पारसनाथ की छाया में गिरिडीह : रवीन्द्रनाथ, “एकला चलो रे” और एक सांस्कृतिक भूगोल
छोटानागपुर का पठारी प्रदेश भारतीय भूगोल का केवल एक प्राकृतिक विस्तार नहीं है,यह भारतीय सभ्यता के उन शांत प्रदेशों में से एक है जहाँ प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध आज भी किसी प्राचीन संवाद की तरह जीवित प्रतीत होता है। झारखण्ड का गिरिडीह जिला इसी संवाद का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ की पहाड़ियाँ, साल के वन, लाल मिट्टी, चट्टानी धरातल, बरसाती नदियाँ और पारसनाथ का विराट पर्वत-ये सब मिलकर केवल एक भौगोलिक परिदृश्य नहीं रचते, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक भूमि का निर्माण करते हैं जिसने साहित्य, संगीत, दर्शन और राष्ट्रीय चेतना को गहराई से प्रभावित किया।
आज का गिरिडीह भले खनिज संपदा, कोयला उद्योग और अभ्रक की खदानों के लिए जाना जाता हो, किन्तु इसका इतिहास केवल औद्योगिक नहीं है। यह नगर कभी बंगाली सांस्कृतिक जीवन का अत्यंत प्रिय केंद्र हुआ करता था। औपनिवेशिक काल में जब कलकत्ता का शिक्षित मध्यवर्ग शहर की भीड़, प्रदूषण और मानसिक तनाव से दूर शांति की खोज में निकलता था, तब छोटानागपुर का यह क्षेत्र उसके लिए “हवा बदल” का प्रदेश बन जाता था। मधुपुर, देवघर, हजारीबाग और गिरिडीह जैसे स्थान धीरे-धीरे बंगाली समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों में बस गए।
गिरिडीह का आकर्षण केवल इसकी जलवायु नहीं थी। यहाँ प्रकृति का वह सौंदर्य था जो मनुष्य को भीतर से शांत कर देता है। यहाँ सुबहें धुएँ और मशीनों के शोर से नहीं, बल्कि पक्षियों के स्वर और जंगलों की सुगंध से आरम्भ होती थीं। वर्षा ऋतु में पहाड़ियों से उतरती छोटी नदियाँ चाँदी की धाराओं की तरह चमकती थीं, जबकि गर्मियों में वही धरती लाल धूल और सूखी हवाओं के बीच भी किसी गहरे सौंदर्य को सँजोए रहती थी। इस क्षेत्र की मिट्टी में एक आकर्षण दिखाई देती थी ।
इसी वातावरण ने अनेक साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और चिंतकों को अपनी ओर आकर्षित किया। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने करमाटांड़(मधुपुर जामताड़ा के बीच) अपने जीवन का एक महत्त्वपूर्ण समय बिताया। उन्होंने वहाँ केवल निवास नहीं किया, बल्कि संथाल समाज के बीच शिक्षा और मानवता का कार्य भी किया। जगदीश चंद्र बोस का “शांति निवास” गिरिडीह की सांस्कृतिक स्मृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। काज़ी नजरुल इस्लाम, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और अनेक बंगाली बुद्धिजीवियों ने इस क्षेत्र को आत्मिक विश्राम की भूमि माना।
किन्तु इन सबमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर का संबंध सबसे अधिक गहरा और भावनात्मक प्रतीत होता है।
रवीन्द्रनाथ के लिए गिरिडीह केवल एक नगर नहीं था; यह एक अनुभव था। कलकत्ता की सामाजिक और बौद्धिक व्यस्तता से दूर उन्हें यहाँ वह निस्तब्धता मिलती थी जिसमें मनुष्य स्वयं से मिल सकता है। मोटर-यात्राओं के अपने शौक के कारण वे छोटानागपुर के अनेक भागों में घूमते रहे। उन्हीं यात्राओं के दौरान पहली बार उन्होंने पारसनाथ पर्वत को देखा।
पारसनाथ केवल एक पर्वत नहीं है। वह झारखण्ड की आत्मा का एक मौन प्रतीक है। चार हजार फीट से अधिक की ऊँचाई पर खड़ा यह पर्वत आसपास की छोटी पहाड़ियों के बीच किसी तपस्वी की भाँति प्रतीत होता है। दूर से देखने पर उसकी आकृति सरल लगती है, मानो कोई भी यात्री सहजता से उसकी चोटी तक पहुँच सकता हो; परंतु उसके भीतर छिपी कठिनाई और रहस्य केवल वही समझ सकता है जिसने उसकी यात्रा की हो।
रवीन्द्रनाथ जब अपनी पत्नी के साथ उसकी ओर बढ़े, तब यह केवल एक साहसिक यात्रा थी। पर जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ते गए, वह यात्रा एक आध्यात्मिक अनुभव में बदलती चली गई। जंगलों की नीरवता, अंधकार में गूँजते “राम-राम” के स्वर, लौटते तीर्थयात्रियों की चेतावनियाँ और पर्वत का रहस्यमय वातावरण-इन सबने उनके भीतर एक गहरा प्रभाव उत्पन्न किया।
रात के अंधकार में पर्वत के शिखर के निकट आग के पास बिताया गया वह समय मानो प्रकृति की परीक्षा थी। और अगली सुबह जब सूर्य की किरणों में जैन मंदिर का संगमरमर चमका, तब वह दृश्य केवल दृश्य नहीं रहा; वह आत्मा का अनुभव बन गया। मंदिर के भीतर की सादगी और रिक्तता ने ठाकुर को अत्यंत प्रभावित किया। वहाँ वैभव नहीं था, केवल शांति थी। वही शांति उनके भीतर उतर गई।
पारसनाथ का यह अनुभव उनके मन में स्थायी रूप से बस गया। संभवतः इसी कारण बाद के वर्षों में वे बार-बार गिरिडीह की ओर लौटे।
उस समय का गिरिडीह प्रकृति और औद्योगिक सभ्यता के संघर्ष का जीवंत उदाहरण था। एक ओर खेतों में काम करते किसान थे, पहाड़ियों से उतरती जलधाराएँ थीं, साल के गंभीर वन थे; दूसरी ओर कोयले की खदानें, धुएँ से भरी चिमनियाँ और धरती के भीतर काम करते हजारों मजदूर थे।
गिरिडीह भारत के उन क्षेत्रों में था जहाँ औद्योगिक आधुनिकता ने सबसे पहले प्रकृति के शांत जीवन को चुनौती दी। अंग्रेजी शासन के दौरान यहाँ कोयले और अभ्रक का व्यापार तेजी से बढ़ा। रेलवे लाइनों का विस्तार हुआ। बंगाल और राजस्थान के व्यापारी यहाँ आकर बसने लगे। नगर का स्वरूप बदलने लगा।
किन्तु रवीन्द्रनाथ ने इस परिवर्तन को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखा। उन्होंने महसूस किया कि आधुनिक सभ्यता मनुष्य को प्रकृति से दूर कर रही है। उन्होंने देखा कि जो जंगल कभी जीवन और शांति का प्रतीक थे, वे अब खदानों और मशीनों में बदलते जा रहे हैं। उन्होंने उन मजदूरों का दुख भी देखा जो दिनभर धरती के भीतर कोयले और धूल में काम करते थे और रात को थके हुए लौटते थे।
यहीं ठाकुर की संवेदना केवल प्रकृति-प्रेम तक सीमित नहीं रहती; वह सामाजिक चेतना में बदल जाती है।
गिरिडीह का सांस्कृतिक जीवन भी उस समय अत्यंत समृद्ध था। यहाँ अनेक बंगाली परिवारों ने बड़े-बड़े बंगले बनाए। “उपलापथ”, “गोलकुठी”, “शांति निवास”, “रोज़ विला” और “जयंती” जैसे बंगले केवल मकान नहीं थे; वे साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र थे। शाम को संगीत-संध्याएँ होती थीं, कविताएँ पढ़ी जाती थीं, राजनीति और साहित्य पर चर्चा होती थी।
यहाँ की जलवायु को स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता था। क्षय रोग और मानसिक थकान से पीड़ित लोग यहाँ विश्राम के लिए आते थे। बंगाली समाज में “चेंज जाना” केवल यात्रा नहीं था; वह जीवन की गति को धीमा करने और प्रकृति के साथ कुछ समय बिताने का एक सांस्कृतिक अभ्यास था। गिरिडीह इस परंपरा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
इसी सांस्कृतिक और आत्मिक वातावरण में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की चेतना और अधिक प्रखर हुई। सन 1905 में जब बंग-भंग आंदोलन ने पूरे बंगाल को आंदोलित कर दिया, तब भारतीय समाज भय, असमंजस और संघर्ष के दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में ठाकुर ने केवल राजनीतिक प्रतिरोध का मार्ग नहीं चुना; उन्होंने लोगों के भीतर आत्मबल जगाने का प्रयास किया।
इसी दौर में गिरिडीह में “एकला चलो रे” की रचना हुई।
यह गीत केवल एक राष्ट्रवादी गीत नहीं था। यह मनुष्य के भीतर छिपे नैतिक साहस का घोष था। प्रारंभ में इसका शीर्षक “एका” था। इसकी धुन में बाउल और वैष्णव परंपरा की गूँज थी। गीत का संदेश अत्यंत सरल किन्तु गहरा था-यदि तुम्हारी पुकार सुनकर कोई न आए, तब भी अकेले आगे बढ़ो।
यह विचार केवल राजनीति का नहीं था; यह जीवन-दर्शन था। सत्य का मार्ग प्रायः अकेलेपन से होकर गुजरता है। महान परिवर्तन हमेशा भीड़ से नहीं, बल्कि किसी एक व्यक्ति के साहस से आरम्भ होते हैं।
महात्मा गांधी को यह गीत अत्यंत प्रिय था क्योंकि उनके अपने जीवन में भी यही संघर्ष था। गांधी जानते थे कि सत्य और अहिंसा का मार्ग अक्सर मनुष्य को अकेला कर देता है। इसलिए “एकला चलो रे” उनके लिए केवल गीत नहीं, बल्कि आत्मिक शक्ति का स्रोत था।
आज भी जब यह गीत सुनाई देता है, तब उसमें केवल स्वदेशी आंदोलन की स्मृति नहीं होती; उसमें मनुष्य की स्वतंत्र आत्मा की पुकार सुनाई देती है।
गिरिडीह की विशेषता यही है कि यहाँ प्रकृति, आध्यात्मिकता, संघर्ष और संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। पारसनाथ का पर्वत यहाँ आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। साल के वन यहाँ प्रकृति की गंभीरता के प्रतीक हैं। खदानें आधुनिक सभ्यता के संघर्ष की प्रतीक हैं। और “एकला चलो रे” इस भूमि की आत्मिक शक्ति का प्रतीक बन जाता है।
समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। पुराने बंगले उजड़ गए। बंगाली सांस्कृतिक जीवन धीरे-धीरे समाप्त हो गया। जंगल कम होते गए। खनन और शहरीकरण ने इस क्षेत्र के स्वरूप को बदल दिया। परंतु इतिहास केवल इमारतों में नहीं रहता; वह स्मृतियों में भी जीवित रहता है।
आज भी जब कोई यात्री गिरिडीह की पहाड़ियों से होकर गुजरता है, जब वह दूर खड़े पारसनाथ को देखता है, जब वह किसी पुराने बंगले के टूटे बरामदे या किसी सूनी पगडंडी पर ठहरता है, तब उसे महसूस होता है कि यह भूमि केवल भूगोल नहीं है-यह एक सांस्कृतिक स्मृति है।
यह वही भूमि है जहाँ एक कवि ने प्रकृति में राष्ट्र की आत्मा देखी थी। यही वह भूमि है जहाँ एक पर्वत आध्यात्मिक आरोहण का प्रतीक बन गया। और यही वह भूमि है जहाँ से एक स्वर उठा था-
“यदि तोर डाक सुने केउ ना आसे, तबे एकला चलो रे…”
आज भी वह स्वर समय की सीमाओं को पार कर मनुष्य को साहस देता है।