अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 12 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 12


अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 12 : नई लेखिका
पूरा पुस्तकालय एकदम शांत था।
हजारों किताबें हवा में स्थिर खड़ी थीं।
समय जैसे रुक गया था।
अनन्या के हाथ में वह पुरानी कलम थी।
वही कलम...
जिससे कभी आदित्य ने अपनी किस्मत लिखी थी।
और शायद...
पूरी दुनिया की भी।
उसके सामने अधूरी किताब खुली हुई थी।
उसका आखिरी पन्ना खाली था।
पूरी तरह खाली।
जैसे किसी का इंतजार कर रहा हो।
रक्षक की आवाज गूँजी—
"अब फैसला तुम्हारा है।"
"जो तुम लिखोगी..."
"वही सत्य बन जाएगा।"
अनन्या के हाथ काँप गए।
"अगर मैं गलती कर दूँ तो?"
रक्षक कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
"तब कहानी हमेशा के लिए टूट जाएगी।"
अनन्या ने सामने खड़े लोगों की ओर देखा।
आर्या।
अन्वी।
आदित्य।
तीनों उसकी तरफ देख रहे थे।
तीनों की किस्मत अब उसके हाथ में थी।
सबसे पहले आर्या आगे बढ़ी।
उसकी लाल आँखों में वर्षों का दर्द था।
"अगर मेरा अंत लिखना पड़े..."
वह मुस्कुराई।
"तो लिख देना।"
अनन्या की आँखें भर आईं।
"नहीं।"
"तुमने बहुत सहा है।"
आर्या धीरे से बोली—
"हर कहानी का अंत जरूरी होता है।"
"मैं सदियों से एक अंत का इंतजार कर रही हूँ।"
फिर अन्वी आगे आई।
उसके चेहरे पर हमेशा की तरह शांति थी।
"डरो मत।"
उसने कहा।
"सही कहानी हमेशा दिल लिखता है।"
लेकिन आदित्य चुप खड़ा रहा।
उसकी आँखें झुकी हुई थीं।
सदियों की थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।
कुछ देर बाद वह बोला—
"मैंने एक बार अपने दुःख में पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया था।"
"इस बार..."
उसने अनन्या की तरफ देखा।
"मैं तुम्हारे फैसले को स्वीकार करूँगा।"
अनन्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।
एक तरफ आर्या थी।
एक अधूरी आत्मा।
दूसरी तरफ अन्वी थी।
जिसकी आत्मा के टुकड़े बिखरे हुए थे।
और तीसरी तरफ आदित्य था।
जिसने गलतियाँ की थीं...
लेकिन सिर्फ एक पिता होने की वजह से।
अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया।
उसने अधूरी किताब की तरफ देखा।
फिर रक्षक से पूछा—
"क्या हर कहानी का सिर्फ एक ही अंत होता है?"
रक्षक कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर पहली बार उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
"यह सवाल किसी ने पहले कभी नहीं पूछा।"
"जवाब दीजिए।"
अनन्या बोली।
रक्षक ने कहा—
"नहीं।"
"लेकिन आसान अंत हमेशा एक ही होता है।"
अनन्या के भीतर जैसे कोई रोशनी जल उठी।
उसने किताब को देखा।
फिर कलम को मजबूती से पकड़ लिया।
धीरे-धीरे उसने आखिरी पन्ने पर लिखना शुरू किया।
स्याही अपने आप चमकने लगी।
शब्द उभरते गए—
"यह कहानी किसी की हार की नहीं होगी।"
"यह कहानी मुक्ति की होगी।"
जैसे ही उसने यह लिखा...
पूरा पुस्तकालय काँप उठा।
रक्षक की आँखें फैल गईं।
आदित्य हैरान रह गया।
अनन्या लिखती रही—
"आर्या को उसकी कैद से मुक्ति मिलेगी।"
"अन्वी अपनी अधूरी आत्मा को वापस पाएगी।"
"और आदित्य अपने अपराधों का प्रायश्चित करेगा।"
अचानक अधूरी किताब से तेज रोशनी निकलने लगी।
इतनी तेज कि कोई आँखें नहीं खोल पा रहा था।
"यह असंभव है!"
रक्षक गरजा।
"तीनों को बचाया नहीं जा सकता।"
अनन्या ने कलम नहीं रोकी।
"किसने कहा?"
और फिर उसने अंतिम पंक्ति लिख दी—
"क्योंकि यह कहानी नियमों से नहीं..."
"प्रेम से पूरी होगी।"
जैसे ही आखिरी शब्द पूरा हुआ...
अधूरी किताब चमक उठी।
उसकी रोशनी पूरे पुस्तकालय में फैल गई।
हजारों किताबें खुल गईं।
उनके पन्नों से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
आर्या का शरीर चमकने लगा।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
सदियों बाद उसके चेहरे पर सच्ची मुस्कान आई।
उसे पहली बार शांति महसूस हो रही थी।
दूसरी तरफ अन्वी का शरीर रोशनी में बदलने लगा।
उसके बिखरे हुए टुकड़े वापस जुड़ने लगे।
वह धीरे-धीरे पूरी होती जा रही थी।
और आदित्य...
वह घुटनों पर बैठ गया।
उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
क्योंकि वर्षों बाद उसने अपनी बेटी को मुस्कुराते हुए देखा था।
तभी अन्वी उसके पास आई।
उसने अपने छोटे हाथ उसके चेहरे पर रख दिए।
"पापा..."
आदित्य फूट-फूटकर रो पड़ा।
"मुझे माफ कर दो।"
अन्वी मुस्कुराई।
"मैंने आपको बहुत पहले माफ कर दिया था।"
यह सुनते ही आदित्य के शरीर से सारा अंधकार बाहर निकल गया।
काला धुआँ हवा में घुल गया।
और उसकी जगह सिर्फ एक साधारण इंसान रह गया।
वह वही आदित्य था...
जो कभी एक पिता था।
एक लेखक था।
एक इंसान था।
अचानक रक्षक घुटनों पर बैठ गया।
उसकी विशाल आकृति टूटने लगी।
अनन्या हैरान थी।
"क्या हो रहा है?"
रक्षक मुस्कुराया।
"तुमने वह कर दिखाया जो सदियों में कोई नहीं कर सका।"
"तुमने कहानी को खत्म नहीं किया..."
"तुमने उसे पूरा किया है।"
और फिर...
उसकी पूरी आकृति रोशनी में बदल गई।
पूरा पुस्तकालय सुनहरी चमक से भर गया।
अधूरी किताब हवा में उठी।
उसके सारे पन्ने अपने आप भरने लगे।
एक-एक करके।
सभी खाली अध्याय पूरे होने लगे।
सभी अधूरी कहानियाँ समाप्त होने लगीं।
अनन्या ने देखा—
आर्या धीरे-धीरे रोशनी बनकर आसमान में विलीन हो रही थी।
अन्वी भी मुस्कुरा रही थी।
और आदित्य पहली बार शांति से आँखें बंद कर रहा था।
फिर अधूरी किताब का अंतिम पन्ना खुला।
और उस पर खुद-ब-खुद शब्द उभरने लगे—
"हर कहानी का अंत होता है..."
"लेकिन कुछ कहानियाँ अंत के बाद भी जीवित रहती हैं..."
अगले ही पल सब कुछ सफेद रोशनी में डूब गया।
और जब अनन्या ने आँखें खोलीं...
तो वह फिर वाराणसी में थी।
मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर।
सुबह हो चुकी थी।
गंगा के ऊपर सूरज की पहली किरणें चमक रही थीं।
उसके हाथ में वही किताब थी।
लेकिन अब उसका नाम बदल चुका था।
कवर पर लिखा था—
"पूर्ण किताब"
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
कहानी पूरी हो चुकी थी।
या शायद...
एक नई कहानी शुरू होने वाली थी।

 यह शुरू हुई थी — एक किताब से शुरू हुई कहानी, एक किताब पर समाप्त होगी, और अंतिम ट्विस्ट भी सामने आएगा।