अध्याय 4: रूहानी भूल-भुलैया
तहखाने की उस ठंडी और घुटन भरी हवा में आर्यन का दम घुटने लगा था। उसके हाथ में मौजूद डायरी जैसे-जैसे वह पढ़ रहा था, उसे महसूस हो रहा था कि वह कागज़ नहीं, बल्कि किसी की धड़कती हुई खाल को छू रहा है। ऊपर छत पर चिपकी वह औरत—ज़ोया—अचानक एक चीख के साथ नीचे झपटी। आर्यन ने फुर्ती से खुद को एक तरफ फेंका और वह औरत ज़मीन पर किसी जानवर की तरह चारों पैरों पर लैंड हुई। उसकी सफेद आँखों में कोई रहम नहीं था, सिर्फ सदियों पुरानी प्यास थी।
"तुम... तुम क्या चाहती हो?" आर्यन की आवाज़ कांप रही थी। उसने अपना टूटा हुआ कैमरा और बैग उठाया और सीढ़ियों की तरफ भागा।
लेकिन जैसे ही वह तहखाने से बाहर हॉल में पहुँचा, उसके होश उड़ गए। जो हॉल कुछ देर पहले विशाल और खाली था, वह अब एक अंतहीन गलियारे (corridor) में बदल चुका था। आर्यन जिस भी दरवाज़े को खोलता, वह वापस उसी पुराने हॉल में पहुँच जाता जहाँ ठाकुर विक्रम सिंह की तस्वीर उसे देख कर मुस्कुरा रही थी। हवेली ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया था—वह अब एक ज़िंदा भूल-भुलैया बन चुकी थी।
आर्यन गलियारे में भाग रहा था कि तभी उसे एक कमरे से बच्चों के हंसने की आवाज़ सुनाई दी। वह रुका। कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला था। अंदर एक पुरानी लकड़ी की गुड़िया (doll) फर्श पर बैठी थी, जिसके गले में वही लाल धागा बंधा था जो गाँव के बरगद के पेड़ पर था। अचानक गुड़िया का सिर 360 डिग्री घूम गया और उसने आर्यन की तरफ देखा। गुड़िया के मुँह से ठाकुर विक्रम सिंह की भारी आवाज़ निकली— "बेटा, रायचंद खानदान का कर्ज सिर्फ खून से उतरता है... भागो मत, स्वीकार करो।"
तभी गलियारे की सारी मोमबत्तियाँ एक साथ बुझ गईं। अंधेरे में आर्यन को महसूस हुआ कि दीवारें पास आ रही हैं। वह दीवारों को छूने लगा, तो उसे पत्थर की जगह मांस और हड्डियों का अहसास हुआ। हवेली की दीवारें धड़क रही थीं! अचानक उसे याद आया कि डायरी के आखिरी पन्ने पर एक नक्शा बना था। उसने अपनी जेब से टॉर्च निकाली और डायरी खोली। नक्शे में एक 'मुक्ति द्वार' का ज़िक्र था जो हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल, यानी 'अटारी' (Attic) में था।
वह जैसे ही ऊपर की तरफ भागा, उसे पीछे से ज़ोया के नाखूनों के फर्श पर घिसटने की आवाज़ सुनाई दी— खुरच... खुरच... खुरच... वह पास आ रही थी। आर्यन सीढ़ियों पर चढ़ा, लेकिन हर सीढ़ी चढ़ते ही वह और नीचे गिर जाता। समय और दिशा का सारा बोध खत्म हो चुका था। तभी उसे छत से लटकते हुए दर्जनों काले साये दिखे, जो हवा में झूल रहे थे। वे सब वही लोग थे जो पिछले सौ सालों में इस हवेली में आए और कभी वापस नहीं गए।
आर्यन ने अपनी आँखें बंद कीं और डायरी में लिखा वह मंत्र ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने लगा जो ज़ोया को शांत करने के लिए था। जैसे ही उसने पहला शब्द बोला, पूरी हवेली में एक दर्दनाक चीख गूँजी और फर्श ज़ोर से फटने लगा। अब आर्यन के पास सिर्फ दो रास्ते थे—या तो वह उस अटारी तक पहुँचे, या फिर हमेशा के लिए इन दीवारों का हिस्सा बन जाए।