पापा बोले—
“नहीं बेटा, कोई नहीं आया होगा… लगता है खिड़की खुली रह गई थी, उसी वजह से सामान बिखर गया होगा।”
मैंने कहा—
“ठीक है, चलो अपने-अपने कमरे चेक करते हैं… तभी पता चल जाएगा कि कोई आया था या नहीं।”
हम लोगों ने मम्मी को उनके कमरे में बैठा दिया।
प्रियांशी उनके पास ही रुक गई, और हम बाकी लोग अपने-अपने कमरों की तरफ चले गए।
हमने अपना कमरा चेक किया—
लेकिन वहाँ सब कुछ ठीक था, कुछ भी गायब नहीं था।
फिर हम मम्मी के कमरे में गए…
और जैसे ही अलमारी खोली, हम सबके होश उड़ गए।
मम्मी के सारे गहने गायब थे…
मैंने घबराकर कहा—
“मम्मी, आपके गहने कहाँ हैं? आप तो इन्हें इसी अलमारी में रखती थीं… लेकिन यहाँ तो कुछ भी नहीं है!”
तभी पापा भी हमारे पास आ गए और बोले—
“क्या हुआ?”
मैंने कहा—
“पापा… मम्मी के गहने यहाँ नहीं हैं।”
पापा हैरान होकर बोले—
“तो फिर गए कहाँ? इतने कीमती गहने…!”
मम्मी घबराते हुए बोलीं—
“मैं तो हमेशा यही रखती थी… इसी अलमारी में…”
फिर उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
“उसमें लगभग 60 लाख के गहने थे…”
यह सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया।
सबके चेहरे पर डर और निराशा साफ दिखाई दे रही थी।
मैंने हिम्मत जुटाकर कहा—
“अंकिता, चल मेरे साथ… हम थाने में रिपोर्ट लिखवाते हैं।”
अंकिता बोली—
“ठीक है भैया, चलो अभी चलते हैं… देर नहीं करनी चाहिए।”
मैंने पापा से कहा—
“पापा, हम दोनों रिपोर्ट लिखवाकर आते हैं।”
इतना कहकर हम दोनों भाई-बहन थाने के लिए निकल गए।
थाने पहुँचकर मैंने एक पुलिस वाले से कहा—
“सर, मुझे चोरी की रिपोर्ट लिखवानी है।”
पुलिस वाला बोला—
“लिख जाएगी… लेकिन अभी नहीं। बड़े साहब आएँगे, तब लिखी जाएगी।”
मैंने कहा—
“अभी क्यों नहीं? आप भी तो लिख सकते हैं।”
वह बोला—
“लिख तो दूँगा… लेकिन मुझे क्या मिलेगा?”
यह सुनकर मुझे गुस्सा आ गया।
मैंने कहा—
“आप रिपोर्ट लिखेंगे या नहीं?”
पुलिस वाला बोला—
“नहीं लिखूँगा। तुम किसी और को लेकर आओ, तब लिखूँगा।”
मैंने कहा—
“जब मेरा सामान चोरी हुआ है, तो रिपोर्ट भी मैं ही लिखवाऊँगा… कोई और क्यों आएगा?”
मैंने गुस्से में कहा—
“आपको हमारी रिपोर्ट लिखनी ही होगी!
मेरे घर में लाखों के गहनों की चोरी हुई है।”
पुलिस वाला धीमे से बोला—
“ठीक है… मदद तो कर दूँगा, लेकिन थोड़ा ‘चाय-पानी’ का इंतज़ाम करना पड़ेगा…”
यह सुनकर मेरा खून खौल उठा।
मैंने कहा—
“रहने दीजिए! अगर रिपोर्ट लिखने के लिए भी पैसे देने पड़ें,
तो मैं किसी दूसरे थाने में जाकर लिखवा लूँगा…
आप यहीं बैठे रहिए।”
अंकिता भी गुस्से में बोली—
“हाँ भैया! ऐसे लोग वर्दी पहनकर बस उसका नाम खराब करते हैं।
हमें यहाँ से चलना चाहिए… दूसरे थाने में रिपोर्ट लिखवा देंगे।”
इतना कहकर हम दोनों वहाँ से निकल गए।
घर पहुँचते ही प्रियांशी ने चिंतित होकर पूछा—
“क्या हुआ? आप लोग रिपोर्ट लिखवाकर आ गए?”
पापा ने भी वही सवाल दोहराया—
“हाँ बेटा, रिपोर्ट लिखी गई या नहीं?”
मैंने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“नहीं पापा… वहाँ तो बिना पैसे लिए रिपोर्ट ही नहीं लिख रहे थे…”
घर में फिर से एक भारी सन्नाटा छा गया…
मैंने गुस्से में कहा—
“कल हम सीधे जिला कोर्ट जाएँगे… वहीं से रिपोर्ट लिखवाएँगे,
और उस थाने के अधिकारी के खिलाफ भी शिकायत करेंगे!”
प्रियांशी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा—
“हाँ, यह सही रहेगा… गलत के खिलाफ आवाज़ उठानी ही चाहिए।”
पापा ने थोड़ा शांत करते हुए कहा—
“बेटा, थाने वाले को छोड़… तू बस अपने सामान की रिपोर्ट लिखवा ले।
ज्यादा पचड़े में मत पड़।”
मैंने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“नहीं पापा, अगर हम आज चुप रहेंगे तो ऐसे लोग हमेशा यही करेंगे।
मैं अपने साथ-साथ उस अधिकारी की भी शिकायत करूँगा।”
पापा ने फिर समझाते हुए कहा—
“देख बेटा, गुस्से में कोई बड़ा फैसला मत ले।
पहले अपना काम पूरा कर ले… बाकी बाद में देख लेंगे।”
मैंने थोड़ा शांत होकर कहा—
“ठीक है पापा… पहले रिपोर्ट लिखवाते हैं,
लेकिन गलत को यूँ ही छोड़ना भी सही नहीं है…”
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई…
हर कोई अपने-अपने सोच में डूबा हुआ था—
डर भी था, गुस्सा भी… और कहीं न कहीं न्याय की उम्मीद भी…
मैंने कहा—
“कल हम लोग जाएंगे, रिपोर्ट लिखवाकर आएंगे और न्याय के लिए गुहार लगाएंगे।”
अंकिता बोली—
“भैया सही कह रहे हैं, पापा जी…
आज हमारे साथ हुआ है, ठीक है… लेकिन दोबारा किसी और के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए।”
पापा बोले—
“ठीक है बेटा, तुम लोग कल चले जाना।”
(अगले दिन)
सुबह मैं जल्दी उठ गया।
मैंने अंकिता से कहा—
“तुम जल्दी से खाना बना लो, हमें आज रिपोर्ट लिखवाने भी जाना है।”
अंकिता बोली—
“हाँ भैया, मैं खाना बना रही हूँ। सब्जी तैयार है… बस अब रोटियाँ सेकनी बाकी हैं।”
तभी प्रियांशी बोली—
“दो, मैं रोटियाँ सेक देती हूँ।
अंकिता, तुम खाना परोस दो अपने भैया को… और तुम भी खा लो।
मैं रोटियाँ बनाकर देती जाऊँगी।”
मैंने कहा—
“ठीक है।”
मैंने खुद ही थाली उठाई और उसमें सब्जी निकालकर खाने लगा।
अंकिता ने भी अपनी थाली लगा ली और मेरे पास बैठकर खाने लगी।
प्रियांशी तवे पर गरम-गरम रोटियाँ सेक रही थी,
और हमें एक-एक करके परोसती जा रही थी…
घर का माहौल भले ही कल की घटना से भारी था,
लेकिन इस समय सब सामान्य दिखने की कोशिश कर रहे थे…
हम लोगों ने खाना खा लिया और जाने की तैयारी कर ली।
पापा बोले—
“संभल कर जाना बेटा…”
मैंने कहा—
“ठीक है पापा… आप मम्मी को दोपहर की दवा समय से दे देना।”
तभी प्रियांशी बोली—
“आप लोग चिंता मत कीजिए… मैं आंटी को समय पर दवा दे दूँगी।”
मैंने उसकी तरफ देखा…
उसके चेहरे की सादगी और जिम्मेदारी देखकर मेरे चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
मैंने धीरे से कहा—
“ठीक है… ध्यान रखना।”
इतना कहकर मैं और अंकिता घर से निकल पड़े—
रिपोर्ट लिखवाने के लिए।
थाने पहुँचने के बाद…
मैंने एक अधिकारी से कहा—
“सर, मेरे घर में दो दिन पहले चोरी हो गई है… मुझे उसकी रिपोर्ट लिखवानी है।”
पुलिस अधिकारी ने मेरी ओर देखते हुए पूछा—
“तुम कहाँ से हो? अपना पूरा परिचय बताओ।”
मैंने कहा—
“सर, मैं कटनी से हूँ।
लेकिन वहाँ के थाने में मेरी रिपोर्ट नहीं लिखी जा रही,
इसलिए मैं यहाँ आया हूँ…”
मैंने अपनी पूरी समस्या विस्तार से उन्हें बता दी।
अधिकारी ने ध्यान से सब सुना,
फिर शांत आवाज़ में बोले—
“कोई बात नहीं… हम यहाँ आपकी रिपोर्ट दर्ज कर लेते हैं।”
उनकी बात सुनकर मेरे मन को थोड़ी राहत मिली।
लेकिन फिर उन्होंने आगे कहा—
“हाँ, कार्यवाही में थोड़ा समय लग सकता है…
क्योंकि हमें यह मामला आपके क्षेत्र के थाने में भी भेजना होगा।”