50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 3 Priya Chaudhary द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 3

साउंड इफेक्ट: कालकोठरी का भारी लोहे का दरवाज़ा बंद होने की गूंज। आर्यन की भारी साँसें और अंधेरे में किसी के चलने की धीमी आहट।)
कालकोठरी का वह भारी दरवाज़ा बंद होते ही आर्यन के अंदर का डर और गहरा गया। बाहर की दुनिया से उसका संपर्क पूरी तरह कट चुका था। उसने अपनी टॉर्च की रोशनी चारों तरफ घुमाई, लेकिन कालकोठरी की सीलन भरी दीवारें उसे किसी पिंजरे की तरह घेर रही थीं।
"कौन है वहाँ? सामने आओ!" आर्यन की आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस आ रही थी।
अंधेरे में एक ठंडी हँसी गूँजी—वही हँसी, जो किसी पुरानी यादों के मलबे से निकलकर आई हो। तभी, आर्यन को अपने पैरों के पास कुछ महसूस हुआ। उसने टॉर्च नीचे की, तो देखा—वहाँ ज़मीन पर मिट्टी की एक ताज़ा परत थी और उस पर एक पुराना, फटा हुआ फोटोग्राफ पड़ा था।
सीन 1: फोटो का रहस्य
आर्यन ने कांपते हाथों से फोटो उठाई। उसमें वह खुद था, इंस्पेक्टर कबीर था, और माया थी। तीनों एक साथ खड़े थे, और उनके पीछे वही हवेली थी जो आज खंडहर हो चुकी थी। फोटो के पीछे खून से लिखा था: "तुमने कबीर को अपना साथी समझा, लेकिन वो तुम्हारा सबसे पुराना दुश्मन है।"
आर्यन का दिमाग सुन्न हो गया। कबीर? वह इंस्पेक्टर जो उसे सालों से तंग कर रहा था, वह कोई और नहीं बल्कि माया का भाई था, जिसके बारे में आर्यन को कभी पता ही नहीं चला था। कबीर का यह पूरा खेल सिर्फ आर्यन की हवेली की तलाशी नहीं था, बल्कि यह उसका निजी बदला था।
(साउंड इफेक्ट: कालकोठरी के कोने से धीरे-धीरे कदमों की आवाज़ पास आ रही है।)
आर्यन ने टॉर्च की रोशनी उस दिशा में घुमाई, लेकिन वहां कोई नहीं था। उसे लगा कि वह पागल हो रहा है। तभी, दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक फिर से शुरू हुई—लेकिन यह आवाज़ किसी घड़ी की नहीं, बल्कि किसी इंसान के दिल की धड़कन की थी, जो दीवार के पीछे से आ रही थी।
सीन 2: कालकोठरी की दूसरी दीवार
आर्यन ने दीवार पर लगी मिट्टी को हटाना शुरू किया। वह मिट्टी बहुत नरम थी। उसने अपने हाथों से खोदना शुरू किया। थोड़ी ही खुदाई के बाद, उसे एक और लोहे का दरवाज़ा मिला। यह कालकोठरी के भीतरी हिस्से की ओर ले जाता था।
जैसे ही उसने वह दरवाज़ा खोला, उसके सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कोई कालकोठरी नहीं, बल्कि एक छोटा सा कमरा था—बिल्कुल आयशा के बेडरूम जैसा। दीवार पर आयशा की बचपन की तस्वीरें थीं, और सबसे हैरान कर देने वाली बात थी—वहाँ एक पुराना रिकॉर्ड प्लेयर चल रहा था, जिस पर आयशा की आवाज़ में एक लोरी बज रही थी।
"आयशा? तुम यहाँ क्या कर रही हो?" आर्यन चिल्लाया।
लेकिन वहाँ आयशा नहीं थी। वहाँ एक आईना था, और आईने में उसे अपना नहीं, बल्कि माया का चेहरा दिख रहा था। आईने के दूसरी तरफ से किसी ने अपना हाथ बाहर निकाला और आर्यन का गला पकड़ लिया।
सीन 3: कबीर का सच
तभी, कालकोठरी का मुख्य दरवाज़ा खुला। कबीर अंदर दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक टॉर्च और एक फाइल थी।
"बहुत जल्दी राज़ खुल रहे हैं, आर्यन," कबीर ने ठंडे लहजे में कहा। उसने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली और जलाई। "मैंने सोचा था तुम थोड़ा और वक्त लोगे। लेकिन लगता है, 20 साल का बोझ अब भारी पड़ने लगा है।"
"तुमने मुझे यहाँ क्यों बंद किया है?" आर्यन ने दहाड़ते हुए पूछा।
"बंद? मैंने नहीं, आर्यन। तुम तो खुद इस कालकोठरी में बंधे हो।" कबीर ने फाइल खोली और उसे आर्यन के सामने फेंक दिया। "ये आयशा के असली कागजात हैं। क्या तुम्हें सच में लगता था कि तुम एक मासूम को गोद लेकर अपने सारे पाप धो लोगे? आयशा... माया की बेटी है, और मेरी बहन की मौत का इंतकाम अब उसी के हाथों पूरा होगा।"
आर्यन के होश उड़ गए। आयशा माया की बेटी थी? वह जिसे वह अपनी बेटी मानता था, वह असल में उसके सबसे बड़े दुश्मन की वारिस थी?
(साउंड इफेक्ट: बाहर तेज बारिश की आवाज और बिजली कड़कने से पूरी हवेली दहल गई।)
तभी, हवेली के ऊपरी हिस्से से आयशा की चीख सुनाई दी। आर्यन ने चौंककर ऊपर की तरफ देखा।
"आयशा!"
नैरेटर: 48 दिन बचे हैं। आर्यन को पता चल चुका है कि खेल कितना बड़ा है। लेकिन सवाल यह है—अगर आयशा ऊपर हवेली में है, तो उसे यहाँ कौन लाया? और कबीर के साथ कौन सा तीसरा शख्स है जो अंधेरे में आर्यन को देख रहा है?
( कबीर जब मुड़ा, तो उसकी जैकेट के पीछे एक अजीब सा निशान था—वही निशान जो आर्यन ने अपनी डायरी में 'माया की मौत' के वक्त देखा था। क्या कबीर उस रात वहां मौजूद था?)