--------------उलझन (3) जगल पस्तक मे दर्ज किया गया है... जो ये जानता है कि रास्ते खुद बे खुद बन जाते है। फिर काफ़ले निकल पड़ते है।
जैसे साप दृष्टि मित्र झपकनी नहीं है। वैसे ही सब काम एकाग्र मन से करो। करते रहो....
मै गंगा तट को निहारे जा रहा था। मेरी सोच गंगा की लहरों मे डुबकी लगाए थी। आँखे बंद थी। खुद पर ही केंद्रिक कितनी वार कर चूका था। दिसबर का महीना था.... ठंड थी। पर शरीर को भी साधना जरूरी, कितनी ठंड सेह सकता था... गुरू नाम शिव का नाम नहीं छोड़ा था... स्वास से अंदर नाम चलाये हुए था.. तभी एकाएक नाम गुजा... " दयाल जी " मैंने आँखे खोली... सामने वही बालक इशारा कर रहा था। मैंने मन मार कर उधर गया। उन्होंने गर्म चाये पकड़ा दी। आपने बसेरे मे ही रहने को कहा यहां पर वाटर प्रूफ तरपेले डाली हुई थी, कमबल थे... बोल कोई नहीं रहा था.. " मैंने गर्म चाये के" चार घुट रुक रुक कर भरे वैसे ही जाप पर बैठ गया। मन का मनन था... यही जाप था। सब यही शयद कर रहे थे। एक बालक जो था रात वाला वो एक टक आँखे जमाये हुए शिव की सुंदरता को देख रहा था.... मैंने दूसरे को देखा वो सूटा खींच कर" बम बम " का जय घोष कर रहा था।
सब ने वारी वारी खींचा... पर मैंने नहीं। पता नहीं क्यो? सूर्य के आगे बदली आ गयी थी... " तभी एक बोला --- दयाल जी आप कहा से हो? " मै थोड़ा रुक सा गया " मै पंजाब से जलधर से हूँ.... "
मैंने साथ ही कहा " आपको कितनी देर साधना मे लगा जो अब भी कर रहे हो। " वो शक्श बोला " मै अठारा साल का था, ज़ब मै इस किर्या साधना मे आ गया --- मै इसी स्थान से हूँ... बचपन मे ही मेरा ख़याल भगवत प्राप्ति था, मेरा नाम किर्पा है । " अब ये सत्य बताओ कि अन्दर जो नाम चल रहा है या नहीं " मैंने कहा " नहीं महोदय। " ऐसा कयो होता है " मैंने कहा।
" अन्दर खूब जाते हो " किर्पा जी ने कहा। ऊपर हवा की गती चाल मे रहना सीखो। टूटे हुए पते की तरा नहीं। " उन्हों ने इशारा किया था। किस ओर..... बात करते हुए भी हवा की तरा गती मे रहो... खूबना नहीं। " उनों ने कहा " दयाल जी आप स्पष्ट बंदे हो... अभेयास से सब कुछ होता है... अभ्यास करो। "
किर्पा जी ने आँखे मुद ली... फिर वो डूब गए, शिव की लीला मे। दयाल जी को धुयाँ चढ़ गया था सास सास मे... घुटन... सास ठीक आ नहीं रहा था। तीनो ने मिट मे समझ लिया... गंगा जी के ठंडे जल मे डुबकी लगा दी। तीनो ने पकड़ कर... फिर वो कापने लगा... जै भोले.. जै नंदी जी माँ गोरा कहते हुए उसे तीनो वही ले आये... आगे से बेहतर था... पर कप्पन थी अंग अंग मे.... भीड़ जयादा हो चुकी थी.. तट पर बच्चे बूढ़े सब डूबकिया लगा कर शिव भोले का नाम गुजन कर रहे थे। कितना सुहाना दृश्य था। " सास की तकलीफ पहले बता देते... दयाल जी। " आँखे झुकाये माफ़ी मांगते हुए जैसे कहा " मुझे माफ करना, आपका धयान भंग किया। " किर्पा जी हस पड़े।