रांची की वह सुबह आज भी याद है...
ठंडी हवा थी...सड़कें धीरे-धीरे जाग रही थीं...और मैं किताबों की तलाश में था।
किताबें...जो सिर्फ पन्ने नहीं होतीं...कई बार वे मनुष्य को नया मनुष्य बना देती हैं...
मेरे साथ साईं भाई थे...
चेहरे पर सहज मुस्कान...बातों में अपनापन...और कदमों में अजीब सा धैर्य...
हम एक दुकान से दूसरी दुकान घूम रहे थे...
कहीं बुद्ध पर पुस्तक नहीं मिली...कहीं गांधी की किताब अधूरी थी...कहीं राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक आउट ऑफ स्टॉक...
लेकिन यात्रा सिर्फ पुस्तक खोजने की नहीं थी...
वह जीवन को समझने की यात्रा बनती जा रही थी...
चलते-चलते साईं भाई ने कहा -
“बुद्ध को पढ़ना आसान है...लेकिन बुद्ध जैसा चलना कठिन है...”
मैं मुस्कुरा दिया...
सच भी तो है...
गौतम बुद्ध ने राजमहल छोड़ा...
लेकिन सिर्फ महल छोड़ना महानता नहीं थी...
महानता थी - प्रश्न करना...
उन्होंने जीवन को आँख बंद करके स्वीकार नहीं किया...
उन्होंने दुख देखा...बीमारी देखी...मृत्यु देखी...और फिर मनुष्य को समझने निकले...
यही बात उन्हें अलग बनाती है...
वे किसी चमत्कार से बड़े नहीं बने...
वे यथार्थ से बड़े बने...
बुद्ध कहते हैं - “अप्प दीपो भवः”
अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो...
यही स्वतंत्र विचार की शुरुआत है...
शायद इसी कारण कबीर में बुद्ध दिखाई देते हैं...
गांधी में बुद्ध दिखाई देते हैं...
राहुल सांकृत्यायन में बुद्ध दिखाई देते हैं...
यहाँ तक कि ओशो भी बुद्ध के एक-एक रोएँ पर घंटों बोलते रहे...
राहुल सांकृत्यायन की एक बात मुझे हमेशा भीतर तक छूती है...
वे कहते थे कि शिक्षा में शारीरिक श्रम जरूरी है...
और यह बात जितनी सरल लगती है...उतनी ही गहरी है...
आज पढ़े-लिखे लोग मजदूर को सम्मान से नहीं देखते...
क्यों...?
क्योंकि शिक्षा ने दिमाग तो विकसित किया...लेकिन शरीर और श्रम के प्रति संवेदना नहीं...
पंखे की हवा में बैठकर समाज नहीं समझा जा सकता...
गांधी पैदल चले...
विनोबा भावे पैदल चले...
वे सिर्फ यात्रा नहीं कर रहे थे...वे भारत को महसूस कर रहे थे...
मुझे याद है उस दिन रांची में हम लगभग पाँच किलोमीटर पैदल चले थे...
गणतंत्र दिवस परेड की वजह से शरीर में थोड़ा स्टेमिना आ गया था...
लेकिन उस दिन समझ आया कि पैदल चलना सिर्फ शरीर का काम नहीं...मन का भी अभ्यास है...
बीच रास्ते में मैंने जेब टटोली...
पैसे कम पड़ गए थे...
साईं भाई ने बिना कुछ कहे पचास रुपए बढ़ा दिए...
राशि छोटी थी...
लेकिन उस क्षण वह सहायता नहीं...विश्वास लग रही थी...
और यही तो बुद्ध का मार्ग है...
करुणा...
बिना शोर की करुणा...
उसी यात्रा में फूफाजी भी याद आते हैं...
उन्होंने ढेर सारी पुस्तकें दिलवाई थीं...
मेरे और शंकर के लिए चश्मा भी...
चश्मा तो मैंने खो दिया...
लेकिन खुशी इस बात की है कि पुस्तकें नहीं खोईं...
शायद इसलिए कि चश्मा आँखों को साफ करता है...
और पुस्तकें दृष्टि को...
फूफाजी का हँसमुख स्वभाव हमेशा आश्चर्य में डालता है...
कभी कौए की आवाज निकालकर बच्चों को हँसा देना...
कभी गंभीर बैठे आदमी के चेहरे पर मुस्कान ला देना...
ऐसे लोग किताबों में कम मिलते हैं...जीवन में मिलते हैं...
तुलसीदास ने लिखा था -
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई...”
पहले यह सिर्फ पंक्ति लगती थी...
लेकिन कुछ लोगों को देखकर लगता है कि तुलसीदास ने मनुष्य को बहुत ध्यान से पढ़ा था...
इसी बीच मुझे डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी याद आते हैं...
उन्होंने बुद्ध को सिर्फ पूजा का विषय नहीं बनाया...
उन्होंने बुद्ध को तर्क के साथ समझा...
उन्होंने बौद्ध धर्म में फैली कपोल-कल्पनाओं और परलौकिक बातों का विरोध किया...
क्योंकि बुद्ध का मूल तो यथार्थ है...
मनुष्य को वास्तविक जीवन से जोड़ना...
शायद इसलिए बुद्ध आज भी खत्म नहीं होते...
कभी वे किताब में मिलते हैं...
कभी किसी मजदूर के पसीने में...
कभी किसी शिक्षक के विचार में...
कभी किसी दोस्त की छोटी सी मदद में...
और शायद यही कारण है कि बुद्ध से पीछा नहीं छूटता...
क्योंकि बुद्ध कोई व्यक्ति भर नहीं...
एक दृष्टि हैं...
और जब एक बार दृष्टि बदल जाए...
तो फिर रास्ते वही रहते हैं...
लेकिन चलने वाला मनुष्य बदल जाता है...