राज-ए-खंडहर: श्रापित विरासत - 5 Dev Kumar Rawat द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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राज-ए-खंडहर: श्रापित विरासत - 5

अध्याय 5: स्याही का काला सच


आर्यन की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। 'स्याही' गाँव का वह खौफनाक सन्नाटा अब हवेली के अंदर एक गूँजती हुई चीख में बदल चुका था। जैसे ही उसने 'अटारी' (Attic) का दरवाज़ा खोला, उसे लगा जैसे वह वक्त के किसी पुराने हिस्से में पहुँच गया हो। वहाँ चारों तरफ पुरानी कड़ियों से लटकी हुई जंजीरें थीं और फर्श पर वही 'स्याही' जैसा काला गाढ़ा तरल पदार्थ फैला था, जो दीवारों से धीरे-धीरे रिस रहा था।

कमरे के बीचों-बीच एक बड़ा आदमकद आईना रखा था, लेकिन उसमें धूल नहीं थी—वह आईना चमक रहा था। आर्यन जैसे ही उसके करीब गया, उसका अक्स (reflection) उसे दिखाई नहीं दिया। आईने के अंदर उसे 1920 का नज़ारा दिखने लगा। उसने देखा कि ठाकुर विक्रम सिंह—जो बिल्कुल आर्यन जैसा दिखता था—एक बेबस औरत, ज़ोया, को इन्हीं जंजीरों से जकड़ रहा है।

"नहीं! यह मैं नहीं हूँ!" आर्यन चिल्लाया।

तभी आईने से ज़ोया का हाथ बाहर निकला और उसने आर्यन की कमीज़ पकड़ ली। ज़ोया की आवाज़ अब गूँज रही थी, "तुम वही हो... वही रूह, वही गुनहगार। सौ साल पहले तुमने मुझे इस अंधेरे में छोड़ा था, आज तुम खुद इस अंधेरे का हिस्सा बनोगे।"

आर्यन ने झटके से पीछे हटकर अपनी डायरी खोली। उसे वह 'मुक्ति मंत्र' पढ़ना था, लेकिन जैसे ही उसने पन्ना पलटा, उसने देखा कि डायरी के शब्द गायब हो रहे थे। वह काला तरल पदार्थ (स्याही) पन्नों पर फैल रहा था और शब्दों को निगल रहा था। तभी उसे अहसास हुआ—यह साधारण स्याही नहीं थी, यह ज़ोया का क्रोध था जो हर सबूत को मिटा देना चाहता था।

अचानक, अटारी की खिड़कियाँ ज़ोर से टूटीं और बाहर का काला कोहरा कमरे के अंदर भर गया। आर्यन को लगा जैसे हज़ारों ठंडे हाथ उसे ज़मीन के अंदर खींच रहे हों। उसने ज़मीन पर गिरे हुए दीये को उठाया और उसे उस काली स्याही पर फेंक दिया। "अगर मैं यहाँ से नहीं जा सकता, तो यह श्राप भी यहाँ नहीं रहेगा!"

आग तेज़ी से फैलने लगी। आग की लपटें नीली थीं, जो इस बात का संकेत थीं कि यहाँ कुछ अलौकिक (supernatural) घट रहा है। ज़ोया की रूह आग की लपटों के बीच तड़पने लगी। उसकी आँखों की सफेदी अब अंगारों की तरह दहकने लगी थी। हवेली की दीवारें फटने लगीं और ऐसा लगा जैसे पूरी पहाड़ी ही नीचे धंस रही हो।

आर्यन ने आखिरी बार आईने की तरफ देखा। वहाँ ठाकुर विक्रम सिंह का चेहरा अब आर्यन के चेहरे में बदल चुका था और वह ज़ोर-ज़ोर से हंस रहा था। आर्यन ने अपनी पूरी ताकत लगाई और खिड़की से बाहर छलांग लगा दी। नीचे गहरी खाई थी और आँखों के सामने सिर्फ अंधेरा।

जब उसकी आँखें खुलीं, तो वह 'स्याही' गाँव के उसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे लेटा था। सूरज की पहली किरणें निकल रही थीं। गाँव के लोग उसे दूर से खड़े होकर ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने कोई चमत्कार देख लिया हो। आर्यन ने अपनी जेब में हाथ डाला, तो उसे वह पुरानी डायरी मिली। उसने उसे खोला, तो वह पूरी खाली थी—सिर्फ आखिरी पन्ने पर ताज़ा 'स्याही' से एक लाइन लिखी थी:

"शुक्रिया आर्यन... मुझे हवेली से बाहर निकालने के लिए।"
आर्यन का शरीर बर्फ जैसा ठंडा पड़ गया। उसने अपने हाथ देखे—उसके नाखूनों के पोरों पर वही काली स्याही लगी थी जो कभी मिटने वाली नहीं थी।