तपती दोपहरी prem chand hembram द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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तपती दोपहरी

🌿 तपती दोपहरी 
बैसाख की तपती दोपहरी…
आसमान से आग बरस रही थी।
ऐसा समय, जब लोग घर से बाहर निकलने से भी कतराते हैं।
पुराने बाज़ार के एक कोने में राजू अपनी रिक्शा लेकर खड़ा था।
सामने सत्तू की छोटी-सी दुकान…
जहाँ इक्का-दुक्का लोग आकर प्यास बुझा रहे थे।
राजू का मन लस्सी पीने का हुआ।
उसने जेब टटोली…
कुछ सिक्के… कुछ मुड़े हुए नोट…
“इतने में तो बस सत्तू ही मिलेगा…”
उसने एक लंबी साँस ली—
“नहीं… अभी नहीं…”
इच्छा को दबाकर वह आगे बढ़ गया।
रामविलास—पुराने बाज़ार का नामी व्यापारी।
मीठी बोली, हँसमुख चेहरा…
सालों की मेहनत से खड़ी की गई दुकान।
राजू वहीं काम करता था।
ईमानदार, फुर्तीला और चुपचाप अपना काम करने वाला।
कभी-कभी बड़े अफसर आते—
सेठ जी उन्हें सलाम करते।
राजू दूर खड़ा सोचता—
“कितने भाग्यशाली होंगे उनके बच्चे…
जिन्हें ऐसा बाप मिला है…
और मैं…?”
फिर खुद को समझाता—
“समय बदलेगा… मेरे दिन भी बदलेंगे…”
“अरे राजू!”
सेठ जी की आवाज़ ने उसे ख्यालों से बाहर खींच लिया।
“ये सामान ले… और यह लिस्ट… चेक पोस्ट पर बिरजू सिंह को दे आ।”
“जी सेठ जी।”
राजू तुरंत चल पड़ा।
पुराना बाज़ार…
संकरी गलियाँ… बजबजाती नालियाँ…
कूड़े के ढेर और प्लास्टिक से ढके छोटे-छोटे घर।
कमरे इतने छोटे कि साँस लेना भी भारी लगे।
बरसात में नालियों का पानी घरों में घुस जाता।
बीमारियाँ जैसे यहाँ मेहमान नहीं—स्थायी निवासी थीं।
वोट के समय नेता आते…
वायदों की बारिश करते…
फिर सब कुछ पहले जैसा।
बैसाख में पानी के लिए हाहाकार…
रात भर बर्तनों की खनखनाहट…
लंबी कतारें… झगड़े… थकान…
इन्हीं हालातों में जीवन चलता था।
हरिजन मोहल्ले के अंतिम छोर पर राजू का घर था।
पत्नी—सरला
बेटी—लाली
दो बेटे—शंकरा और टीनकरा
गरीबी ने बच्चों के चेहरे से बचपन की चमक छीन ली थी।
आज लाली का सत्रहवाँ जन्मदिन था।
घर से निकलते समय उसने धीमे स्वर में कहा था—
“पिताजी… मुझे एक मोबाइल चाहिए…”
राजू ने हाँ तो कर दी थी…
पर भीतर से जानता था—
यह उसके बस की बात नहीं।
महँगाई जैसे उसकी कमाई को निगल जाती थी।
कभी चावल होता—तो दाल नहीं।
कभी साबुन होता—तो सर्फ नहीं।
घर लौटते समय वह मोबाइल की दुकान के सामने से गुज़रा…
पर अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
चुपचाप आगे बढ़ गया।
घर पहुँचा—
सरला ने पानी और गुड़ दिया।
आँगन में पकौड़ियाँ बन रही थीं।
लाली की सहेलियाँ हँस-हँसकर कह रही थीं—
“लाली, मोबाइल दिखाओ!”
लाली की नज़र बार-बार दरवाज़े पर टिक जाती।
राजू चुपचाप अंदर चला गया।
आज पहली बार उसे अपनी गरीबी चुभी।
बहुत गहराई से।
वह टूट गया—
“सरला… मैं हार गया…
अपनी बेटी को एक मोबाइल भी नहीं दे सकता…”
इतने में मोहरी काका आ गए।
झुकी कमर… हाथ में लाठी…
“क्या हुआ रे राजू?”
सरला ने सब बताया।
काका ने लंबी साँस ली—
“एक जमाना था…
गरीब-अमीर सब साथ पढ़ते थे…
एक किताब कई बच्चों तक चलती थी…
अब तो पढ़ाई कम… व्यापार ज़्यादा हो गया है…
लेकिन सुन—
लाली पढ़ने में तेज है…
इसे मोबाइल दिला दे…
मेरा मन कहता है—
ये लड़की इस मोहल्ले का नाम रोशन करेगी।”
काका की बातों ने राजू को झकझोर दिया।
उसने आँसू पोंछे—
और मन ही मन ठान लिया—
“जो भी हो… लाली को पढ़ाऊँगा…”
तभी लाली दौड़कर आई—
“पिताजी… मुझे मोबाइल नहीं चाहिए…
मैं ऐसे ही पढ़ लूँगी…”
राजू ने उसकी ओर देखा—
आँखों में दर्द और दृढ़ता दोनों थे—
“नहीं बेटी…
अब मोबाइल जरूरी है…”
अगले दिन…
राजू ने हिम्मत जुटाई और सेठ जी से अपनी बात कह दी।
सेठ रामविलास चुपचाप सुनते रहे।
फिर उन्होंने बक्सा खोला…
एक पुराना लेकिन ठीक मोबाइल निकाला…
और कुछ पैसे भी दिए—
“ले राजू…
ये लाली के लिए…
और ये पैसे—मिठाई बाँट देना…”
राजू की आँखें भर आईं।
उसे अपना बचपन याद आ गया—
माता-पिता डायरिया में चल बसे थे…
तीसरी के बाद पढ़ाई छूट गई…
कभी होटल में बर्तन धोए…
कभी राशन दुकान में दिहाड़ी की…
जीवन ने उसे जल्दी बड़ा कर दिया था।
पर एक चीज़ उसने कभी नहीं छोड़ी—
ईमान और स्वाभिमान।

उस शाम…
राजू घर पहुँचा।
बिना कुछ कहे…
मोबाइल लाली के हाथ में रख दिया।
लाली स्तब्ध रह गई…
फिर उसकी आँखों में आँसू भर आए—
“पिताजी…!”
वह दौड़कर उनसे लिपट गई।
आँगन में खड़ी सहेलियाँ चुप हो गईं।
आज उस मोबाइल में सिर्फ एक यंत्र नहीं था—
एक पिता का संघर्ष था…
उसका प्रेम था…
उसका आत्मसम्मान था।
राजू के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी—
क्योंकि आज उसने सिर्फ एक चीज़ नहीं दी थी…
उसने अपनी बेटी की उम्मीद लौटा दी थी।
वह रात राजू के लिए दिवाली से कम न थी।
उसने प्रण किया—
गरीबी का रोना रोने से परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं।
उसने अपनी पत्नी सरला से बात की
और नज़दीक के एक मेस संचालक के यहाँ
टिफिन पैकिंग का काम भी पक्का कर लिया।
उसे लाली को पढ़ाना था।
लाली को जैसे उड़ने के लिए पंख मिल गए थे।
उसने फटाफट कई ऑनलाइन क्लास के ऐप डाउनलोड कर लिए।
अब उसे अपनी मंज़िल नज़दीक दिखने लगी थी।
उस छोटे-से घर में
उस दिन कोई त्योहार नहीं था…
फिर भी—
रोशनी थी…
उम्मीद थी…
और विश्वास था…
अब उस घर में गरीबी थी…
लेकिन हार नहीं ।
जयगुरु 🙏🙏🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम