भक्त प्रह्लाद - 19 Siya Kashyap द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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भक्त प्रह्लाद - 19

भगवान् नरसिंह का अवतार

क्षीर सागर में लेटे भगवान् विष्णु माता लक्ष्मी की ओर देखकर मुसकरा रहे थे। उन्होंने माता लक्ष्मी के मुखमंडल पर चिंता की रेखाओं को देखते हुए कहा, “क्या बात है महामाया! तुम इतनी चिंतित क्यों हो ?” 

“प्रभु! मैं भली-भाँति जानती हूँ कि आप मेरी चिंता के कारण से परिचित हैं तो फिर मैं क्या वर्णन करूँ ?” माता लक्ष्मी गंभीर स्वर में बोलीं।

“तुम्हारा कथन सत्य है देवी!” प्रभु ने मुसकराते हुए कहा, “हम तुम्हारी चिंताओं के कारण से ही नहीं, बल्कि लोक-परलोक की चिंताओं के कारण से भी भली प्रकार परिचित हैं।”

“प्रभु! तो फिर आप इन चिंताओं के निवारण हेतु कुछ कीजिए।” माता लक्ष्मी ने कहा। 

“देवी! तुम्हारी दिव्य दृष्टि जिस दृश्य का अवलोकन कर रही है, वह दृश्य हमारी दृष्टि से बचा नहीं है। अब शीघ्र ही इस दृश्य का पटाक्षेप होने वाला है।” प्रभु ने मंद-मंद मुसकराते हुए कहा।

“हाँ प्रभु! हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रह्लाद पर न जाने कैसे-कैसे अत्याचार किए हैं, जिन्हें याद करते ही हृदय काँप उठता है। वह तो केवल कहने मात्र को ही पिता है, किंतु अपनी संतान को कोई इस प्रकार के कठोर दंड दे सकता है, इसकी कल्पना करना भी कठिन है।” माता लक्ष्मी ने कहा।

“तुम्हारा कथन सत्य है देवी!” प्रभु बोले, “हिरण्यकशिपु के अत्याचार अब चरम बिंदु पर पहुँच गए हैं। जब ऐसा होता है तो फिर उसे उसके किए का दंड भी अवश्य ही मिलता है।”

“आपके कहने का तात्पर्य यह है कि अब आप सृष्टि में एक नए अवतार के साथ अवतरित होने वाले हैं।” माता लक्ष्मी ने गंभीरता से कहा।

माता लक्ष्मी की बातें सुनकर प्रभु मुसकराने लगे। उन्हें मुसकराते देखकर माता लक्ष्मी धीरे से बोलीं, “प्रभु! आप तो भक्त-वत्सल हैं, किंतु आपके भक्त को जिस प्रकार क्षण प्रतिक्षण यातनाएँ देकर सताया जा रहा है, वह भीषण अत्याचार की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या हैं? आपको शीघ्रातिशीघ्र इस दिशा में कुछ करना चाहिए।”

”देवी! शीघ्र ही आपकी इच्छानुकूल परिणाम सामने आने वाला है।” प्रभु ने मानो माता लक्ष्मी को सांत्वना दी। “प्रभु! प्रह्लाद की भक्ति भावना अनुकरणीय है कि उसे इतनी भीषण यातनाएँ दी जा रही हैं और वह सबकुछ आपके नाम पर हँसते-हँसते सहन कर रहा है।” माता लक्ष्मी चिंतित स्वर में बोलीं।

“अपनी आँखों से देख लो महादेवी! इतने कष्ट सहने पर भी हमारा प्रिय भक्त अपनी भक्ति पर कोई आँच नहीं आने दे रहा है।” श्रीविष्णु ने शेषशय्या से उठकर बैठते हुए कहा।

“हाँ प्रभु! कभी उसे अग्नि में जलाने का प्रयास किया जा रहा है तो कभी विष पिलाकर मारने का प्रयास किया जा रहा है, कभी नदी के गहरे जल में प्रवाहित किया जा रहा है तो कभी पर्वत शिखर से गहरी घाटी में धकेला जा रहा है। न जाने उस पर कैसे-कैसे अत्याचार किए जा रहे हैं।” माता लक्ष्मी ने कहा।

“महादेवी! आप इस कथन से भली-भाँति परिचित हैं कि सांसारिक कष्ट ही मेरे भक्त को भक्ति की कसौटी पर कसते हैं। यदि उन पर कोई कष्ट न आए उन्हें किसी विपत्ति का सामना न करना पड़े तो मेरे भक्तों की निर्मल भक्ति को उज्ज्वल स्वरूप कैसे प्राप्त होगा, किंतु भक्तों पर कष्टों और विपत्तियों का यह सिलसिला अधिक लंबे समय तक नहीं चलता।” प्रभु ने माता लक्ष्मी की ओर देखते हुए कहा।

प्रभु ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “इन कष्टों और विपत्तियों का दौर तब तक चलता है, जब तक मेरे भक्त अपनी सदाशयता के कारण मुझे नहीं पुकारते। जब भक्तों को यह दिखाई देने लगता है कि अत्याचारी किसी भी प्रयास से नहीं सुधर सकता और उसके अत्याचारों में कोई भी कमी नहीं आती तथा भक्तों की भक्ति को कसौटी पर कसा जाता है। ऐसे में हम अपने भक्तों की गरिमा को बनाए रखने का हर संभव प्रयास करते हैं।”

“प्रभु! आपके लिए संभव और असंभव की कोई बात ही नहीं है।” माता लक्ष्मी स्तुति के स्वर में बोलीं।

“देवी! हमने सृष्टि में जिन विडंबनाओं को सृजित किया है, हम प्राणियों से उनका न केवल पालन कराते हैं, बल्कि स्वयं भी पालन करते हैं। यह हमारा कोई आदेश नहीं, बल्कि हमारी इच्छा है। जब हमने संभव की रचना की है तो असंभव का सृजन भी यह विचार करते हुए किया था कि किसी अपवादित समय में निश्चय ही असंभव को भी संभव करने की आवश्यकता पड़ेगी और फिर तभी तो हमारे भक्त हमारा अनुकरण कर सकेंगे।” प्रभु ने मंद मुसकान के साथ कहा।

“प्रभु! आपके विधान और सृजनता को ग्रहण करना जितना सरल है, उसे समझना उतना ही कठिन है।” माता लक्ष्मी धीरे से बोलीं।

“देवी! यदि सृष्टि में हमारे किसी भी अंशरूप ने किसी प्राणी को कोई वर या शाप दे दिया तो फिर हमारे लिए भी यह आवश्यक हो जाता है कि उस वर या शाप के संबंध में निर्धारित अपेक्षाओं का पालन किया जाए।” प्रभु अपनी बात स्पष्ट करते हुए बोले, “यदि हम चाहें तो ऐसा न करके भी काम चला सकते हैं, किंतु हम उनके विपरीत कुछ भी करना उचित नहीं समझते। जो भक्त या हमारे अंशरूप जब वर या शाप का प्रभाव किसी को प्रदान करते हैं तो यदि हम उनके वर या शाप के विपरीत फल प्रदान कर दें तो यह न केवल उनका अपमान होगा अपितु यह उनकी भक्ति और स्वयं हमारा भी अपमान होगा। अतः हम अपने भक्त की गरिमा बनाए रखने का हर संभव प्रयास करते हैं।”

“प्रभु! इसमें कोई संदेह नहीं कि आप असंभव को संभव बना सकते हैं।” माता लक्ष्मी प्रभु के चरण दबाते हुए बोलीं।

“देवी! हमारे कहने का अर्थ भी तो यही है कि जो कार्य हम संभव कर सकते हैं, उसी कार्य को असंभव होते हुए भी हमारे भक्त संभव करने का प्रयास करते हैं।” प्रभु रहस्यमयी वाणी में बोले। 

“प्रभु! यह किस प्रकार संभव है?” माता लक्ष्मी ने प्रश्न किया।

“देवी! एक ओर तो तुम हमारे लिए संभव असंभव को तुच्छ समझती हो, वहीं दूसरी ओर हमारे भक्तों के लिए असंभव को संभव करने की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा रही हो।” प्रभु मुसकराते हुए बोले, “क्या तुम इस बात से परिचित नहीं कि जैसी हमारी इच्छा होती है, हमारे भक्त वैसा ही करते हैं या यह समझें कि जैसा हमारे भक्त करते हैं, उसे हम पूर्ण करते हैं।”

“निस्संदेह! आपका कथन सर्वथा उचित है, प्रभु!”

प्रभु ने आगे कहा, “देवी! यदि हमारे भक्त ने किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए हमारी स्तुति की तो वह कार्य पूर्ण करने के लिए हमें वहाँ जाना ही होता है, जैसा कि अब वह समय निकट है।”

“कैसा समय, प्रभु ?” माता लक्ष्मी उत्सुकता से बोलीं।

“आज भक्त प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु के अत्याचारों से मुक्त कराने का समय आ गया है।” प्रभु माता लक्ष्मी की ओर देखते हुए बोले, “आज सांसारिक दृष्टि से असंभव समझे जाने वाले कार्य को संभव करने हेतु हमें वहाँ जाना होगा।”

“किंतु प्रभु! ब्रह्माजी ने तो हिरण्यकशिपु को ऐसा वरदान दिया हुआ है कि उसका अंत करना अत्यंत कठिन कार्य है।” माता लक्ष्मी चिंतित स्वर में बोलीं।

“बस, यही कारण है कि हिरण्यकशिपु अभिमानी हो गया और अभिमानवश वह तरह-तरह के अत्याचार कर रहा है, किंतु अब उसके अत्याचार सीमा को पार कर गए हैं।” प्रभु ने कहा।

प्रभु की भाव-भंगिमा को देखते हुए माता लक्ष्मी सचेत होकर मूक भाव से उन्हें निहारने लगीं। उनके मन में अनेक प्रश्नों का कोलाहल मचा हुआ था।

कुछ क्षणों के पश्चात् स्वयं प्रभु ही बोले, “यदि हमारे भक्त पर अत्याचार होते रहे और उसे तरह-तरह से सताया जाता रहा, तो भला हम कब तक यह सहन कर सकते हैं। अपने भक्त की करुण पुकार सुनकर हमें उसकी सहायता के लिए जाना ही पड़ता है।”

अपने वार्त्तालाप के दौरान प्रभु श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी दिव्य दृष्टि से देख रहे थे कि हिरण्यकशिपु का दरबार लगा हुआ है, जहाँ वाद-प्रतिवाद का क्रम जारी है।

हिरण्यकशिपु हुंकार भर रहा है, जिससे आकाश प्रकंपित होता प्रतीत हो रहा है, किंतु भक्त प्रह्लाद पर उसकी भीषण हुंकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

जब हिरण्यकशिपु के डराने-धमकाने का प्रह्लाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो वह चीखता हुआ हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिये प्रह्लाद की ओर दौड़ा, “कुलघाती! तूने जो निर्लज्जता की है, हम तुझे उसका बोध कराते हैं।” 

“पिताश्री! आप शांत हो जाइए।” प्रह्लाद ने कहा, “क्रोध में किया गया कार्य सदैव हानि देने वाला होता है।”

“अब तो हम शांत तभी होंगे, जब तेरा संहार कर देंगे।” हिरण्यकशिपु गरजते हुए बोला, “बुला ले आज अपने उस आराध्य देव विष्णु को, जो कण-कण में व्याप्त है। आज वह भी हमारी शक्ति से परिचित हो जाएगा कि हम कितने शक्तिशाली हैं।”

“पिताश्री! मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास है, यदि मुझे सहायता की आवश्यकता पड़ी तो वे अवश्य ही मेरी सहायता के लिए प्रकट होंगे।” प्रह्लाद ने कहा।

“तो फिर आज तुझे सहायता की आवश्यकता अवश्य ही पड़ेगी। पुकार अपने प्रभु को, वह इस तप्त स्तंभ से प्रकट हो।” हिरण्यकशिपु हुंकारते हुए बोला, यदि तू सच्चा है और तेरा भगवान् सच्चा है, तो मेरे सम्मुख बुलाकर दिखा अपने भगवान् को, अन्यथा मैं समझूगा कि तेरा भगवान् भुलावा है, भ्रम है।”

हिरण्यकशिपु का इतना कहना था कि प्रह्लाद ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस तप्त स्तंभ के सम्मुख शीश झुकाकर अपने आराध्य देव की स्तुति करने लगा, “प्रभु! समस्त संसार के पालनहार! यदि मेरी भक्ति पावन और पवित्र है तो आज आपको मेरी भक्ति की लाज रखने के लिए इस तप्त स्तंभ से प्रकट होना ही होगा, आपको शीघ्र ही इस स्तंभ से प्रकट होना होगा।”

प्रह्लाद को अपने आराध्य देव की स्तुति करते देख हिरण्यकशिपु जोर-जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगा, “हा... हा... हा...अरे ओ मूर्ख! इस स्तंभ से अपने प्रभु के प्रकट होने का आह्वान कर रहा है। यह असंभव है और फिर क्या तू यह नहीं जानता कि हम सर्वशक्तिमान हैं, विश्वविजयी हैं तो वह हमारे सम्मुख प्रकट होने का साहस भला कैसे करेगा!”

प्रह्लाद का ध्यान हिरण्यकशिपु की किसी भी बात पर नहीं था। उनका ध्यान तो केवल अपने प्रभु की स्तुति में लगा हुआ था।

एक ओर तो हिरण्यकशिपु प्रह्लाद का अंत करने के लिए आतुर हो रहा था, वहीं दूसरी ओर वह यह देखकर आश्चर्यचकित भी हो रहा था कि उसके सम्मुख तो देवराज इंद्र भी बोलने का साहस नहीं करते तो फिर एक छोटे से बालक में इस प्रकार वाद-प्रतिवाद करने का साहस कैसे उत्पन्न हुआ।

माता लक्ष्मी अपनी दिव्य दृष्टि से हिरण्यकशिपु के दरबार का दृश्यावलोकन कर रही थीं और प्रह्लाद की निर्दोष एवं निश्छल छवि देखकर वात्सल्य और स्नेह की परिपूर्णता का अनुभव भी कर रही थीं।

हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को तलवार की भेंट चढ़ाने के लिए उद्यत तो था, किंतु वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहा था, दूसरी ओर प्रह्लाद को मृत्यु का कोई भय नहीं था। वह तो हर प्रकार के भय को त्यागकर अपने प्रभु की स्तुति में मग्न था। उसने स्वयं को अपने प्रभु के अर्पण कर दिया था। उनकी निश्चिंतता देखकर हिरण्यकशिपु मन-ही-मन कुढ़ता जा रहा था।

उधर क्षीर सागर में अपने भक्त प्रह्लाद की करुण पुकार सुनकर भगवान् विष्णु शेषशय्या से उठ खड़े हुए। उनका भक्त उन्हें पुकारे और वे उसकी पुकार न सुनें, ऐसा कभी नहीं हो सकता।

माता लक्ष्मी के कानों में प्रह्लाद की करुण पुकार गूँज रही थी, “मेरे प्रभु! आज आपको इस धातु के स्तंभ से प्रकट होना ही होगा... आज आपको मेरी भक्ति की लाज रखनी ही होगी।”

“हा... हा... हा... तेरा प्रभु नहीं आने वाला।” हिरण्यकशिपु जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए कह रहा था, “नहीं आने वाला और वह आएगा भी कैसे, इस स्तंभ से ? नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता।”

यह कहकर जब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद पर तलवार का वार करना चाहा तो वहाँ एक भीषण गर्जना हुई, इससे संपूर्ण दरबार काँप उठा। जो हिरण्यकशिपु अभी कुछ समय पहले जोरदार ठहके लगा रहा था, इस भीषण गर्जना के कारण उसका हृदय भी भय के मारे प्रकंपित हो उठा।

सभी दरबारियों ने जब भीषण गर्जना करते हुए एक दिव्य आकृति को उस तप्त स्तंभ में से प्रकट होते हुए देखा तो उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गई। उन्होंने देखा कि उस आकृति का मुख सिंह का और शेष शरीर मनुष्य का था। यह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान् विष्णु थे, जो अपने भक्त प्रह्लाद की करुण पुकार सुनकर नरसिंह के रूप में स्तंभ से प्रकट हुए थे।

भगवान नरसिंह का स्वरूप देखकर दरबारियों के रोंगटे खड़े हो गए। उनका स्वरूप अत्यंत विशाल था और सूर्य के तेज से भी ज्यादा चमकती हुई उनकी बड़ी-बड़ी आँखें थीं, जिनकी ओर देखने का साहस न होता था। उनके सिर पर इतने घने व बड़े बाल थे, जो उनकी गरदन तक लटक रहे थे। उनके विशाल दाँत विकराल व अत्यंत चमकीले थे। उनका मुख ऐसे खुला हुआ था, जैसे वे रक्तपान करने के लिए आतुर हों। उनके चार हाथ थे, जिनमें शंख, पद्म, गदा और चक्र धारण किए हुए थे। उनके इस स्वरूप को देखकर कोई भी प्राणी भयभीत हो सकता था।

हिरण्यकशिपु के लिए यह विश्वास करना अत्यंत कठिन हो रहा था कि धातु के तप्त स्तंभ से कोई भी प्राणी कैसे प्रकट हो सकता है! उसकी आँखें यह दृश्य देखकर आश्चर्य से फटी जा रही थीं। भगवान् नरसिंह के रूप ने तो उसे अंदर तक हिलाकर रख दिया था। वह उनके विशाल स्वरूप के सामने स्वयं को बौना सा अनुभव कर रहा था।

भगवान् नरसिंह के स्वरूप को देखकर भयभीत हिरण्यकशिपु शीघ्र ही सँभल गया। चूँकि उसे इस बात का अभिमान था कि वह अजेय है और कोई उसे मार नहीं सकता, इसीलिए वह जोर-जोर से अट्टहास करने लगा। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि नरसिंह के रूप में स्तंभ से प्रकट होने वाले यह कोई और नहीं, बल्कि भगवान् विष्णु ही हैं। वह यह विचार करने लगा कि यदि उसने नरसिंह रूपी विष्णु को समाप्त कर दिया तो फिर संपूर्ण सृष्टि चक्र का वह एकमात्र अधिपति बन जाएगा। यही सोचकर वह तलवार लिये भगवान् नरसिंह के सामने आ धमका और बोला, “ अरे ओ विष्णु! तुम्हीं ने वराह का रूप धरकर छल से मेरे भाई हिरण्याक्ष का वध किया था। मुझे बहुत लंबे समय से तुम्हारी प्रतीक्षा थी। आज तुमसे सामना हो ही गया। अब मैं तुम्हें समाप्त करके अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लूँगा।”

हिरण्यकशिपु की बात सुनकर भगवान् नरसिंह ने भीषण गर्जना की, जिससे दरबार का कोना-कोना प्रकंपित हो उठा।

प्रत्युत्तर में हिरण्यकशिपु भी गरज उठा, “तुम मेरा संहार कदापि नहीं कर सकते विष्णु। मुझे ब्रह्माजी से अजेय होने का वरदान प्राप्त है। मैं अमर हूँ, अमर... हा... हा...हा।”

“अरे ओ दुष्ट! यह तेरा भ्रम मात्र है कि तू अजेय है।” भगवान् नरसिंह गर्जना करते हुए बोले, “अब तेरा अंतकाल निकट है। अपनी मृत्यु का स्वागत करने के लिए तैयार हो जा।”

“मृत्यु! हा...हा...हा...।” हिरण्यकशिपु जोरों से ठहाके लगाते हुए बोला, “मैं अमर हूँ और मुझे सृष्टि का कोई भी प्राणी नहीं मार सकता।”

“अत्याचारी राक्षस! यह तेरा मिथ्या अहंकार बोल रहा है।” भगवान् नरसिंह ने गर्जना करते हुए कहा, “जरा ध्यान से देख, क्या हमारा सृजन ब्रह्मा के कर कमलों से हुआ है ?”

“न... नहीं!” अनायास हिरण्यकशिपु के मुख से निकला। जब उसने बड़े ध्यान से भगवान् नरसिंह का अवलोकन किया तो उसके मुख पर भय स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने लगा।

“जरा ध्यान से देख कि इस समय प्रकाश फैला हुआ है अथवा अंधकार ?” भगवान् नरसिंह ने पुनः गर्जना की। हिरण्यकशिपु ने देखा कि इस समय तो सूर्यास्त होने वाला है, अर्थात् दिन की समाप्ति हो रही है और रात्रि का प्रथम प्रहर आरंभ होने वाला है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि न तो दिन है और न ही रात।

यह विचार करते ही हिरण्यकशिपु का हृदय प्रकंपित हो उठा। उसने सोचा कि ब्रह्माजी से प्राप्त वरदान के अनुसार भगवान् नरसिंह न तो उनके द्वारा सृजित सृष्टि का कोई प्राणी है और न ही इस समय दिन है और न रात अर्थात् भगवान् विष्णु इसे उपयुक्त समय जानकर उसका अंत कर सकते हैं।

बस, फिर क्या! हिरण्यकशिपु ने तीव्र वेग से भगवान् नरसिंह पर अपनी तलवार से प्रहार कर दिया, किंतु वह प्रहार निशाने पर न लगा। बड़ी फुरती से भगवान् नरसिंह ने स्वयं को उसके प्रहार से बचा लिया। भय और चिंता की रेखाएँ उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थीं। इसी कारण उसका प्रहार कहीं-का-कहीं पड़ रहा था। उसके तलवार चलाने के ढंग से ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह तलवार चलाना ही भूल गया हो।

दोनों के मध्य भीषण युद्ध आरंभ हो गया। भगवान् नरसिंह हिरण्यकशिपु को धकेलते हुए महल के द्वार तक ले आए और उसे वहीं बड़ी जोर से पटक दिया। इससे हिरण्यकशिपु के हाथ से तलवार छूटकर एक ओर जा गिरी। भगवान् नरसिंह का रौद्र रूप देखकर हिरण्यकशिपु के मस्तक पर भय के कारण मोतियों के रूप में स्वेद कण चमकने लगे। वह कभी भगवान् नरसिंह की ओर देखता तो कभी महल के द्वार की ओर।

भगवान् नरसिंह भयंकर सिंह गर्जना करते हुए बोले, “देख ले ओ अहंकारी राक्षस! इस स्थान को बड़े ध्यान से देख ले, जहाँ तू खड़ा हुआ है। क्या यह तेरे महल का अंदर का भाग है अथवा बाहर का ?”

भगवान् नरंसिह की बात सुनकर हिरण्यकशिपु विचारने लगा कि उसने ब्रह्मा से वरदान माँगते समय कहा था कि मेरी मृत्यु न तो मेरे महल के अंदर हो और न ही बाहर और इस समय वह उस स्थान पर खड़ा हुआ है, जो न तो महल के अंदर का भाग है और न बाहर का। अब उसके मुख पर भय की हवाइयाँ उड़ने लगी थीं। उसने उठने का बहुत प्रयास किया, किंतु उठ न सका। ऐसा लगा मानो उसके शरीर के सभी अंग क्षीण पड़ गए हों। घबराहट के कारण उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था।

भगवान् नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को अपनी बाँहों में जकड़ लिया और फिर महल के द्वार पर बैठ गए। उन्होंने हिरण्यकशिपु को उठाकर अपनी जंघा पर डाल लिया और सिंह गर्जना करते हुए बोले, “ओ अत्याचारी! देख इस इस समय तू धरती पर है या आकाश !”

हिरण्यकशिपु ने देखा कि वह इस समय न तो धरती पर है और न ही आकाश में, बल्कि इस समय वह भगवान् नरसिंह की जंघा पर है।

“और यह भी देख पापी!” भगवान् नरसिंह ने फिर से गर्जना की, “तेरा अंत करने के लिए किसी भी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नहीं किया जा रहा है।” इतना कहने के पश्चात् भगवान् नरसिंह ने अपने लंबे व तेज नाखूनों से हिरण्यकशिपु का पेट चीर डाला। इससे उसकी आँतें बाहर निकल आईं, जिन्हें भगवान् नरसिंह ने अपने गले में माला के रूप में धारण कर लिया।

हिरण्यकशिपु का अंत होते ही दरबार में उपस्थित सभी असुर भयभीत हो अपने-अपने आसनों से उठ खड़े हुए। उन सभी ने चारों ओर से भगवान् नरसिंह को घेर लिया और उन पर अपने अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करने लगे, किंतु वे अस्त्र-शस्त्र तो भगवान् नरसिंह को ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो तिनके हों। कुछ ही क्षणों में उन्होंने सभी असुरों का नाश कर डाला।

अत्याचारी हिरण्यकशिपु और उसके सहयोगी असुरों के सर्वनाश के पश्चात् भगवान् नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने पुष्पवर्षा की और अप्सराओं व गंधर्वों ने नृत्यगान किया।

यद्यपि हिरण्यकशिपु के अंत के पश्चात् सृष्टि में हर्ष और प्रसन्नता का वातावरण बना हुआ था, किंतु भगवान् नरसिंह के कुपित होने के कारण यह हर्ष और प्रसन्नता का वातावरण नष्ट होता जा रहा था। उनकी भीषण हुंकार से ऐसा लगा कि मानो सृष्टि में प्रलय आ गई हो। इससे सृष्टि के समस्त प्राणी भयभीत हो उठे। कोई भी भगवान् नरसिंह के रौद्र रूप को शांत करने में समर्थ न था।

भगवान् नरसिंह ने ऐसा रौद्र रूप धारण किया हुआ था कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा तक भी उनके सम्मुख आने का साहस न जुटा सके।

तब माता लक्ष्मी ने आगे बढ़कर भगवान् नरसिंह की अनेक प्रकार से स्तुति की ओर उनकी प्रलंयकारी गर्जना को शांत करने का प्रयास किया, किंतु वे किसी की कोई याचना नहीं सुन रहे थे। ऐसी स्थिति में लगा था कि सृष्टि का विनाश निश्चित है।

यह विकट स्थिति देखकर देवगुरु बृहस्पति ने सुझाव दिया कि भगवान् नरसिंह की विकरालता यदि शांत हो सकती है तो केवल श्रीहरि के भक्त प्रह्लाद की स्तुति से ही हो सकती है, अन्यथा प्रलय होकर ही रहेगी। सभी देवगणों, यक्ष-गंधर्व आदि ने मिलकर भक्त प्रह्लाद से अनुरोध किया कि वे स्वयं भगवान् श्रीहरि की स्तुति कर उन्हें शांत करने का प्रयास करें।

परिस्थितियों को विपरीत होते देखकर भक्त प्रह्लाद ने उनके मिश्रित अनुरोध को सहर्ष स्वीकार किया और मनवचन तथा कर्म से समवेत होकर भगवान् श्रीहरि रूपी नरसिंह देव की स्तुति करने लगे। जो भगवान् नरसिंह देव सृष्टि के किसी भी देव, गंधर्व और यक्ष सहित माता लक्ष्मी की स्तुति से भी प्रसन्न नहीं हो रहे थे, वही भक्त प्रह्लाद की क्षणिक भक्ति से प्रसन्न हो उठे। भगवान् नरसिंह देव ने प्रसन्न होकर प्रह्लाद को अपनी बाँहों में उठा लिया और उन्हें स्नेह करते हुए बोले, “प्रिय भक्त! तुमने मेरे लिए, केवल मेरे लिए न जाने कितने कष्टों को सहन किया है, किंतु देव-दानव, यक्ष-गंधर्व किसी ने भी तुम्हारे उन कष्टों को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। सृष्टि का कोई भी कारक तुम्हारे पक्ष में उठकर सामने नहीं आया। इच्छा होती है कि इस समस्त स्वार्थी सृष्टि को नष्ट कर डालूँ।”

“प्रभु!” भक्त प्रह्लाद अपने प्रभु को शांत करने का प्रयास करते हुए बोले, “इस सृष्टि में जब मेरे तारणहार, मेरे पालनहार स्वयं श्रीहरि हैं तो भला मुझे किसी अन्य कारक की सहायता की क्या आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त आपके भक्त और स्वामी के मध्य किसी और का आना तो स्वयं आप भी सहन नहीं करते, फिर भला सृष्टि का कोई अन्य कारक हमारे मध्य कैसे आ सकता है? आपकी भक्त-वत्सलता और कृपा पर मुझे पहले भी पूर्ण विश्वास था, आज भी है और सदैव ही रहेगा। आपने हर कठिन और असंभव परिस्थिति में मेरी सहायता की, मेरा मनोबल बढ़ाया, यही मेरे लिए असत्य, अधर्म और अत्याचार से द्वंद्व करने का संबल बना। महाप्रभु! कृपया अब अपना रौद्र रूप त्यागकर सौम्य स्वरूप धारण कीजिए, अन्यथा मैं स्वयं आपके इस रौद्र रूप से भयभीत हो उठा हूँ।”

प्रह्लाद की स्तुतिपूर्ण भक्ति और निष्कपट-निर्दोष बातें सुनकर भगवान् नरसिंह देव ने सौम्य स्वरूप धारण कर लिया। यह दृश्य देखकर देवताओं ने उनकी जय-जयकार की और करबद्ध होकर भगवान् नरसिंह देव के रूप में अवतरित श्रीहरि विष्णु की स्तुति की।

भगवान् नरसिंह प्रह्लाद को स्नेह करते हुए बोले, “प्रहलाद! तुम पर कैसे-कैसे अन्याय व अत्याचार किए गए और मैं यह सब देखता रहा। मेरे प्रिय भक्त! मुझे तुम्हारी रक्षा हेतु आने में जो विलंब हुआ, उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।”

भगवान् नरसिंह की वत्सलता एवं स्नेह पाकर प्रह्लाद का अंतर्मन अभिभूत हो उठा। उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। अन्याय एवं अत्याचार के अंत के साथ ही प्रह्लाद को सर्वश्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति हुई।

प्रह्लाद के सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् नरसिंह ने स्नेहिल स्वर में कहा, “भक्त प्रह्लाद! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं। अतः अपनी इच्छानुसार वर माँगो।”

प्रह्लाद ने कहा, “प्रभु! मुझे आपके साक्षात् दर्शन हुए, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है। आपके दर्शन पाकर मेरा जीवन कृतार्थ हुआ, मैंने सबकुछ प्राप्त कर लिया। अब मुझे किसी और वस्तु की अभिलाषा नहीं।” “नहीं वत्स!” भगवान् नरसिंह आग्रह करते हुए बोले, “कुछ और वर माँगो कम-से-कम हमारी प्रसन्नता के लिए ही सही।”

“प्रभु! यदि आपकी इच्छा मुझे कोई वर देने की है तो कृपया मुझे यह वर दें कि मेरे भीतर कामना के बीज का सर्वथा नाश हो और आपके चरण कमलों के प्रति मेरी श्रद्धा-भक्ति सदैव अक्षुण्ण बनी रहे।” “तथास्तु!” भगवान् नरसिंह ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया।

इसके पश्चात् भगवान् नरसिंह देव माता लक्ष्मी के साथ वहाँ से अंतर्धान हो गए। देवगण, यक्ष, गंधर्व आदि भक्त प्रह्लाद की पावन भक्ति और श्रीहरि की भक्त-वत्सलता का गुणगान करते हुए अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए।