सुबह घर की पुरानी पुस्तकों के बीच एक छोटी-सी, मात्र बासठ पन्नों की पुस्तिका हाथ लगी—सत्यवादी हरिश्चंद्र। उसे देखते ही बचपन की अनेक स्मृतियाँ जाग उठीं। कॉलेज जाने की जल्दी थी, इसलिए उसे हाथ में लेकर ही निकल पड़ा। रास्ते में डोरंडा से मित्र चंदन मिल गए। उनकी गाड़ी पर पीछे बैठकर मैंने पढ़ना शुरू किया। सड़क आगे बढ़ रही थी, पर मन उस कथा के भीतर उतरता जा रहा था।
पन्ने पलटते-पलटते अचानक एक पात्र मेरे हृदय में उतरने लगा—रोहताश। अब तक मैंने हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा और तारामती के त्याग के बारे में बहुत सुना था, पर इस बार रोहताश ने मुझे रोक लिया। एक बालक, जिसकी उम्र खेलने-कूदने की थी, वह जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा रहा था।
कथा का सबसे मार्मिक क्षण था। राजा हरिश्चंद्र पर तीन भार स्वर्ण का ऋण चुकाने का संकट था। चारों ओर निराशा थी। तभी तारामती ने भारी मन से कहा—
“स्वामी, मुझे बेच दीजिए, कम-से-कम यह ऋण उतर जाएगा।”
यह सुनते ही बालक रोहताश अचानक बोल उठा—
“पिताजी, एक प्रश्न पूछूँ? यदि आप राजा होते और आपकी मृत्यु हो जाती, तो इस राज्य का उत्तराधिकारी कौन होता?”
हरिश्चंद्र ने गंभीर स्वर में कहा—
“तुम... क्योंकि तुम मेरे पुत्र हो।”
रोहताश ने तुरंत उत्तर दिया—
“यदि मैं आपकी सारी संपत्ति का अधिकारी होता, तो आपके ऋण का भार भी मेरा ही होता। फिर माँ क्यों बिकें? मुझे बेच दीजिए। यह मेरा कर्तव्य है।”
इतना कहकर वह अपनी माँ से लिपट गया और बोला—
“माँ, संसार का कोई भी पुत्र इतना निर्लज्ज नहीं हो सकता कि उसकी आँखों के सामने उसकी माँ बिके। सबसे पहले मैं बिकूँगा।”
यह सुनकर तारामती फूट-फूटकर रो पड़ीं। हरिश्चंद्र का हृदय भी कांप उठा। पर पुत्र के दृढ़ निश्चय के सामने दोनों को झुकना पड़ा।
और फिर वह क्षण आया—माँ और पुत्र, दोनों बिक गए।
मैं गाड़ी पर बैठा था, पर मेरी आँखें भीग चुकी थीं। लगा, जैसे यह कोई कथा नहीं, जीवन का कठोरतम सत्य हो। एक बालक अपने माता-पिता को कर्तव्य का अर्थ समझा रहा था।
तभी मन में विचार आया—शायद यही वह दृश्य रहा होगा, जिसने बालक मोहनदास करमचंद गांधी के हृदय में भी आग जलाई होगी। जब उन्होंने राजा हरिश्चंद्र का नाटक देखा होगा, तब सत्य की वही लौ उनके भीतर जली होगी, जो आगे चलकर महात्मा गांधी के रूप में प्रकट हुई।
उस दिन कॉलेज पहुँचते-पहुँचते मैं बदल चुका था। एक छोटा-सा पात्र, एक बालक—रोहताश—मुझे यह सिखा गया कि जीवन की महानता उम्र में नहीं, विचारों में होती है; और कर्तव्य का भार वही उठा सकता है, जिसके भीतर प्रेम, साहस और त्याग का प्रकाश हो।
आज भी जब रोहताश को याद करता हूँ, तो लगता है—वह कोई पात्र नहीं, भारतीय संस्कृति के हृदय में जलता हुआ एक दीपक है, जो पीढ़ियों को कर्तव्य और त्याग का मार्ग दिखाता रहेगा। ऐसे पात्र केवल कथाओं में नहीं रहते, वे हमारे भीतर जीवित रहते हैं—जब भी हम सत्य चुनते हैं, जब भी हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठते हैं, जब भी हम दूसरों के लिए त्याग करते हैं, तब-तब रोहताश हमारे भीतर पुनर्जीवित होता है। शायद यही किसी महान कथा की सबसे बड़ी सफलता है—वह पढ़कर समाप्त नहीं होती, बल्कि हमारे चरित्र का हिस्सा बन जाती है।