अभी नहीं..... prem chand hembram द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अभी नहीं.....


अभी नहीं...
गाँव के किनारे एक विशाल पीपल का वृक्ष था। उसकी फैली हुई शाखाएँ दूर-दूर तक शीतल छाया बिखेरती थीं। पक्षियों का कलरव, पत्तों की सरसराहट और उसके नीचे पसरी हुई शांति मानो थके हुए मन को विश्राम देने के लिए ही बनी थी।
एक दिन उसी वृक्ष के नीचे एक वृद्ध संत आकर ठहरे। उनके मुख पर तप का तेज था और आँखों में करुणा की अथाह गहराई। वे अधिक बोलते नहीं थे, पर उनके पास बैठने मात्र से लोगों के मन का बोझ हल्का हो जाता था।
धीरे-धीरे गाँव के लोग उनके पास आने लगे। कोई धर्म की चर्चा सुनता, कोई जीवन की उलझनों का समाधान पूछता और कोई केवल उनके चरणों में बैठकर मन की शांति खोजता।
उसी गाँव में हरिनारायण नाम का एक गृहस्थ रहता था। वह परिश्रमी, ईमानदार और परिवार-निष्ठ व्यक्ति था। पत्नी, बच्चे, खेत-खलिहान और गृहस्थी ही उसकी दुनिया थे।
एक दिन संत ने उसे अपने पास बुलाया।
"पुत्र," उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, "मनुष्य जन्म दुर्लभ है। आओ, दीक्षा ले लो। संसार का कार्य करते हुए भी ईश्वर की ओर एक कदम बढ़ाओ।"
हरिनारायण ने आदरपूर्वक सिर झुका दिया।
"बाबा, आपकी बात सिर आँखों पर। पर अभी बच्चे बहुत छोटे हैं। उनके पालन-पोषण, शिक्षा और भविष्य की चिंता है। जब ये दायित्व पूरे हो जाएँगे, तब अवश्य आपकी शरण में आऊँगा।"
संत कुछ क्षण मौन रहे।
फिर धीरे से बोले, "समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता पुत्र।"
हरिनारायण मुस्करा दिया।
"अभी नहीं बाबा।"
संत ने उसकी ओर गहरी दृष्टि से देखा और शांत भाव से वहाँ से चले गए।
समय अपनी गति से बहता रहा।
ऋतुएँ बदलती रहीं। बच्चे बड़े हो गए। बेटों के विवाह हो गए। घर में बहुएँ आ गईं। कुछ वर्षों बाद पोते-पोतियों की किलकारियाँ पूरे आँगन में गूँजने लगीं।
लगभग बीस वर्ष बाद वही संत पुनः उस गाँव में आए।
उन्होंने हरिनारायण को देखा। उसके बाल सफेद हो चुके थे। कमर झुक गई थी, पर चेहरे पर गृहस्थ जीवन का संतोष झलक रहा था।
संत मुस्कराए।
"बंधु, अब तो तुम्हारे दायित्व पूरे हो गए। अब तो ईश्वर की ओर चलो।"
उसी समय एक छोटा पोता दौड़ता हुआ आया और उसकी धोती पकड़कर बोला—
"दादाजी! चलिए न, घोड़ा बनिए।"
हरिनारायण हँस पड़ा। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया।
फिर संत की ओर देखकर बोला—
"बाबा, अब तो इन बच्चों के साथ समय बिताने का अवसर मिला है। इन्हें छोड़कर मैं साधना कैसे करूँ?"
संत ने पूछा—
"तो क्या जीवन भर यही कहते रहोगे—अभी नहीं?"
हरिनारायण ने सहजता से उत्तर दिया—
"बस थोड़ा और समय।"
पास खड़ा उसका बड़ा पुत्र बोला—
"पिताजी, बाबा ठीक कह रहे हैं। अब कुछ समय अपने लिए भी निकालिए।"
हरिनारायण कुछ नाराज़ हो गया।
"अपने लिए? यह घर किसने बनाया? ये खेत किसने जोड़े? तुम लोग अभी संसार कहाँ समझते हो!"
संत ने शांत स्वर में कहा—
"घर की सेवा करना उचित है, पर स्वयं को उसका स्वामी समझ लेना दुःख का कारण बन जाता है।"
पर हरिनारायण सुनने को तैयार नहीं था।
संत फिर चले गए।
कुछ वर्षों बाद हरिनारायण की मृत्यु हो गई।
घर में शोक हुआ। आँसू बहे। फिर धीरे-धीरे जीवन अपनी पुरानी गति से चल पड़ा।
पर कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
कुछ समय बाद संत तीसरी बार उस गाँव में आए।
उन्होंने देखा कि हरिनारायण के घर के द्वार पर एक कुत्ता बैठा रहता है। दिन हो या रात, वह घर की रखवाली करता रहता था।
संत उसे देखते ही ठिठक गए।
उनकी दृष्टि साधारण नहीं थी।
वे सब समझ गए।
उनके मुख से करुणा भरी आवाज निकली—
"अरे मूर्ख! तू फिर लौट आया?"
कुत्ता उनके चरणों के पास आकर बैठ गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी पहचान झलक रही थी।
संत ने पूछा—
"क्या अब भी इसी घर की रखवाली कर रहा है?"
मानो उसकी आत्मा बोल उठी—
"हाँ बाबा। यह घर मेरा है। यह परिवार मेरा है। इनकी रक्षा करना मेरा धर्म है।"
संत की आँखें करुणा से भर उठीं।
"जिस घर को तू अपना समझ रहा है, उसके लोग तुझे केवल एक कुत्ते के रूप में देखते हैं।"
लेकिन मोह का बंधन तर्क से नहीं टूटता।
कुत्ता जैसे फिर विनती करने लगा—
"पहले मुझे अपना कर्तव्य निभाने दीजिए बाबा।"
संत चुपचाप वहाँ से चले गए।
पाँच वर्ष और बीत गए।
अब संत भी अत्यंत वृद्ध हो चुके थे।
एक दिन वे फिर उसी घर पहुँचे।
उन्होंने आँगन में बैठे युवकों से पूछा—
"बेटा, यहाँ एक कुत्ता था। वह कहाँ गया?"
"मर गया बाबा।"
संत कुछ देर मौन रहे।
फिर पूछा—
"क्या कुछ समय पहले इस घर में कोई बड़ा विषधर साँप निकला था?"
युवक चौंक पड़े।
"हाँ बाबा, बहुत भयंकर था।"
एक बोला—
"मैंने उसकी कमर लाठी से तोड़ दी थी।"
दूसरा हँसते हुए बोला—
"बड़ी भाभी ने उस पर जलती मशाल फेंकी थी।"
तीसरा बोला—
"और मैंने पेट्रोल डालकर आग लगा दी थी।"
"फिर?"
"फिर वह मर गया।"
संत ने गहरी साँस ली।
"मुझे वह स्थान दिखाओ।"
वे वहाँ पहुँचे। संत ने आसन लगाया और ध्यान में बैठ गए।
कुछ समय बाद वातावरण एकदम शांत हो गया।
अचानक उनके सामने एक व्याकुल आत्मा प्रकट हुई।
वह फूट-फूटकर रो रही थी।
"बाबा... मुझसे भूल हो गई।"
संत ने शांत स्वर में पूछा—
"अब समझ आया?"
आत्मा काँप उठी।
"यदि मैंने आपकी बात मान ली होती... यदि मैंने दीक्षा ले ली होती... यदि मैंने ईश्वर की ओर कदम बढ़ाया होता... तो शायद यह दशा न होती।"
वह विलाप करने लगी—
"जिन बच्चों को गोद में खिलाया, जिनके लिए जीवन भर परिश्रम किया, मेरे ही पुत्रों ने मेरी देह तोड़ी, बहू ने मुझे जलाया और छोटे पुत्र ने आग लगा दी।"
संत ने करुणा से उसकी ओर देखा।
"नहीं पुत्र। उन्होंने तुम्हें नहीं मारा।"
आत्मा विस्मित रह गई।
संत बोले—
"उन्होंने एक साँप को मारा। वे तुम्हें पहचान ही कहाँ पाए।"
आत्मा का सिर झुक गया।
संत आगे बोले—
"और सच तो यह है कि तूने भी स्वयं को कभी नहीं पहचाना।"
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर संत ने कहा—
"जो दिखाई नहीं देता, वह असत्य नहीं हो जाता। जैसे सूर्य की एक किरण में सात रंग छिपे रहते हैं, वैसे ही इस शरीर में भी अनगिनत रहस्य विद्यमान हैं। पर मनुष्य नश्वर को सत्य और शाश्वत को कल्पना समझ बैठता है।"
आत्मा निःशब्द सुनती रही।
संत बोले—
"सोए हुए मनुष्य को जगाना सरल है, क्योंकि वह वास्तव में सोया हुआ है। पर जो अहंकार और मोह में डूबकर स्वयं को जाग्रत समझ बैठे, उसे जगाना अत्यंत कठिन है।
तुझे अनेक अवसर मिले। समय ने संकेत दिए। संतों ने पुकारा। पर तू हर बार कहता रहा—'अभी नहीं।'
और यही 'अभी नहीं' तेरे जीवन का सबसे बड़ा भ्रम बन गया।"
फिर संत ने आगे कहा—
"नर रूपी नारायण ही समय-समय पर मनुष्य को जगाने आते हैं। वे किसी संत, सद्गुरु या महापुरुष के रूप में उसके द्वार पर खड़े होकर पुकारते हैं।
पर मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाता।
वह चक्र, धनुष और त्रिशूल धारण किए हुए भगवान की प्रतीक्षा करता रहता है, जबकि परमात्मा उसके सामने मनुष्य रूप में खड़े होकर उसे बार-बार मार्ग दिखाते रहते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि हम संकेत को नहीं पहचानते, अवसर को नहीं पकड़ते और सत्य की पुकार को टालते रहते हैं।
फिर एक दिन पूरा जीवन बीत जाता है।
जब आँख खुलती है, तब समय हाथ से निकल चुका होता है।"
संत ने आकाश की ओर देखते हुए कहा—
"यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था—संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया था—
'प्रतिदिन असंख्य प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं, फिर भी जीवित मनुष्य सोचता है कि वह नहीं मरेगा।'"
संध्या उतर चुकी थी।
आकाश में सूर्य की अंतिम किरणें बिखर रही थीं।
संत धीरे-धीरे उठे।
चलते-चलते उन्होंने अंतिम बार कहा—
"यह संसार एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।
ईश्वर को पाने का समय कभी नहीं आता, उसे निकालना पड़ता है।
जो साधना को कल पर टालता है, उसका कल कभी नहीं आता।"
वृद्ध संत की आकृति धीरे-धीरे अंधकार में विलीन हो गई।
पीछे केवल एक प्रश्न रह गया—
क्या हम भी जीवन भर किसी न किसी बहाने से 'अभी नहीं' कहते रहेंगे?
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जयगुरु 🙏 🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र ) बोकारो 
झारखंड