चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 10 Std Maurya द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 10

लेखक - एसटीडी मौर्य ✍️ 

कटनी मध्य प्रदेश 

अंकिता बिना कुछ सोचे-समझे मेरे पास आ गई।

मैंने तुरंत मज़ाक में उसके कान पकड़ लिए—जैसा कि पापा ने इशारा किया था।
अंकिता चिल्लाते हुए बोली—
“अरे भैया! कान छोड़ो… दर्द हो रहा है!”
फिर पापा की तरफ देखकर बोली—
“देखो पापा! भैया मेरे कान पकड़ लिए हैं, छोड़ ही नहीं रहे!”
मम्मी भी मुस्कुराते हुए बोलीं—
“अरे नालायक! मेरी बेटी का कान तो छोड़ दे।”
यह सब देखकर प्रियांशी चुपचाप मुस्कुरा रही थी।
उसे हमारा यह अपनापन और मस्ती बहुत अच्छा लग रहा था।
फिर वह हल्के से बोली—
“अरे, अंकिता का कान छोड़ दीजिए…
नहीं तो जब यह ससुराल जाएगी, तब आप ही रोने लगोगे।”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे, इस चुड़ैल को तो आज ही कोई मिल जाए, तो मैं खुद छोड़ आऊँ!”
मेरी बात सुनकर सब ज़ोर से हँस पड़े।
कमरे का माहौल हल्का और खुशियों से भर गया।
ऐसे ही बातें करते-करते कब रात गहरा गई, पता ही नहीं चला…
मैंने जब मोबाइल देखा तो करीब 12 बजने वाले थे।
मैंने हल्के से कहा—
“अब मुझे नींद आ रही है…”
यह सुनकर प्रियांशी ने मुझे तिरछी नज़रों से देखा, जैसे कुछ कहना चाहती हो।
अंकिता बोली—
“हाँ भैया, अब हमें सो जाना चाहिए। सुबह भी जल्दी उठना है।”
मम्मी बोलीं—
“सभी लोग एक बेड पर तो नहीं सो सकते। ऐसा करो—बैग में जो चटाई है, उसे बिछा लो और ऊपर कपड़ा डाल लो, फिर आराम से सो जाओ।”
मैंने कहा—
“ठीक है… मैं और पापा नीचे सो जाते हैं। एक बेड खाली है, उस पर अंकिता और प्रियांशी सो जाएँगी।”
यह सुनते ही अंकिता बिना देर किए चटाई निकालकर बिछाने लगी।
उसने बेड पर चादर भी ठीक कर दी, ताकि कोई और आकर वहाँ न बैठ जाए।
तभी प्रियांशी बोली—
“नहीं, आप और पापा बेड पर सो जाइए… मैं और अंकिता नीचे सो जाएँगे।”
पापा तुरंत बोले—
“नहीं बेटी, तुम दोनों ही बेड पर सो जाओ। हम दोनों नीचे चटाई पर सो जाएंगे।
वैसे भी बेड थोड़ा छोटा है… मैं आराम से सो नहीं पाऊँगा।”
पापा की यह बात सुनकर सब हँस पड़े।
प्रियांशी मुस्कुराते हुए बोली—
“ठीक है, फिर मैं और अंकिता बेड पर सो जाते हैं।”

यह कहकर हम सब सोने चले गए।
मैं बहुत थक चुका था, इसलिए लेटते ही गहरी नींद में सो गया।
(अगली सुबह)
सुबह की हल्की-हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी…
हम सब अभी भी सो रहे थे।
पापा उठकर टहलने के लिए बाहर जा चुके थे,
लेकिन मैं अब भी गहरी नींद में था।
तभी प्रियांशी धीरे-धीरे मेरे पास आई…
वह चुपचाप मेरे बगल में आकर बैठ गई।
कुछ पल तक वह मुझे देखती रही—
जैसे मेरे चेहरे को पढ़ रही हो।
फिर उसने धीरे से अपने दुपट्टे का एक कोना पकड़ा…
और शरारत भरे अंदाज़ में उसे मोड़कर मेरे कान के पास ले गई।
वह हल्के-हल्के मेरे कान में गुदगुदी करने लगी…
मैंने दो-तीन बार नींद में ही हाथ उठाकर कान के पास से कुछ हटाने की कोशिश की…
लेकिन बार-बार ऐसा होने पर मेरी नींद अचानक खुल गई।
मैं झट से उठकर इधर-उधर देखने लगा—
“ये क्या हो रहा है?”
तभी मेरी नज़र प्रियांशी पर पड़ी।
मैं मुस्कुराते हुए बोला—
“अच्छा! तो तुम हो… मेरी कानों में कीड़ा बनकर घूम रही थीं?”
प्रियांशी थोड़ा नकली गुस्से में बोली—
“क्या मैं तुम्हें कीड़ा दिख रही हूँ?”
फिर हल्का मुस्कुराकर बोली—
“सुबह हो गई है, अब उठ जाओ…”
मैंने आँखें मलते हुए कहा—
“अभी सोने दो यार… बहुत नींद आ रही है…”
इतना कहकर मैं फिर से लेट गया।
लेकिन प्रियांशी भी कहाँ मानने वाली थी…
वह फिर से अपने दुपट्टे का कोना लेकर मेरे कानों के पास गुदगुदी करने लगी।
लेकिन जैसे ही मैं दोबारा जगा,
मैंने तुरंत प्रियांशी का हाथ पकड़ लिया।
मैं हल्के से हँसते हुए बोला—
“अब करो… गुदगुदी!” 
प्रियांशी एकदम चौंक गई…
फिर मुस्कुराते हुए बोली—
“अरे छोड़ो मेरा हाथ… क्या कर रहे हो?”
मैंने मज़ाक में उसका हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ लिया और कहा—
“इतनी देर से परेशान कर रही थी, अब मेरी बारी है।”
प्रियांशी शर्माते हुए बोली—
“अच्छा जी! तो अब बदला लिया जाएगा?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“बिलकुल… पूरा हिसाब बराबर होगा।”
इतना सुनते ही वह हल्के से हँस पड़ी…
और अपनी नज़रें नीचे झुका लीं।
कमरे में सुबह की हल्की रोशनी थी…
और उस पल में एक अलग ही सुकून था—
जहाँ शरारत भी थी, और प्यार भी… 

जब मेरी नज़र मम्मी की तरफ गई, तो मैंने तुरंत उसका हाथ छोड़ दिया।
मैंने प्रियांशी से धीरे से कहा—
“शुक्र मनाओ, मम्मी यहीं हैं… नहीं तो तुम्हारे गुलाब जैसे होठों को चूम ही लेता।”
प्रियांशी बोली—
“अच्छा जी, अभी क्या हो गया?”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“चलो, घर चलेंगे तो बताऊँगा।”
प्रियांशी बोली—
“अच्छा जी…”
तभी अंकिता भी आ जाती है और कहती है—
“भैया, आज हमें छुट्टी मिल जाएगी, तो हमें घर भी चलना है।”
मैंने कहा—
“ठीक है, फिर मैं जाकर गाड़ी बुक कर देता हूँ, तभी तो चल पाएँगे।”

अंकिता बोली—
“भैया, मैं भी आपके साथ चलती हूँ… मैं भी थोड़ा घूम लूँगी।”
मैंने कहा—
“नहीं, तू अभी यहीं रह… मैं बस गाड़ी बुक करके आता हूँ।”
तभी मम्मी बोलीं—
“ले जा उसे भी… वह भी थोड़ा घूम लेगी।”
मैंने कहा—
“ठीक है मम्मी, चलो।”
फिर मैं और अंकिता दोनों अस्पताल के गेट की तरफ चले गए।
गेट के पास ही एक कार खड़ी थी।
मैंने ड्राइवर से पूछा—
“भैया, गाड़ी बुक करनी है… क्या आप चलोगे?”
ड्राइवर बोला—
“हाँ भैया, इसी काम के लिए तो यहाँ खड़ा हूँ।”
मैंने पूछा—
“कितना किराया लगेगा?”
वह बोला—
“300 रुपये लगेंगे, लेकिन कटनी के अंदर ही जाना होगा।”
मैंने कहा—
“ठीक है भैया, मेरा घर कटनी में ही है।”
फिर मैंने कहा—
“आप यहीं रुके रहना, मैं मम्मी को लेकर आता हूँ।”
इतना कहकर मैं और अंकिता जल्दी से वापस अस्पताल के अंदर आ गए।
हमने वहाँ जरूरी पैसे जमा किए, रिपोर्ट ली और दवाइयाँ भी ले लीं।
फिर हम मम्मी को लेकर बाहर आए और कार में बैठ गए।
कुछ ही देर में हम अपने घर पहुँच गए।
घर पहुँचते ही हमने देखा कि सारा सामान बिखरा हुआ था।
यह देखकर मैं हैरान हो गया और कहा—
“यह सब कैसे हुआ? क्या यहाँ कोई आया था?”
पापा हमारी तरफ देखते हुए बोले—
“………”