चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 14 Std Maurya द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 14

मैंने कहा—
“चलो ठीक है… सफर का आनंद लेते हैं।
लो, तुम लोग भी मूंगफली खाओ…”
इतना कहकर मैंने मूंगफली का लिफाफा उनकी तरफ बढ़ा दिया।
अंकिता ऊपर वाली सीट से नीचे उतरी और
2–3 मूंगफली उठाकर खाने लगी।
तभी प्रियांशी मुस्कुराते हुए बोली—
“और बताओ अंकिता, सफर कैसा लग रहा है?”
अंकिता ने उत्साह से कहा—
“मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है…
मैं पहली बार दोस्तों के साथ सफर कर रही हूँ।”
फिर थोड़ी देर रुककर बोली—
“सच में, मैंने सफर तो बहुत किया है…
लेकिन हमेशा मम्मी-पापा के साथ ही।”
हमारी बर्थ पर दो और यात्री भी बैठे हुए थे।
उन्होंने हमारी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए पूछा—
“अरे, तुम लोग कहाँ जा रहे हो?”
मैंने विनम्रता से जवाब दिया—
“हम लोग बौद्ध गया जा रहे हैं… घूमने के लिए।”
यात्री ने कहा—
“अच्छा है… वो जगह मुझे भी बहुत पसंद है।
मैं भी कई बार सोचा हूँ वहाँ जाऊँ,
लेकिन समय ही नहीं मिल पाता…”
मैंने उनसे पूछा—
“आप कहाँ जा रहे हैं? अगर पूछूँ तो…”
वह बोले—
“बस बेटा, शहर से अपने घर लौट रहे हैं…”
तभी अंकिता ने उत्सुकता से पूछा—
“अंकल जी, आप लोग क्या करते हैं?”
यात्री ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“ज्यादा कुछ नहीं…
हम शहर में डिलीवरी का काम करते हैं…”
अंकिता ने धीरे से कहा—
“अंकल जी… आपका वेतन तो बहुत कम होगा न?”
यात्री हल्की मुस्कान के साथ बोले—
“हाँ बेटा… कम ही है।
लेकिन क्या करें…”
उन्होंने गहरी साँस ली और आगे बोले—
“हम ज्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं…
और कोई खास हुनर भी नहीं सीखा है।”
कुछ पल रुककर बोले—
“अगर हमारे पास कोई हुनर होता,
या कोई डिग्री होती…
तो कम से कम 50–60 हजार रुपये तक कमा लेते…”
उनकी आवाज़ थोड़ी भारी हो गई—
“लेकिन अब तो जो काम मिल रहा है, वही करना पड़ रहा है…”
फिर उन्होंने धीमे से कहा—
“घर में एक बेटी भी है…
उसकी शादी की जिम्मेदारी भी है…”
वह अंकिता की तरफ देखते हुए बोले—
“आजकल शादी का खर्च तो तुम जानती ही हो, बेटी…”
प्रियांशी ने गंभीर होकर कहा—
“अंकल जी, आजकल शादी कहाँ हो रही है…
मैं तो देखती हूँ कि अब सिर्फ पैसों की ही शादी हो रही है।
लड़का-लड़की की खुशी तो बस एक बहाना बनकर रह गई है…
बिना पैसे के तो अब शादी भी मुश्किल हो गई है…”
यात्री ने सहमति में सिर हिलाया और बोले—
“हाँ बेटी… लेकिन हम क्या कर सकते हैं?
आजकल पैसा ही सब कुछ बन गया है…”
मैंने उनकी बात सुनकर कहा—
“अंकल जी, अगर हर एक युवा बदलाव लाने की ठान ले…
तो बदलाव जरूर आ सकता है।”
यात्री थोड़े हैरान होकर बोले—
“वो कैसे बेटा?
एक आदमी से क्या ही हो सकता है…
आजकल तो भ्रष्टाचार भी बढ़ता ही जा रहा है।”
उन्होंने आगे कहा—
“रिश्तेदारों को तो किसी तरह मना लेंगे,
लेकिन जब शादी का सामान लेने जाते हैं…
तो उसके दाम आसमान छू रहे होते हैं।”
फिर उन्होंने समझाते हुए कहा—
“तुम खुद ही देख लो बेटा…
एक साड़ी की कीमत करीब 1500 रुपये हो गई है।
अगर 10 लोगों के लिए लेनी पड़े,
तो सिर्फ साड़ियों में ही 15 हजार खर्च हो जाते हैं…”
उन्होंने थके हुए स्वर में कहा—
“और अभी तो बाकी का सामान भी लेना होता है…
जिसका खर्च अलग से जोड़ो तो और भी बढ़ जाता है…”
मैंने शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा—
“अंकल जी, यह बात तो सही है…
लेकिन आजकल दहेज की मांग भी बहुत बढ़ती जा रही है।”
मैंने आगे कहा—
“अगर कोई लड़का सरकारी नौकरी में है,
तो लोग उससे बहुत ज्यादा दहेज मांगते हैं…”
थोड़ा रुककर मैंने कहा—
“और कई बार ऐसा भी होता है कि लड़कियाँ भी
उसी तरह के लड़कों की तरफ ज्यादा आकर्षित होती हैं…
हालाँकि, सभी ऐसी नहीं होतीं…
लेकिन कुछ लोग इस सोच को बढ़ावा जरूर देते हैं…”
यात्री ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“हाँ बेटा… जिस लड़के के पास सरकारी नौकरी नहीं होती,
उसके घर तो रिश्ता जाकर भी लौट आता है…”
उन्होंने दुख भरे स्वर में आगे कहा—
“और अगर कोई लड़का दहेज नहीं मांगता,
तो लोग उसी में कमियाँ निकालने लगते हैं…
कहते हैं— ‘कहीं लड़के में कोई कमी तो नहीं…’”
कुछ पल रुककर उन्होंने एक उदाहरण दिया—
“मेरे गाँव में एक लड़का था… नाम था रोहित।
वह चाहता था कि वह बिना दहेज के शादी करे…”
उन्होंने हल्की निराशा के साथ कहा—
“लेकिन उसके घर भी रिश्ता आकर लौट गया…
लोगों ने यही सोचा कि—
‘लड़का दहेज नहीं ले रहा, मतलब उसमें जरूर कोई कमी होगी…’”
मैंने उनकी बात सुनकर कहा—
“हाँ अंकल जी…
ऐसा मेरे यहाँ भी हुआ है…”
प्रियांशी ने गंभीर होकर कहा—
“यह बात बिल्कुल सही है…
पता नहीं लोग ऐसा क्यों सोचते हैं।
आजकल लोग लड़का-लड़की को खुश और अच्छा जीवन देना चाहते हैं,
लेकिन फिर भी पैसे के पीछे ही भागते रहते हैं…”
वह थोड़ा भावुक होकर बोली—
“समझ नहीं आता… लोगों को कब समझ आएगी…”
मैंने शांत स्वर में कहा—
“बदलाव आ सकता है…
लेकिन उसके लिए हमें खुद बदलना होगा।”
मैंने आगे कहा—
“दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए
हमें प्रेम विवाह को बढ़ावा देना चाहिए…”
प्रियांशी मेरी बात ध्यान से सुन रही थी।
मैंने समझाते हुए कहा—
“जब लड़का-लड़की अपनी पसंद से,
एक-दूसरे को समझकर शादी करेंगे,
तो दहेज की जरूरत ही नहीं पड़ेगी…”
मैंने आगे कहा—
“इससे सिर्फ दहेज प्रथा ही खत्म नहीं होगी,
बल्कि समाज में एकता भी बढ़ेगी…
जो आज हजारों जातियों में बंटा हुआ है…”
मैं थोड़ा जोश में आ गया—
“और सबसे बड़ी बात…
शादी में होने वाला बेवजह का खर्च भी बचेगा।
आजकल लोग सिर्फ दिखावे के लिए
लाखों रुपये कर्ज में डूब जाते हैं…”
मैंने गहरी साँस लेकर कहा—
“अगर सोच बदल जाए…
तो समाज खुद-ब-खुद बदल जाएगा…”
अंकिता ने मुस्कुराते हुए मज़ाक में कहा—
“भैया, अगर मैं किसी लड़के को पसंद करूँ…
तो मेरी शादी उसी से कराओगे न?”
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“क्यों नहीं…
लेकिन लड़का सही होना चाहिए।
नशा बिल्कुल नहीं करता हो…
मेरी तरह 
तब मैं जरूर तुम्हारी शादी उसी से कराऊँगा।”
अंकिता हँसते हुए बोली—
“अरे भैया, मैं तो मज़ाक कर रही थी…
आप तो सीरियस हो गए!”
मैंने भी हँसते हुए कहा—
“इसमें सीरियस होने वाली क्या बात है…
मैं तो बस सही बात कर रहा था।”
हमारी बातें सुनकर यात्री मुस्कुराए और बोले—
“बिल्कुल सही कह रहे हो बेटा…
काश हर लड़की को तुम्हारे जैसा भाई मिले,
जो अपनी बहन की खुशी के बारे में सोचे…
न कि अपने स्वार्थ के लिए…”
फिर उनका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया—
“आजकल कुछ भाई ऐसे भी होते हैं…
जो अपनी बहन की शादी में सिर्फ पैसा और फायदा देखते हैं…”