God Wishar - 5 Ram Make द्वारा रोमांचक कहानियाँ में हिंदी पीडीएफ

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God Wishar - 5




घर पर कबीर के माता-पिता के अलावा उसकी दो बुआ, मीना और सुमन भी आई हुई थीं। सुमन बुआ अपने दोनों बेटों यानी कबीर के फुफेरे भाइयों (जतिन और तरुण) को भी साथ लाई थीं। कबीर ने अंदर जाकर सभी के पैर छुए और नमस्ते किया।

खाना पहले ही परोसा जा चुका था, और ऐसा लग रहा था जैसे सभी सिर्फ उसी का इंतज़ार कर रहे थे। कबीर भाँप गया कि दाल में कुछ काला है। उसने अपने माता-पिता के चेहरों पर छाई चिंता और बुआ की अजीब सी नज़रों को देखा, तो वह सोचने लगा कि आखिर माजरा क्या है।

वहां सिर्फ उसकी छोटी बहन, मेघना ही दिखाई नहीं दे रही थी। मेघना थोड़ी चुलबुली और आज़ाद खयाल की थी, पता नहीं कहाँ गायब थी।

कबीर का शक सही निकला। उसने अभी खाने के दो-चार निवाले ही लिए थे कि सुमन बुआ बोल पड़ीं, "और कबीर बेटा, तेरे पिताजी ने बैंक वाली उस घटना के बारे में बताया। मुख्यमंत्री कार्यालय से तुझे दो लाख रुपये का इनाम मिला है ना?"

कबीर ने ईमानदारी से सिर हिलाते हुए कहा, "जी बुआ, बिल्कुल सही।"

सुमन बुआ का चेहरा खिल उठा। "और तुझे तो पता ही है कि जतिन की कॉलेज प्रवेश परीक्षा आने वाली है। उसके इतने अच्छे नंबर आ रहे हैं कि उसे अपने मनपसंद कॉलेज में आराम से दाखिला मिल जाएगा।" कबीर की भौहें थोड़ी तन गईं; उसे समझ आने लगा था कि बात किस तरफ जा रही है।

"तो बात ऐसी है बेटा..." सुमन बुआ ने चहकते हुए कहा, "मैंने तेरे पिताजी से कह दिया है कि वे 2 लाख रुपये जतिन की कॉलेज फीस के लिए दे दें। भविष्य में जब वह नौकरी करने लगेगा, तो तुम्हारे पैसे लौटा देगा।"

कबीर सन्न रह गया। उसने अपने पिता की ओर देखा; उनके चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी। कबीर समझ गया कि यहाँ क्या हुआ होगा।

कबीर के पिता, समीर, एक बेहद सीधे-सादे इंसान थे, जबकि सुमन बुआ किसी की नहीं सुनती थीं। उन्हें अपना काम निकालना बहुत अच्छी तरह आता था, और पक्का उन्होंने घर में क्लेश करके समीर को अपनी बात मानने पर मजबूर कर दिया होगा। कबीर की माँ, अंजलि, स्वभाव से बहुत शांत थीं और कभी अपनी ननदों के सामने पलटकर जवाब नहीं देती थीं। अगर पिताजी मान गए, तो माँ भी कुछ नहीं कहेंगी।

कबीर ने अपनी भौहें सिकोड़ीं। उसने पहले अपने फुफेरे भाई जतिन को देखा और फिर सुमन बुआ को। बुआ के चेहरे पर अभी भी उत्साह वाली मुस्कान थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सा तिरस्कार था। कबीर मुस्कुराया और बोला, "माफ़ करना सुमन बुआ, मुझे उन पैसों की सख्त ज़रूरत है। मुझे यकीन है कि आप जतिन की फीस के लिए कहीं और से उधार का इंतज़ाम कर लेंगी।"

"क्या?" यह जवाब सुनकर सुमन बुआ से बैठा नहीं गया। वह झल्लाकर बोलीं, "तू तो पुलिस विभाग में एक मामूली सा कर्मचारी है। तुझे इतने पैसों का क्या करना है? घर का पैसा वहीं खर्च होना चाहिए जहाँ उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो। जतिन जल्द ही कॉलेज जाने वाला है। उसे ट्यूशन फीस, रहने-खाने का खर्च, और बाकी चीज़ों के लिए पैसे चाहिए होंगे। उसे अपनी ज़िंदगी बनानी है! हम बस उधार माँग रहे हैं। ऐसा तो है नहीं कि हम तेरे पैसे खा जाएंगे!"

तभी उसका फुफेरा भाई जतिन, जो अब तक चुप था, बड़े घमंड से बोला, "टेंशन मत ले कबीर भाई। जब मेरी पढ़ाई पूरी हो जाएगी, तो मैं अपना खुद का बिज़नेस शुरू करूँगा। तब मैं तेरा पूरा ख्याल रखूँगा! तुझे ज़िंदगी भर पुलिस वालों की जी-हुज़ूरी नहीं करनी पड़ेगी। अभी मुझ पर इन्वेस्ट कर, भविष्य में मैं तुझे इसका अच्छा सिला दूँगा!"

कबीर साफ़ समझ रहा था कि वे लोग उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं। उसका खून खौल रहा था, लेकिन सतह पर उसने खुद को शांत रखा। "अच्छा सुमन बुआ, एक बात बताइए, पिछले साल आपने पिताजी से 70,000 रुपये उधार लिए थे ना? और जहाँ तक मुझे पता है, आपने उसमें से एक धेला भी वापस नहीं किया है। तो फिर आप दोबारा उधार क्यों माँग रही हैं?"

जतिन की बोलती बंद हो गई और उसने एक शब्द नहीं कहा। लेकिन सुमन बुआ मुँह बनाते हुए बोलीं, "मैं और तेरे पिताजी भाई-बहन हैं। अपनों में ये सब चलता है।" फिर वे नाक-भौं सिकोड़कर बोलीं, "और तुझे क्या हो गया है? तू तो बड़ा संस्कारी हुआ करता था। क्या पुलिस थाने में तुझे यही सिखाते हैं? बड़ों का निरादर करना?"

कबीर ने अपने पानी का एक घूंट लिया और शांति से बोला, "नहीं बुआ, ये सब तो मैंने आपसे ही सीखा है। मैं तो बस आप ही के बात करने के तरीके की नकल कर रहा हूँ।" सुमन बुआ का मुँह खुला का खुला रह गया, पर कबीर रुका नहीं, "मनोज फूफाजी इतने सालों से अपना बिज़नेस चला रहे हैं। क्या आप मुझसे ये कहना चाहती हैं कि आप और फूफाजी मिलकर अपने ही बेटे की फीस नहीं भर सकते? वैसे अच्छा हुआ आप आ गईं, मैं तो खुद आपके घर आकर अपने पुराने पैसों के बारे में पूछने वाला था। आप सालों से यहाँ-वहाँ करके थोड़ा-थोड़ा उधार ले रही हैं। मुझे लगता है अब तक यह रकम चार-पाँच लाख रुपये तो हो ही गई होगी, है ना?"

सुमन बुआ के गले में जैसे खाना अटक गया, लेकिन कबीर ने उन्हें मोहलत नहीं दी। "चूंकि अब आप यहाँ हैं ही, तो मैं सीधे-सीधे पूछ लेता हूँ। आप हमारे पैसे कब लौटा रही हैं?"

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

पहले के मुकाबले कबीर अब एक बिल्कुल अलग इंसान लग रहा था। पहले वह दब्बू और आज्ञाकारी था, लेकिन आज न केवल वह अपने पैसे देने से मना कर रहा था, बल्कि अपनी तेज़-तर्रार बुआ से पुराने पैसे भी वापस माँग रहा था।

सुमन बुआ फटी आँखों से उसे घूर रही थीं। वे सोच रही थीं कि यह नया कबीर आखिर है कौन, और इसने उनके सीधे-सादे भतीजे का क्या किया।

कबीर के माता-पिता भी अपने बेटे को हैरत से देख रहे थे। लेकिन सबसे बुरा हाल सुमन बुआ का था; ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी भी पल बेहोश होकर गिर पड़ेंगी।

कुछ पलों तक किसी ने कुछ नहीं कहा। माहौल में एक अजीब सी खामोशी और तनाव था।

कबीर ने एक और घूंट लिया और शांति से अपनी बुआ को देखता रहा। उसकी बुआ ने हमेशा उनके परिवार को दबाकर रखा था। कबीर के परिवार ने उनकी वजह से बहुत कुछ सहा था।

उसके माता-पिता सीधे थे, और उसकी बहन अभी छोटी थी। लेकिन अब, कबीर अपने परिवार को सुमन बुआ की दादागिरी और नहीं सहने देगा!

सुमन बुआ आगबबूला हो उठीं। इस कल के लौंडे की हिम्मत कैसे हुई उन्हें जवाब देने की और ऊपर से पैसे वापस माँगने की! यह तो बर्दाश्त के बाहर था।

वे खड़ी हो गईं और गुस्से में कबीर के पिता की ओर मुड़ीं। "समीर, हमारी इस बारे में बात पक्की हो गई थी। अब तू अपने बेटे को अपना फैसला क्यों बदलने दे रहा है? क्या तू इस घर का मुखिया नहीं है?"

समीर ने कुछ बोलने से पहले अपने गिलास से एक घूंट लिया। लेकिन जैसे ही वे कुछ कहने के लिए अपनी कुर्सी से उठने लगे, कबीर ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया। समीर ने उलझन में उस हाथ को देखा। उस स्पर्श में एक कोमलता थी, लेकिन साथ ही एक ऐसी मज़बूती थी जिसे टाला नहीं जा सकता था। अपने बेटे के शांत और आत्मविश्वास से भरे चेहरे को देखकर समीर को जैसे सब समझ आ गया।

उनका बेटा अब बड़ा हो गया था। जो छोटे-छोटे हाथ कभी अपने पिता की उंगली पकड़कर चलते थे, वे अब मज़बूत और ज़िम्मेदार हो गए थे।

समीर ने अपनी आधी ज़िंदगी कड़ी मेहनत में गुज़ार दी थी, लेकिन उन्होंने अपने बेटे की परवरिश बहुत अच्छी की थी। यह अहसास उन्हें भावुक कर गया और साथ ही एक सुकून भी दे गया। उनकी आँखें हल्की सी नम हो गईं।

बिना एक शब्द कहे, उन्होंने अपना सिर झुकाया और एक और घूंट लिया। इस बार, यह उन्हें कड़वा या बोझिल नहीं लगा।

कबीर ने बुआ की आँखों में देखते हुए कहा, "मुझे नहीं लगता कि आपको यह पूछने का कोई हक है कि इस घर का 'असली मर्द' कौन है, बुआ। खास तौर पर तब, जब आपका पति घर पर आराम फरमा रहा है और आप यहाँ अपने भाई से पैसे ऐंठने आई हैं।"

सुमन बुआ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। दूसरी तरफ बैठा कबीर का दूसरा फुफेरा भाई, तरुण, अपनी कुर्सी से उछल पड़ा और चिल्लाया, "तेरा मतलब क्या है कि मेरे पापा मर्द नहीं हैं? तेरी हिम्मत कैसे हुई? एक बार फिर बोलकर दिखा!"

**धड़ाम!**

कबीर ने डाइनिंग टेबल पर इतनी ज़ोर से मुक्का मारा कि मेज एक ज़ोरदार चटक के साथ दरक गई। बर्तन खनखनाते हुए ज़मीन पर जा गिरे। कबीर तेज़ी से खड़ा हुआ और ठंडी आवाज़ में बोला, "क्यों? तुम लोग दूसरों को नीचा दिखा सकते हो, लेकिन कोई और पलटकर जवाब नहीं दे सकता? यही नियम है क्या?"

वह कदम बढ़ाकर तरुण के ठीक सामने आ खड़ा हुआ और धीरे-धीरे चबाकर बोला, "ध्यान से सुन लो। अगर तुम लोग हमारे घर आकर यह कहोगे कि मेरे पिता अपने परिवार के साथ सही नहीं कर रहे हैं, तो तुम्हें भी कुछ कड़वे सच सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। समझे?"

कबीर के इर्द-गिर्द एक ऐसा खौफनाक और शक्तिशाली आभामंडल (Aura) बन गया था कि कमरे में मौजूद सभी लोगों की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई।

तरुण की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसे अचानक याद आया कि कुछ ही दिन पहले इसी कबीर ने अकेले ही तीन हथियारों से लैस बैंक लुटेरों को धूल चटाई थी!

तरुण का शरीर बेकाबू होकर काँपने लगा। कबीर की खौफनाक आँखों में देखकर उसके पैर लड़खड़ाए और वह ज़मीन पर धम्म से बैठ गया।

कबीर ने ज़मीन पर पड़े अपने फुफेरे भाई को देखा और फिर सुमन बुआ की तरफ मुड़ा। उनके चेहरों पर खौफ देखकर उसे समझ आ गया कि उसका काम हो गया है।

उसने एक गहरी सांस छोड़ी और कहा, "हम सब एक ही परिवार के हैं, इसलिए मैं इस बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। लेकिन अगर आइंदा आपने मेरे माता-पिता से बदतमीज़ी से बात करने की जुर्रत की, तो उसके अंजाम के लिए मुझे दोष मत दीजिएगा!"

जैसा कि कहावत है, 'सीधे इंसान को सब दबाते हैं।' अतीत में, उसके परिवार ने हमेशा समझौते किए थे और झुककर रहे थे, लेकिन अब कबीर यह सुनिश्चित करने वाला था कि बाज़ी पूरी तरह से पलट जाए!




एक पल के लिए किसी की कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। सुमन बुआ की साड़ी पर अभी भी गिरी हुई दाल-सब्जी के दाग लगे थे। पहले जैसी बात होती तो शायद वे इस पर आगबबूला हो जातीं, लेकिन अब वे चुपचाप कबीर को देख रही थीं, और उनके चेहरे पर साफ खौफ नज़र आ रहा था।

कबीर ने ठंडी आवाज़ में कहा, "मैं आपको पैसे उधार नहीं दूँगा। अब इस बारे में मुझसे दोबारा मत पूछना।"सुमन बुआ कबीर के इस दो-टूक जवाब से सन्न थीं, लेकिन वे इतनी आसानी से हार मानने वालों में से भी नहीं थीं। उन्हें अपने तेज़-तर्रार रवैये और अपने चालाक बिज़नेसमैन पति का घमंड था। अतीत में उन्होंने हमेशा अपने रिश्तेदारों पर इसी तरह रौब जमाया था।लेकिन इस बार, उनका भतीजा उनसे भी ज़्यादा खतरनाक साबित हो रहा था। और तो और, उसे इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि बुआ से रिश्ते बिगड़ जाएंगे। उसके शब्दों में एक ऐसा अटल निश्चय था जिसे हिलाया नहीं जा सकता था!उसी पल, कबीर के दिमाग में सिस्टम की आवाज़ गूँजी।

डिंग! आपने सुमन बुआ की उधार माँगने की इच्छा को चकनाचूर कर दिया है, एट्रीब्यूट पॉइंट + 1।""डिंग! आपने सुमन बुआ और अपने फुफेरे भाइयों की आपका मज़ाक उड़ाने की इच्छा को खत्म कर दिया है। एट्रीब्यूट पॉइंट + 1।"डिंग! आपने अपने माता-पिता की पैसे उधार न देने की इच्छा पूरी की है। विश वैल्यू + 1।"डिंग! सिस्टम प्रॉम्प्ट: बड़ों का सम्मान करना बहुत ज़रूरी है। यह पहली बार है जब आपने अपने माता-पिता की कोई इच्छा पूरी की है। 'छिपा हुआ इनाम' (Hidden Reward) अनलॉक हुआ: आपको किसी एक रैंडम (Random) स्किल में अधिकतम स्तर की निपुणता दी जाएगी।"सिस्टम आपके लिए एक रैंडम स्किल चुन रहा है। कृपया प्रतीक्षा करें।""क्या?" इससे पहले कि कबीर कुछ समझ पाता, सिस्टम की आवाज़ फिर आई। "डिंग! होस्ट को 'पाक कला' (Culinary Mastery) में अधिकतम स्तर की निपुणता प्राप्त हुई।"

"पाक कला? क्या तुम मुझे बावर्ची बनाना चाहते हो?" कबीर थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन फिर उसके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई।ज़्यादा हुनर होने से उस पर कोई बोझ तो पड़ने वाला नहीं था। सच कहें तो, जितने ज़्यादा हुनर हों, उतना ही अच्छा!अपने दिमाग में चल रहे सिस्टम को नज़रअंदाज़ करते हुए, उसने अपनी माँ की ओर देखा और नम्रता से कहा, "माँ, तुम्हारे पास वो डायरी है ना जिसमें तुम सारे उधार का हिसाब-किताब लिखती हो? उसे ले आओ ताकि बुआ उसे देख सकें। आज हम पूरा हिसाब करेंगे; तय करेंगे कि इन पर हमारा कितना पैसा बकाया है और ये उसे कब तक लौटाने वाली हैं!"इस बात पर सुमन बुआ आखिरकार होश में आईं और चिल्लाईं, "कबीर, तू अपनी औकात भूल रहा है! याद रख मेरा पति कौन है! यह मत सोचना कि वह तुझे सबक सिखाने के लिए किसी को नहीं भेजेगा!"

कबीर की आँखें बर्फ की तरह ठंडी हो गईं। "क्या आप मुझे धमकी दे रही हैं?" वह सुमन बुआ के पास गया और कड़े शब्दों में बोला, "मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं या आपके पति कौन हैं, लेकिन मुझे धमकियों से सख्त नफरत है! क्या आप अपनी बात फिर से दोहराना चाहेंगी?सुमन बुआ को ऐसा लगा जैसे वे किसी शिकारी के निशाने पर फंसा खरगोश हों। उन्हें लगा कि अगर उन्होंने एक और शब्द बोलने की जुर्रत की, तो यह भेड़िया उन्हें बिना झिझक चीर-फाड़ देगा।
उन्होंने खौफ से कबीर की ओर देखा और काँपती आवाज़ में कहा, "तू... तू क्या कर रहा है।"कबीर के इस खौफनाक रूप को देखकर बाकी का परिवार सन्न था। वे उसे स्तब्ध होकर देख रहे थे, किसी की सांस लेने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी।तभी, दरवाज़े की घंटी बजी।सब लोग एक साथ चौंके, फिर कबीर की माँ दरवाज़ा खोलने दौड़ीं। बाहर खड़े लोगों के समूह को देखकर उनकी घबराहट और बढ़ गई।

सूट-बूट पहने सात-आठ लोग घर में दाखिल हुए। उनके आगे एक सौम्य चेहरे वाले अधेड़ उम्र के सज्जन थे, जिन्हें कबीर ने टीवी पर देखा था। यह शहर के मेयर साहब थे!उनके पीछे पुलिस कमिश्नर सूर्यकांत और कबीर की सीनियर ऑफिसर, इंस्पेक्टर शिवानी थीं। हालाँकि कबीर बाकी लोगों को नहीं जानता था, लेकिन वह समझ सकता था कि वे सभी बड़े अधिकारी ही होंगे।भी उसे याद आया कि शिवानी ने उसे अस्पताल में क्या बताया था: मेयर कार्यालय और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी उसे सम्मानित करने और प्रेस शूट के लिए उसके घर आने वाले थे। लेकिन उसे उम्मीद नहीं थी कि वे इतनी जल्दी आ जाएंगे!

मेयर साहब मुस्कुराए और बोले, "कबीर, है ना? मैंने तुम्हारी बहादुरी के किस्से सुने हैं। तुमने हमारे समाज के लिए बहुत बड़ा काम किया है। तुमने शहर के दुश्मनों को पकड़वाने में मदद की है। अपने शहर के ऐसे युवा और होनहार नागरिक से मिलकर मुझे बहुत खुशी हो रही है!"बोलते हुए उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और कबीर ने जल्दी से आगे बढ़कर उनसे हाथ मिलाया। "आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं, सर। मैंने वही किया जो मेरी ड्यूटी थी। कृपया अंदर आइए और बैठिए। मुझे खेद है कि घर थोड़ा अस्त-व्यस्त है, मुझे आपके इतनी जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी।"तब जाकर उन लोगों ने कमरे के चारों ओर देखा और महसूस किया कि कमरे की क्या हालत हो रही थी। फर्श पर टूटे हुए बर्तन और दाल-सब्जी फैली हुई थी।मेयर साहब हँसे और बोले, "अरे कबीर, लगता है यहाँ अभी-अभी कोई तूफ़ान आया था!"कबीर ने झेंपते हुए अपना सिर खुजलाया, जबकि कमिश्नर सूर्यकांत ने मेयर साहब के कंधे के पीछे से उसे आँख मारी।

कबीर ने तुरंत सिंक से एक कपड़ा उठाया। "बस एक मिनट सर, मैं इसे साफ कर देता हूँ।"कबीर और उसके पिता ने जल्दी से सारा बिखरा हुआ सामान साफ किया, जबकि उसकी माँ ने सभी को बिठाया और उनके लिए पानी और शरबत लेकर आईं। जब सफाई हो गई, तो मेयर साहब ने कबीर को अपने साथ सोफे पर बैठने का इशारा किया और उसके व उसके माता-पिता के साथ बहुत ही आत्मीयता से बातचीत करने लगे।सुमन बुआ को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जतिन, तरुण और मीना बुआ भी उतने ही सन्न थे।शहर का सबसे बड़ा व्यक्ति समीर (कबीर के पिता) के घर मेहमान बनकर आया था और साथ में कैमरा टीम भी लाया था। क्या उनके साथ आई वह युवती एक रिपोर्टर थी?

इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात तो कबीर, कमिश्नर साहब और शिवानी का बातचीत करने का अंदाज़ था। वे ऐसे सहज होकर बात कर रहे थे जैसे पुराने परिचित हों।ये दोनों शहर की बहुत सम्मानित हस्तियाँ थीं। क्या यह संभव है कि कबीर की उनसे इतनी अच्छी जान-पहचान हो?"हे भगवान!"सुमन बुआ ने मन ही मन सोचा।

अगर यह सब उनके सामने न हो रहा होता, तो सुमन बुआ और बाकी लोग कभी इस बात पर यकीन न करते। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे रुकें या जाएँ। दिक्कत तो यह थी कि वीआईपी ग्रुप के दो लोग दरवाज़े के पास ही खड़े होकर बात कर रहे थे, और सुमन बुआ में उनके बीच से गुज़रकर बाहर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी!उन्हें अब एहसास हुआ कि कुछ देर पहले उनकी बातें कितनी बचकानी थीं। उनका पति एक स्थानीय व्यापारी था और समाज में कई लोगों को जानता था। लेकिन इस कमरे में बैठी हस्तियों के सामने वह कुछ भी नहीं था।कबीर एक-एक करके अपने आस-पास खड़े रिश्तेदारों के चेहरे देख रहा था, और मन ही मन हँसने से खुद को रोक नहीं पा रहा था।

लेकिन जब उसकी नज़र अपने फुफेरे भाई, तरुण पर पड़ी, तो कबीर चौंक गया। तरुण की आँखें चमक रही थीं और वह कैमरे वाली रिपोर्टर को घूर रहा था।कैमरा चलाने वाली महिला बेहद खूबसूरत थी, बिल्कुल शिवानी जितनी ही सुंदर। कोई हैरानी की बात नहीं थी कि तरुण उसे देखकर इतना मंत्रमुग्ध हो गया था।उसी पल, उसके कान के पास एक गुस्से भरी आवाज़ आई। "कबीर, शहर के कुछ सबसे खास लोग यहाँ बैठे हैं। तुम वहाँ क्या घूर रहे हो?
यह आवाज़ इंस्पेक्टर शिवानी की थी। उसे सुनकर कबीर तुरंत सतर्क हो गया और उसने झट से कैमरावुमन से अपनी नज़रें हटा लीं।शिवानी ने यह देखा और व्यंग्य से साँस छोड़ी। उसने कबीर को घूरते हुए अपनी आँखें घुमाईं, जैसे उसे कुछ समझ आ गया हो। उसके कान हल्के लाल हो गए थे।

तभी, कबीर की माँ, जो मेहमानों के साथ खुशी-खुशी बात कर रही थीं, अचानक बोलीं, "आप लोग सीधे दफ्तर से आ रहे होंगे। मुझे लगता है आपने अभी तक खाना नहीं खाया है, है ना? क्यों न मैं आप लोगों के लिए खाना लगा दूँ?"मेयर साहब ने आँखों में चमक लिए कबीर की ओर देखा।कबीर ने उन पर बहुत अच्छा प्रभाव डाला था। यह युवक अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सामने विनम्र तो था, लेकिन उसमें कोई हीन भावना नहीं थी। उसके बात करने और व्यवहार करने का तरीका बहुत प्रभावशाली था। मेयर समझ गए थे कि कबीर एक बेहद काबिल नौजवान है।

पहली बार, मेयर साहब ने अपने बगल में खड़े पुलिस कमिश्नर से पूछा, "कमिश्नर साहब, क्या हमें जाने से पहले कुछ खा लेना चाहिए?"कमिश्नर हँसे। "ठीक है। लेकिन अंजलि जी, हमारे साथ काफी लोग हैं। हम आपको परेशानी में नहीं डालना चाहते।"कबीर की माँ ने मुस्कुराते हुए बात टाल दी और वे रसोई की तरफ बढ़ने ही वाली थीं कि अचानक सुमन बुआ की आँखें चमक उठीं। वे झट से बोल पड़ीं, "अरे मेयर साहब, क्या आपको नहीं पता? हमारा कबीर तो बहुत शानदार खाना बनाता है। क्यों न आज वह आपको अपने हाथ का खाना बनाकर अपनी पाक कला का हुनर दिखाए?"