लाल साड़ी वाली चुड़ैल Suman द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

लाल साड़ी वाली चुड़ैल

लाल साड़ी वाली चुड़ैल – हाथरस के गांव छौंक की सच्ची घटना

यह घटना उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के गांव छौंक की बताई जाती है। यह कहानी हमारे परिवार के सबसे बड़े जेठ जी के साथ घटी थी। जब भी घर में इस घटना का जिक्र होता है, आज भी सभी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस घटना को सुनने के बाद मुझे पहली बार एहसास हुआ कि इस दुनिया में कुछ ऐसी शक्तियां भी हो सकती हैं, जिनके बारे में हम पूरी तरह नहीं जानते।

यह बात कई साल पुरानी है। उस समय गांवों में आज की तरह सुविधाएं नहीं थीं। खेतों में ज्यादातर काम बैलों से ही किया जाता था। गर्मियों का मौसम था। जेठ का महीना चल रहा था। दोपहर के समय सूरज मानो आग बरसा रहा था। गर्म हवाएं चल रही थीं और लोग बिना किसी जरूरी काम के घरों से बाहर निकलना भी पसंद नहीं करते थे।

उस दिन हमारे सबसे बड़े जेठ जी सुबह-सुबह ही खेत पर जुताई करने चले गए थे। खेत काफी बड़ा था और काम भी बहुत ज्यादा था। इसलिए उन्होंने घर से निकलते समय हमारे पति से कहा था, "आज काम बहुत है। मैं दोपहर में घर नहीं आ पाऊंगा। तुम खाना खेत पर ही लेकर आ जाना।"

दोपहर होने लगी। घर की महिलाओं ने रोटियां बनाई, सब्जी तैयार की और साथ में ठंडी छाछ भी रख दी। गर्मी बहुत ज्यादा थी, इसलिए छाछ ले जाना जरूरी था। हमारे मझले जेठ जी खाना लेकर खेत की ओर चल पड़े। उन्होंने एक झोले में रोटी, सब्जी और छाछ रख ली।

उनके पास एक तेज कटार भी थी। गांव में उस समय खेतों में जाते समय लोग अपने साथ कटार या दरांती जरूर रखते थे। उन्होंने सोचा कि वापस लौटते समय खेत से थोड़ी चरी भी काट लेंगे, इसलिए कटार साथ रख ली।

खेत तक पहुंचने के लिए उन्हें एक पुराने जंगल से होकर गुजरना पड़ता था। वह जंगल गांव से थोड़ी दूरी पर था। गांव के लोग उस जंगल के बारे में कई तरह की बातें करते थे। कहा जाता था कि जब गांव में किसी छोटे बच्चे की मृत्यु हो जाती थी, तो उसे उसी जंगल में दफनाया जाता था। इसी कारण लोग उस जगह को अशुभ मानते थे।

गांव के बुजुर्ग अक्सर कहते थे कि उस जंगल में शाम के बाद कोई नहीं जाता। कई लोगों ने वहां अजीब-अजीब आवाजें सुनने और परछाइयां देखने की बात कही थी। हालांकि हमारे जेठ जी इन बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि डर इंसान के मन में होता है।

उस दिन जब वे जंगल के रास्ते पर पहुंचे, तो चारों तरफ बिल्कुल सन्नाटा था। केवल गर्म हवा की आवाज और पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट सुनाई दे रही थी। दोपहर इतनी तेज थी कि दूर-दूर तक कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा था।

तभी उनकी नजर अपने से कुछ दूरी पर चल रही एक औरत पर पड़ी।

उस औरत ने लाल रंग की साड़ी पहन रखी थी। उसके सिर पर लंबा घूंघट था, जिसकी वजह से उसका चेहरा बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था। वह धीरे-धीरे रास्ते पर आगे बढ़ रही थी।

जेठ जी को यह देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ।

उन्होंने मन ही मन सोचा, "इतनी तेज धूप में यह औरत अकेली यहां क्या कर रही है? और अगर गांव की कोई महिला है, तो अकेले इस जंगल से क्यों गुजर रही है?"

फिर उन्होंने सोचा कि शायद किसी जरूरी काम से जा रही होगी।

वे भी उसके पीछे-पीछे चलने लगे।

कुछ दूर चलने के बाद उन्होंने आवाज लगाई, "बहन जी, कौन हो आप?"

लेकिन उस औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

जेठ जी को लगा कि शायद उसने उनकी आवाज नहीं सुनी होगी।

उन्होंने दूसरी बार थोड़ा जोर से पूछा, "अरे, कौन हो आप?"

फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला।

अब उन्हें थोड़ा अजीब लगने लगा। रास्ता सुनसान था और वह औरत बिना पीछे देखे लगातार आगे बढ़ती जा रही थी।

उन्होंने तीसरी बार पूछा, "कौन हो आप? सुनाई नहीं दे रहा क्या?"

फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

अब उनके मन में हल्का-सा डर पैदा होने लगा।

उन्होंने चौथी और आखिरी बार पूछा, "कौन हो आप?"

इस बार वह औरत अचानक रुक गई।

कुछ क्षणों तक वह बिल्कुल स्थिर खड़ी रही। फिर उसने धीरे-धीरे अपना सिर पीछे की ओर घुमाना शुरू किया।

जैसे ही उसका चेहरा दिखाई दिया, जेठ जी के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

उस औरत का चेहरा इंसानों जैसा बिल्कुल नहीं था।

उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल चमक रही थीं। उसके दांत बहुत बड़े और नुकीले थे। चेहरा बेहद भयानक और डरावना था। उसके चेहरे पर ऐसी क्रूर मुस्कान थी, जिसे देखकर किसी का भी दिल दहल जाए।

इतना ही नहीं, उसके हाथ भी सामान्य इंसानों जैसे नहीं लग रहे थे।

वह औरत अचानक भयानक आवाज में गुर्राई और तेजी से जेठ जी की ओर झपट पड़ी।

यह देखकर एक पल के लिए जेठ जी भी घबरा गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने तुरंत अपने हाथ में पकड़ी कटार निकाल ली और सामने कर दी।

जैसे ही उन्होंने कटार उठाई, वह भयानक औरत कुछ क्षणों के लिए रुकी।

फिर अगले ही पल वह अचानक गायब हो गई।

ऐसा लगा मानो वह कभी वहां थी ही नहीं।

चारों तरफ फिर से वही सन्नाटा छा गया।

जेठ जी कुछ देर तक वहीं खड़े रहे। उनके पूरे शरीर से पसीना बह रहा था। दिल तेजी से धड़क रहा था। उन्होंने इधर-उधर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था।

कुछ देर बाद उन्होंने खुद को संभाला और तेजी से खेत की ओर चल पड़े।

खेत पर पहुंचकर उन्होंने सबसे पहले अपने बड़े भाई को खाना दिया, लेकिन उनका चेहरा डरा हुआ था। बड़े भाई ने जब उनकी हालत देखी तो पूछा, "क्या हुआ? तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?"

तब उन्होंने पूरी घटना विस्तार से बताई।

शाम को जब सभी लोग घर लौटे, तो उन्होंने यह बात पूरे परिवार को बताई। परिवार के बुजुर्गों ने उनकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि संभव है कि उनका सामना किसी अलौकिक शक्ति से हुआ हो।

उस दिन के बाद परिवार का कोई भी सदस्य अकेले उस जंगल से जाने की हिम्मत नहीं कर पाया।

आज भी जब यह घटना याद की जाती है, तो सभी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह घटना सच थी या किसी अनजानी शक्ति का खेल, यह कहना मुश्किल है। लेकिन जिसने उस डरावने चेहरे को देखा, वह आज तक उस मंजर को भूल नहीं पाया।