पवित्र बहु - 16 archana द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र बहु - 16

चित्रा की बातें सुनकर दिव्यम कुछ पल तक बिल्कुल शांत बैठा रहा। उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन वह गुस्सा चित्रा पर नहीं, उस आदमी पर था जिसने एक सच्ची लड़की की आत्मा तक तोड़ दी थी।
दिव्यम ने धीरे से कहा, "चित्रा... मैं तुम्हारा बीता हुआ दर्द मिटा नहीं सकता। लेकिन इतना वादा करता हूँ कि अब तुम्हें कभी खुद को कमजोर महसूस नहीं होने दूँगा।"
चित्रा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं।
"मैं तुम्हें अपनी पत्नी मानने के लिए मजबूर नहीं करूँगा। तुम्हारा दिल जहाँ अटका है, मैं उसे जबरदस्ती बदलने की कोशिश भी नहीं करूँगा। लेकिन एक दोस्त बनकर... हर कदम पर तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।"
चित्रा ने धीमी आवाज़ में कहा, "मैं आपको पति का स्थान नहीं दे सकती... क्योंकि मेरे मन में आज भी बहुत सारे घाव हैं।"
दिव्यम हल्का-सा मुस्कुराया।
"मुझे कोई स्थान नहीं चाहिए... बस इतना चाहता हूँ कि एक दिन तुम खुद को पहचानो।"
चित्रा पहली बार किसी की बात सुनकर थोड़ा सहज हुई।
उसी रात दिव्यम बहुत देर तक सो नहीं पाया।
उसके मन में बार-बार वही शब्द गूँज रहे थे—
"गँवार औरत है... इसे कुछ नहीं आता..."
वह सोच रहा था,
"कैसा आदमी होगा जो अपनी पत्नी की इज़्ज़त किसी दूसरी औरत के सामने इस तरह मिट्टी में मिला दे?"
उसने उसी समय मन ही मन फैसला कर लिया—
"अब चित्रा की पहचान उसके अतीत से नहीं, उसकी काबिलियत से होगी।"
अगली सुबह...
दिव्यम एक लैपटॉप लेकर चित्रा के कमरे में पहुँचा।
चित्रा घबरा गई।
"ये... ये मेरे लिए?"
दिव्यम मुस्कुराया।
"हाँ... क्योंकि आज से तुम्हारी नई पढ़ाई शुरू होगी।"
चित्रा ने डरते हुए कहा,
"मुझे कुछ नहीं आता... मैं कैसे सीखूँगी?"
दिव्यम ने कुर्सी खींचकर उसके सामने रख दी।
"जिसे बोलना आता है... उसे सीखना भी आता है। सिर्फ शुरुआत करनी पड़ती है।"
चित्रा चुप रही।
उसके मन में आज भी अपने पहले पति की आवाज़ गूँज रही थी—
"गँवार है... इसे कुछ नहीं आता..."
उसने डरते हुए कहा,
"अगर मैं नहीं सीख पाई तो?"
दिव्यम ने तुरंत जवाब दिया,
"तो मैं फिर से सिखाऊँगा... सौ बार सिखाऊँगा... लेकिन तुम्हें हारने नहीं दूँगा।"
धीरे-धीरे दिन बीतने लगे।
दिव्यम उसे मोबाइल चलाना सिखाता...
ईमेल बनाना सिखाता...
लोगों से आत्मविश्वास के साथ बात करना सिखाता...
छोटे-छोटे बिज़नेस के बारे में समझाता।
पहले दिन चित्रा हर बात पर घबरा जाती।
दूसरे दिन कम।
तीसरे दिन उसने पहली बार बिना मदद के एक काम पूरा किया।
दिव्यम ने ताली बजाई।
"वाह... यही है मेरी बहादुर चित्रा!"
चित्रा के चेहरे पर महीनों बाद हल्की-सी मुस्कान आई।
लेकिन उसे क्या पता था...
दूर कहीं उसका पहला पति अब भी उसे बदनाम करने में लगा हुआ था।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि जिस लड़की को उसने "गँवार" कहकर ठुकराया था...
वही लड़की अब हर दिन अपने पैरों पर खड़ी होना सीख रही थी।
और शायद...
बहुत जल्द वही उसकी सबसे बड़ी हार बनने वाली थी।

सुबह के आठ बजे थे।
दिव्यम पहले से ही अपने ऑफिस के केबिन में बैठा चित्रा का इंतज़ार कर रहा था। कुछ ही देर में चित्रा हल्के रंग का सूट पहनकर, हाथ में डायरी लिए धीरे-धीरे अंदर आई।
उसके चेहरे पर आज भी झिझक थी।
दिव्यम मुस्कुराया।
"गुड मॉर्निंग, चित्रा।"
चित्रा ने भी हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"गुड मॉर्निंग..."
दिव्यम ने मेज़ पर रखी एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।
"आज तुम्हारा पहला काम है।"
चित्रा के हाथ काँप गए।
"म... मेरा पहला काम?"
"हाँ। लेकिन घबराना नहीं। बस इस फाइल में जो नाम और नंबर हैं, उन्हें कंप्यूटर में टाइप करना है। अगर गलती होगी तो मैं यहीं हूँ।"
चित्रा ने गहरी साँस ली और कुर्सी पर बैठ गई।
उसने धीरे-धीरे टाइप करना शुरू किया।
शुरुआत में उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। एक-दो बार स्पेलिंग भी गलत हुई।
वह घबराकर बोली,
"मुझसे नहीं होगा... मैं सच में कुछ नहीं कर सकती।"