लेखक - एसटीडी मौर्य ✍️
कटनी मध्य प्रदेश
ट्रेन से उतरने के बाद हम लोग स्टेशन के बाहर ऑटो पकड़ने के लिए पार्किंग की ओर चले गए।
वहाँ बहुत सारे ऑटो लाइन में खड़े थे। ऑटो वाले जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे—
“कटनी बाईपास…!”
“मधु नगर… मधु नगर चलो…!”
इतने में नर्स गुड़िया बोली—
“ठीक है, मैं मधु नगर जा रही हूँ। वहीं मैं एक कमरा लेकर रहती हूँ। अब मैं यहीं से चली जाऊँगी। बाय, फिर कभी मुलाकात होगी।”
इतना सुनते ही अंकिता तुरंत बोली—
“ठीक है, लेकिन अपना नंबर तो दे दीजिए। अगर पास में न मिल सके तो कम से कम फोन पर बात तो कर सकेंगे।”
प्रियांशी भी बोली—
“हाँ, यह तो सही बात है। आपको अपना नंबर दे देना चाहिए।”
गुड़िया मुस्कुराते हुए बोली—
“क्यों नहीं, आप लोग मेरा नंबर लिख लीजिए।”
यह सुनकर मेरी बहन अंकिता ने बिना देर किए तुरंत अपना मोबाइल निकाला और गुड़िया का नंबर उसमें नोट कर लिया।
फिर हम सबने एक-दूसरे को अलविदा कहा।
गुड़िया मधु नगर जाने वाले ऑटो में बैठकर चली गई, और हम तीनों—मैं, प्रियांशी और अंकिता—अस्पताल जाने के लिए एक दूसरा ऑटो पकड़कर आगे बढ़ गए।
अस्पताल पहुँचने के बाद हम सबसे पहले स्टाफ रूम की ओर गए। वहाँ एक नर्स बैठी थी।
मैंने उनसे पूछा—
“मैडम, मेरी मम्मी किस रूम में हैं?”
नर्स ने हमारी ओर देखा और पूछा—
“आप उनके कौन लगते हैं?”
मैंने जवाब दिया—
“मैं उनका बेटा हूँ।”
नर्स बोली—
“ठीक है सर, क्या आप अपना आधार कार्ड दिखा सकते हैं?”
मैंने तुरंत अपना आधार कार्ड निकालकर दे दिया—
“जी, ये लीजिए।”
नर्स ने कार्ड देखकर कहा—
“ठीक है सर, रूम नंबर 9 में हैं। आप वहाँ जा सकते हैं।”
अंकिता बोली—
“चलो भैया, अब देर किस बात की?”
मैंने कहा—
“हाँ, चलो।”
जब हम रूम नंबर 9 के पास पहुँचे, तो देखा पापा बाहर खड़े थे, जैसे हमारे ही इंतज़ार में हों।
पापा हमें देखते ही बोले—
“अरे बेटा, तुम लोग ठीक से आ गए न? कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
मैंने कहा—
“नहीं पापा, हम ठीक से आ गए। आप ये बताइए, मम्मी कैसी हैं?”
पापा थोड़ा उदास होकर बोले—
“मम्मी अंदर बेड पर हैं। अभी थोड़ी देर में डॉक्टर आएँगे और उन्हें खून चढ़ाया जाएगा।”
मैंने कहा—
“पापा, खून का इंतज़ाम हम कर चुके हैं।”
इतने में पापा की नजर प्रियांशी पर गई।
उन्होंने पूछा—
“बेटा, ये कौन है?”
अंकिता बोली—
“पापा, ये मेरी सहेली प्रियांशी है।”
प्रियांशी ने हाथ जोड़कर कहा—
“नमस्ते अंकल जी… आंटी जी कैसी हैं?”
पापा बोले—
“बस बेटा, ठीक हो जाएँ यही दुआ है।”
तभी एक नर्स जल्दी से आई और बोली—
“आप लोगों ने ब्लड का इंतज़ाम किया है या नहीं? समय बहुत कम है, हमें तुरंत ब्लड चढ़ाना होगा।”
मैंने कहा—
“जी, इंतज़ाम हो गया है।”
इतने में प्रियांशी आगे बढ़कर बोली—
“मैडम, मैं ब्लड डोनेट कर देती हूँ… एक यूनिट।”
यह सुनकर पापा घबरा गए—
“अरे बेटा, तुम खून दोगी? तुम्हें कुछ हो गया तो हम खुद को माफ नहीं कर पाएँगे।”
प्रियांशी ने मुस्कुराकर कहा—
“नहीं अंकल जी, मुझे कुछ नहीं होगा। आप सबका आशीर्वाद है।”
मैंने कहा—
“प्रियांशी, तुम आधा यूनिट देना… और आधा मैं दे दूँगा।”
प्रियांशी बोली—
“लेकिन आपका ब्लड ग्रुप अलग है ना?”
मैंने समझाते हुए कहा—
“हाँ, लेकिन मैं अपना ब्लड बैंक में जमा कर दूँगा और बदले में मैचिंग ब्लड ले लेंगे। एक साथ पूरा देना थोड़ा रिस्की होता है, इसलिए हम दोनों मिलकर देंगे।”
नर्स बोली—
“आप लोग बातें बाद में कर लीजिए, पहले जल्दी चलिए।”
फिर मैं और प्रियांशी ब्लड डोनेशन रूम की ओर चले गए।
वहाँ हमारा ब्लड लिया गया।
उधर पापा और अंकिता बाहर खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वे हमें देखकर उन्हें छुपाने की कोशिश कर रहे थे।
अंकिता चुपचाप बालकनी में जाकर भगवान से प्रार्थना कर रही थी—
“हे भगवान, मम्मी को जल्दी ठीक कर दो…”
कुछ देर बाद जब हमारा ब्लड लिया गया, तो शरीर में थोड़ी कमजोरी महसूस होने लगी।
पापा हमारे लिए अनार का जूस लेकर आए और बोले—
“लो बेटा, इसे पी लो… ताकत आ जाएगी।”
हमने जूस पिया और थोड़ी देर आराम किया।
उधर मम्मी को धीरे-धीरे ब्लड चढ़ाया जा रहा था…
पूरा माहौल शांत था, लेकिन दिलों में डर और उम्मीद दोनों साथ-साथ चल रहे थे।
जब मम्मी को खून चढ़ाया जा चुका था, कुछ समय बाद उन्हें धीरे-धीरे होश आने लगा।
यह खबर मिलते ही हम सब उनसे मिलने के लिए बेचैन हो गए, लेकिन डॉक्टर ने हमें तुरंत अंदर जाने से मना कर दिया।
डॉक्टर बोले—
“अभी मरीज को आराम करने दीजिए। थोड़ी देर बाद आप मिल सकते हैं।”
उधर, ब्लड डोनेट करने के कारण डॉक्टर ने मुझे और प्रियांशी को भी सख्त हिदायत दी थी—
“आप दोनों अभी 2–3 घंटे तक चलेंगे-फिरेंगे नहीं। आराम करना जरूरी है।”
इसलिए हमें वहीं एक कमरे में आराम करने के लिए भेज दिया गया।
मैं और प्रियांशी एक ही कमरे में, पास-पास रखे दो बेड पर लेट गए।
शरीर में हल्की कमजोरी थी, लेकिन मन में एक सुकून भी था—
कि हमने समय पर मम्मी के लिए कुछ कर पाया।
कमरे में हल्की-सी खामोशी थी…
बस हमारे दिलों की धड़कनें और बाहर से आती अस्पताल की हलचल सुनाई दे रही थी।
मैं चुपचाप छत की ओर देख रहा था,
और प्रियांशी भी शायद अपने ही ख्यालों में खोई हुई थी…
जब प्रियांशी को ध्यान आया कि मैं भी उसके बगल वाले बेड पर लेटा हूँ,
तो उसने धीरे से मेरी ओर देखते हुए पूछा—
“आप ठीक हो ना?”
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“तुम ठीक हो तो मैं भी ठीक हूँ।”
प्रियांशी तुरंत बोली—
“हट पागल! मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
इतने में अंकिता कमरे में आ गई।
वह उत्साहित होकर बोली—
“भैया! मम्मी को होश आ गया है… अब चिंता की कोई बात नहीं।”
यह सुनकर हमारे चेहरे पर राहत साफ झलकने लगी।
अंकिता पास आकर प्रियांशी के बगल में बैठ गई और उसके सिर को हल्के-हल्के दबाने लगी।
प्रियांशी तुरंत मना करते हुए बोली—
“अरे नहीं! मैं ठीक हूँ… तुम क्यों परेशान हो रही हो?”
फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा—
“तुम अपने भैया का सिर दबा दो, उन्हें ज्यादा जरूरत है।”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे, मैं भी ठीक हूँ!”
अंकिता बोली—
“नहीं भैया, आज तो आप दोनों हीरो हो… सेवा तो बनती है।”
हम तीनों हल्का-सा हँस पड़े।
फिर अंकिता बोली—
“चलो अब… मम्मी इंतज़ार कर रही होंगी।”
हम धीरे-धीरे उठे…
और मम्मी से मिलने के लिए उनके कमरे की ओर बढ़ गए।