिया और गुस्से से उसकी ओर बढ़ा। उसने उसका जबड़ा कसकर पकड़ लिया और दबी आवाज़ में बोला, "तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।"

 
उसी समय उसके फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर उसके असिस्टेंट का नाम चमक रहा था। उसने झुंझलाकर अंकिता को छोड़ दिया, कॉल रिसीव की और बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया। जाते-जाते उसने एक ठंडी, कठोर नज़र अंकिता पर डाली।
 
अंकिता वहीं फर्श पर बैठ गई। उसके हाथ काँप रहे थे, आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। रोते-रोते कब उसकी आँख लग गई, उसे खुद भी पता नहीं चला।
 
अगली सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह घबराकर उठ बैठी। उसने कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह बाहर से बंद था। तभी एक नौकर खाना लेकर अंदर आया। अंकिता उसके सामने हाथ जोड़कर बोली, "कृपया... मुझे जाने दीजिए। मैंने आपका क्या बिगाड़ा है?" नौकर ने सिर झुका लिया, लेकिन कुछ नहीं बोला। वह खाना रखकर चुपचाप बाहर चला गया। दरवाज़ा फिर बंद हो गया और अंकिता की उम्मीद भी।
 
दूसरी ओर रणविजय अपने आलीशान कमरे में बैठा सीसीटीवी स्क्रीन पर अंकिता को देख रहा था। उसके चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान थी। कुछ देर बाद वह अपने ऑफिस के लिए निकल गया।
 
रात को वह फिर होटल "द रॉयल फोर्टनेस" पहुँचा और सीधे अंकिता के कमरे में गया। अंकिता डरकर पीछे हट गई और काँपती आवाज़ में बोली, "प्लीज़... मुझे जाने दीजिए।"
 
लेकिन रणविजय के भीतर का गुस्सा और अहंकार उस पर हावी था। उसने उसकी एक भी बात नहीं सुनी। उसने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल किया और अंकिता की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ गंभीर अत्याचार किया। अंकिता लगातार रोती रही, उससे रहम की भीख माँगती रही, लेकिन वह नहीं रुका।
 भीतर सुलग रहा गुस्सा और उसका घायल अहंकार उसकी इंसानियत पर भारी पड़ चुका था। अंकिता की आँखों में साफ़ दिखाई देता डर, उसकी काँपती आवाज़ और बार-बार की गई विनती भी उसके पत्थर हो चुके दिल को नहीं पिघला सकी।
 
उस रात उसने अपनी ताकत का बेरहमी से दुरुपयोग किया और अंकिता की इच्छा तथा सम्मान को पूरी तरह कुचल दिया। कमरे की चारदीवारी उसकी चीखों और टूटती हुई उम्मीदों की गवाह बन गई, लेकिन उसकी मदद के लिए कोई नहीं आया।
 
रात धीरे-धीरे बीतती रही। हर पल अंकिता का साहस टूटता गया और उसका मन गहरे सदमे में डूबता चला गया। जब सुबह की पहली किरण खिड़की से कमरे में पहुँची, तब तक वह दर्द, थकान और मानसिक आघात से बेसुध हो चुकी थी।
 
रणविजय ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बिना किसी पछतावे के वह कमरे से बाहर निकल गया, मानो कुछ हुआ ही न हो। पीछे रह गई थी सिर्फ़ अंकिता—टूटी हुई, निढाल और खामोश।
 
उसे नहीं पता था कि उसकी ज़िंदगी की सबसे अँधेरी रात खत्म तो हो गई है, लेकिन असली संघर्ष अब शुरू होने वाला था।
जब अंकिता की आँख खुली, तो कुछ पल तक उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है। जैसे ही पिछली रात की यादें उसके ज़ेहन में ताज़ा हुईं, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने खुद की ओर देखा और फूट-फूटकर रो पड़ी।
 
वह किसी तरह बिस्तर से उठी, लेकिन उसके पूरे शरीर में असहनीय दर्द था। लड़खड़ाते कदमों से वह वॉशरूम तक पहुँची। आईने के सामने खड़ी होकर जब उसने अपने शरीर पर पड़े नीले निशान देखे, तो उसकी हिम्मत जवाब दे गई। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह आईने के सामने ही फूट-फूटकर रोने लगी।
 
कुछ देर बाद उसने खुद को संभालने की कोशिश की, नहाकर बाहर आई और कमरे का दरवाज़ा खोलने लगी। लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद था। उसने कई बार दरवाज़ा पीटा, मगर कोई जवाब नहीं मिला।
 
कुछ देर बाद एक नौकर खाना लेकर आया। उसने चुपचाप खाना अंदर रखा और बिना कुछ बोले वापस चला गया। अंकिता ने खाने की ओर एक बार भी नहीं देखा। उसका मन पूरी तरह टूट चुका था। वह फिर से बिस्तर पर बैठ गई और रोते-रोते कब उसकी आँख लग गई, उसे खुद भी पता नहीं चला।