गुरुकुल की ओर गमन
समय का चक्र बिना किसी अवरोध के निरंतर अपनी धुरी पर घूमता रहता है। उसे किसी की प्रतीक्षा नहीं होती अपितु हर कोई उसी की प्रतीक्षा करता है। संसार में होने वाला परिवर्तन प्रह्लाद को कोई बड़ा आश्चर्य ही दिखाई देता। वे उसके रहस्य को समझने का प्रयास करते और फिर कुछ समझकर और कुछ न समझते हुए व्याकुल हो उठते। उनकी आयु पाँच वर्ष हो चुकी थी, किंतु इतनी छोटी सी आयु में वे सार और असार के ज्ञान से परिचित हो गये थे। संसार में जन्म लेने का उद्देश्य धीरे-धीरे उनकी समझ में आने लगा था। अनेक समस्याओं को सुलझाने की शक्ति प्रहलाद में बाल्यावस्था में ही आ गई थी। वह भले ही बालक थे, लेकिन उनकी सोचने-समझने की शक्ति किसी प्रौढ़ व्यक्ति से कम न थी।
जैसे अल्पायु में बालकों का ध्यान खेलों की ओर आकृष्ट होता है, वैसी स्थिति प्रह्लाद के साथ नहीं थी। वह खेलने की अपेक्षा एकांत में बैठकर साधना करना अधिक पसंद करते थे। उनमें शिष्टाचार, विनय, मधुरभाषिता और दयालुता आदि सद्गुणों का पूर्ण समावेश था।
एक दिन हिरण्यकश्यपु ने प्रहलाद को अपनी गोद में बैठा लिया और स्नेह करने लगा। जैसा कि बाल्यावस्था में बालक कुछ-न-कुछ शरारतें करते रहते हैं, वैसा कोई भाव प्रह्लाद के भीतर नहीं था। वे बड़े शांत भाव से अपने पिता की गोद में बैठे रहे। वह बातें भी बड़े शांत भाव से इस प्रकार करते कि बड़े-बड़े राज्याधिकारी अपने दाँतों तले अंगुलियाँ दबा लेते थे। जब हिरण्यकश्यपु प्रह्लाद के बालों को सहला रहा था, तो रानी कयाधू बोली, “महाराज! अब हमारा पुत्र पाँच वर्ष का हो गया है।”
“हूँ!” हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को पूर्ववत् स्नेह करते हुए बोला।
“क्या आपने इसके बारे में कुछ सोचा है ?” माता कयाधू कुछ चिंतित स्वर में बोली।
“सोचना... कैसा सोचना ?” हिरण्यकश्यपु ने असावधान होते हुए कहा, “अभी तो इसकी आयु केवल पाँच वर्ष ही है, जो इसके खेलने-कूदने की अवस्था है।”
“आप मेरे कहने का अभिप्राय नहीं समझ रहे हैं।” कयाधू प्रह्लाद को पति की गोद से अपनी गोद में लेते हुए बोली।
“तो फिर अपना अभिप्राय स्पष्ट करो।” हिरण्यकश्यपु बोला।
“मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि अब, जब हमारा पुत्र बोलने-समझने लगा है तो हमें उसकी शिक्षा-दीक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए।” कयाधू ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा।
“हाँ, तुम सत्य कहती हो। हम शीघ्र ही प्रह्लाद की शिक्षा-दीक्षा के संबंध में गुरु शुक्राचार्य से विचार-विमर्श करेंगे।” हिरण्यकश्यपु ने कहा।
जिस समय हिरण्यकशिपु के मन में प्रह्लाद की शिक्षा-दीक्षा का विचार आया, उस समय गुरु शुक्राचार्य तपस्या करने के लिए हिमालय की ओर गए थे। कुछ मास तक तो उसने शुक्राचार्य के आने की प्रतीक्षा की, किंतु जब अधिक समय हो गया, तो उसने शुक्राचार्य के सुयोग्य पुत्रों शण्ड और अमर्क के हाथों में प्रह्लाद की शिक्षा-दीक्षा की जिम्मेदारी सौंपने का निश्चय कर लिया। शण्ड और अमर्क में योग्यता और प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी। अपने पिता की अनुपस्थिति में उन्होंने आश्रम की प्रत्येक छोटे-बड़े दायित्वों का उचित ढंग से निर्वाह किया था। प्रह्लाद के तीनों भाइयों की शिक्षा-दीक्षा भी उन्हीं की देख-रेख में हो रही थी।
जब प्रह्लाद को पता चला कि उसकी शिक्षा-दीक्षा उनके भाइयों के साथ ही होगी तो उसे कोई विशेष प्रसन्नता नहीं हुई। इसका कारण यह था कि उसका स्वभाव अपने भाइयों से तनिक भी नहीं मिलता था। एक दिन प्रह्लाद ने अपनी माता कयाधू से पूछा, “माता! गुरुकुल में जाने से क्या होता है ?”
प्रह्लाद के सिर पर स्नेह से हाथ फिराते हुए कयाधू ने कहा, “पुत्र! विद्या के अभाव में जीवन का कोई महत्त्व नहीं होता। विद्या के बिना बुद्धि कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती और अनेक सद्गुणों की प्राप्ति भी विद्या के द्वारा ही होती है। तुम राजा के पुत्र हो। अतः तुम्हें राजपद के योग्य होने के लिए विद्या की बहुत आवश्यकता होगी। जिस गुरुकुल में तुम्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जा रहा है, वहाँ तुम्हारे अन्य भाई भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जब तुम वहाँ जाओ तो अपना समय व्यर्थ न करना, मन लगाकर शिक्षा ग्रहण करना।”
कुछ देर सोचने के पश्चात् प्रह्लाद ने कहा, “माता! क्या आपको नहीं लगता कि अधिकांश लोग अपना समय व्यर्थ के कार्यों में बर्बाद करते हैं? ऐसा कौन है, जिसे समय का उचित ज्ञान हो ? जिस विद्या को प्राप्त करने के लिए सभी इतना परिश्रम करते हैं, क्या वह विद्या समय व्यर्थ करके ही प्राप्त नहीं होती ?”
प्रह्लाद के मुख से इस प्रकार की बातें सुनकर रानी कयाधू आश्चर्यचकित हो उठीं। उन्हें भय सताने लगा कि महात्माओं की भाँति उपदेश करने वाले उनके पुत्र के साथ कोई अनहोनी न घट जाए।
शीघ्र ही वह दिन भी आ गया, जब प्रह्लाद को गुरुकुल में भेजने की तैयारियाँ की जाने लगीं। राजमहल के अंदर कई दिनों से चहल-पहल थी। हिरण्यकशिपु ने आश्रम के आचार्यों शंड और अमर्क को एकांत में ले जाकर कहा, “मैं आपसे कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं समझता, किंतु फिर भी मैं आपको याद दिलाता हूँ कि आप प्रह्लाद को भी उसके भाइयों की तरह उस शिक्षा से परिचित कराएँ, जिससे वे विष्णु-द्वेषी हो गए हैं। प्रह्लाद को भी ऐसी शिक्षा दीजिए, जिससे सदैव के लिए उसके मन में वैष्णवों के सर्वनाश का विचार भरा रहे। वह कभी भी कम न हो, बल्कि क्षण प्रतिक्षण बढ़ती ही रहे।”
आश्रम के आचार्यों ने मन, वचन और कर्म से प्रह्लाद को विद्यादान की बात कही, तो हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को शंड और अमर्क के साथ गुरुकुल भेज दिया।
जब प्रह्लाद गुरुकुल पहुँचे तो आश्रम को देखकर उन्हें बड़ा अच्छा लगा। आश्रम का निर्मल और हरा-भरा वातावरण देखते ही उनके मन में दिव्य भावना भर गई। उनका तन-मन आनंदविभोर हो उठा। उन्होंने दृष्टि उठाकर इधर-उधर देखा तो पाया कि वहाँ उनके भाइयों के अलावा और भी ऐसे अनेक छात्र थे, जो उनके पूर्व-परिचित थे। उनके भाइयों ने उन्हें देखा तो दौड़े-दौड़े उनके पास आए और उन्हें गले लगा लिया।
पहले दिन उनके गुरु ने उन्हें समझाते हुए कहा, “वत्स! आज से तुम्हारे जीवन का दूसरा अध्याय आरंभ होता है। अभी तक तुम अपने माता-पिता की गोद में रहे। वहाँ तुम्हें कोई कार्य करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अभी तक जिस प्रकार तुमने अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन किया है, वैसे ही अब तुम्हें यहाँ भी करना पड़ेगा। तुम्हें स्वयं को ऐसे आचरण या कार्यों से दूर रहना होगा, जो आश्रम के अनुशासन के प्रतिकूल हों। यहाँ तुम्हें अपना प्रत्येक कार्य स्वयं ही करना होगा और तुम अन्य बालकों की भाँति साधारण जीवन व्यतीत करोगे।” इसी प्रकार की और भी बहुत सारी बातें गुरु ने प्रह्लाद को समझाईं, जिन्हें प्रह्लाद ने बड़े ध्यान से सुना व समझा।
एक दिन आचार्य अमर्क ने प्रह्लाद को बताया, “वत्स प्रह्लाद! आज हम तुम्हें मित्र और शत्रु का पाठ पढ़ाएँगे।”
“परंतु आचार्य ! इस शिक्षा की तो मुझे कोई आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती।” प्रह्लाद ने कहा।
“तुम ऐसा किस आधार पर कह सकते हो, वत्स ?” आचार्य अमर्क आश्चर्यचकित स्वर में बोले।
“आचार्य! मेरे कहने का आधार यह है कि इस सृष्टि में मेरा कोई शत्रु ही नहीं है।” प्रह्लाद ने गंभीर स्वर में कहा, “जब मेरा कोई शत्रु ही नहीं है तो फिर मेरी सबसे मित्रता निश्चित है।”
“वत्स! असुर नीति के अनुसार, संसार में जितने भी मित्र हैं, उससे कहीं अधिक शत्रु हैं और फिर मित्रता में भी शत्रुता का भाव व्याप्त रहता है। बस यही कारण है कि भूल से भी मित्र को केवल मित्र की दृष्टि से देखना उचित नहीं।” आचार्य अमर्क भी गंभीरता से बोले।
“तो फिर आचार्य! कृपा करके आप मुझे मित्र और शत्रु की स्पष्ट व्याख्या से परिचित कराएँ।” प्रह्लाद ने कहा।
“वत्स!” आचार्य अमर्क प्रह्लाद को समझाते हुए बोले, “सत्य बात तो यही है कि जो भी तुम्हारी प्रगति में किसी भी प्रकार का अवरोध उत्पन्न करे, समझो वही तुम्हारा शत्रु है और जो इसके विपरीत आचरण करता है, वही तुम्हारा मित्र है।”
“किंतु आचार्य! प्रगति के मार्ग से आपका क्या तात्पर्य है ?” प्रह्लाद ने प्रश्न किया।
“वत्स! वह मार्ग, जिस पर चलकर धन-संपदा, यश, प्रसिद्धि, गौरव इत्यादि प्राप्त होता हो, वही मार्ग प्रगति का मार्ग कहलाता है।” आचार्य अमर्क ने बताया।
“इसका अर्थ तो यह हुआ कि यह सब तो मुझे अपने पिता से प्राप्त हो सकता है। उनके पास विशाल साम्राज्य के साथ-साथ विशाल धन-संपदा का भंडार भी है। यदि मैं किसी प्रकार से उनसे यह सब हस्तगत कर लूँ तो मुझे यश और गौरव की प्राप्ति स्वतः ही हो जाएगी।” प्रह्लाद ने कहा, “आचार्य! ऐसी स्थिति में मुझे तो यही लगता है कि आप मुझे अपने ही पिता से शत्रुता करने की शिक्षा प्रदान कर रहे हैं ?”
“नहीं, नहीं वत्स!” आचार्य अमर्क कुछ सकपकाते हुए बोले, “तुम्हें हमारी बात समझने में भूल हुई है। हमारे कहने का यह अभिप्राय कदापि नहीं था।”
“नहीं आचार्य! मेरे समझने में कोई भूल नहीं है, बल्कि भूल तो आपसे हुई है।” प्रह्लाद ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा।
“तुम यह क्या कह रहे हो, वत्स!” आचार्य अमर्क कुछ विचलित स्वर में बोले।
“आचार्य! आप यह तो भली-भाँति जानते हैं कि इस संपूर्ण सृष्टि के सर्जक परब्रह्म हैं और वे ही सृष्टि के कणकण में वास करते हैं। अतः जब परमब्रह्म श्रीहरि विष्णु ही सृष्टि के सभी चराचर में व्याप्त हैं तो फिर कोई न तो शत्रु है और न ही मित्र, सब समान हैं।” प्रह्लाद ने कहा।
प्रह्लाद का ऐसा तर्क सुनकर आचार्य अमर्क की कोई प्रतिवाद करने की हिम्मत नहीं हुई। यद्यपि प्रह्लाद की बातों से वे विचलित तो अवश्य हुए थे, किंतु प्रह्लाद के साथ डाँट-डपट करने की उनकी जरा सी भी हिम्मत नहीं हुई। वे यह भली-भाँति जानते थे कि प्रह्लाद असुरराज का पुत्र है और असुरराज प्रह्लाद को अपार स्नेह करते हैं। यदि प्रह्लाद के साथ कठोर व्यवहार किया गया तो हो सकता है कि वे रुष्ट हो जाएँ और उनके क्रोध का शिकार उन्हें बनना पड़ जाए।
जब प्रह्लाद जी की शिक्षा आरंभ हुई तो उनका मन आश्रम के आचार्यों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा में नहीं लगा। वे प्रह्लाद को कुछ और पढ़ाते, लेकिन वह कुछ और ही पढ़ते। उनका अधिकांश समय भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए बीतता। जब आचार्यों को इस स्थिति का ज्ञान हुआ तो उनके होश उड़ गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। विष्णु से पहले ही असुरराज हिरण्यकशिपु का वैर था और प्रह्लाद बारंबार उन्हीं का नाम स्मरण कर रहा था, यह बात आचार्यों को बड़ी खटकी। वे यह सोचने लगे कि यदि हिरण्यकशिपु को इस बारे में पता चल गया तो उनका क्या हाल होगा! संभव है कि उन्हें प्राणदंड दे दिया जाए। यह सोच-सोचकर उन सभी का बहुत बुरा हाल था।
आचार्यों ने प्रह्लाद को विभिन्न प्रकार से समझाया कि वह विष्णु का स्मरण बिल्कुल न करे, लेकिन उनकी किसी भी बात का प्रह्लाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जब आचार्य सब प्रकार से उपाय करते-करते थक गए तो उनके मस्तिष्क में एक और युक्ति आई। उन्होंने प्रह्लाद को बड़े शांत ढंग से समझाते हुए कहा, “वत्स! यदि तुम्हें उपासना ही करनी है तो फिर शिव की उपासना करो और फिर तुम्हारे कुल में शिव की ही पूजा प्रचलित है। शिव भी सर्व-शक्तिशाली हैं और वे शक्ति में विष्णु से किसी भी प्रकार कम नहीं हैं।”
आचार्यों की बात सुनकर प्रह्लाद मुसकराते हुए बोले, “क्या आप इस तथ्य से परिचित नहीं हैं कि प्रेम के लिए योग्य अथवा अयोग्य का कोई महत्त्व नहीं होता ? यह प्रेम का लक्षण ही नहीं है कि वह बदले में कुछ प्राप्त करे। जब मेरा हृदय भगवान विष्णु को प्रेम करता है और बिना किसी प्रार्थना के अपनी संपूर्णता उन्हीं के चरणों में समर्पित करना अधिक पसंद करता है तो फिर उनके सामने शिव को या अन्य किसी को लाकर खड़ा करना उचित शिक्षा का प्रमाण नहीं है।”
इस प्रकार प्रह्लाद पर आचार्यों के किसी भी प्रलोभन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अब आचार्यों को यह चिंता सताने लगी कि जब असुरराज हिरण्यकश्यपु उनसे प्रह्लाद की शिक्षा के बारे में पूछेंगे तो वे क्या उत्तर देंगे! यही सोच-सोचकर तरह-तरह की आशंकाएँ उनके मन में प्रकंपित करने लगीं।
प्रह्लाद में किसी भी तरह का ऐसा कोई परिवर्तन नहीं आया, जिससे आचार्यों की चिंता दूर होती, बल्कि विष्णु के प्रति उसका प्रेमानुराग दिन-प्रतिदिन और गहरा होता चला गया। जब उन्हें डराया धमकाया जाता तो वे स्वयं से कह उठते, ‘अरे, डरते क्यों हो ? क्या तुम इन बाधाओं का प्रयोजन नहीं समझते ? ये बाधाएँ तुम्हें सफल बनाने के लिए तो आ रही हैं, तो फिर इनसे घबराना कैसा ?’ अब वे निडर भाव से आश्रम में विष्णु की आराधना करने लगे।
प्रह्लाद की संगति पाकर आश्रम के अन्य बालक भी वैसा ही करने लगे। उनका व्यक्तित्व था ही कुछ ऐसा कि उन्हें देखने के बाद बालक क्या, वृद्ध भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थें। धीरे-धीरे प्रह्लाद का अनुसरण करने वाले बालकों की संख्या में वृद्धि होने लगी।
एक दिन आश्रमाचार्य शण्ड और अमर्क किसी आवश्यक कार्य से आश्रम से बाहर गए थे। बस इसे अपने लिए एक बढ़िया अवसर जान बालक खेलने में जुट गए। कुछ बालक तो आश्रम में ही खेलने लगे और कुछ आश्रम के बाहर भी चले गए थे। इसी बीच कुछ बालक प्रह्लाद के इर्द-गिर्द एकत्र हो गए, जो ध्यानावस्था में बैठे हुए थे। एक बालक के मन में विचार आया कि प्रह्लाद आजकल बड़े शांत ढंग से चुपचाप क्यों बैठा रहता है ? आखिर इसका कारण क्या है ? क्यों वह अन्य बालकों की भाँति खेल नहीं खेलता ? इस तरह के अनेक प्रश्नों का ज्वार उनके मनमस्तिष्क में उमड़ आया था। वह प्रह्लाद के समीप पहुँचा और उससे प्रश्न किया, “प्रह्लाद! तुम ऐसे चुपचाप क्यों बैठे रहते हो ? क्या तुम परेशान हो ? यदि तुम्हें कोई परेशानी है तो हमें बताओ।”
“मित्र!” प्रह्लाद मधुर स्वर में बोले, “तुम मेरी चिंता मत करो। मुझे किसी प्रकार का कोई कष्ट, कोई शोक नहीं है। मुझे तो श्रीहरि विष्णु की कृपा से आनंद-ही-आनंद प्राप्त है। यह संसार नश्वर है, जिसमें सुख और दुःख दोनों ही प्राणी को उसके वास्तविक मार्ग से भटकाने वाले हैं। अतः प्राणी को चाहिए कि वह इन दोनों का परित्याग कर दे।”
प्रह्लाद की बातों का उनके इर्द-गिर्द बैठे बालकों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें असीम शांति का अनुभव हुआ। ऐसी शांति, जो शायद उन्हें अब तक नहीं मिली थी। एक अन्य बालक ने प्रश्न किया, “अच्छा मित्र! जरा यह तो बताओ कि तुम्हारे इष्टदेव कैसे दिखाई देते हैं? उनका रंगरूप कैसा है ? उनसे तुम्हारी भेंट कब होती है ? और जब तुम उनसे मिलते हो तो तुम्हें कैसा अनुभव होता है ?”
उस बालक का प्रश्न सुनकर प्रह्लाद मुसकराने लगे। वे मृदुल स्वर में बोले, “मित्रो! इन आँखों को वे दिखाई नहीं देते। उन्हें देखने के लिए तो प्रेम की आँखें चाहिए। इस दृष्टि से तो संसार को ही देखा जा सकता है, प्रभु को नहीं। यदि उनके दर्शन करने की इच्छा है, तो उन्हें प्रेमपूर्वक पुकारना चाहिए। उनके रूप-रंग का क्या वर्णन करूँ। वे इतने तेजवान् हैं कि अनेक सूर्यों का तेज भी फीका पड़ जाए। उनके निवासस्थान का मैं क्या वर्णन करूँ, वे तो सर्वत्र विद्यमान हैं। वे सर्वव्यापी हैं, फिर भी यदि उनके विशेष निवास स्थान की बात की जाए तो वे भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। रही बात उनके मिलने की कि वे कब मिलते हैं, तो जब कोई भक्त उन्हें पुकारता है, तभी वे उसकी पुकार सुनकर तुरंत दौड़े चले आते हैं। यदि तुम्हारी उनके दर्शन करने की इतनी गहरी इच्छा है तो निश्चल भाव से उनकी भक्ति करो। वे तुम्हें अवश्य दर्शन देंगे।”
प्रह्लाद के प्रवचनों का अन्य बालकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। सभी की दृष्टि प्रह्लाद पर टिकी रह गई। प्रह्लाद के कहे गए अक्षर-अक्षर को बालकों ने सत्य मान लिया। उनके मन में विचित्र सी हलचल उत्पन्न हो गई थी। नाना प्रकार के विचारों ने उन्हें घेर लिया था। वे सोचने लगे थे कि प्रह्लाद जो भी कहता है, एकदम सत्य ही कहता है। फिर क्या था, जब भी बालकों को अवसर मिलता, वे प्रह्लाद के इर्द-गिर्द जमा हो जाते और उनके विचारों में खो जाते। एक तरह से प्रह्लाद उनके लिए रोचक, मनोरंजन तथ्य बताने वाले बन गये थे। बालकों ने अनुभव किया कि गुरुदेव की वाणी की तुलना में प्रह्लाद की वाणी में अधिक मधुरता है। इसी कारण प्रह्लाद उन सभी को गुरु से अधिक सहृदयी लगे। अंततः वही हुआ, जिसकी आचार्य आशंका कह रहे थे। कुछ बालकों में विद्रोही प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया। वे विद्रोही बन बैठे। उन्होंने आपस में मिलकर निर्णय किया वे अब व्याकरण के सूत्रों का अध्ययन नहीं करेंगे अपितु प्रह्लाद के कथनों का वे भली-भाँति अनुसरण करेंगे। परिणाम यह हुआ कि आश्रम में हड़कंप मच गया। कोई करे भी तो क्या ? प्रह्लाद एक ऐसे राजा के पुत्र थे, जिसने तीनों लोकों में विध्वंस मचा दिया था और देवताओं को स्वर्ग छोड़ने पर बाध्य कर दिया था। भला ऐसे राजा के पुत्र को कुछ कहने की चेष्टा किसमें थी । सभी को अपने प्राण प्यारे थे। सभी को लगता था कि यदि हमने प्रह्लाद के विरुद्ध राजा से कोई शिकायत कर दी और राजा रुष्ट हो गया तो फिर उनके प्राणों की खैर नहीं। बस, अपने जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मौन रहना ही उचित समझा।
आश्रम में प्रह्लाद का एक अलग दल बन गया था। सबके मन में प्रह्लाद की बात अच्छी तरह बैठ गई थी। प्रहलाद ने उनको बताया था कि यह संसार नश्वर है। आज नहीं तो कल इस संसार के मायाजाल से बाहर निकलना ही जीवों का मुख्य उद्देश्य है। इस मायाजाल से बाहर निकलने का केवल एक ही मार्ग है और वह है श्रीहरि विष्णु के नाम का जप। प्रह्लाद की बातों का बाल-दल पर गहरा प्रभाव पड़ा और सभी बालक भगवान् विष्णु के नाम की माला जपने लगे। जब शण्ड और अमर्क बाहर से आए तथा प्रह्लाद व अन्य बालकों को विष्णु के नाम का कीर्तन करते देखा तो वे भयभीत हो उठे। वे सोचने लगे कि अब तो उनकी मृत्यु निश्चित है। उनके आश्रम में उन्हीं विष्णु का नाम बड़े जोर-शोर से लिया जा रहा था, जिनसे हिरण्यकशिपु द्वेष रखता था। जब उसे आश्रम की इस प्रकार की स्थिति का पता चलेगा तो निश्चय ही वह किसी को भी जीवित नहीं छोड़ेगा। वह तो क्रोधवश इस बात का भी मान नहीं रखेगा कि कौन गुरु है और कौन ब्राह्मण। फिर भी वे चुप रहे और उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ समय पश्चात् प्रह्लाद अपने माता-पिता से मिलने राजमहल लौट आये। लंबे समय के पश्चात् पुत्र को देखकर माता ने उन्हे गोद में भर लिया और एकटक निहारने लगीं। असुरराज हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को स्नेह से दुलारते हुए पूछा, “पुत्र! आश्रम में सब कुशल-मंगल है न ?”
“जी पिताश्री!” प्रह्लाद ने बताया।
“अच्छा, यह बताओ कि आश्रम में तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा कैसी चल रही है ?” हिरण्यकशिपु ने प्रश्न किया। “पिताश्री! आश्रम की शिक्षा का स्वरूप ही ऐसा है कि कुछ समझ में नहीं आता।” प्रह्लाद ने अपने मनोभावों को स्पष्ट प्रकट करते हुए कहा, “आश्रम में आचार्य जिस प्रकार की शिक्षा प्रदान करते हैं, उसे मेरा मन स्वीकार ही नहीं कर पाता।”
“कोई बात नहीं पुत्र!”रानी कयाधू प्रह्लाद के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “अभी तुम्हारी आयु है ही कितनी ? अभी तो तुम बालक हो। जब बड़े हो जाओगे तो धीरे-धीरे सबकुछ समझ में आने लगेगा।”
“हाँ पुत्र!” हिरण्यकशिपु बोला, “ऐसा भी तो हो सकता है कि आचार्य की भाषा क्लिष्ट हो, जिस कारण उनकी बात तुम्हारी समझ में न आती हो।”
“नहीं पिताश्री!” प्रह्लाद ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, “आचार्य की भाषा तो क्लिष्ट नहीं है, किंतु उनके विचार अवश्य ही क्लिष्ट हैं। यही कारण है कि वे मेरी समझ में नहीं आ पाते।”
“इसमें आवेशित होने की कोई बात नहीं है, पुत्र!” हिरण्यकशिपु प्रहलाद की ओर देखते हुए बोला, “हम तुम्हारे आचार्य से कह देंगे कि तुम्हें पढ़ाते समय अधिक क्लिष्टता का प्रयोग न करें।”
“जी पिताश्री!” प्रह्लाद ने धीरे से स्वीकृति में सिर हिलाया।
“अच्छा, हमें यह बताओ कि तुम्हारे आचार्य ने तुम्हें किस विषय में समझाया था ?” हिरण्यकशिपु ने प्रश्न किया। “पिताश्री! आचार्य ने सर्वप्रथम मुझे सृष्टि में कौन मित्र है और कौन शत्रु, मित्र और शत्रु को कैसे पहचाना जाए तथा उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाए इत्यादि के बारे में समझाया था।” प्रह्लाद ने बताया।
"हूँ !" हिरण्यकशिपु ने कुछ न कहा।
“किंतु पिताश्री! मुझे तो मित्र और शत्रु में कोई अंतर दिखाई नहीं देता तो फिर मित्र और शत्रु के साथ व्यवहार आदि का ज्ञान मैं भला कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?” प्रह्लाद ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा।
“पुत्र! मित्र और शत्रु के बीच भेद जानने में कौन सी बड़ी बात है।” हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को समझाते हुए बोला, “जो प्राणी किसी के साथ शत्रु जैसा व्यवहार करे, वह उसका शत्रु और इसके विपरीत व्यवहार करने वाला मित्र है।”
“परंतु पिताश्री! मुझे यह सब बिल्कुल भी नहीं भाता।” प्रह्लाद ने निर्लिप्त भाव से कहा, “मेरी इच्छा तो यह है कि मैं किसी एकांत स्थान पर जाकर भगवान् विष्णु का नाम जपता रहूँ।”
प्रह्लाद के मुख से अपने परम शत्रु का नाम सुनकर हिरण्यकशिपु चीख उठा “क्या प्रह्लाद! तुमने हमारे परम शत्रु विष्णु का नाम हमारे सम्मुख लेने का दुस्साहस कैसे किया ? भविष्य में कभी भूलकर भी विष्णु का नाम न लेना।”
पिता हिरण्यकशिपु की बात सुनकर प्रह्लाद ने कुछ कहना चाहा, लेकिन हिरण्यकशिपु ने उसे बीच में ही रोक दिया। कुछ क्षण के लिए कक्ष में हिरण्यकशिपु की चीख दीवारों से टकाराकर गूँजती रही। उसके क्रोध को देखकर रानी कयाधू काँप उठीं। उन्होंने हिरण्यकशिपु को शांत करते हुए कहा, “महाराज! अभी प्रह्लाद बालक ही तो है । उसे हित-अहित का कोई ज्ञान नहीं है।”
“हाँ महारानी !” अपने क्रोध को नियंत्रित करते हुए हिरण्यकशिपु बोला, “हमें भी कुछ ऐसा ही लगता है, अन्यथा वह हमारे समक्ष हमारे परम शत्रु का नाम लेने का दुस्साहस कभी न करता।”
“आपका कथन सर्वथा उचित है, स्वामी!” रानी कयाधू ने प्रह्लाद के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
“किंतु हमें एक बात पर घोर आश्चर्य हो रहा है।” कुछ देर सोचने के बाद हिरण्यकशिपु बोला।
“आश्चर्य वाली ऐसी कौन सी बात है, स्वामी!” रानी कयाधू ने हिरण्यकशिपु की ओर देखते हुए धीरे से कहा। “जब तक प्रह्लाद हमारी छत्रछाया में रहा तो इसने यहाँ रहते हुए कभी भी हमारे परम शत्रु विष्णु का नाम नहीं लिया, किंतु आश्रम में जाते ही इसके मन में इस प्रकार के विचार कैसे उत्पन्न हुए। बस, यही बात हमारी समझ में नहीं आ रही है।” हिरण्यकशिपु कुछ विचलित सा होता हुआ बोला।
“हाँ महाराज!” हिरण्यकशिपु की हाँ में हाँ मिलाते हुए रानी कयाधू बोलीं, “यह तो सच में ही सोचने वाली बात है।”
“मुझे तो ऐसा लगता है कि आश्रम में हमारा कोई शत्रु घुस आया है, जो हमारे पुत्र के मन-मस्तिष्क में हमारे परम शत्रु के प्रति प्रेमपूर्ण आडंबर रच रहा है।” हिरण्यकशिपु दाँत पीसते हुए बोला।
इसके पश्चात् हिरण्यकशिपु ने आचार्यों को आश्रम का पुनर्निरीक्षण करने अपने विचारों से उन्हें अवगत कराया।
असुरराज ने जब आश्रम के आचार्यों को दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया तो उनके प्राण मानो कंठ में आ फँसे, किंतु वे राजदरबार में आने की राजाज्ञा का उल्लंघन करने का साहस भी नहीं कर सकते थे। वे भय से हाँफते-काँपते असुरराज के सम्मुख उपस्थित हुए, किंतु जब उन पर कोई आरोप नहीं लगाया गया तो उन्होंने अपने प्राण को पुनः शरीर में लौटते हुए अनुभव किया। अंततः इस प्राणघातक विषय का पटाक्षेप आश्रम का पुनर्निरीक्षण कराए जाने की बात को लेकर हो गया।