अत्याचार की पराकाष्ठा
आश्रम के लगभग सभी छात्र प्रह्लाद की राह पर चल पड़े थे। इन छात्रों ने प्रह्लाद के बताए हुए भागवत धर्म को अपना लिया था और उसका यथावत् पालन करने लगे थे। जब आश्रम के आचार्य वापस लौटे तो वे आश्रम की स्थिति देखकर दंग रह गए। वे समझ गए थे कि यह सब किया धरा प्रह्लाद का ही है और वे यह भी भली-भाँति समझ गए थे कि प्रह्लाद को अब किसी भी प्रकार से उस राह पर नहीं लाया जा सकता, जिस राह पर वे चाहते थे। उन्होंने विचार किया कि यदि प्रह्लाद को आश्रम में ही रखा गया तो वह सभी छात्रों को अपने रंग में रंग लेगा। इससे असुर समाज को बड़ी हानि का सामना करना पड़ेगा। अतः इसी बात को ध्यान में रखते हुए आचार्य शंड ने इस बारे में असुरराज हिरण्यकशिपु से वार्त्तालाप करना उचित समझा।
एक दिन आचार्य शंड हिरण्यकशिपु के दरबार में जा पहुँचे और प्रहलाद के बारे में बताया, “असुरराज! प्रह्लाद में अब हमें किसी प्रकार के सुधार की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। हमने सभी प्रकार के उपाय करके देख लिये, किंतु कोई लाभ होता दिखाई नहीं दिया।”
“क्या हुआ आचार्य!” आचार्य शंड की ओर देखते हुए हिरण्यकशिपु बोला, “क्या उसने कोई नया प्रकरण रच डाला है?”
“कुछ ऐसा ही है असुरराज!” आचार्य शंड ने कहा, “आश्रम के अधिकांश आचार्य मेरे साथ किसी कार्य से बाहर गए हुए थे कि हमारे पीछे राजकुमार प्रह्लाद ने आश्रम के शिष्यों को अपने प्रपंच में फँसा लिया।”
“प्रपंच में! कैसे प्रपंच में, आचार्य ?” हिरण्यकशिपु ने चौंकते हुए पूछा।
“राजकुमार प्रह्लाद ने आश्रम के शिष्यों को भागवत धर्म का पाठ पढ़ाकर उन्हें अपने पीछे कर लिया।” आचार्य शंड चिंतित स्वर में बोले, “अब सभी शिष्य भागवत धर्म में प्रवृत्त हो गए हैं।”
“यह आप क्या कह रहे हैं आचार्य!” हिरण्यकशिपु ने चिंतित स्वर में कहा।
“हाँ असुरराज! यही सत्य है।” आचार्य शंड ने कहा, “इस विषय में ही मैं आपसे वार्त्तालाप करने हेतु आया हूँ।”
“यह तो बहुत बुरा हुआ, आचार्य!” हिरण्यकशिपु क्रोधित स्वर में बोला, “ऐसा प्रतीत होता है, मानो इस कुलघाती का जन्म ही असुर-कुल पर कलंक लगाने के लिए हुआ है। अब हमें ही इस कुलविद्रोही को दंडित करने के लिए कुछ करना पड़ेगा।”
आचार्य शंड मौनावस्था में हिरण्यकशिपु के क्रोधित स्वरूप को देखते रहे। कुछ क्षण सोच-विचार के पश्चात् हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, “जाओ और उस कुलघाती प्रह्लाद को तुरंत हमारे सम्मुख प्रस्तुत करो।”
“जो आज्ञा असुरराज!” कहकर सैनिक वहाँ से चले गए।
अभी कोई अधिक समय नहीं हुआ था कि सैनिक प्रह्लाद को लेकर हिरण्यकशिपु के सम्मुख जा पहुँचे। हिरण्यकशिपु का दरबार लगा हुआ था। सभी दरबारी सहमे हुए से अपने-अपने स्थान पर विराजमान थे। दरबार में भारी सन्नाटा छाया हुआ था। तभी हिरण्यकशिपु ने चीखते हुए कहा, “क्यों रे कुलघाती! इतना सबकुछ घटित होने के बाद भी तेरी उद्दंडता नहीं गई ?”
“क्षमा चाहता हूँ, पिताश्री!” प्रह्लाद ने विनीत स्वर में कहा, “मैंने किसी प्रकार की कोई उदंडता नहीं की, बल्कि मैं तो उद्दंडता से दूर रहने का प्रयास करता हूँ।”
“यह उद्दंडता नहीं तो और क्या है कि तूने आश्रम के अन्य छात्रों को भी अपने विचारों में रँग लिया है।” हिरण्यकशिपु बोला, “वे भी अब भागवत प्रेमी हो गए हैं।”
“पिताश्री! मैंने आश्रम के छात्रों को भागवत धर्म की शिक्षा देकर कोई अपराध नहीं किया है।” प्रह्लाद ने अपना स्पष्टीकरण देते हुए बताया, “फिर सत्य भी यही है कि भागवत धर्म की सृष्टि ही शाश्वत धर्म है। जब प्राणी इस धर्म का पालन करेंगे, तभी उनका उद्धार हो सकता है।”
“अरे ओ मूर्ख!” हिरण्यकशिपु गरज उठा, “आज तो यह निर्णय होकर रहेगा कि तू किसे मानता है। बता, तेरा अधिष्ठाता कौन है ?”
“कण-कण और तृण-तृण में व्याप्त श्रीहरि विष्णु ही मेरे इष्टदेव हैं, मेरे आराध्य हैं, जिसकी शक्ति के सम्मुख तीनों लोक थरथराते हैं।” प्रह्लाद ने निर्भीक स्वर में कहा।
“तुझे मेरे सामने मेरे शत्रु का गुणगान करते हुए भय नहीं लगता ?” हिरण्यकशिपु कड़क स्वर में बोला। “पिताश्री! जो भी प्राणी श्रीहरि विष्णु की शरण में चला जाता है, वह स्वतः ही इतना साहसी हो जाता है कि प्रभु की शक्ति के अतिरिक्त उसे संसार की अन्य सभी शक्तियाँ तुच्छ दिखाई देती हैं।” प्रह्लाद ने कहा।
“तो फिर ठीक है, रे कुलघाती! आज हम तेरी उस शक्ति को समाप्त कर डालेंगे, जिस पर तू इतना गर्व करता है।” हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, “धातु के इस स्तंभ को तपाकर तुरंत लाल कर दिया जाए।”
वास्तव में धातु के उस स्तंभ का प्रयोग तब किया जाता था, जब किसी अपराधी को अत्यंत जघन्य अपराध के लिए दंड दिया जाता था। सर्वप्रथम स्तंभ को अग्नि से तप्त कर अपराधी को इससे बाँध दिया जाता था, जिससे अपराधी तड़प-तड़पकर अपने प्राण त्याग देता था। अत: हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को इसी स्तंभ से बाँधकर अत्यंत भयानक सजा देने का निश्चय कर लिया था।
हिरण्यकशिपु की आज्ञानुसार धातु के उस स्तंभ को शीघ्र ही अग्नि से तप्त कर दिया गया। जब हिरण्यकशिपु को उसका निरीक्षण करने के पश्चात् पूर्ण संतुष्टि हो गई तो वह जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए बोला, “आज हम देखते हैं कि तेरा इष्टदेव तुझे कैसे बचाता है ?”
इसके पश्चात् हिरण्यकशिपु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, “सैनिको! इस दुष्ट को शीघ्रातिशीघ्र इस तप्त स्तंभ से बाँध दो।”
सैनिकों ने तुरंत ही हिरण्यकशिपु की आज्ञा का पालन किया।
इसी बीच प्रह्लाद ने विचार किया, यदि प्रभु की यही इच्छा है कि इसी स्थिति में मृत्यु का वरण करूँ तो फिर यही सही। प्रह्लाद ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने आराध्य भगवान् विष्णु का स्मरण करने लगे। सैनिकों ने प्रह्लाद को दाएँ-बाएँ से पकड़ लिया और उसे लाल तप्त स्तंभ की ओर ले जाने लगे। तभी प्रह्लाद ने देखा कि लाल तप्त स्तंभ पर कुछ चींटियाँ पंक्तिबद्ध दौड़ी चली जा रही हैं। यह दृश्य देख प्रह्लाद की आँखें आश्चर्य से फैल गई। बस तभी उन्होंने विचार किया कि जब इन प्राणियों पर अग्नि की तपन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो फिर मुझ पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? यह बात ध्यान में रखते हुए और अपने प्रभु को स्मरण कर प्रह्लाद ने बड़ी तेजी से उस लाल तप्त स्तंभ को बाँहों में भर लिया।
प्रह्लाद की यह निर्भीकता देखकर हिरण्यकशिपु व अन्य दरबारीगण आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। वे यह सोच रहे थे कि अग्नि से तप्त धातु के जिस लाल स्तंभ की अत्यंत भयानक सजा सुनकर अच्छे-अच्छे शूरवीरों के पैरों तले से धरती खिसक जाती थी, उस स्तंभ को कितनी सरलता व निर्भयता से प्रहलाद ने अपनी बाँहों में जकड़ लिया था।
हिरण्यकशिपु ने सोचा था कि अग्नि से तप्त इस धातु के स्तंभ से जैसे ही प्रह्लाद को बाँधा जाएगा, तो स्तंभ की तीव्र तप्तता उन्हें राख के ढेर में परिवर्तित कर देगी, किंतु यहाँ तो सबकुछ इसके विपरीत हुआ। स्तंभ की तीव्र तप्तता का प्रहलाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
“अब हम यह भली-भाँति समझ गए हैं कि तू मायावी शक्ति से ओत-प्रोत है।” हिरण्यकशिपु बोला, “भले ही तु मायावी शक्ति से परिपूर्ण हो गया हो, किंतु मैं तेरी मायावी शक्ति से कभी भी प्रभावित नहीं हो सकता। हमने न जाने तेरे जैसी कितनी मायावी शक्तियों को पराजित किया है। अतः बालक! यह मत समझ कि हम तेरी मायावी शक्ति से भयभीत हो जाएँगे।”
“पिताश्री! आप गलत अनुमान लगा रहे हैं।” प्रह्लाद ने विनीत स्वर में कहा, “मैं किसी भी प्रकार की मायावी शक्ति से संपन्न नहीं हूँ।”
“तू असत्य बोलता है।” हिरण्यकशिपु गरजकर बोला।
“नहीं पिताश्री! मैं असत्य नहीं बोल रहा हूँ।”
“यदि ऐसी बात है तो फिर तेरे शरीर पर किसी भी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव क्यों नहीं होता? क्या तेरा शरीर वज्र का बना हुआ है ?”
“नहीं, मेरा शरीर भी आप लोगों की भाँति हाड़-मांस का बना हुआ है।” प्रह्लाद ने कहा।
हिरण्यकशिपु तीव्र स्वर में बोला, “निश्चय ही तू मायावी शक्तियों से संपन्न हो चुका है। अब तू हमें इतना और बता दे कि तुझे ये मायावी शक्तियाँ कहाँ से मिलीं? जिसने भी तुझे ये मायावी शक्तियाँ प्रदान की हैं, वह निश्चय ही हमारा शत्रु है।”
“पिताश्री! मुझमें जो आसुरी शक्तियों का सामना करने का साहस उत्पन्न हुआ है, वह त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णु की कृपा के कारण ही संभव हो सका है। भगवान् विष्णु ही वह शक्ति है, जो संसार की किसी भी आसुरी शक्ति का सामना कर सकने का सामर्थ्य रखते हैं।” प्रह्लाद ने बताया।
“अपनी जिह्ववा पर नियंत्रण रख मूर्ख बालक!” हिरण्यकशिपु बुरी तरह से भड़क उठा, “आज यह निर्णय हो ही जाएगा कि तेरे उस विष्णु में कितनी शक्ति है ? पुकार अपने विष्णु को बुला उसे, कहाँ है वह ?”
“उन्हें कहीं भी ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं। वे तो कण-कण में विद्यमान हैं।” प्रह्लाद ने कहा, “हर भक्त के हृदय में उनका वास है। जब भी उनका कोई भक्त किसी संकट में होता है तो वे स्वतः ही उसकी सहायता के लिए प्रकट हो जाते हैं।”
“यदि तुझे अपने विष्णु पर इतना ही विश्वास है तो फिर पुकार उसे, वह इस तप्त स्तंभ से प्रकट हो।” हिरण्यकशिपु गरजकर बोला।
“हाँ पिताश्री! भगवान् विष्णु संसार के कण-कण में विद्यमान हैं और मुझे अपने आराध्य देव पर पूरा विश्वास है।” प्रह्लाद ने कहा।
“विश्वास! हा-हा-हा!” हिरण्यकशिपु जोरदार ठहाका लगाता हुआ बोला, “आज तेरा सारा विश्वास चूर-चूर हो जाएगा। बुला अपने विष्णु को, अपनी सहायता के लिए।”
इतना कहने के पश्चात् हिरण्यकशिपु ने भयानक गरजना करते हुए म्यान से तलवार निकाल ली। उस तलवार की चमक ऐसी प्रतीत होती थी, मानो बादलों के बीच बिजली चमक रही हो। वह ठहाके लगाता हुए अपने सिंहासन से नीचे उतरने लगा। हाथ में तलवार लिये उसका भयानक स्वरूप कालदेव से भी अधिक भयानक प्रतीत हो रहा था। हिरण्यकशिपु स्तंभ से लिपटे खड़े प्रह्लाद के निकट पहुँचा और बड़ी क्रूरता से प्रह्लाद को देखने लगा।
उस समय हिरण्यकशिपु का स्वरूप इतना विकराल एवं भयानक था कि यदि कोई अन्य होता तो वह उसे देखते ही मूर्च्छित हो जाता, किंतु प्रह्लाद पर उसकी भयानकता का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। प्रह्लाद निर्भय होकर पूर्ववत् खड़ा रहा।
कुछ क्षणों तक हिरण्यकशिपु एकटक प्रहलाद को क्रूर भाव से देखता रहा। संभव है कि वह प्रह्लाद को भयभीत करने का प्रयास कर रहा था, किंतु भगवान् के भक्तों को कैसा भय ? जिसके साथ स्वयं भगवान् हों तो उसे डरने की आवश्यकता ही नहीं। प्रह्लाद पर हिरण्यकशिपु की किसी भी गतिविधि का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तभी हिरण्यकशिपु चीखा, “ओ कुलघाती! तूने जो अपराध किया है, तुझे उसका दंड आज अवश्य ही मिलेगा। तूने जो निर्लज्जता दिखाई है, हम तुझे उसका बोध अवश्य कराएँगे।”
“पिताश्री! क्रोध में किया गया कोई भी कार्य सदैव हानि देने वाला होता है।” प्रह्लाद ने समझाते हुए कहा।
“बंद कर अपना यह उपदेश!” हिरण्यकशिपु गरजते हुए बोला, “अब तू हमें सिखाएगा कि हमें क्या करना है और क्या नहीं ?”
इतना कहकर वह प्रह्लाद पर तलवार का वार करने के लिए आगे बढ़ा।
प्रह्लाद निर्भय-निश्चल खड़ा अपने पिता को क्रूर भाव से अपनी ओर बढ़ते देख रहा था। उसके मुखमंडल पर शांति का स्थायी भाव दृष्टिगोचर हो रहा था, मानो पिता की क्रूर विकरालता का उस पर कोई प्रभाव न पड़ रहा हो।