बिल्ली जो इंसान बनती थी - 14 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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बिल्ली जो इंसान बनती थी - 14

शानवी गहरी नींद में थी। कमरा अंधेरे में डूबा हुआ था। तभी…खिड़की से हल्की थक-थक की आवाज़ आई। शानवी झटके में उठी। दिल जोर से धड़कने लगा।

वो बोला - 
क्या… क्या हुआ?

धीरे-धीरे वो खिड़की की तरफ बढ़ी। और बालकनी में झाँका…वो देखती ही रह गई। कार्तिकेय इंसान का रूप बिलकुल चुपचाप, चोरी की तरह बालकनी पर खड़ा था उसकी आँखों में हल्की बेचैनी, और डर

शानवी ने ताज्जुब और गुस्से में कहा—
तुम यहाँ क्या कर रहे हो?!
पारितोष को पता चल गया तो… क्या होगा?
ये तुम्हारे लिए भी और… मेरे लिए भी खतरा है!

वो कदम बढ़ाकर खड़ी हो गई। आँखों में आग थी।

वो बोली - 
निकलो यहां से…हमारा कोई रिश्ता अब नहीं है!
और तुम… बिल्ली हो या इंसान…मेरा हिस्सा नहीं!

कार्तिकेय झुका। दिल की धड़कन तेज़ थी।

वो बोला - 
मैं… मैं बस… तुम्हें देखना चाहता था…मैं… कुछ नहीं करूंगा…।

लेकिन…शानवी का गुस्सा और डर उसे सच में बेचैन कर रहा था।
पैर पीछे खींच लिए आँखें झुकी हुई थीं धीरे-धीरे… वापस खिड़की की ओर बढ़ने लगा
शानवी दिल में कुछ टूटने सा महसूस कर रही थी गुस्सा और प्यार के बीच फँसी थी कार्तिकेय बाहर… इंसान बनकर…पारितोष की safety खतरे में पड़ सकती थी शानवी ने अपने हाथ फैलाए।

वो बोली 
जाओ… अभी!
अगर पारितोष ने देखा तो सब खत्म!

कार्तिकेय ने हौले से सिर हिलाया। फिर…बालकनी से कूद कर,
सड़क की ओर भाग गया।

सुबह की हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। पारितोष धीरे-धीरे उठकर टुक-टुक की ओर गया। टुक-टुक अब बिल्ली बन चुका था।
वो कमज़ोर और उदास दिख रहा था। खाना… ठीक से नहीं खा रहा था। खेलने का मन नहीं था। अक्सर अकेले बैठकर…बाहर की तरफ देखता रहता था।

पारितोष ने कोशिश की—
चलो… थोड़ी खेलते हैं… थोड़ा खाना खाते हैं…

लेकिन…टुक-टुक बस सिर हिला कर पीछे हट गया। आँखों में उदासी और डर साफ़ दिख रहा था। पारितोष धीरे-धीरे टुक-टुक के पास बैठा।

वो बोला - 
तुम ठीक हो ना…?
क्यों इतना चुप हो?

टुक-टुक ने उसकी ओर देखा। लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

पारितोष समझ गया—
ये… बिल्ली सिर्फ़ बिल्ली नहीं है…कुछ तो अंदर छुपा है।
ये उदास क्यों है?

वो धीरे-धीरे उसका सिर सहलाने लगा। लेकिन टुक-टुक ने छोटा सा म्याऊँ किया।

शायद कहना चाहता हो -
शायद…मैं ठीक हूँ…बस… अकेला हूँ।

पारितोष और टुक-टुक दोनों चुप थे। एक तरफ…टुक-टुक का अकेलापन।
दूसरी तरफ…पारितोष का डर कि कुछ ठीक नहीं है
शानवी के दिमाग में भी रात की यादें ताज़ा थीं।

वो सोच रही थी—
क्या मैं वापस जाऊँ?
क्या मैं उसे देखूँ?

सवेरे का हल्का सूरज कमरे में छिटक रहा था, और शानवी अपने नए घर में बैठी थी। तभी दरवाज़े पर हल्की खटखट हुई। उसने देखा तो पारितोष खड़ा था, हाथ में टुक-टुक को लेकर।

शानवी बोली - 
आप ! यहां?

परितोष बोला - 
हां तुमसे जरूरी बात करनी है।

टुक-टुक जैसे ही शानवी की नजरों में आया, उसकी सारी उदासी अचानक गायब हो गई। उसने एक झटके में उछलकर उसकी गोद में कूद लिया। उसकी आँखों में अचानक वही चमक लौट आई, जो कभी उसके साथ बिताए पलों में रहती थी। शानवी चौंक गई, लेकिन फिर उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।
पारितोष सोफे पर बैठ गया, और शानवी ने उसे पानी दिया। टुक-टुक उसके चारों तरफ घूम रहा था, म्याऊँ करता और फुर्र-फुर्र कर रहा था, 

बिल्कुल जैसे कह रहा हो—
मैं वापस आ गया हूँ, सब ठीक है।

पारितोष ने मुस्कुराते हुए कहा —
लगता है इसे तुमने बहुत प्यार किया है। इसका हर व्यवहार, हर छोटी आदत सिर्फ तुम्हारे लिए है बस यही बताती है।

शानवी उसकी आँखों में देखते हुए बोली —
हाँ… मैं… शायद इतना प्यार कभी किसी को नहीं कर पाई।

टुक-टुक उसके हाथों में सिमट गया, और जैसे ही उसने उसकी गर्दन पर सिर रखा, वह पूरी तरह से खुश नजर आया।

पारितोष ने धीरे से हँसते हुए कहा —
ये बिलकुल अलग energy है… लगता है अब इसे नया घर और नया प्यार मिल गया।

और उस कमरे में, उस पल, तीनों के बीच एक अजीब सी गर्माहट और भरोसे का एहसास फैल गया। टुक-टुक की वापसी ने सब कुछ बदल दिया था।

पारितोष ने टुक-टुक की ओर देखते हुए धीरे से कहा —
तुम्हारा pet तुमसे बहुत प्यार करता है। मैं इसे यहां इसलिए लाया क्योंकि ये घर पर ठीक से खाना नहीं खा रहा था, ना ही खेल रहा था। बस लगातार खिड़की की तरफ देखता रहता था, जैसे किसी का इंतजार कर रहा हो। अगर तुम चाहो तो इसे वापस रख सकती हो।

शानवी ने उसकी बात सुनी और तुरंत हाथ हिला दिया,

थोड़ी जल्दी में और थोड़े दुख के साथ बोली —
अरे नहीं, नहीं… मुझे इसे रखना ठीक नहीं लगेगा। मेरा मतलब… मैं इसकी care नहीं कर पाऊँगी। मैं इसे पूरा प्यार और ध्यान नहीं दे सकती। इसे… इसे किसी अच्छे घर की जरूरत है।

टुक-टुक उसकी गोद में सिर रखकर थोड़ा म्याऊँ किया, और उसके पैरों के पास हल्का सा घूमने लगा। उसकी आँखों में अभी भी वही मासूमियत और प्यार था।

लेकिन शानवी ने खुद को संभालते हुए कहा—
इसलिए मैं चाहती हूँ कि ये… किसी के पास रहे जो इसे पूरा समय दे सके। मुझे सिर्फ यह देखना अच्छा लगता है कि ये खुश है।

पारितोष ने मुस्कुराया और धीरे से कहा — 
ठीक है, तुमने सही किया। इसे प्यार मिला है, और अब ये जगह इसे सुरक्षित रखेगी।

शानवी ने टुक-टुक को धीरे से सहलाया, उसकी गर्दन पर हाथ फेरा, और फिर उसे पारितोष के हाथों में सौंप दिया। टुक-टुक ने जैसे समझ लिया हो कि ये सही है, उसने आराम से सिर पारितोष के हाथों पर रख दिया।
कमरे में एक अजीब सी शांति और हल्की उदासी फैल गई। खुशी और दर्द दोनों का मिश्रण। शानवी जानती थी कि ये सही फैसला है, लेकिन उसका दिल अभी भी उस छोटे से जीव से जुड़ा हुआ था।

टुक-टुक वैसे ही था—बिल्ली, लेकिन उसका व्यवहार अभी भी इंसान जैसा ही था। पारितोष ने कोशिश की, उसे खेलाया, खाना दिया, उसके साथ समय बिताया…लेकिन टुक-टुक शांत रहता।
कभी अचानक उछलता, कभी फुर्र-फुर्र करके कमरे में घूमता।
पारितोष परेशान हो गया।

वो बोला - 
ये बिलकुल… शांत क्यों है?

उसने खुद से कहा —
प्यार भी करता है… लेकिन कभी पूरी तरह खुलता नहीं।

टुक-टुक उसकी ओर देखकर धीरे से म्याऊँ करता। पारितोष ने उसका सिर सहलाया, और फिर थोड़ा गंभीर हो गया।

उसने धीरे से बोला—
तुम क्या सोचते हो, कार्तिकेय…मैं तुम्हें पालने लाया हूँ?

टुक-टुक बस उसे देखता रहा। कुछ पल के लिए…जैसे सब कुछ ठहर गया हो। लेकिन कमरे की हवा में… कुछ अजीब सा महसूस हुआ। जो पारितोष दिख रहा था… वो शायद वही नहीं था। और जो था… वो शायद अब भी छुपा हुआ था। टुक-टुक ने हल्का सिर हिलाया…

और जैसे कह दिया हो—
तुम मुझे समझ नहीं सकते।
सच अभी सामने नहीं आया।

कमरे में सन्नाटा छा गया।
पारितोष और टुक-टुक के बीच एक अनकहा connection बन गया। 
लेकिन कोई भी यह नहीं जान सका असली मकसद क्या था?
और वो कौन सा सच छुपा रहा था, जो अब तक सामने नहीं आया था।