मैं रात भर इन्हीं बातों को सोचता रहा…
और सोचते-सोचते कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
(अगले दिन)
सुबह मैं गहरी नींद में सोया हुआ था,
तभी प्रियांशी मेरे पास आ गई और मुझे जगाने लगी।
लेकिन मैं इतनी गहरी नींद में था कि मुझे कुछ पता ही नहीं चल रहा था।
वह मेरी चादर खींच रही थी… फिर भी मैं नहीं जागा।
तभी अंकिता हँसते हुए बोली—
“प्रियांशी, ये ऐसे नहीं उठेगा… लो पानी, इसके ऊपर डाल दो… तुरंत उठ जाएगा!”
फिर क्या था…
प्रियांशी ने सच में पानी लेकर मेरे ऊपर डाल दिया!
मैं झटके से उठ बैठा और बोला—
“अरे! मुझे सोने भी नहीं दे रहे हो… अभी कितनी रात है?”
तभी प्रियांशी हँसते हुए बोली—
“अरे महाराज! उठ जाओ… सुबह के 8 बज चुके हैं!”
अंकिता बोली—
“भैया, कब तक सोते रहोगे? उठो… पापा बुला रहे हैं, कोई जरूरी काम है।”
यह सुनकर मेरे मन में कई सवाल आने लगे—
“कहीं पापा को हमारी कोई बात तो नहीं पता चल गई?”
फिर अचानक ध्यान आया—
“शायद गहनों के बारे में ही बात करनी होगी…”
यही सोचकर मैं जल्दी से उठ गया,
वॉशरूम जाकर मुँह धोया…
(नहीं तो पापा डाँट देते )
फिर मैं पापा के पास गया।
पापा बोले—
“सत्येंद्र बेटा, पता चला है कि जो गहने चोरी हुए थे… वो मिल गए हैं?”
मैंने कहा—
“हाँ पापा… कल करीब 9 बजे दो लोग आए थे और खिड़की के पास रखकर चले गए।
हम लोग बालकनी में थे, इसलिए उन्हें देख नहीं पाए।”
पापा ने राहत की साँस लेते हुए कहा—
“कोई बात नहीं बेटा… गहने मिल गए, यही बहुत है।
अब इस बात को यहीं खत्म कर देते हैं।”
उधर अंकिता और प्रियांशी मिलकर खाना बना रही थीं।
थोड़ी ही देर में हम सब एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।
घर का माहौल अब पहले से काफी हल्का हो चुका था…
खाना खाने के बाद
मैं, प्रियांशी और अंकिता—
तीनों घूमने जाने का प्लान बनाने लगे।
मुझे लोगों से मिलकर
कुछ सामाजिक बातें भी समझनी और लिखनी थीं,
इसलिए हमने पापा-मम्मी से अनुमति ली…
और फिर हम तीनों बाहर निकल पड़े—
एक नई जगह… और नई कहानी की तलाश में…
अंकिता बोली—
“भैया, हम लोग आज बोधगया चलेंगे… फिर वहाँ से दूसरी जगह भी जाएँगे।
क्योंकि गौतम बुद्ध का ज्ञान दुनिया के हर कोने में गूँजता है।
वह एक ऐसा पवित्र स्थल है,
जहाँ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं।
और वहाँ जाने से हमें अलग-अलग लोगों से मिलने और बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा…”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“ज़रूर… हम वहीं चल रहे हैं।
मैंने तो पहले से ही वहाँ के टिकट भी ले लिए हैं।”
यह सुनते ही अंकिता का चेहरा खुशी से खिल उठा—
जैसे उसकी कोई बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो।
तभी प्रियांशी बोली—
“अंकिता, तुम किस जगह की बात कर रही हो?
मैंने इसका नाम तो सुना है…
लेकिन मैं इनके बारे में ज्यादा नहीं जानती…”
फिर उसने उत्सुकता से कहा—
“क्या तुम मुझे गौतम बुद्ध के बारे में बताओगी?”
अंकिता बोली—
“क्यों नहीं! चलो ट्रेन में बैठकर आराम से बातें करेंगे।
वैसे भी ट्रेन आने ही वाली है…”
इतने में स्टेशन पर ट्रेन की अनाउंसमेंट हो गई।
कुछ ही पलों में ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकने लगी।
हम तीनों जल्दी से अपना सामान उठाकर ट्रेन के अंदर चढ़ गए
और अपनी-अपनी सीट ढूँढने लगे।
थोड़ी देर बाद हमें अपनी सीट मिल गई—
मेरा सीट नंबर 50 था,
अंकिता का 51,
और प्रियांशी का 52।
लेकिन जैसे ही हम बैठे,
प्रियांशी जल्दी से जाकर सीट नंबर 51 पर बैठ गई
और मुस्कुराते हुए अंकिता से बोली—
“अंकिता, तुम मेरे वाली सीट पर बैठ जाओ…”
अंकिता उसे देखकर हल्का-सा मुस्कुराई…
जैसे उसे समझ आ गया हो कि प्रियांशी ऐसा क्यों कर रही है।
अंकिता, प्रियांशी को चिढ़ाते हुए बोली—
“मैं सब समझ रही हूँ…
तुम मेरे भैया से दूर रहना नहीं चाहती हो, है ना?”
यह बात सुनकर प्रियांशी हल्की-सी शर्माने लगी और बोली—
“हट पगली! मैं तो ऐसे ही बैठ गई…
तुम भी ना, कुछ भी बोलती रहती हो…”
मैंने हँसते हुए कहा—
“अंकिता, मेरी बहन है… उसे बातों में मत उलझाओ।
और हाँ, प्रियांशी… ये तुम्हारी हर बात समझ जाती है।”
अंकिता तुरंत बोली—
“सुन लो भाभी… भैया मुझे अच्छे से जानते हैं,
अब तुम भी समझ लो…”
यह सुनकर प्रियांशी ने नजरें झुका लीं…
और हल्की-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई…
ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी…
लेकिन हमारे बीच चल रही ये नोकझोंक
सफर को और भी खूबसूरत बना रही थी…
अंकिता उबासी लेते हुए बोली—
“भैया, मुझे नींद आ रही है… मैं अब सोने जा रही हूँ।
बाद में बात करूँगी… आप दोनों आराम से बातें करो…”
प्रियांशी ने हैरानी से कहा—
“अरे! अभी सो जाओगी तुम?
अभी तो रात होने में भी बहुत समय है…”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“कोई बात नहीं अंकिता…
तुम सो लो, बाद में उठ जाना…”
अंकिता ऊपर की सीट पर चली गई और थोड़ी ही देर में सो भी गई…
तभी अचानक एक आवाज आई—
“मूंगफली ले लो… मूंगफली…”
मैंने हाथ से इशारा करते हुए कहा—
“अरे मूंगफली वाले भाई … इधर आओ!”
वह पास आकर बोला—
“हाँ भाई साहब, 20 रुपए की दे रहा हूँ…
लो आप भी खाओ… अच्छा लगे तो पैसे देना,
नहीं तो मुफ्त में खा लेना…”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे नहीं भैया, ऐसा कैसे…
ये लो 20 रुपए, बढ़िया वाली देना…”
मूंगफली वाले ने जल्दी से कागज़ का लिफाफा बनाया
और उसमें गरम-गरम मूंगफली भरकर मुझे दे दी।
मैंने पैसे दिए,
और वह मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया…
अब मैं और प्रियांशी साथ बैठे थे…
ट्रेन की हल्की-हल्की आवाज…
और हाथ में गरम मूंगफली…
जैसे माहौल खुद ही कुछ खास होने का इंतज़ार कर रहा था…
प्रियांशी मुस्कुराते हुए बोली—
“मुझे भी दो… क्या आप अकेले ही खाओगे?”
उसकी यह बात सीधे मेरे दिल को छू गई…
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“अब मैं तुम्हें क्या दूँ…
तुम तो मुझे ही चुरा चुकी हो…”
फिर थोड़ा झुककर धीरे से बोला—
“और इस तरह मत देखा करो…
नहीं तो मेरी जान ही ले लोगी…”
यह सुनकर प्रियांशी हल्के से शर्मा गई
और मुस्कुराते हुए बोली—
“अच्छा जी… मैं आपको चुरा ली हूँ?
आपने ही मेरा दिल चुराया है…
इसलिए असली चोर तो आप हो…”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे! तुमने तो मुझे ही चुरा लिया है…
अब बताओ, मैं क्या करूँ?”
हम दोनों हल्का-हल्का मुस्कुरा रहे थे…
एक ही लिफाफे से मूंगफली खाते हुए…
ट्रेन अपनी रफ्तार से चल रही थी,
लेकिन उस पल में…
जैसे समय भी ठहर सा गया था…
इतने में अंकिता अचानक उठ गई और इधर-उधर देखने लगी—
“मैं… कहाँ आ गई?”
यह सुनकर प्रियांशी मुस्कुराई और मज़ाक करते हुए बोली—
“कहीं तुम अपनी ससुराल तो नहीं पहुँच गई, अंकिता?”
अंकिता तुरंत सीधी बैठ गई और बोली—
“हाँ हाँ… और आप मेरी भाभी बनकर साथ आई हो क्या?”
यह सुनकर मैं हँस पड़ा,
और प्रियांशी हल्का-सा शर्मा गई…
अंकिता फिर बोली—
“भैया, ध्यान रखना…
कहीं भाभी को छोड़कर मत भाग जाना…”
मैंने हँसते हुए कहा—
“अरे पगली, तू सोते-सोते भी बस यही सोचती रहती है क्या?”
तीनों की हँसी से पूरा माहौल हल्का और खुशनुमा हो गया…
ट्रेन अपनी रफ्तार से चल रही थी,
और हमारा सफर अब और भी मजेदार बन चुका था…
अब देखिये अगला भाग की आगे क्या होता हैं