अजनबी - 5 Sonam Brijwasi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अजनबी - 5

तीनों एकदम सन्न खड़े थे…नज़रें ज़मीन पर जमी हुईं…वो चौथी परछाई…स्पष्ट दिख रही थी…

रिद्धि की उंगलियां कांपने लगीं वो बोली—
त… तुम लोग भी देख रहे हो ना…?

अपर्णा ने धीमे से सिर हिलाया और बोली—
हां… ये… ये हमारे साथ चल रही है…

विशाल कुछ बोल नहीं पाया…कुछ सेकंड…बस सन्नाटा…फिर अचानक , रिद्धि ने अपनी आंखें कसकर बंद कीं…और जोर से मिचमिचाईं…

वो बोली - 
नहीं! ये सच नहीं है… ये बस डर है…

अपर्णा ने भी वैसा ही किया…विशाल ने भी गहरी सांस लेकर आंखें बंद कीं…तीनों ने एक साथ…दोबारा आंखें खोलीं…और…सड़क पर…अब सिर्फ तीन परछाइयां थीं…कोई चौथी नहीं…। तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा…कुछ पल तक…जैसे कोई यकीन ही नहीं कर पा रहा था…।

फिर विशाल ने हल्की सी हंसी छोड़ी और बोला—
ओह माय गॉड… हम सच में पागल हो रहे हैं…।

रिद्धि ने राहत की सांस ली और बोली —
सच में… इतना डर गए हैं कि अब वहम होने लगा है…।

अपर्णा भी मुस्कुरा दी और बोली—
हाँ… अब जो दिख रहा है… वो भी असली है या नहीं… पता नहीं…।

तीनों ने खुद को संभालने की कोशिश की…अब वो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे…थोड़ा सामान्य होने की कोशिश करते हुए…लेकिन…
इस बार…उनकी चाल में एक संकोच था…जैसे…उन्हें खुद पर भी भरोसा नहीं रहा…तभी…।

विशाल ने casually कहा —
चलो अच्छा है… अब कम से कम वो सब खत्म—

वो अचानक रुक गया…

रिद्धि ने पूछा - 
क्या हुआ?

विशाल ने धीरे-धीरे सिर उठाया…उसकी आंखें फैल गईं…

वो बोला - 
हम… तीन ही हैं ना…?

रिद्धि और अपर्णा एकदम चौंकीं और बोलीं—
हाँ! अभी तो—

विशाल की आवाज़ सूख गई वो बोला - 
तो फिर…ये… चौथी आवाज़ कौन है…?

रिद्धि और अपर्णा के कानों में भी…अब साफ़ सुनाई देने लगा…उनके कदमों के साथ-साथ…एक और कदमों की आवाज़…धीमी…
सटीक…और बिल्कुल उनके साथ ताल में…तीनों ने एक साथ चलना बंद किया…आवाज़ भी रुक गई…तीनों ने धीरे-धीरे एक-दूसरे की तरफ देखा…कोई कुछ नहीं बोला…और फिर…
तीनों ने एक साथ…अपने पीछे मुड़कर देखा…अंधेरा, खाली सड़क…लेकिन…उसी अंधेरे से…एक बहुत धीमी…

फुसफुसाती हुई आवाज़ आई —
अब… सिर्फ वहम नहीं है…

रिद्धि ने खुद को संभालते हुए हल्की हंसी में कहा —
चलो यार… बस वहम है… हम ज़्यादा सोच रहे हैं…

विशाल और अपर्णा ने भी हां में सिर हिलाया…तीनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे…तभी…रिद्धि ने अपनी कलाई उठाई , घड़ी देखने लगी…

वो बोली - 
कितने बजे—

उसकी बात अधूरी रह गई…क्योंकि उसी पल…विशाल और अपर्णा आगे निकल गए…कुछ कदम…फिर विशाल अचानक रुका —

वो बोला - 
अरे… रिद्धि पीछे रह गई…

अपर्णा ने पीछे मुड़कर देखा , और…उसकी सांस अटक गई…

वो बोली - 
वि… विशाल…

विशाल बोला - 
क्या हुआ?

अपर्णा बोली - 
वो… वहां… कोई नहीं है…

विशाल ने तुरंत पीछे देखा…सड़क… खाली…ना रिद्धि…ना उसकी परछाई…कुछ भी नहीं…दोनों के चेहरे से खून उड़ गया…।

विशाल बोला - 
अभी तो यहीं थी…

विशाल की आवाज़ कांप गई।

अपर्णा के हाथ ठंडे पड़ गए वो बोली—
वो… घड़ी देख रही थी… और फिर…

दोनों के बीच सन्नाटा छा गया…तभी…अपर्णा को अचानक कुछ याद आया…

उसने धीरे-धीरे विशाल की तरफ देखा और बोली—
रिद्धि… क्या कह रही थी अभी…?

विशाल की आंखें फैल गईं…

दोनों के दिमाग में एक साथ वही बात गूंजी —
हम पक्का तीन ही हैं ना…?

अपर्णा के होंठ सूख गए वो बोली—
कहीं…

विशाल ने उसकी बात पूरी की —
दो तो नहीं…?

दोनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई…अगर…अगर शुरू से…तीन नहीं… सिर्फ दो ही थे…?
तो फिर…तीसरा कौन था…?
तभी…पीछे से…

एक जानी-पहचानी आवाज़ आई —
तुम लोग मुझे छोड़कर कहां जा रहे हो…?

दोनों धीरे-धीरे मुड़े…सामने…रिद्धि खड़ी थी…लेकिन…इस बार…
उसकी मुस्कान…पहले जैसी नहीं थी....उसकी आंखें…पूरी काली हो चुकी थीं…और वो…धीरे-धीरे… उनकी तरफ बढ़ रही थी…।

रिद्धि को उस हालत में देखकर…विशाल और अपर्णा के शरीर से जैसे जान निकल गई…।

विशाल बोला - 
भागो!!!

दोनों बिना एक पल गंवाए…उल्टी दिशा में भाग निकले…।

पीछे से रिद्धि की आवाज़ गूंज रही थी —
रुको… मैं भी तो आ रही हूं…।

लेकिन…उस आवाज़ में अब वो रिद्धि नहीं थी…बस एक खालीपन था…दोनों भागते रहे…सांसें टूटती रहीं…पैर जवाब दे रहे थे…। पर वो रुके नहीं…जब तक…आखिरकार…वो घर नहीं पहुंच गए…।
दरवाज़ा बंद…कुंडी लगाई…और दोनों वहीं फर्श पर गिर पड़े…।
कुछ मिनट तक…सिर्फ सन्नाटा…। फिर…ट्रिन… ट्रिन…विशाल का फोन बजा…उसका हाथ कांप गया…स्क्रीन पर नाम देखकर…
उसकी रूह कांप गई —
Riddhi Calling…

अपर्णा ने डरते हुए उसकी तरफ देखा और बोली—
उ… उठाओ…

विशाल ने कांपते हाथों से कॉल उठाई और बोला—
ह… हेलो…?

दूसरी तरफ से वही जानी-पहचानी आवाज़ आई —
विशाल… सॉरी! मैं आज नहीं आ पाऊंगी…

विशाल के दिल की धड़कन रुक गई वो बोला—
क… क्यों?

रिद्धि ने बिल्कुल सामान्य लहजे में कहा —
वो क्या है ना… मैं अभी तक नोएडा से लौटी ही नहीं हूं…।

कुछ सेकंड…कोई आवाज़ नहीं…विशाल का खून जैसे जम गया…
उसने धीरे-धीरे अपर्णा की तरफ देखा…अपर्णा भी उसे ही देख रही थी…

दोनों के दिमाग में एक ही सवाल गूंज रहा था —
अगर रिद्धि नोएडा में थी…तो… उनके साथ कौन था…?

तभी…दरवाज़े पर…धीरे-धीरे…खट… खट…दोनों की नजर दरवाज़े पर टिक गई…

और बाहर से…वही आवाज़ आई —
विशाल… दरवाज़ा खोलो…मैं आ गई…।

The End… 👁️‍🗨️