भक्त प्रह्लाद - 2 Siya Kashyap द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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भक्त प्रह्लाद - 2

हिरण्याक्ष का उत्थान एवं पतन

जब से सृष्टि-चक्र आरंभ हुआ, तभी से पुण्य व पाप का इतिहास-चक्र भी अपने अंदर अनेक रहस्य समेटे हुए निरंतर अबाध गति से चलायमान है। जिस प्रकार अच्छाई और बुराई आरंभिक काल से विद्यमान हैं, उसी प्रकार देव और असुर भी आदिकाल से आपस में संघर्ष करते चले आए हैं।

देवों और असुरों के पिता भगवान् कश्यप थे। उनकी अनेक पत्नियाँ थीं, जिनमें अदिति से देवों ने और दिति से असुरों ने जन्म लिया।

सतयुग का समय था। भूमंडल में पुण्य का प्रताप अधिक और पाप का प्रकोप कम था। चहुँओर शांति और समृद्धि का साम्राज्य था। प्राणियों में अनाचार, व्यभिचार, ईर्ष्या और द्वेष नाममात्र को ही था। सभी अपना जीवनयापन पारस्परिक सौहार्द के वातावरण में कर रहे थे।

इस युग में देवों और असुरों ने बहुत उन्नति कर ली थी। उनके वंश खूब फल-फूल रहे थे। जहाँ देवो को सत्य, धर्म और पुण्य के प्रतीक के रूप में जाना जाता था, वहीं असुर असत्य, अधर्म और पाप के प्रतीक बन गए थे। देवता सत्त्वगुण के अनुयायी थे, जिससे उनका स्वभाव, संयमी, उदार और परोपकारी था। इसके विपरीत असुर तमोगुणी थे, जिससे वे क्रोधी, आलसी, अत्याचारी और दुराचारी थे तथा उनमें संयम एवं सदाचार का नितांत अभाव था।

असुर वंश में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दो अत्यंत शक्तिशाली भाइयों ने जन्म लिया। समय के साथ-साथ उन्होंने अपनी शक्तियों में वृद्धि की। शक्ति के मद में चूर होकर उन्होंने तीनों लोकों में उत्पात मचाना आरंभ कर दिया। वे इतनी हिंसक प्रवृत्ति के थे कि स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, किसी पर भी दयादृष्टि नहीं रखते थे। मानव की तो बात ही क्या, देवताओं में भी उनका सामना करने की सामर्थ्य नहीं थी। उनके दिन-प्रति-दिन बढ़ते अत्याचारों से देव, दानव और मानव सभी त्रस्त थे।

देवताओं और असुरों में छोटी-छोटी झड़पों से लेकर बड़े-बड़े युद्ध तक प्रायः होते रहते थे। इन सभी में जब कभी देवता दुष्ट असुरों को पराजित करने की स्थिति में होते तो विष्णु कोई हस्तक्षेप नहीं करते, किंतु जब देवता पराजित होने की स्थिति में होते या पराजित हो चुके होते तो विष्णु देवताओं की विजय सुनिश्चित करने के लिए कोई-न-कोई उपाय अवश्य ही करते। असुर बारंबार अपनी विजय को पराजय में परिवर्तित होने का मूल कारण विष्णु को मानने लगे थे। इसी कारण हिरण्याक्ष विष्णु से घोर शत्रुता रखने लगा था।

हिरण्याक्ष का शरीर चट्टान की भाँति सुदृढ़ था। उसकी भुजाएँ इतनी शक्तिशाली थीं कि अपने एक ही प्रहार से हाथी जैसे विशाल प्राणी को भी धराशायी कर दे। वह जैसे-जैसे बड़ा होता गया, उसके व्यवहार में क्रूरता व अभिमान का वेग बढ़ता गया। उसे देखकर असुर गुरु शुक्राचार्य को बड़ी प्रसन्नता होती थी। उन्होंने उसमें इतना साहस भर दिया था कि उसे किसी का भय नहीं रहा था। अब वह समस्त भूलोक पर अपनी विजय पताका फहराने का स्वप्न देखने लगा था।

एक दिन हिरण्याक्ष शुक्राचार्य के पास आया और उन्हें प्रणाम करते हुए बोला, “गुरुदेव! मुझे अपनी आत्मिक शक्ति बढ़ाने के लिए ऐसा क्या करना चाहिए, जिससे मैं समस्त भूलोक पर अपनी विजय पताका फहरा सकूँ ?” शुक्राचार्य मुस्कराते हुए बोले, “इतने अधीर न बनो पुत्र”

“मेरे धैर्य की सीमा समाप्त होने लगी है, गुरुदेव!” हिरण्याक्ष बोला, “लगता है कि समय आ गया है, जब मुझे अपने उद्देश्य को मूर्त रूप देना चाहिए, अपने स्वप्न को साकार करना चाहिए।”

“ पुत्र! हमारी भी यही हार्दिक अभिलाषा है।” असुर गुरु शुक्रचार्य गंभीर स्वर में बोले, “हम भी यही चाहते हैं कि तुम अपने उद्देश्य में पूर्णरूपेण सफल हो और अपना स्वप्न साकार करो, किंतु... ।” “किंतु क्या गुरुदेव ?” हिरण्याक्ष अधीरता के साथ शुक्राचार्य का मुख निहारते हुए बोला।

“संपूर्ण संसार पर विजय पताका फहराने के अभियान पर निकलने से पूर्व तुम्हें असुर-कुल के एक-एक योद्धा से शक्ति सामर्थ्य और बुद्धि के आधार पर लोहा लेना होगा। अपनी वीरता-धीरता और साहस का परचम असुर-कुल में फहराने के पश्चात् ही तुम्हें अपने 'निश्चय' की ओर बढ़ना होगा।”

“गुरुदेव! क्या असुर-कुल हिरण्याक्ष की अपरिमित शक्ति से अपरिचित है ?” हिरण्याक्ष उत्तेजित होकर बोला, “क्या किसी योद्धा में हिरण्याक्ष की चुनौती स्वीकार करने की क्षमता है ? बताइए गुरुदेव! यदि असुर-कुल में आपकी दृष्टि में कोई एक भी ऐसा योद्धा हो तो सामने लाइए।”

“हिरण्याक्ष! असुर-कुल महान् वीर योद्धाओं का कुल है। यहाँ कोई भी, किसी की भी चुनौती स्वीकार करने से पीछे नहीं हटता — इस बात को तुम भली-भाँति जानते हो।” शुक्राचार्य सहज भाव से बोले, “असुर वीरों की विशेष रुचि जय-पराजय और जीवन-मृत्यु में कदापि नहीं, बल्कि किसी की चुनौती स्वीकार करने अथवा किसी को चुनौती देने में अधिक है। तुम ऐसी बात फिर भला किस अधिकार से कर सकते हो कि कोई असुर योद्धा तुम्हारी चुनौती स्वीकार करने की क्षमता नहीं रखता ?”

“गुरुदेव! आप मेरे कथन को अन्यथा न लें।” हिरण्याक्ष विनम्रता के साथ बोला, “मेरा तात्पर्य केवल यह था कि अब मैं पूर्ण समर्थ, सक्षम और शक्तिसंपन्न हो गया हूँ। आपके आशीर्वाद और असुरों की संयुक्त शक्ति के द्वारा मैं किसी भी राजा-महाराजा को पराजित कर सकता हूँ।”

“हाँ, अवश्य!” शुक्राचार्य के अधरों पर प्रगाढ़ सी मुस्कान खेलने लगी, “निस्संदेह, तुम्हारी इस विवेचना में सत्यता है, जिसे हम मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं। अब हम तुम्हें यह स्मरण करा दें कि असुरों ने अपने उत्थान और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए तुम्हें सहर्ष अपना राजा स्वीकार किया था। राजा प्रजा के लिए साक्षात् ईश्वर का ही स्वरूप होता है। अतः अब तुम्हें अपनी निजी महत्त्वकांक्षा से अधिक असुरों के हितों की रक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।”

“गुरुदेव! मैं उसी दिशा में बढ़ रहा हूँ। पृथ्वीलोक को जीतकर मैं देवताओं को शक्तिसंपन्न बनाने वाले यज्ञ, हवन और पूजा-अर्चन को प्रतिबंधित करना चाहता हूँ, ताकि असुरों को समय-समय पर त्राण देने वाले, पीड़ा पहुँचाने वाले स्वर्गलोक के देवताओं को दंडित कर सकूँ।” हिरण्याक्ष के मुख से शब्द के रूप में जैसे अग्निबाण निकल रहे थे, मैं विशेष रूप से देवताओं के रक्षक कहलाने वाले विष्णु को चुनौती देना चाहता हूँ, उसे समाप्त करना चाहता हूँ, ताकि उसके बाद देवताओं का कोई शुभचिंतक ही न रहे।”

“तुम्हारा विचार अत्युत्तम है, हिरण्याक्ष !” शुक्राचार्य प्रसन्न होते हुए बोले, “मंत्रोच्चर से हम तुम्हारी आत्मिक शक्ति एवं सामर्थ्य को कई गुना प्रबल कर देंगे, किंतु यह तभी संभव हो पाएगा, जब हमारी विशेष पूजा संपन्न हो जाएगी।”

“गुरुदेव! मुझे प्रतीक्षा रहेगी।” कहकर हिरण्याक्ष ने करबद्ध होकर प्रणाम किया और फिर विदा लेकर वहाँ से प्रस्थान किया।

हिरण्याक्ष अपने भ्राता हिरण्यकशिपु से बड़ा स्नेह रखता था। अपनी देख-रेख में ही उसने हिरण्यकशिपु को अस्त्र-शस्त्र के संचालन एवं मल्ल युद्ध की कला में पारंगत किया। हिरण्यकशिपु भी अपने बड़े भ्राता हिरण्याक्ष के समान ही शक्तिसंपन्न एवं महत्त्वाकांक्षी था। हिरण्याक्ष के लिए इधर उसका भाई हिरण्यकशिपु शक्ति का तेजपुंज बनकर उभर रहा था तो दूसरी ओर गुरु शुक्राचार्य की विशेष पूजा समाप्त होने पर उन्होंने मंत्रोच्चार के द्वारा हिरण्याक्ष में आत्मिक शक्ति की प्रबलता का वेग बढ़ा दिया था। इस प्रकार अब ऐसा प्रतीत होने लगा था, जैसे असुरराज हिरण्याक्ष की शक्ति का कोई पारावार ही न हो। वह पृथ्वीलोक पर चढ़ाई करने के लिए उद्यत हो उठा।

हिरण्याक्ष ने गुरुदेव शुक्राचार्य का आशीर्वाद लिया और शीघ्र ही एक विशाल रक्तपिपासु सेना को संगठित किया, फिर हिरण्यकशिपु को साथ लेकर उसने पृथ्वीलोक के राजाओं पर चढ़ाई कर दी। उन्होंने भयंकर उत्पात मचाना आरंभ कर दिया। देखते-ही-देखते धरती पर जैसे रक्त की नदियाँ बहने लगीं। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। पृथ्वीलोक के किसी भी राजा में इतनी सामर्थ्य न थी कि असुरों के सामने अधिक समय तक टिक पाता। असुर सेना जिस ओर भी निकल जाती, उसी ओर मैदान साफ हो जाता।

असुरों का वैर विशेष रूप से भगवान् विष्णु से था। अतः सर्वप्रथम हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ने विष्णु का नाम लेने वाले लोगों को मारना-काटना आरंभ कर दिया। उन्होंने निश्चय किया कि वे विष्णु के नाम को संसार से मिटा देंगे। जो भी मनुष्य विष्णु की पूजा-अर्चना करता अथवा विष्णु नाम की माला जपता, उसे शीघ्र ही मौत के घाट उतार दिया जाता और जो असुरों की बात मान लेता, उसे छोड़ दिया जाता। अधिकांश लोग मृत्यु भय से असुरों की बात शीश झुकाकर मानने लगे थे। अल्पकाल में ही पृथ्वीलोक के अधिकांश भाग पर असुरों का राज्य स्थापित हो गया? विष्णु का नाम लेने वालों की संख्या कम हो गई। अब जिधर भी देखो, प्रायः शैवमत के ही लोग दिखाई देने लगे।

भूमंडल के अधिकांश भाग पर अपनी विजय पताका फहराने के बाद भी हिरण्याक्ष की व्यग्रता कम न हुई थी। इसका मुख्य कारण यह था कि वह अपने घोर शत्रु विष्णु को भी परास्त करना चाहता था, इसी कारण वह व्याकुल रहने लगा। वह विष्णु से मिलने, उनसे युद्ध करने के लिए अधीर था, लेकिन उनसे उसका सामना हो भी तो कैसे यही प्रश्न उसे दिन-रात व्याकुल किए रहता था। जिस विष्णु से लड़ने के लिए उसने इतना रक्तपात किया, वह अब तक उनकी एक झलक तक न देख पाया था— यही बात उसके मन की व्यग्रता को बढ़ा रही थी।

एक दिन हिरण्याक्ष को अपने गुप्तचरों से पता चला कि जिस विष्णु का सामना करने के लिए वह इतना अधीर है, वह पाताललोक में वराह के रूप में निवास कर रहा है। इसके साथ ही उसे यह बताया गया कि वराह रूपी विष्णु बहुत ही शक्तिशाली है, उनमें शक्ति की कोई सीमा नहीं है। अतः असुरराज को उनसे लड़ने की बात भूल जानी चाहिए।

गुप्तचरों की बातों पर अधिक ध्यान न देकर विष्णु का पता जानने के बाद हिरण्याक्ष का मन हर्षित हो उठा। राज्यसंचालन का कार्यभार अपने छोटे भाई हिरण्यकशिपु के हाथों में सौंपकर वह पाताललोक की ओर चल पड़ा। उसने पातालोक का कोना-कोना छान मारा, लेकिन कहीं भी वह विष्णु भगवान् का कुछ आभास तक न पा सका। अभी सागर को छानना शेष था। अतः उसने विचार किया कि हो न हो, विष्णु यही होंगे। बस, यही विचार कर उसने उमड़ते सागर में छलाँग लगा दी। उसने सागर को भी छान डाला, लेकिन कहीं भी उसे विष्णु दिखाई नहीं दिए। इस पर वह क्रोधित हो उठा। श्रीहरि विष्णु के भक्तों को कष्ट देने के लिए वह पृथ्वी को सागर की अतल गहराइयो में खींचकर ले जाने लगा। उसका विचार था कि पृथ्वी जब सागर में जलमग्न हो जाएगी तो विष्णु के भक्त उन्हें पुकारेंगे। उसने सुन रखा था कि विष्णु अपने भक्तों की पुकार पर अवश्य प्रकट होते हैं और ऐसा ही हुआ भी पृथ्वी के सागर में जलमग्न हो जाने पर पृथ्वीलोक में त्राहि-त्राहि मच गई। प्राणी सृष्टि के पालनहार श्रीहरि विष्णु को बारंबार पुकारने लगे। प्राणियों की करुण चीख-पुकार पर श्रीहरि वराह रूप में हिरण्याक्ष के सम्मुख प्रकट हो गए। उन्होंने हिरण्याक्ष को चेतावनी दी कि वह पृथ्वी को यथास्थान पर रखकर वहाँ से चला जाए, किंतु असुरराज पर श्रीहरि की चेतावनी का कोई प्रभाव न हुआ।

भयंकर गर्जना करते हुए वराह रूपी श्रीहरि तीव्र वेग से हिरण्याक्ष की ओर बढ़े। अपने शक्तिशाली मुख का तीक्ष्ण प्रहार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के हाथों से पृथ्वी को मुक्त करा लिया, किंतु हिरण्याक्ष ने उनका पीछा न छोड़ा। वराह रूपी श्रीहरि ने भीषण गर्जन करते हुए हिरण्याक्ष पर प्रहार किया, प्रत्युत्तर में असुरराज भी तीव्रता से प्रहार करने लगे। इस भीषण युद्ध से पृथ्वी के प्राणियों में हाहाकार मच गया और उनके प्राण कंठ में आ अटके। असुरराज अत्यंत शक्तिशाली था, किंतु वराह रूपी श्रीहरि के सम्मुख वह अधिक समय तक न ठहर सका। अंततः एक तीक्ष्ण और निर्णायक प्रहार से हिरण्याक्ष का वध करके वराह रूपी श्रीहरि ने पृथ्वी को यथास्थान स्थापित किया। हिरण्याक्ष की मृत्यु और अपनी मुक्ति पर देवी पृथ्वी ने वराह रूपी श्रीहरि का आभार प्रकट किया। पृथ्वीलोक के सभी प्राणियों ने मन-ही-मन श्रीहरि का पावन स्मरण करते हुए उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए।