अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 2 : मणिकर्णिका घाट का रहस्य
पूरी रात अनन्या की आँखों में नींद नहीं थी।
उसके सामने मेज़ पर रखी "अधूरी किताब" बंद पड़ी थी, लेकिन उसका मन बार-बार उसी की ओर जा रहा था।
आखिरी पन्ने पर लिखा संदेश अब भी उसके दिमाग में गूंज रहा था—
"कल रात बारह बजे मणिकर्णिका घाट पर आना... अगर सच जानना है।"
सुबह होते ही उसने खुद को समझाने की कोशिश की कि यह सब उसका भ्रम है।
लेकिन जब उसने किताब खोली, तो उसका दिल एक बार फिर दहल गया।
जहाँ कल रात संदेश लिखा था, वहाँ अब कुछ भी नहीं था।
पन्ना बिल्कुल खाली था।
मानो कभी कुछ लिखा ही न गया हो।
अनन्या ने घबराकर किताब बंद कर दी।
"यह कैसे हो सकता है?"
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
दिन भर वह विश्वविद्यालय में रही, लेकिन उसका ध्यान पढ़ाई में नहीं लगा।
बार-बार उसके दिमाग में वही सवाल घूम रहा था—
यह किताब उसके पास कैसे पहुँची?
तस्वीर वाली लड़की कौन थी?
और सबसे बड़ी बात...
क्या सचमुच उसे रात में मणिकर्णिका घाट जाना चाहिए?
शाम को उसने अपनी रूममेट पूजा को सारी बात बताई।
पहले तो पूजा हँसने लगी।
"तू बहुत हॉरर फिल्में देखती है।"
लेकिन जब अनन्या ने तस्वीर दिखाई, तो पूजा भी कुछ देर के लिए चुप हो गई।
"सच में..."
वह धीरे से बोली।
"यह लड़की बिल्कुल तेरी जैसी दिखती है।"
अनन्या ने गहरी साँस ली।
"मैं आज रात घाट जाऊँगी।"
"अकेले?"
"हाँ।"
"तू पागल हो गई है क्या?"
लेकिन इस बार अनन्या का फैसला अटल था।
उसे जवाब चाहिए थे।
रात के ग्यारह बजे।
वाराणसी की गलियाँ धीरे-धीरे सुनसान होने लगी थीं।
आसमान में बादल छाए हुए थे।
हवा में अजीब ठंडक थी।
अनन्या अपने बैग में अधूरी किताब रखकर हॉस्टल से निकल गई।
उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
हर कदम के साथ उसका डर बढ़ रहा था।
लेकिन वह रुकी नहीं।
करीब बारह बजे वह मणिकर्णिका घाट पहुँच गई।
रात के उस समय घाट का दृश्य बेहद डरावना लग रहा था।
कुछ दूर अंतिम संस्कार की चिताएँ जल रही थीं।
धुएँ की गंध हवा में घुली हुई थी।
गंगा का पानी काला दिखाई दे रहा था।
चारों तरफ ऐसा सन्नाटा था जैसे समय रुक गया हो।
अनन्या ने घड़ी देखी।
बारह बज चुके थे।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
"क्या मैं बेवकूफ बन रही हूँ?"
उसने खुद से कहा।
तभी...
उसके बैग के अंदर रखी किताब अचानक गर्म होने लगी।
वह चौंक गई।
उसने जल्दी से किताब बाहर निकाली।
किताब अपने आप खुल गई।
पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और फिर एक पन्ने पर आकर रुक गए।
उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"पीछे..."
अनन्या के हाथ काँप गए।
उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
और उसका खून जम गया।
कुछ दूरी पर एक लड़की खड़ी थी।
सफेद कपड़े।
लंबे खुले बाल।
बिल्कुल वही चेहरा...
जो तस्वीर में था।
और वही चेहरा...
जो अनन्या जैसा दिखता था।
"क... कौन हो तुम?"
अनन्या ने काँपती आवाज़ में पूछा।
लड़की कुछ नहीं बोली।
बस उसे देखती रही।
फिर उसने अपना हाथ उठाया और घाट की सीढ़ियों की ओर इशारा किया।
अनन्या का डर अब जिज्ञासा में बदलने लगा था।
वह धीरे-धीरे उसके पीछे चलने लगी।
घाट की सीढ़ियों के नीचे एक पुराना मंदिर था।
इतना पुराना कि अधिकांश लोगों को उसके बारे में पता भी नहीं था।
लड़की मंदिर के सामने जाकर रुक गई।
फिर अचानक गायब हो गई।
मानो वह कभी वहाँ थी ही नहीं।
"अरे!"
अनन्या घबरा गई।
उसने चारों ओर देखा।
कोई नहीं था।
तभी मंदिर का दरवाजा अपने आप खुल गया।
चीईईईं...
पुरानी लकड़ी की आवाज़ पूरे वातावरण में गूंज उठी।
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
लेकिन न जाने क्यों उसके कदम मंदिर के अंदर बढ़ गए।
अंदर घना अंधेरा था।
दीवारों पर पुरानी आकृतियाँ बनी हुई थीं।
मंदिर के बीचोंबीच एक पत्थर का चबूतरा था।
और उस पर एक लकड़ी का संदूक रखा था।
संदूक पर मोटी धूल जमी हुई थी।
ऐसा लग रहा था कि वर्षों से किसी ने उसे छुआ तक नहीं।
अनन्या धीरे-धीरे उसके पास गई।
जैसे ही उसने संदूक को हाथ लगाया...
अधूरी किताब चमकने लगी।
संदूक का ताला अपने आप टूट गया।
धड़ाम!
अनन्या डरकर पीछे हट गई।
फिर उसने हिम्मत करके संदूक खोला।
अंदर एक पुरानी डायरी थी।
डायरी के पहले पन्ने पर नाम लिखा था—
"आर्या"
अनन्या की आँखें फैल गईं।
यही नाम शायद उस लड़की का था।
उसने डायरी खोलकर पढ़ना शुरू किया।
पहली पंक्ति थी—
"अगर कोई यह डायरी पढ़ रहा है, तो समझो मैं मर चुकी हूँ..."
अनन्या की साँस रुक गई।
आगे लिखा था—
"मुझे इस किताब ने चुना था। बिल्कुल वैसे ही जैसे अब किसी और को चुना गया है।"
"अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो अगली शिकार तुम हो।"
अनन्या के हाथ काँपने लगे।
उसने तेजी से अगला पन्ना पलटा।
लेकिन तभी...
मंदिर के अंदर किसी के चलने की आवाज़ गूँज उठी।
ठक...
ठक...
ठक...
अनन्या ने सिर उठाया।
मंदिर के अंधेरे कोने में कोई खड़ा था।
एक आदमी।
काले कपड़ों में।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
"कौन है?"
अनन्या चिल्लाई।
कोई जवाब नहीं आया।
वह आकृति धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी।
ठक...
ठक...
ठक...
हर कदम के साथ वातावरण और ठंडा होता जा रहा था।
अनन्या घबराकर पीछे हटने लगी।
लेकिन तभी उसने देखा—
उस आदमी की आँखें पूरी तरह सफेद थीं।
बिना पुतलियों की।
मानो किसी मृत इंसान की आँखें हों।
अनन्या की चीख निकल गई।
उसने डायरी उठाई और भागने लगी।
लेकिन मंदिर का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
अब वह अंदर फँस चुकी थी।
उसकी साँसें तेज हो गईं।
काला साया लगातार उसकी ओर बढ़ रहा था।
तभी उसके हाथ में पकड़ी अधूरी किताब फिर चमकने लगी।
पन्ने अपने आप खुल गए।
और उनमें लाल अक्षरों में लिखा उभरने लगा—
"भागो..."
"अभी..."
उसी क्षण मंदिर की एक दीवार अचानक टूट गई।
जोरदार धमाके के साथ।
अनन्या ने मौका देखा और उसी रास्ते बाहर भाग गई।
पीछे से उस अजीब आदमी की डरावनी चीख सुनाई दे रही थी।
लेकिन उसने मुड़कर नहीं देखा।
वह लगातार दौड़ती रही।
दौड़ती रही।
दौड़ती रही।
जब तक कि वह घाट से बहुत दूर नहीं पहुँच गई।
करीब एक घंटे बाद।
वह हॉस्टल लौट चुकी थी।
उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
लेकिन अब उसके पास आर्या की डायरी थी।
और शायद...
कई सवालों के जवाब भी।
उसने काँपते हाथों से डायरी का आखिरी पन्ना खोला।
वहाँ सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"किताब कभी किसी को यूँ ही नहीं चुनती..."
"तुम्हारा संबंध उस कहानी से है, जिसे दुनिया भूल चुकी है।"
और उसके नीचे...
एक तस्वीर चिपकी हुई थी।
तस्वीर में एक छोटा बच्चा था।
लगभग पाँच साल का।
अनन्या तस्वीर को देखकर जम गई।
क्योंकि वह बच्चा कोई और नहीं...
बल्कि उसका अपना बचपन का फोटो था।
उसकी आँखों से डर साफ झलकने लगा।
अब यह सिर्फ एक रहस्यमयी किताब की कहानी नहीं थी।
अब यह उसकी अपनी कहानी बन चुकी थी।
और कहीं न कहीं...
उसका अतीत भी इस किताब से जुड़ा हुआ था।
क्रमशः...
अगले एपिसोड 3 में अनन्या अपने बचपन के रहस्य, आर्या की मौत और उस सफेद आँखों वाले आदमी की सच्चाई जानने की कोशिश करेगी।