पुस्तक समीक्षा - अंधी दौड़ Prafulla Kumar Tripathi द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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पुस्तक समीक्षा - अंधी दौड़

 वर्तमान दौर के सच को उजागर करती पुस्तक -  अंधी दौड़ ।कभी कभी कुछ ऐसी बातें घटित होती हैं जिन्हे हम स्वीकारने में झिझकते हैं | समाज और परिवार भी |यह सिलसिला जब आम हो जाता है तो इस पर समाज की मुहर लग जाती  है | लिव  इन रिलेशन शिप का  मुद्दा भी ऐसा ही है जो आज आम होता चला  जा रहा है |प्रस्तुत उपन्यास “अंधी दौड़” इसी सच के ताने बाने से रची गई है |कथानक में सिर्फ़ लिव इन पर ही नहीं उससे जुड़े तमाम पहलुओं को भी रोचक तरीके से शामिल किया गया है | 

उपन्यासकार सूर्य नारायण शुक्ल ने आमुख में ही लिखा है कि “टूटने और जुडने का सिलसिला तब तक चलता रहता  है जब तक जान जाने की नौबत नहीं आ  जाती |अक्सर युवक युवतियाँ मारे पीटे  जाते हैं और कभी कभार तो उनकी हत्या भी हो जाती है |” इस उपन्यास में ऐसा ही हुआ है और रोमांचक तरीके से घटना क्रम आगे बढ़ता गया है |

उपन्यास में हमारे समाज और परिवार के आसपास के मुख्यत: दो पात्र हैं-दीपक शुक्ला और ज्योति |दोनों मेधावी और सभ्रांत परिवार से तालुक रखने वाले | बेंगलुरू में दीपक की मुलाकात रिया भंभानी से होती है |उसके साथ दो और लड़कियां होती हैं-पूनम शर्मा  और दिव्या सिंह |तीनों लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थीं लेकिन रिया का अपने ब्याव फ्रेंड से ब्रेक अप हो गया था | नाटकीय घटनाक्रम में रिया और दीपक शुक्ला पास आते हैं और एक रात धोखे से रिया दीपक को नशा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बना लेती है |संबंध ही नहीं बना लेती है बल्कि उसकी वीडियो रिकार्डिंग भी कर लेती है |अब शुरू होता है वसूली का खेल |

उधर दीपक के माता पिता उसकी शादी के लिए आए प्रस्तावों पर विचार करते हैं |इसी में ज्योति त्रिपाठी नामक लड़की के लिए प्रस्ताव  आता है जो स्वयं भी बैंगलूरू में उसी कंपनी में काम करती  है जहां दीपक कार्यरत है | प्रस्ताव पर मुहर लग जाती है और दीपक की माँ अपने हाथ की अंगूठी को निकाल कर ज्योति को पहना देती है |

ज्योति जब बेंगलुरू जाती है तो उसकी मुलाकात दीपक से होती है |अनेक ऐसे घटनाक्रम होते हैं जब ये दोनों करीब से करीब होते जाते हैं |एक रात ज्योति दीपक के कमरे मे आती है और उससे लिपट जाती  है |जब दीपक प्रतिरोध करता है तो ज्योति कहती है कि” मैं अपने साथ सिंदूर की डिब्बी लेकर आई हूँ .. मुझसे गंधर्व विवाह करो और मेरी मांग में सिंदूर भर दो |”लेकिन दीपक तैयार नहीं हुआ |

उधर रिया ने रंगदारी का दबाब बनाना शुरू  किया और दस लाख पर बात तय हुई |निर्धारित समय पर जब दीपक रुपयों से भरा बैग  लेकर रिया के कमरे पर पहुंचता है तो देखता है कि रिया का मर्डर हो चुका है |वह भागने की कोशिश में था कि पुलिस आ गई |वह पकड़ा गया |लेकिन जब गाड़ी पर बैठाया जाने लगा तो उसने एक बार फिर फरार होने की  और सफल हो गया |देर रात ज्योति के घर जाकर उसे रुपयों का बैग देता है और वहाँ से भाग जाता है |

इसके बाद की कहानी और भी रोचक है |उपन्यासकार जगह जगह इब्न ए  सफ़ी ,सुरेन्द्र मोहन पाठक ,वेद प्रकाश शर्मा,ओम प्रकाश शर्मा की लेखन शैली  को अपनाते हुए कहानी में भरपूर सस्पेंस भरते हैं |पुलिस से बचने के चक्कर में कथा नायक दीपक कभी गोपाल दास बनते हैं तो कभी  हनुमंत सर | लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता है दीपक इस खून के इल्जाम से आगे के घटनाक्रम में मुक्त हो जाता है |

उपन्यास की लेखन शैली रोचक और दमदार है |कुछ डॉयलागस बेहतर बन पड़े हैं जैसे- “दर्द जीवन का हिस्सा है |ज़िंदगी है तो दुख दर्द आते जाते रहेंगे |”.. उसके घर के बागीचे के मुरझाए फूल खिल उठे | बागीचे में घूमने वाली तितलियाँ नाच उठीं |”.. “ मनुष्य जीवन है तो संचित धन भी जरूरी है |पता नहीं कौन सी आवश्यकता कब सामने खड़ी हो जाए |”

कुल 82 पृष्ठों की इस पुस्तक में 9 पाठ हैं और इसका मूल्य एक सौ पचास रुपये है|पुस्तक पठनीय है | मुद्रण में कुछ त्रुटियाँ अवश्य हैं जिन्हें प्रूफ रीडिंग में सुधारा  जा सकता था |चूंकि लेखक इस समय 80 वर्ष से ऊपर आयु के हैं और उनकी यह पाँचवी पुस्तक है |इसलिए उनके इस हौसले को सलाम किया जाना चाहिए |यह भी कि भौतिकी के प्रवक्ता के रुप में अपनी सेवाएं देने वाले श्री सूर्य नारायण शुक्ल द्वारा  हिन्दी साहित्य मे दिए जा रहे इस योगदान की भरपूर सराहना की जानी चाहिए |पुस्तक का आवरण सुंदर है और इसके हैं अभिधा प्रकाशन ।