50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 14 Priya Chaudhary द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 14

(फोन की लाइन पर एक अजीब सी 'Static' आवाज़—चर-चर की आवाज़। आर्यन कांपते हाथों से फोन पकड़े हुए है। बाहर बारिश रुक चुकी है, लेकिन सन्नाटा अब पहले से कहीं ज़्यादा भारी है।)
वह अज्ञात आवाज़ अभी भी फोन पर थी। "मिस्टर मल्होत्रा, आपको लगा कि सब कुछ सुलझ गया? आपको लगा कि पिताजी का झूठ ही सब कुछ था? लेकिन ज़रा सोचिए... उस रात की बारिश में, जब माया को धक्का लगा था, तब पिताजी तो हॉल में थे और समीर को आपने घर से बाहर निकाल दिया था। तो फिर, माया को सीढ़ियों से नीचे किसने धकेला?"
आर्यन की सांसें रुक गईं। उसका दिमाग पागलों की तरह पुरानी यादों के पन्ने पलटने लगा। समीर उसके बगल में खड़ा था, उसने भी वह आवाज़ सुनी थी। समीर का चेहरा पीला पड़ गया।
सीन 1: स्मृति की परतों में दफन सच
आर्यन ने फोन काट दिया, लेकिन वह सवाल उसके दिमाग में गूँज रहा था। "किसने? अगर वह मैं नहीं था, अगर वह समीर नहीं था, अगर वह पिताजी नहीं थे... तो कौन था?"
उसने अपनी यादों को फिर से कुरेदा। उसे याद आया—वह रात। माया उससे बहस कर रही थी। उसने माया को धक्का देने के लिए हाथ उठाया था, लेकिन जैसे ही उसने उसे छुआ, माया का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों के किनारे पर आ गई थी। लेकिन तभी... तभी किसी और का हाथ उसकी कमर पर लगा था। आर्यन को लगा था कि वह उसका अपना हाथ है, लेकिन अब उसे याद आ रहा था—उस हाथ में एक अंगूठी थी। एक नीलम वाली अंगूठी!
आर्यन की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह अंगूठी किसकी थी? वह अंगूठी 'आयशा' की माँ (आर्यन की सेक्रेटरी और पार्टनर) की थी।
सीन 2: 38वां दिन—जाल में फँसा शिकार
"आयशा की माँ..." आर्यन बुदबुदाया।
समीर ने उसका कंधा हिलाया। "आर्यन, क्या हुआ? तुम किसके बारे में सोच रहे हो?"
"समीर, वो कोई और था! वह रंजना थी! रंजना ने माया को धक्का दिया था!"
समीर हैरान रह गया। रंजना, जो बीस साल पहले आर्यन की सबसे भरोसेमंद सेक्रेटरी थी, जिसने खुद आयशा को अनाथालय से गोद लेने में मदद की थी। रंजना, जिसे आर्यन ने माया की मौत के बाद सबसे ज़्यादा पैसा दिया था ताकि वह अपना मुंह बंद रखे।
आर्यन को एहसास हुआ कि रंजना ने उसे हमेशा से अपना मोहरा बनाया था। वह सिर्फ समीर को ही नहीं, बल्कि खुद आर्यन को भी फँसाकर सारा बिज़नेस अपने नाम करना चाहती थी। आयशा को गोद लेने का विचार भी रंजना का ही था, ताकि वह आर्यन को हमेशा के लिए अपनी उंगलियों पर नचा सके।
सीन 3: रंजना का असली चेहरा
आर्यन और समीर बिना एक पल गँवाए उस पुराने ऑफिस की तरफ निकले, जहाँ रंजना अब भी फाइलों का काम संभालती थी। रंजना का ऑफिस अब एक जर्जर गोदाम में तब्दील हो चुका था, जो शहर के बाहरी इलाके में था।
जब वे वहां पहुँचे, तो ऑफिस का दरवाज़ा खुला था। अंदर रंजना बैठी थी, एक पुराने रिकाॅर्ड प्लेयर पर वही पुराना गाना बज रहा था जो माया अक्सर गुनगुनाया करती थी। रंजना ने उन्हें देखकर एक ठंडी मुस्कान दी।
"तुम देर से आए, आर्यन। मुझे लगा था कि तुम इस 'सन्नाटे' में इतने खो जाओगे कि कभी बाहर ही नहीं निकलोगे।"
"तुमने क्यों किया, रंजना?" आर्यन दहाड़ा। "माया ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? और तुमने हमें क्यों लड़ाया?"
रंजना अपनी कुर्सी से उठी। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था, बस एक नफरत की आग थी। "माया इस पूरे साम्राज्य की वारिस बनने वाली थी। तुम तो बस एक मामूली मैनेजर थे। मैंने तुम्हें प्यार का नाटक करके इस हवेली में फँसाया। माया की मौत एक दुर्घटना नहीं, मेरा मास्टरप्लान था ताकि तुम खुद को कातिल समझो और पूरी ज़िंदगी अपराधबोध में जियो। ताकि मैं तुम्हारा पूरा पैसा धीरे-धीरे अपने खाते में डाल सकूँ।"
सीन 4: 38वां दिन—आर्यन का आखिरी दांव
आर्यन का खून खौल उठा। उसने रंजना की तरफ कदम बढ़ाया, लेकिन रंजना ने एक रिवॉल्वर निकाल ली।
"पीछे हटो, आर्यन! आज इस सन्नाटे को मैं हमेशा के लिए खत्म कर दूँगी। तुम दोनों भाई जेल जाने की बात कर रहे थे ना? तो फिर मर कर ही चले जाओ!"
समीर ने आर्यन को धक्का देकर एक मेज के पीछे कर दिया। गोली चली, जो मेज के लकड़ी के टुकड़े को उड़ा ले गई। आर्यन ने देखा कि रंजना का ध्यान बंटा हुआ है। उसने पास पड़े एक भारी पेपरवेट को उठाया और रंजना के हाथ पर दे मारा।
रिवॉल्वर दूर जा गिरी। समीर ने तुरंत रंजना को काबू कर लिया।
सीन 5: सच की जीत और सज़ा
पुलिस को फोन किया गया। आर्यन ने इस बार पुलिस को सिर्फ रंजना का गुनाह नहीं बताया, बल्कि रंजना के उन तमाम खातों का ब्यौरा भी दिया जो उसने पिछले बीस सालों में आर्यन के नाम पर फर्जी तरीके से खोले थे।
रंजना को पुलिस ले गई। उसके चेहरे पर जो हार का मंज़र था, वह आर्यन के लिए बीस साल के सन्नाटे का सबसे बड़ा जवाब था।
सीन 6: 38 दिन बीत गए—क्या सन्नाटा खत्म हुआ?
हॉल में अब सन्नाटा नहीं था। वहां पुलिस की गाड़ियों के सायरन थे, लोगों की हलचल थी। समीर ने आर्यन के हाथ में हाथ डाला।
"आर्यन, हम जीत गए। तुमने रंजना को हरा दिया।"
लेकिन आर्यन का मन अभी भी अशांत था। उसने रंजना को फँसा दिया, उसने अपना सच कबूल कर लिया, उसने अपनी हवेली छोड़ दी। लेकिन क्या माया वापस आ सकती थी? क्या वे बीस साल वापस आ सकते थे जो उन्होंने नफरत में बिताए थे?
आर्यन ने अपनी नोटबुक निकाली। 38 दिन बीत चुके थे। 12 दिन अभी भी बाकी थे।
उसने लिखा: "सच्चाई ने रंजना को सलाखों के पीछे भेज दिया, लेकिन मेरे अंदर का सन्नाटा अभी भी कह रहा है—इंसाफ तो हो गया, पर शांति कहां है?"
नैरेटर: 38 दिन शेष हैं। आर्यन को रंजना का सच तो मिल गया, लेकिन अभी भी एक ऐसी चीज़ बाकी है जिसे आर्यन ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। रंजना ने कहा था कि उसने ही आयशा को गोद लेने का नाटक रचा था। इसका मतलब है कि आयशा... क्या आयशा वाकई रंजना की बेटी है, या वह सच में किसी और की औलाद है?
(सस्पेंस पॉइंट: फोन पर फिर से वही अज्ञात आवाज़ आई—"बधाई हो आर्यन, रंजना तो एक प्यादा थी। असली खेल तो अब शुरू होगा। आयशा के कमरे की वो दराज देखो, जिसमें तुम कभी ताला नहीं लगाते थे। वहां एक DNA रिपोर्ट रखी है। वो रिपोर्ट रंजना की नहीं, तुम्हारी है। क्या तुम सच में तैयार हो यह जानने के लिए कि आयशा किसकी बेटी है?")
लेखक: प्रिया
आर्यन अब उस सबसे बड़े राज़ के करीब है जो उसकी पूरी ज़िंदगी की नींव को हिला देगा। आयशा कौन है? सस्पेंस जारी है...