अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 1 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 1


अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 1 : रहस्यमयी किताब
वाराणसी की रात हमेशा से रहस्यमयी मानी जाती थी। दिन में जितनी चहल-पहल रहती, रात होते ही शहर की पुरानी गलियाँ किसी अनकहे रहस्य में डूब जाती थीं।
ऐसी ही एक ठंडी रात थी।
घड़ी में लगभग बारह बज रहे थे।
चौक इलाके की एक संकरी गली में "ज्ञानदीप पुस्तकालय" नाम की एक पुरानी किताबों की दुकान थी। दुकान इतनी पुरानी थी कि लोग कहते थे उसके अंदर रखी कुछ किताबें सौ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं।
दुकान का मालिक रघुनाथ मिश्रा सत्तर वर्ष का बूढ़ा आदमी था।
उसने जिंदगी का अधिकांश समय किताबों के बीच बिताया था।
उस रात वह दुकान बंद करने की तैयारी कर रहा था।
बाहर हल्की बारिश हो रही थी।
रघुनाथ ने आखिरी बार दुकान का निरीक्षण किया और दरवाजे की ओर बढ़ा।
तभी उसकी नजर दुकान के सबसे पुराने कोने पर पड़ी।
वह अचानक रुक गया।
वहाँ एक किताब रखी थी।
धूल से ढकी हुई।
काली जिल्द।
पुराने चमड़े का कवर।
लेकिन अजीब बात यह थी कि वह किताब उसने पहले कभी नहीं देखी थी।
रघुनाथ की भौंहें सिकुड़ गईं।
वह धीरे-धीरे उसके पास गया।
जैसे ही उसने किताब उठाई, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
कवर पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"अधूरी किताब"
यह नाम पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
उसके हाथ कांपने लगे।
उसकी आंखों में वर्षों पुरानी एक घटना तैर उठी।
लगभग तीस साल पहले...
एक ऐसी ही किताब उसकी दुकान में आई थी।
और उसके बाद...
तीन लोग रहस्यमय तरीके से गायब हो गए थे।
उनमें से कोई कभी वापस नहीं लौटा।
उस घटना के बाद किताब भी अचानक गायब हो गई थी।
रघुनाथ ने कभी किसी को उस घटना के बारे में नहीं बताया।
आज इतने वर्षों बाद वही नाम फिर उसके सामने था।
"नहीं..."
उसके मुंह से धीरे से निकला।
"यह वापस नहीं आ सकती..."
उसने किताब को वहीं छोड़ने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही वह पीछे हटा, दुकान की सारी लाइटें झपकने लगीं।
टिम...
टिम...
टिम...
और अचानक पूरी दुकान अंधेरे में डूब गई।
रघुनाथ डर गया।
उसने जेब से टॉर्च निकाली।
टॉर्च की रोशनी सीधे किताब पर पड़ी।
और तभी...
किताब अपने आप खुल गई।
उसके पन्ने हवा के बिना ही तेजी से पलटने लगे।
फड़...
फड़...
फड़...
फड़...
रघुनाथ की सांसें रुक गईं।
फिर अचानक पन्ने रुक गए।
एक पन्ने पर लाल अक्षरों में कुछ लिखा था—
"हर कहानी का अंत होता है..."
धीरे-धीरे नीचे नए शब्द उभरने लगे—
"लेकिन मेरी कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं..."
रघुनाथ का गला सूख गया।
उसने तुरंत किताब बंद कर दी।
लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे खड़ा है।
बिल्कुल पीछे।
उसकी गर्दन के पास।
जैसे कोई सांस ले रहा हो।
रघुनाथ ने डरते-डरते पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन दुकान के कांच में उसे एक परछाईं दिखाई दी।
एक लड़की की परछाईं।
सफेद कपड़ों में।
लंबे बाल।
झुका हुआ चेहरा।
रघुनाथ चीख पड़ा।
टॉर्च उसके हाथ से गिर गई।
जब उसने दोबारा ऊपर देखा...
परछाईं गायब थी।
और किताब भी।
वहाँ कुछ नहीं था।
सिर्फ धूल।
मानो किताब कभी थी ही नहीं।
रघुनाथ घबराकर दुकान से बाहर भाग गया।
उस रात वह बिल्कुल नहीं सो पाया।
उसे बार-बार वही शब्द याद आते रहे—
"मेरी कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं..."
अगली सुबह।
वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय।
अनन्या शर्मा लाइब्रेरी साइंस में शोध कर रही थी।
उसे पुरानी किताबों और इतिहास में बहुत रुचि थी।
उस दिन वह अपने हॉस्टल से निकलने ही वाली थी कि दरवाजे पर किसी चीज से उसका पैर टकराया।
नीचे देखकर वह हैरान रह गई।
एक पुराना पैकेट रखा था।
उस पर उसका नाम लिखा था।
"अनन्या शर्मा"
लेकिन भेजने वाले का नाम नहीं था।
उसने पैकेट उठाया और कमरे के अंदर ले आई।
उसकी रूममेट पूजा भी उत्सुकता से देखने लगी।
"खोलो न..."
पूजा बोली।
अनन्या ने पैकेट खोला।
अंदर एक पुरानी किताब थी।
काले रंग की।
चमड़े का कवर।
और सामने सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"अधूरी किताब"
"वाह..."
पूजा मुस्कुराई।
"काफी पुरानी लग रही है।"
लेकिन अनन्या को न जाने क्यों किताब को देखते ही अजीब बेचैनी महसूस हुई।
उसने धीरे से पहला पन्ना खोला।
अंदर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—
"इस किताब का अगला अध्याय तुम्हें पूरा करना है।"
अनन्या चौंक गई।
"अजीब है..."
उसने कहा।
तभी किताब के अंदर से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।
उसने तस्वीर उठाई।
तस्वीर लगभग पचास साल पुरानी लग रही थी।
उसमें पाँच लोग खड़े थे।
चार पुरुष।
और एक लड़की।
अनन्या तस्वीर को ध्यान से देखने लगी।
अचानक उसकी सांस रुक गई।
तस्वीर में मौजूद लड़की का चेहरा...
उससे मिलता-जुलता था।
बहुत ज्यादा।
"यह कैसे संभव है?"
वह बुदबुदाई।
पूजा ने भी तस्वीर देखी।
"अरे यार... यह तो बिल्कुल तुम्हारी तरह दिख रही है।"
अनन्या असहज हो गई।
उसने तस्वीर वापस किताब में रख दी।
"शायद संयोग होगा।"
लेकिन उसके मन में डर का एक छोटा-सा बीज बोया जा चुका था।
उस रात।
करीब दो बजे।
अनन्या की नींद अचानक खुली।
कमरे में अजीब सन्नाटा था।
पूजा गहरी नींद में थी।
तभी उसे लगा जैसे कोई पन्ने पलट रहा हो।
फड़...
फड़...
फड़...
उसने सिर घुमाया।
टेबल पर रखी अधूरी किताब खुली हुई थी।
उसके पन्ने अपने आप पलट रहे थे।
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह धीरे-धीरे बिस्तर से उतरी।
और किताब के पास पहुंची।
पन्ने अचानक रुक गए।
आखिरी खुले हुए पन्ने पर कुछ लिखा था।
लेकिन वह लेख पहले वहां नहीं था।
काले अक्षरों में शब्द उभर रहे थे—
"अनन्या जाग चुकी है..."
उसके हाथ कांपने लगे।
धीरे-धीरे अगली पंक्ति लिखी गई—
"अब कहानी शुरू होगी..."
अनन्या ने घबराकर किताब बंद कर दी।
उसी समय कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।
तेज ठंडी हवा अंदर आई।
लाइट झपकने लगी।
और फिर...
उसे साफ सुनाई दिया—
एक लड़की की आवाज।
बहुत धीमी।
बहुत दर्दभरी।
"मुझे ढूंढो..."
अनन्या का पूरा शरीर कांप उठा।
"कौन है?"
उसने डरते हुए पूछा।
लेकिन जवाब नहीं मिला।
सिर्फ सन्नाटा।
कुछ सेकंड बाद सब सामान्य हो गया।
लाइट स्थिर हो गई।
हवा रुक गई।
खिड़की बंद हो गई।
लेकिन अनन्या जान चुकी थी—
यह कोई साधारण किताब नहीं थी।
और शायद...
उसकी जिंदगी अब पहले जैसी रहने वाली भी नहीं थी।
उसने डरते-डरते किताब को फिर खोला।
इस बार आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"कल रात बारह बजे मणिकर्णिका घाट पर आना..."
"अगर सच जानना है।"
अनन्या की आंखें फैल गईं।
उसने तुरंत किताब बंद कर दी।
लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार गूंज रहा था—
आखिर यह किताब उससे क्या चाहती है?
और वह लड़की कौन थी जो बार-बार उसे पुकार रही थी?
उसे नहीं पता था कि अगले चौबीस घंटे उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देने वाले थे।
और यह तो सिर्फ शुरुआत थी...
क्योंकि अधूरी किताब ने अपना नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया था।