चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 12 Std Maurya द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 12

मैंने पूछा—

“कोई बात नहीं सर… लेकिन सुनवाई शुरू होने में कितना समय लग सकता है?”
अधिकारी ने शांत स्वर में कहा—
“यही कोई कुछ हफ्ते लग सकते हैं… और आपको एक वकील रखना होगा।”
फिर उन्होंने समझाते हुए कहा—
“चाहें तो आप सरकारी वकील ले सकते हैं, या अपनी पसंद का निजी वकील भी रख सकते हैं।”
मैंने तुरंत कहा—
“ठीक है सर, हम अपना वकील खुद ही रख लेंगे। आप बस कार्रवाई शुरू कर दीजिए।”
अधिकारी ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
हम दोनों वहाँ से निकल पड़े…
मन में थोड़ी राहत थी कि अब मामला आगे बढ़ेगा,
लेकिन साथ ही एक बेचैनी भी थी—
कि सच सामने आने में अभी समय लगेगा।
हम लोग दिल में धैर्य रखकर वापस आ गए, और न्याय की उम्मीद लिए घर की ओर चल पड़े।
घर पहुँचते ही पापा ने पूछा—
“आज क्या हुआ?”
मैंने कहा—
“पापा, रिपोर्ट तो लिखवा दी है… अब कुछ दिन लगेंगे न्याय मिलने में।”
पापा ने शांत स्वर में कहा—
“कोई बात नहीं बेटा… अगर अभी नहीं मिला तो क्या कर सकते हैं। हम लोग हैं, तो मिलकर उसका हल भी निकाल लेंगे।”
उनकी बात सुनकर मन थोड़ा हल्का हो गया।
मैंने धीरे से कहा—
“हाँ पापा, शायद आप सही कह रहे हैं…”
फिर एक गहरी सांस लेते हुए जोड़ा—
“पुलिस वाले भी बस हमें दौड़ाते ही रहेंगे… मुझे तो ऐसा ही लग रहा है।”
उस पल मन में उम्मीद और शक दोनों साथ चल रहे थे—
एक तरफ न्याय की चाह, और दूसरी तरफ सिस्टम पर उठते सवाल…
तभी पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
“सब ठीक हो जाएगा बेटा… चिंता मत कर।”
उनकी आवाज़ में भरोसा था, जो मेरे डगमगाते मन को सहारा दे रहा था।
तभी प्रियांशी ने भी मुस्कुराते हुए कहा—
“आप चिंता मत कीजिए… सब सही हो जाएगा।”
उन दोनों की बातों ने जैसे मेरे अंदर एक नई हिम्मत भर दी।
हम लोग यूँ ही बातें करते रहे…
और देखते ही देखते शाम हो गई।
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था, और उसके साथ ही दिन भर की थकान भी महसूस होने लगी थी…
लेकिन मन में एक बात साफ थी—
कि अब चाहे जितना भी समय लगे, हम इस लड़ाई को पूरा जरूर करेंगे।
रात धीरे-धीरे गहराने लगी थी।
घर के सभी लोग अपने-अपने कमरों में चले गए…
लेकिन मेरी आँखों में नींद नहीं थी।
मैं छत पर चला गया, थोड़ी हवा लेने।
कुछ ही देर में प्रियांशी भी वहाँ आ गई।
वो धीरे से बोली—
“आप अभी तक सोए नहीं…?”
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“नींद ही नहीं आ रही… दिमाग में वही सब चल रहा है।”
प्रियांशी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
उसने धीमे स्वर में कहा—
“इतना मत सोचिए… सब ठीक हो जाएगा। मैं हूँ ना आपके साथ।”
उसकी ये बात सुनकर दिल को थोड़ा सुकून मिला।
मैंने उसकी तरफ देखा…
और पहली बार उस रात थोड़ा हल्का महसूस किया।
हम दोनों कुछ देर तक खामोशी में आसमान की तरफ देखते रहे।
लेकिन उस खामोशी में भी एक सुकून था…
जैसे मुश्किलों के बीच भी कोई अपना साथ हो, तो डर थोड़ा कम हो जाता है।
पर उसी सुकून के बीच… मन के किसी कोने में वो सवाल अभी भी जिंदा था—
“आखिर गहने गए तो गए कहाँ…?”
लेकिन तभी अचानक… हमारे कमरे से कुछ गिरने की तेज आवाज आई।
मैं और प्रियांशी एक-दूसरे की तरफ देखे…
और बिना कुछ कहे बालकनी से दौड़ते हुए कमरे की तरफ भागे।
कमरे में पहुँचकर जो देखा… हम दोनों कुछ पल के लिए ठहर गए।
अलमारी के पास… वही गहना पड़ा था।
हम दोनों हैरानी से उसे देखने लगे—
“ये यहाँ कैसे आ गया…?”
कमरे का दरवाज़ा भी हल्का सा खुला हुआ था।
प्रियांशी ने झुककर गहना उठाया और बोली—
“अरे… ये कहाँ से आ गया? कहीं ये मम्मी का वही गहना तो नहीं… देखो कितना कीमती है।”
मैंने ध्यान से देखा और कहा—
“हाँ… ये मम्मी का ही गहना है…”
फिर थोड़ी उलझन में बोला—
“लेकिन ये अचानक यहाँ कैसे आ गया…?”
मेरे मन में शक और बढ़ गया।
मैं तुरंत खिड़की की तरफ गया और बाहर झाँकने लगा—
“कहीं कोई आया तो नहीं था…?”
जैसे ही मैंने बाहर देखा…
दो परछाइयाँ तेज़ी से भागती हुई दिखाई दीं।
उनके हाथ में मोबाइल की हल्की रोशनी चमक रही थी…
मैं कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वो अंधेरे में गायब हो गए।
मैं कुछ पल तक वहीं खड़ा रह गया…
फिर पीछे मुड़कर प्रियांशी की तरफ देखा।
अब हमारे चेहरे पर डर नहीं… बल्कि राहत थी।
आखिर गहना मिल चुका था।
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“चलो… सुबह मम्मी को दिखा देंगे।”
फिर थोड़ा सोचकर बोला—
“अब शायद रिपोर्ट आगे बढ़ाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी…”
प्रियांशी ने भी सहमति में सिर हिलाया—
“हाँ… अब आपको थाने जाने की कोई जरूरत नहीं है।”
मैंने गहने को हाथ में लेते हुए कहा—
“लगता है… यहाँ फेंककर छोड़ गए हैं।”
प्रियांशी ने मुझे समझाते हुए कहा—
“छोड़िए आप ये सब सोचना… कल आराम से सोचेंगे। अभी हमें खुश होना चाहिए कि गहना मिल गया। दुखी रहने से कुछ नहीं मिलता।”
मैंने हल्की साँस लेते हुए कहा—
“हाँ… ये बात तो सही है…”
फिर थोड़ा सोचकर बोला—
“लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही… बिना कुछ किए ही वापस भी कर दिए… आखिर ऐसा क्यों किया?”
प्रियांशी ने समझाते हुए कहा—
“हो सकता है गहना बहुत कीमती हो… और जब वो लोग इसे बेचने गए हों, तो उन्हें डर लग गया हो।”
मैंने पूछा—
“डर? किस बात का?”
वो बोली—
“यही कि जब भी कोई कीमती चीज़ बेचते हैं, लोग पूछते हैं—ये कहाँ से है? अगर जवाब न दे पाए, तो पकड़े भी जा सकते हैं… शायद उसी डर से वापस रख गए हों।”
मैंने सिर हिलाते हुए कहा—
“हाँ… ये हो सकता है… शायद इसी डर से यहाँ छोड़कर चले गए।”
हम अभी इसी बारे में बात कर ही रहे थे कि तभी…
अचानक अंकिता कमरे में आ गई।
वो थोड़ी जल्दी में बोली—
“प्रियांशी भाभी, चलो… रात काफी हो गई है, अब सो जाओ। बाकी बातें कल कर लेना।”
फिर उसकी नजर गहने पर पड़ी…
“अरे! ये… गहना मिल गया…?”
वो खुशी से लगभग उछल पड़ी।
लेकिन उसकी आँखों में नींद भी साफ दिख रही थी।
वो जल्दी से बोली—
“ठीक है, बाकी बातें कल करेंगे… अभी चलो सोते हैं।”
इतना कहकर वो प्रियांशी को लेकर बाहर चली गई।
मैं कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा…
हाथ में गहना था… मन में सुकून भी…
लेकिन दिमाग में वही सवाल बार-बार घूम रहा था—
“क्या सच में वो डर गए थे…
या इसके पीछे कोई और सच्चाई छुपी है…?”