Mafia's Obsessed Love - 7 Priyanka Saini द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Mafia's Obsessed Love - 7


अब तक अपने पढ़ा....

विधि जी की बात सुनने के बाद सब अपना सिर हां में हिला देते है, वहीं शायना मिहिर और अजित इन तीनों की तो अलग ही खिचड़ी पक रही थी । ऊपर से ये सब सुनने का बाद तो तीनों का मुंह ही बन जाता है क्योंकि तीनों को ही अक्षिता पसंद नहीं थी। 
     अब सभी की निगाहें वेदांश पर टिक जाती है जो वहीं खड़ा , पेंट की पॉकेट में दोनों हाथ डाले आपने एक्सप्रेसनलेस चेहरे के साथ उन्हें ही देख रहा था।

अब आगे....
वेदांश कुछ नहीं कहता उसके लिए ये शादी सिर्फ एक डील थी ।वैसे भी ये शादी वो अपने मोम डैड के कहने पर कर रहा था ।उसे अक्षिता से कोई लेना देना नहीं था ।
         वहीं विकास जी तो खुशी से फुले नहीं समा रहे थे ।
आखिरकार उनका सपना पूरा होने जा रहा था। वो भी पहले से ही चाहते थे कि उनकी बेटी की शादी वेदांश के साथ हो । वो ही राठौर परिवार की बड़ी बहू बने। क्योंकि अक्षिता बचपन से ही वेदांश को पसंद करती थी। 

रात का वक्त था…
पूरा गांव नींद में डूबा हुआ था, लेकिन हवाओं में हल्की सरसराहट थी — जैसे कोई बेचैनी हो, कोई राज़ छिपा हो।

श्री अपने छोटे से कमरे में फर्श पर बैठी थी। आंखें सूजी हुईं, और बगल में उसकी पुरानी किताबें पड़ी थीं — जिनमें कुछ सपने दबे थे, कुछ अरमान।
खिड़की से आती चांदनी उसके आंसुओं पर गिरती, और वो आंसू मोतियों की तरह चमकते… पर उन मोतियों में दुख था, बहुत गहरा दुख।

“क्यों मां-पापा…?”
वो फुसफुसाती है।
“क्यों मुझे अकेला छोड़ गए तुम? किसी से लड़ भी नहीं सकती मैं… किससे कहूं कि ये सब गलत है…”

चाची के शब्द बार-बार उसके दिमाग में गूंजते हैं —
“मनहूस कहीं की… बोझ बनकर जी रही है…”

वो आज दिन में क्या हुआ सब याद करने लगती है।
शाम का वक्त ...
   आज श्री अपनी  एक सहेली के साथ बाजार गई थी । 
घर पर कुछ सब्जियां खत्म हो गई थी, और कुछ जरूरी सामान भी उसे लाना था । बस इसलिए ही उसकी चाची ने उसे जाने दिया था ।

बाजार...
  "ये वाली कुर्ती बहुत प्यारी लग रही है । इसका कपड़ा भी अच्छा है और कलर भी"... श्री जो अपनी सहेली रेनू से कह रही थी...  इस पर रेनू बोलती है ... "श्री तुम्हारी पसंद बहुत अच्छी है ।"
     रेनू ने अभी इतना कहा ही था कि पीछे से एक आवाज आती है...  "श्री भी तो अच्छी है ।" 
इस आवाज को सुनने के बाद श्री और रेनू दोनों ही पलट कर देखते है ।
               तो.. एक लड़का जो प्रिंटेड रंगबिरंगी शर्ट और नीचे एक काली पेंट पहने हुए , बुलेट से लगा खड़ा था । उसका एक हाथ उसके पास खड़े लड़के के कंधे पर ओर दूसरा हाथ की अंगुली में चबी को गोल गोल घूमते हुए उन्हें ही अजीब ढंग से घूर रहा था। उसके साथ कुछ और लड़के भी खड़े थे। जो  श्री को देखकर बस मुस्करा रहे थे।
    उनमें से एक लड़का बोलता है... "अरे भाई सुना है.. इस खूबसूरतकली के लिए पड़ोस के गांव के प्रधान के बड़े बेटे का रिश्ता आया है.."   ये बात कहने के बाद वो मुस्कराने लगता है। 
     उसकी बात सुन्ने के बाद वो बुलेट पर बैठा लड़का जिसका नाम विक्रम था बोलता है ..  "अरे.. अरे इतनी खूबसूरती को दूसरे गांव में भेजनी का क्या जरूरत है। हम है न... " इतना कहने के बाद वो जोर - जोर से हँसने लगता है। उसके साथ खड़े सारे लड़के भी बहुत तेज-तेज हसने लगते है । 
   श्री को अपने बारे मे ऐसी वाहियात बातें सुनने के बाद बहुत जोर से गुस्सा आता है साथ ही आंखो में नमी भी झलकने लगती है।
  रेनू श्री का हाथ टाइट करके पकड़ लेती है और बोलती है  ... "चल श्री अब घर चल वैसे भी बहुत देर हो गई है " 
श्री उसे एक नजर अपनी नम आंखों से  उसे देखती है, और हां में सिर हिलाकर उसके साथ  जैसी ही जाने लगती है.. वैसे ही विक्रम सामने आकर बोलता है  ...  "अरे जानेमन कहां अभी तो जी भरकर देख भी नहीं पहले जी भरकर देख लेने तो दो" .. ये कहते हुए उसका हाथ श्री के कंधे पर चला जाता है और बो उसे अजीब तरीके से छूने लगता है।
       ये देखकर श्री का शरीर पूरी तरीके  से कांप जाता है। वह जल्दी से विक्रम को हाथ झटकती है और उससे अपनी हकलाती हुई आवाज में कहती है ... "दू .. दूर   रहो मुझसे" ... उसकी बात सुनकर विक्रम तिरछी तरीके से मुस्कराते हुए कहता है  ... "क्यों जानेमन हमारे गांव में इतनी खूबसूरती है ओर हम उसके मज़े भी न ले।" 

इतना कहकर वो अपने दोस्तों की तरफ देखता है और जोर जोर से हँसने लगता है साथ ही उसके दोस्त भी हस रहे होते है । बाजार में खड़े सब लोग श्री को ही देख रहे होते है पर कोई उसकी मदद के लिए नहीं आता क्योंकि विक्रम इस गांव के सरपंज का बेटा है । 
   
  विक्रम धीरे धरे श्री की तरफ कदम बढ़ाता है  और अपना हाथ उसके गाल की तरफ बढ़ने लगता है ।वो श्री को छू भी पता उससे पहले ही श्री रेनू का हाथ पकड़ तेज कदमों से निकल जाती है। विक्रम  श्री को जाते हुए देखकर उससे बोलता है ... "जानेमन एक रात तो में तेरे साथ जरूर बिताऊंगा चाहे कुछ भी क्यों हो जाए ।"

   ये सब याद करके श्री की सांसें तेज हो जाती हैं।
वो उठती है, अपनी टूटी अलमारी खोलती है, और उसमें से अपने मम्मी-पापा की तस्वीर निकालती है। आंखों से आंसू टपकते हैं।
“अगर मैं यहां रही तो मेरा दम घुट जाएगा… मुझे जाना होगा… कहीं दूर, बहुत दूर…”

वो जल्दी-जल्दी अपनी कुछ चीज़ें एक छोटे से बैग में रखती है — दो जोड़ी कपड़े, एक किताब, और एक तस्वीर।
धीरे से दरवाज़ा खोलती है, बाहर झांकती है — सन्नाटा पसरा है।
लेकिन जैसे ही वो आंगन में कदम रखती है, उसे अपने चाचा की आवाज़ सुनाई देती है —
      " कौन है ? क्या श्री ये तुम हो ? इतनी रात में वहां क्या कर रही हो ?" ....      पर श्री कुछ नहीं बोलती ..    थोड़ा सा ओर अंधेरे में छिप जाती है ।
  जब उसके चाचा को कोई आवाज नहीं आती तो वो घर के अंदर चले जाते है ।  उनके जाने बाद श्री थोड़ा सा  झांकर देखती है । एक पल के लिए....
             उसका दिल धड़क उठता है।
वो एक पल रुकती है… फिर अपनी चप्पल हाथ में पकड़कर नंगे पांव दौड़ने लगती है…
आंसू और हवा दोनों उसके चेहरे पर टकरा रहे थे।
रात की अंधेरी सड़क पर सिर्फ चांद की रोशनी उसका रास्ता दिखा रही थी।

कितनी देर तक दौड़ती रही — उसे खुद नहीं पता।
थक कर वो सड़क के किनारे बैठ जाती है।
ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उसके अंदर का तूफान थम नहीं रहा था।
वो आसमान की तरफ देखती है…
“अब बस… जहां तक किस्मत ले जाए वहीं जाऊंगी…”
  
       मुंबई, राठौर विला।

वेदांश अपनी कमरे की  बालकनी में शर्टलेस खड़ा था उसकी मस्कुलर बॉडी पर पानी की बूंदें फिसल रही थी उसका चौड़ा सीना और 8 पेक six ab वाला शरीर साफ-साफ विजिबल हो रहा था, उसके चेहरे से ठंडी - ठंडी हवा टकरा रही थीं। वो एक टक दूर फैले समुद्र ओर एक तरफ चलती गाड़ियों को देख रहा था — पर उसके चेहरे पर न एक भी मुस्कान थी, न कोई चमक।
वो चुपचाप सिगार जलाता है, धुआं आसमान में छोड़ते हुए खुद से कहता है —
“शादी… सिर्फ एक सौदा है।”
उसकी आंखों में ठंडापन था, वो कुछ गहराई से सोच रहा था, पर क्या ?  ये तो सिर्फ वही जनता था ।

ठीक उसी वक्त, कहीं दूर स्टेशन पर एक ट्रेन रुकती है…
और उस ट्रेन में चढ़ती है श्री — कांपते हाथों से टिकट पकड़कर, चेहरे पर डर और उम्मीद दोनों लिए।
ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ती है…

ट्रेन की खिड़की से बाहर झांकते हुए श्री धीरे से फुसफुसाती है —
“अब जो भी होगा… वो भगवान भरोसे।"

क्या होगा श्री की आने वाली जिंदगी में ? क्या श्री जिन अंधेरों से भाग रही है। कहीं आगे भी जाकर बांध जाएगी इन अंधेरों की बेड़ियों में? जानने के लिए पढ़ते रहिए मेरी नोबेल "Mafia's Obessed Love" 💕 😘 
   
And thank you readers jo mere novel ko padhte hai unka "तहे Dil से Dhanyawad" ।
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