(एक अजीब सी गूँज, जैसे हज़ारों लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों। आईने के कमरों में टकराती हुई आर्यन की अपनी ही चीखें। हर तरफ से आ रही 'हंसने' की आवाज़ें जो किसी डरावने मेले का एहसास दिला रही हैं।)आर्यन उस कमरे में अकेला था, जहाँ चारों तरफ सिर्फ आईने ही आईने थे। हज़ारों 'आर्यन' उसे घूर रहे थे। कोई आर्यन रो रहा था, कोई मुस्कुरा रहा था, तो कोई क्रूरता से उसे ललकार रहा था। यह कोई काल्पनिक जगह नहीं थी, यह आर्यन के उस मन की गहराई थी जिसे उसने दशकों तक 'सफलता' के मुखौटों के नीचे छिपा रखा था।
सीन 1: अहंकारी अक्स का हमला
तभी, आईनों में से एक आर्यन, जिसने सबसे महंगे सूट पहन रखे थे और जिसके चेहरे पर आर्यन का 'कॉर्पोरेट' अहंकार था, बाहर निकल आया। उसने आर्यन के गले को अपने हाथों से जकड़ लिया।
"तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!" उस अहंकार वाले अक्स ने दहाड़ते हुए कहा। "मैंने ही तुम्हें वह मुकाम दिलाया था। मैंने ही तुम्हें सिखाया था कि दुनिया को कैसे नचाना है। तुम आज जो कुछ भी हो—वो मेरी वजह से हो। अगर तुम मुझे मारोगे, तो तुम खुद को भी मिटा दोगे!"
आर्यन के पास सांस लेने की जगह नहीं थी। उसका चेहरा नीला पड़ने लगा था। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस अक्स को आईने पर दे मारा। खटाक! आईना टूटा, लेकिन कोई खून नहीं निकला, बस हज़ारों कांच के टुकड़े हवा में तैरने लगे।
सीन 2: 42वां दिन—दर्द की गूँज
आर्यन ज़मीन पर गिर पड़ा। अब उसके सामने एक और आर्यन आया—यह वह आर्यन था जिसे उसने समीर की गेंद चुराते वक्त महसूस किया था। वह बच्चा अब बड़ा हो चुका था और उसकी आँखों में वह मासूमियत थी जिसे आर्यन ने बीस साल पहले मार दिया था।
"तुमने गेंद क्यों चुराई, आर्यन?" उस मासूम अक्स ने शांत स्वर में पूछा।
"क्योंकि... क्योंकि मुझे भी वो चाहिए था जो तुम्हारे पास था," आर्यन ने कांपते हुए कहा।
"नहीं," मासूम अक्स ने सिर हिलाया। "तुम्हें वह नहीं चाहिए था। तुम्हें सिर्फ समीर को दुखी देखना था। तुम्हें दूसरों का नुकसान देखकर खुशी मिलती थी। क्या यह सच नहीं है?"
आर्यन के कानों में वह हँसी गूँजने लगी जो उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में दूसरों का मज़ाक उड़ाते हुए की थी। वह बच्चा अब धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था और वह एक 'शैतान' का रूप ले रहा था। यह सच आर्यन की रगों में ज़हर की तरह दौड़ रहा था।
सीन 3: चेहरों का महायुद्ध
अचानक, कमरे के सभी आईने एक साथ टूट गए। हज़ारों आर्यन बाहर आ गए। वे सब के सब एक साथ आर्यन पर टूट पड़े। कोई उसे अपनी 'लालच' की दास्तां सुना रहा था, तो कोई 'धोखे' के पन्ने पलट रहा था। कमरा अब एक युद्ध का मैदान बन चुका था। आर्यन उन हज़ारों परछाइयों के बीच एक नन्हा सा इंसान लग रहा था।
"मैं कौन हूँ?" आर्यन चीखा। "मैं इनमें से कौन सा हूँ?"
किसी ने जवाब नहीं दिया, बस सबने एक साथ कहा—"तुम सब कुछ हो, और तुम कुछ भी नहीं हो!"
आर्यन ने घुटने टेक दिए। उसे समझ आ गया कि वह उन सभी कालों का योग (sum) है। उसके अंदर का 'अपराधी' और 'सफल इंसान' अलग-अलग नहीं थे, वे एक ही थे। उसने एक लंबी सांस ली। उसने उन सब पर हमला करने के बजाय, अपनी आँखें बंद कर लीं।
सीन 4: शून्यता का स्वीकार
जब उसने आँखें बंद कीं, तो उसे सब शांत लगने लगा। उसने अपने अंदर की उन तमाम आवाज़ों को सुनना बंद कर दिया और सिर्फ उस सन्नाटे को महसूस किया जो उसके चारों तरफ था।
"अगर मैं ही तुम सब हूँ, तो मैं तुम्हें मिटा सकता हूँ," आर्यन ने फुसफुसाते हुए कहा।
उसने अपनी जेब से वह 'कागज की बनी चाबी' निकाली। उसने उस चाबी को अपने सीने पर रखा। उसने महसूस किया कि वह चाबी उसके दिल के अंदर समा गई है। एक तेज़ रोशनी कमरे में फैली। हज़ारों अक्स गायब होने लगे। कमरा अब फिर से वही सफेद कमरा था।
सीन 5: नर्स का रहस्य
वह नर्स फिर से वापस आई। इस बार उसके हाथ में कोई दवा नहीं, बल्कि एक फाइल थी।
"मिस्टर मल्होत्रा, आज 42वां दिन है। आपने आज अपनी परछाइयों से युद्ध जीत लिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगला कदम क्या है?"
आर्यन ने अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखों में अब एक अजीब सी चमक थी—न लालच की, न डर की।
"अगला कदम... सच का सामना करना है, नर्स।"
नर्स मुस्कुराई। उसका चेहरा अब वैसा नहीं था जैसा था। वह धीरे-धीरे माया का रूप लेने लगी।
"माया?" आर्यन ने चौंककर पूछा।
"मैं माया नहीं हूँ, आर्यन। मैं वह 'ज़मीर' (Conscience) हूँ जिसे तुमने बीस साल तक अपनी हवेली की नींव में दफन रखा था। मैं तो बस यहाँ तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी कि तुम कब खुद से नफरत करना छोड़ोगे और खुद को स्वीकार करोगे।"
सीन 6: 42वां दिन—अंतिम सात दिन
आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा। अब वहाँ कोई बगीचा नहीं था। वहाँ शहर की वही जेल थी, जहाँ उसका भाई समीर कभी बंद था। उसे अब हकीकत समझ आ रही थी। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक 'स्व-निर्मित जेल' में बिताई थी।
"मुझे क्या करना होगा?" आर्यन ने पूछा।
"अगले 7 दिनों में," नर्स/ज़मीर ने कहा, "तुम्हें उस जेल में वापस जाना होगा, लेकिन इस बार एक कैदी के तौर पर नहीं, बल्कि एक 'इंसान' के तौर पर। तुम्हें हर उस इंसान से माफ़ी माँगनी होगी जिसे तुमने मिटाया था।"
आर्यन खड़ा हुआ। उसके अंदर का वह 'अहंकारी अक्स' मर चुका था। उसने अपनी नोटबुक ली। अब केवल 8 पन्ने बचे थे। उसने 43वां पन्ना पलटा और लिखा: "युद्ध खत्म हुआ। अब प्रायश्चित की शुरुआत है।"
नैरेटर: 42 दिन बीत चुके हैं। आर्यन ने अपनी ही परछाइयों को हरा दिया है। लेकिन क्या असली दुनिया में माफ़ी मिलना इतना आसान है? क्या समीर की रूह उसे माफ करेगी? क्या आयशा कभी उसे बाप के रूप में देख पाएगी?
(सस्पेंस पॉइंट: आर्यन जैसे ही कमरे से बाहर निकला, उसने देखा कि जेल के गलियारे में उसके सामने खुद समीर खड़ा था। समीर ने उसे एक पुलिस की वर्दी दी। "अगर प्रायश्चित करना है, तो पहले मेरे जैसा बनकर देखो, आर्यन। चलो, आज तुम्हें जेल की ज़िंदगी का अनुभव दिलाते हैं।" क्या आर्यन वाकई पुलिस की वर्दी में अपनी ही जेल में बंद होगा?)
लेखक: प्रिया
आर्यन के प्रायश्चित का सफर अब शुरू हो रहा है। अगले एपिसोड में: क्या जेल की सलाखें आर्यन के दिल को पिघला पाएंगी?