50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 13 Priya Chaudhary द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 13

(सुरंग के अंदर टपकते पानी की आवाज़, गूँजते हुए कदमों की आहट और एक भारी, ठंडी हवा का झोंका जो आर्यन के चेहरे को छूता है। आर्यन की सांसें भारी हैं, लेकिन उसके मन में अब एक अजीब सी शांति है।)
वह सुरंग उस जेल की कोठरी से निकलकर सीधे उस जगह ले जा रही थी, जो कभी उसकी 'हवेली' का बेसमेंट हुआ करती थी। सुरंग की दीवारें कच्ची मिट्टी की थीं, जो हर कदम पर धंसने का एहसास दे रही थीं। आर्यन का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, लेकिन वह डर के मारे नहीं, बल्कि इस उत्सुकता में कि बीस साल पहले उसने जो 'अंधेरा' अपने हाथों से बुना था, वह आज कैसा दिखता है।
सीन 1: सुरंग का अंत और बीता हुआ कल
टनल के अंत में उसे वही पुरानी सीढ़ियाँ दिखाई दीं। ये सीढ़ियाँ उसे उसके ही हवेली के उस तहखाने में ले गईं, जिसे उसने दुनिया की नज़रों से बचाने के लिए कंक्रीट से ढंक दिया था। यहाँ की हवा में अब भी पुरानी सिगार और उस महँगी परफ्यूम की गंध थी, जो कभी आर्यन के व्यक्तित्व का हिस्सा हुआ करती थी।
सामने वह 'अंतिम अलमारी' खड़ी थी। बीस साल पहले वह लकड़ी की थी, लेकिन अब उस पर जंग और धूल की ऐसी परत जम चुकी थी कि वह किसी पत्थर के ढाँचे जैसी लग रही थी। आर्यन के हाथ में वह पुरानी चाबी थी, जो अब चमक रही थी, जैसे वह भी इस क्षण का इंतज़ार कर रही हो।
सीन 2: 39वां दिन—खुलता हुआ रहस्य
आर्यन ने चाबी लगाई। खट... ताला खुल गया।
जैसे ही दरवाज़ा खुला, उसके अंदर से कोई डरावनी चीज़ नहीं, बल्कि एक पुराने प्रोजेक्टर और कुछ फाइलों का ढेर निकला। आर्यन ने प्रोजेक्टर चालू किया। दीवार पर एक फिल्म चलने लगी—यह उस रात की रिकॉर्डिंग थी, जिस रात माया की मौत हुई थी।
लेकिन फिल्म देखते ही आर्यन के होश उड़ गए। उसने जो देखा, वह उसकी यादों से बिल्कुल अलग था। स्क्रीन पर वह नहीं, बल्कि उसके पिता की आवाज़ सुनाई दे रही थी। फिल्म में उसके पिता माया से कह रहे थे, "माया, आर्यन को कभी मत बताना कि यह प्रॉपर्टी तुम्हारी नहीं, बल्कि समीर के नाम पर है। उसे यह लगता रहे कि वह मालिक है, तभी वह इसे बचाएगा।"
आर्यन सन्न रह गया। उसका पूरा 'लालच' एक ऐसे झूठ पर आधारित था जो उसे उसके पिता ने परोसा था। उसे लगा था कि वह अपनी मर्ज़ी से कातिल बना है, जबकि हकीकत में वह एक कठपुतली था जिसे उसके पिता ने समीर के खिलाफ खड़ा किया था।
सीन 3: सच की कड़वाहट
उसका पूरा साम्राज्य, उसकी पूरी हवेली, यहाँ तक कि उसका समीर से झगड़ा—सब एक रची-बुनी साज़िश थी। समीर को कभी जेल नहीं जाना चाहिए था, और माया को कभी नहीं मरना चाहिए था, अगर उसके पिता ने उसे यह सच बता दिया होता।
आर्यन ज़मीन पर बैठ गया। वह फूट-फूट कर रोने लगा। "पिताजी! आपने मुझे क्या बना दिया? मैं कातिल था, मैं चोर था, लेकिन मैं आपसे नफरत करता था कि मैंने ये सब किया... और अब मुझे पता चल रहा है कि मैं सिर्फ एक मोहरा था!"
सीन 4: समीर का आगमन
तभी, सुरंग के अंधेरे से एक परछाई बाहर आई। यह समीर था। लेकिन इस बार वह कोई भूत नहीं था। वह असल में समीर था—बीस साल की उम्र के साथ, वह समीर जो कभी जेल नहीं गया था, क्योंकि उसे पहले ही कहीं और शिफ्ट कर दिया गया था।
"आर्यन," समीर ने कहा। उसकी आवाज़ में नफरत की जगह एक गहरा दुख था। "पिताजी ने हम दोनों को बर्बाद किया। मुझे तुमसे दूर रखा गया ताकि मैं तुम्हें कभी सच न बता सकूँ, और तुम्हें मेरे खिलाफ भड़काया गया ताकि तुम हवेली संभालो।"
आर्यन ने समीर की ओर देखा। "तुम यहाँ कैसे? मैंने तो तुम्हें..."
समीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा, आर्यन। मैं इन बीस सालों में तुम्हारी हर हरकत पर नज़र रख रहा था। मैं वह था जो रात को हवेली में आकर सन्नाटा पैदा करता था, ताकि तुम खुद अपना सच उगल सको। मैंने ही वो 'कबीर' का किरदार तुम्हारे दिमाग में डाला था।"
सीन 5: 39वां दिन—प्रायश्चित का अंतिम रूप
आर्यन को समझ आ गया। सन्नाटा कोई भूत नहीं था, समीर की योजना थी। वह समीर जो अब एक सफल लेकिन टूटे हुए इंसान के रूप में उसके सामने खड़ा था।
"समीर, मुझे माफ़ कर दो," आर्यन ने कहा।
समीर ने अपना हाथ बढ़ाया। "माफ़ी की ज़रूरत नहीं है, भाई। ज़रूरत है इस हवेली के झूठ को पूरी तरह ख़त्म करने की। ये फाइल्स देखो—ये वो दस्तावेज़ हैं जो बताते हैं कि इस प्रॉपर्टी का असली वारिस कौन है। हमें इसे सरकारी स्कूल या अस्पताल के लिए दान करना होगा। वही हमारा असली प्रायश्चित होगा।"
सीन 6: नए सवेरे की शुरुआत
आर्यन ने उन फाइलों को उठाया। उसने अब खुद को हल्का महसूस किया। तहखाना अब अंधेरा नहीं था, वहाँ से ऊपर की तरफ एक रास्ता दिखाई दे रहा था।
"चलो," आर्यन ने कहा।
समीर ने उसके साथ कदम बढ़ाया। जैसे ही वे दोनों बाहर निकले, तहखाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। ऊपर सूरज की पहली किरण आर्यन के चेहरे पर पड़ी। वह अब वह आर्यन नहीं था जो 40 दिन पहले हवेली में घुसा था। वह एक ऐसा इंसान था जिसने अपना अतीत जीत लिया था।
नैरेटर: 39 दिन शेष हैं। आर्यन का सच अब कागज़ों पर है। सन्नाटा अब खत्म हो चुका है, क्योंकि सच सामने आ चुका है। क्या समीर और आर्यन मिलकर उस विरासत को सही जगह पहुँचा पाएंगे जिसे उन्होंने झूठ से खड़ा किया था?
(सस्पेंस पॉइंट: जैसे ही आर्यन ने जेल के अधिकारियों को वे दस्तावेज़ सौंपने के लिए फोन उठाया, फोन पर एक अज्ञात आवाज़ आई—"मिस्टर मल्होत्रा, आप अपना प्रायश्चित कर रहे हैं, अच्छी बात है। लेकिन उस प्रॉपर्टी के अलावा एक और राज़ है जो अभी भी दफन है। क्या आप जानते हैं कि माया की मौत का असली ज़िम्मेदार कौन था? पिता ने तो सिर्फ झूठ बोला था, लेकिन माया को धक्का किसने दिया था?")
लेखक: प्रिया
आर्यन को लगा था कि उसने सब जान लिया, लेकिन एक राज़ अभी भी बाकी है। माया की मौत का असली कातिल कौन? अगला एपिसोड... सस्पेंस की आग और भी तेज़ करेगा!