राज-ए-खंडहर: श्रापित विरासत - 2 Dev Kumar Rawat द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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राज-ए-खंडहर: श्रापित विरासत - 2

अध्याय 2: हवेली की दीवारों के राज़
आर्यन ने हवेली के भारी-भरकम लोहे के दरवाज़े को धक्का दिया। दरवाज़ा एक ऐसी चीख के साथ खुला जैसे कोई सदियों से दर्द में कराह रहा हो। अंदर घुसते ही एक ऐसी ठंडी और नमी वाली हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया, जिसने उसके खून को जमा दिया। उस हवा में मिट्टी, सड़ी हुई लकड़ी और पुराने कागज़ों की एक अजीब सी महक थी। आर्यन ने अपना कैमरा निकाला और उसकी पावरफुल एलईडी लाइट ऑन की। रोशनी का घेरा जैसे ही विशाल हॉल में फैला, आर्यन की धड़कनें रुक सी गईं।

हॉल इतना बड़ा था कि उसकी छत अंधेरे में कहीं खो गई थी। दीवारों पर आदमकद तस्वीरें लगी थीं। हर तस्वीर में कोई न कोई ठाकुर या रियासत की रानी बनी थी, लेकिन उन सबकी आँखें ऐसी थीं जैसे वे आर्यन की हर हरकत पर नज़र रख रही हों। आर्यन ने कैमरा घुमाया और धीरे से फुसफुसाया, "दोस्तों, मैं इस वक्त रायचंद हवेली के मुख्य हॉल में हूँ। यहाँ का सन्नाटा इतना गहरा है कि मुझे अपनी ही पलकें झपकने की आवाज़ सुनाई दे रही है।"

जैसे ही वह आगे बढ़ा, लकड़ी के फर्श ने 'चर-चर' की आवाज़ की। अचानक, हॉल के कोने में रखी एक पुरानी घड़ी (Grandfather Clock) जो बरसों से बंद पड़ी थी, अचानक चलने लगी। उसका पेंडुलम इतनी ज़ोर से हिला कि पूरी हवेली में डोंग... डोंग... की भयानक गूँज उथ गई। आर्यन हैरान था, क्योंकि घड़ी की सुइयां टूटी हुई थीं, फिर भी वह समय बता रही थी—रात के ठीक 12 बजे।

आर्यन ने हिम्मत जुटाई और ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। सीढ़ियाँ पुरानी सागौन की बनी थीं और उन पर एक गहरा लाल कालीन बिछा था, जो अब धूल और काले धब्बों से भरा था। जैसे ही उसने पहली सीढ़ी पर पैर रखा, उसे किसी के रोने की हल्की आवाज़ आई। वह रुक गया। आवाज़ ऊपर से नहीं, बल्कि दीवारों के पीछे से आ रही थी। ऐसा लगा जैसे कोई औरत बहुत धीमी आवाज़ में कोई पुराना करुण गीत गा रही हो। "कौन है वहाँ?" आर्यन ने तेज़ आवाज़ में पूछा, लेकिन जवाब में सिर्फ उसकी अपनी प्रतिध्वनि (echo) वापस आई।

तभी उसकी नज़र हॉल के बीच में लगे एक विशाल धुंधले आईने पर पड़ी। आईने में उसने देखा कि उसके ठीक पीछे एक धुंधली सी परछाई खड़ी है, जिसके हाथ बहुत लंबे हैं और उंगलियां आर्यन की गर्दन की तरफ बढ़ रही हैं। आर्यन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। जब उसने वापस आईने में देखा, तो वह परछाई गायब हो चुकी थी, लेकिन आईने की धूल पर उंगलियों से कुछ लिखा हुआ था— "तुम बहुत देर से आए, आर्यन।"

आर्यन के रोंगटे खड़े हो गए। उसने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन तभी मुख्य दरवाज़ा एक धमाके के साथ खुद-ब-खुद बंद हो गया। बिजली की चमक में उसने देखा कि ऊपर की मंज़िल की रेलिंग पर एक काला साया खड़ा उसे घूर रहा है। उसकी आँखें अंधेरे में अंगारों की तरह चमक रही थीं। आर्यन को एहसास हुआ कि वह अब इस हवेली का कैदी बन चुका है और यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता अब सिर्फ उन राज़ों के बीच से होकर जाता है, जो इस हवेली की दीवारों में दफन हैं।