(भारी लोहे के दरवाज़े के खुलने की कर्कश आवाज़। जेल के गलियारे में कैदियों के फुसफुसाने और हथकड़ियों के टकराने की गूँज। आर्यन के कदमों की आवाज़ जो फर्श पर किसी अजनबी की तरह पड़ रही है।)आर्यन ने कांपते हाथों से वह पुलिस की वर्दी पहनी। वह वर्दी उसके लिए सिर्फ कपड़े नहीं थे, बल्कि उस बीस साल पुराने पाप का आईना थी, जिसे पहनकर उसने समीर की ज़िंदगी तबाह की थी। समीर उसके सामने खड़ा था, उसकी वर्दी पर अब एक कैदी का नंबर '420' लिखा था—वही नंबर जो बीस साल पहले समीर को दिया गया था।
सीन 1: जेल की नई दुनिया
समीर ने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा, उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि आर्यन का दिल दहल गया। "आज तुम रक्षक नहीं, रक्षक का मुखौटा पहने एक अपराधी हो, आर्यन। इस गलियारे में चलो, जहाँ मैंने बीस साल अपनी जवानी के आखिरी दिन काटे थे।"
आर्यन ने जब जेल के मुख्य गलियारे में प्रवेश किया, तो वहां का मंज़र देखकर उसकी रूह कांप गई। हर सलाख के पीछे कोई न कोई खड़ा था। ये वे लोग नहीं थे जिन्हें आर्यन ने जेल भेजा था, बल्कि ये उसके वे 'कर्म' थे जो अब सजीव हो उठे थे। किसी की आँखें फूटी थीं, किसी के चेहरे पर घाव थे—वे सब आर्यन के बिज़नेस के शिकार थे।
"सबके सब... ये सब मुझे ही देख रहे हैं," आर्यन ने हकलाते हुए कहा।
समीर ने उसके कान में कहा, "नहीं, वे तुम्हें नहीं देख रहे, वे उस वर्दी को देख रहे हैं जो तुमने पहनी है। तुमने इसी वर्दी की आड़ में न जाने कितनों की ज़िंदगी नर्क बनाई थी। आज, वे तुमसे उसी शक्ति का हिसाब मांगेंगे।"
सीन 2: 41वां दिन—पहरेदार का अपराधबोध
जेल के गार्ड्स ने आर्यन को 'ड्यूटी गार्ड' की जगह खड़ा कर दिया। उसके हाथ में एक डंडा था, वही डंडा जो कभी समीर को पीटने के लिए इस्तेमाल किया गया था। अचानक, जेल का अलार्म बज उठा। कैदियों का एक समूह आगे आया। उनमें वही लोग थे जिन्हें आर्यन ने सबसे अधिक प्रताड़ित किया था।
"आज हमारी बारी है, मिस्टर मल्होत्रा," एक कैदी ने कहा, जिसकी आवाज़ बिल्कुल उस पार्टनर जैसी थी जिसे आर्यन ने सुसाइड के लिए मजबूर किया था।
वे सब धीरे-धीरे आर्यन की तरफ बढ़े। आर्यन पीछे हटा, लेकिन जेल की दीवारें उसे और आगे धकेल रही थीं। वह अपनी जान बचाने के लिए भागने लगा। वह जेल के उस हिस्से में पहुँचा जहाँ 'सोलिटरी कन्फाइनमेंट' (अकेली कोठरी) थी। वहाँ कोई नहीं था, बस एक कुर्सी पड़ी थी।
सीन 3: कोठरी में आत्म-मंथन
आर्यन उस कोठरी के अंदर घुस गया और दरवाज़ा बंद कर लिया। उसने अपनी आँखों को कसकर बंद कर लिया। "ये सब भ्रम है! समीर, तुम मुझे मार दो, पर यह तमाशा बंद करो!"
तभी, उसे एक आवाज़ सुनाई दी। वह समीर की आवाज़ नहीं थी, वह उसकी खुद की आवाज़ थी, लेकिन वह किसी छोटे बच्चे की तरह लग रही थी। "पापा... क्या आप कभी मुझे बाहर निकालोगे?" यह आयशा की आवाज़ थी, जो अब उसकी यादों में एक छोटे बच्चे की तरह कैद थी।
आर्यन ने दरवाज़ा खोला। वहाँ कोई कैदी नहीं थे, सिर्फ एक छोटी सी गुड़िया पड़ी थी—वही गुड़िया जो आयशा को बचपन में सबसे प्रिय थी। आर्यन ने उसे उठाया, तो उसमें से एक आवाज़ आई: "पापा, आपने तो मुझे भी उस हवेली में कैद कर दिया था, जहाँ से मैं कभी बाहर नहीं आ सकी।"
आर्यन के हाथों से डंडा छूट गया। उसने वर्दी के बटन खोलकर उसे उतार फेंका। "मैं अब और नहीं सह सकता! मुझे सज़ा दो! मुझे यहाँ से ले जाओ!"
सीन 4: समीर का आखिरी इम्तिहान
तभी, समीर कोठरी में दाखिल हुआ। उसने आर्यन के सामने एक कागज़ का टुकड़ा फेंका। "यह तुम्हारी सज़ा का परवाना नहीं है, आर्यन। यह तुम्हारी आज़ादी का मौका है। अगर तुम सच में प्रायश्चित करना चाहते हो, तो तुम्हें कल सुबह होने वाली 'पेरोल' सुनवाई (parole hearing) में खुद को दोषी घोषित करना होगा। तुम्हें उस अदालत में जाना होगा जहाँ तुमने बीस साल पहले मेरे खिलाफ गवाही दी थी।"
आर्यन ने कागज़ देखा। उस पर उसके अपने नकली हस्ताक्षर थे।
"लेकिन अगर मैंने खुद को दोषी माना, तो मुझे उम्रकैद हो जाएगी," आर्यन ने फुसफुसाते हुए कहा।
समीर ने ठंडी मुस्कान के साथ कहा, "उम्रकैद तो तुम बीस साल पहले ही पा चुके हो, आर्यन। अब बस उसे स्वीकार करने की बारी है।"
सीन 5: 41वां दिन पूरा
आर्यन पूरी रात उस कोठरी में बैठा रहा। उसने बाहर की सलाखों से सुबह की पहली किरण देखी। उसके पास अब केवल 8 दिन बचे थे। उसने अपनी नोटबुक में 41वां पन्ना पलटा और लिखा: "वर्दी उतार दी है, अब सच पहनने की बारी है। अदालत मेरा आखिरी मंच होगा।"
उसने कागज़ को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया। सुबह होते ही जेल का सायरन बजा। आर्यन उठा और दरवाज़े की तरफ चल दिया। उसके चेहरे पर अब डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी शांति थी जो उसके लिए नई थी।
नैरेटर: 41 दिन शेष। आर्यन ने प्रायश्चित की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। क्या वह अदालत में खड़ा होकर अपनी ही बिछाई बिसात को उखाड़ पाएगा? क्या न्यायाधीश उसके 'कबूलनामे' को स्वीकार करेंगे, या बीस साल की झूठ की नींव इतनी मजबूत है कि वह उसे तोड़ने नहीं देगी?
(सस्पेंस पॉइंट: अदालत की दहलीज पर खड़ा आर्यन जैसे ही अंदर जाने लगा, उसे सामने वही 'जज' दिखा, जो बीस साल पहले समीर को सज़ा सुनाने वाला था। जज ने आर्यन को देखकर एक रहस्यमयी मुस्कान दी। "मिस्टर मल्होत्रा, आज हम बीस साल पुराने एक केस को फिर से खोल रहे हैं। क्या आप तैयार हैं?" आर्यन ने सिर हिलाया, लेकिन तभी जज ने कहा—"पर याद रखना, यहाँ कानून नहीं, तुम्हारी अंतरात्मा का फैसला होगा।")
लेखक: प्रिया