Mafia King - 5 Sah Ankita द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Mafia King - 5

 -धीरे रात हो गई। रणविजय अपने कमरे में आया। उसकी नज़र बिस्तर पर गहरी नींद में सोई अंकिता पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि किसी भी हीरोइन की खूबसूरती उसके सामने फीकी पड़ जाए। कुछ पल के लिए रणविजय का गुस्सा और नफ़रत उसके मन की उलझनों में खो गए। उसने खुद को समझाने की कोशिश की, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार अंकिता पर ही टिक जाती थीं।

वह धीरे-धीरे उसके करीब आया और अनायास ही उसके होठों को चूम बैठा। उस पल वह अपनी सारी नफ़रत भूल चुका था और बस अपनी भावनाओं में बह गया था।कुछ देर बाद अंकिता को साँस लेने में तकलीफ़ महसूस होने लगी। उसने घबराकर आँखें खोलीं तो सामने रणविजय को देखकर चौंक गई। उसने तुरंत उसे दूर धकेलने की कोशिश की, लेकिन रणविजय कुछ क्षण तक वहीं रुका रहा। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि अंकिता को साँस लेने में परेशानी हो रही है, वह तुरंत पीछे हट गया। इसके बाद उसने उसके गाल पर हल्का-सा चुंबन दिया और कुछ पल तक उसे चुपचाप देखता रहा।भीर धीरे धीरे नीचे गले से नीचे आया कॉलर बोन पे किस करने लगा लवबाइट देने लगा  फिर भी उसके तीसरे को निकल के फेक दिया ..वही उसे देखने लगा ..जो बहुत हे खुबसूरत लग रहे थे गोरे बदन पे काली ब्रा  बहुत का आकर्षण लग रहा था ..उसे बहुत प्यार से ऊपर से वह किस करने लगा फिर धीरे धीरे उसकी ब्रा को निकल दिया या  "उसने अपने होंठ उसके स्तनों पर रख दिए और उन्हें चूमने लगा।""वह एक स्तन को अपने हाथ से दबा रहा था और दूसरे को चूस रहा था। फिर धीरे-धीरे बहुत प्यार से उसके पेट पर चुंबन देने लगा।""फिर उसने अपने कपड़े उतारकर एक तरफ फेंक दिए। इसके बाद उसने अंकिता के बचे हुए कपड़े भी उतार दिए और बिना एक पल रुके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा।""आज वह उसके साथ पूरे अपनापन और स्नेह के साथ अंतरंग था। कुछ समय के लिए वह अपने सारे गुस्से और नफ़रत को भूल चुका था। देखते ही देखते सुबह हो गई, लेकिन वह उसके पास से हटने का नाम नहीं ले रहा था। पूरी रात कब बीत गई, दोनों को इसका एहसास तक नहीं हुआ।

इसी तरह धीरे-धीरे एक हफ्ता गुजर गया। लेकिन अंकिता के लिए हर दिन किसी सज़ा से कम नहीं था। उसकी आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं लेते थे। अब उसके मन में बस एक ही ख्वाहिश बची थी—किसी भी तरह इस जगह से निकल जाना। "

अंकिता की माँ ने जब पुलिस की दहलीज लांघी, तो उन्हें उम्मीद थी कि कोई उनकी पुकार सुनेगा। लेकिन वहाँ सन्नाटा था—व्यवस्था का, संवेदनाओं का। पुलिस ने बड़ी बेरुखी से कह दिया, "आपकी बेटी अपने प्रेमी के साथ भाग गई है, खुद ही लौट आएगी। यहाँ समय बर्बाद मत कीजिए।"

माँ का दिल चीख उठा। उन्हें अपनी बेटी के संस्कारों पर अटूट विश्वास था; वह जानती थीं कि अंकिता ऐसी कोई हरकत नहीं कर सकती जो परिवार का सिर झुका दे। एक हफ्ता बीत गया, सन्नाटा और गहरा होता गया। अब उम्मीद की जगह डर ने ले ली थी। मन में एक ही ख्याल कौंध रहा था—कहीं वह लौटकर कभी न आए, कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई?

लेकिन शालिनी (अंकिता की माँ) को यह भान तक न था कि एक माँ के तौर पर उनकी ममता जिस अनहोनी से डर रही है, वास्तविकता उससे कहीं अधिक भयानक और अंधेरे से भरी है