बिल्ली जो इंसान बनती थी - 10 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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बिल्ली जो इंसान बनती थी - 10

तनय और मानव ने मोबाइल पर सीसीटीवी फुटेज खोल दी। शानवी पास खड़ी थी। उसकी आँखें नम थीं। दिल धड़क रहा था।

🔹 फुटेज में दिखा क्या?

रात के लगभग 4 बजे वही सफेद बिल्ली खिड़की से बाहर कूदती हुई सड़क पर निकली।
बिल्ली केवल सड़क पर नहीं चली…बल्कि धीरे-धीरे पैदल चलने जैसे कदम उठा रही थी। उसकी हरकतें…कोई साधारण बिल्ली नहीं कर सकती थी।

सबसे shocking बात:
बिल्ली अचानक…🚶‍♂️ कुछ इंसानों की तरह सड़क पार करने लगी।
उसके पंजे… ऐसा महसूस हो रहा था… जैसे छोटे हाथ हों।
फुटेज में एक पल ऐसा भी था…जहाँ बिल्ली एक lamppost के नीचे रुककर सड़कों की तरफ देखकर खड़ी थी, और एक इंसान की तरह धीरे-धीरे सिर हिला रही थी।

शानवी का दिल रुक सा गया। उसने मोबाइल को दोनों हाथों से पकड़ा।

शानवी बोली - 
ये… ये कैसे…?
मेरा टुक-टुक… ये… ये इंसान जैसा कर रहा था?

तनय और मानव भी सन्न थे। सिर्फ़ स्क्रीन पर देख रहे थे…लेकिन विश्वास नहीं कर पा रहे थे।

शानवी ने धीरे से फुसफुसाया—
मुझे सच लग रहा है…ये सिर्फ़ बिल्ली नहीं है…।

मानव ने फोन स्क्रीन बंद किया। तनय ने उसकी पीठ थपथपाई।

मानव बोला - 
चलो… उसे ढूँढते हैं।
अब बस इंतज़ार नहीं कर सकते।

लेकिन शानवी का दिल घबराया हुआ था। सीसीटीवी ने उसे सिर्फ़ सत्य की झलक दिखाई थी। और अब… शुरू हो गया था असली रहस्य।

शानवी घर की खिड़की के पास खड़ी थी। दिल तेजी से धड़क रहा था। सीसीटीवी की वो झलक अभी भी उसकी आँखों के सामने थी।

🔹 टुक-टुक की हरकतें अब डराने लगीं

वो धीरे-धीरे सोचने लगी—
कैसे वो खिड़की से बाहर कूद गया। कैसे सड़क पर चलते हुए…
उसकी हरकतें इंसान जैसी थीं।
कैसे रात के समय…वो हर कदम सोच-समझकर उठा रहा था।
कैसे सीसीटीवी में वो लाम्पपोस्ट के नीचे सिर हिला रहा था,
जैसे किसी की तरफ देख रहा हो। शानवी का मन काँप उठा।

वो बोली - 
वो… वो बिल्ली… बस बिल्ला नहीं थी।
वो… कुछ और था… शायद… कुछ भूतिया?

वो अपने हाथ अपने सिर पर रखकर सोचने लगी।

वो बोली - 
क्या… ये मुझे नुकसान पहुँचाना चाहता था?
या… बस मुझे डराने आया था?

उसके दिमाग में हर शक…हर सवाल…एक भयंकर भय में बदल गया। शानवी के होंठ हिले…आँखों में आँसू थे। लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे।

वो बोली - 
अगर वो सच में इंसान जैसा था…तो मैं अकेली क्या कर पाऊँगी?

उसने पीछे मुड़कर देखा…कमरे में बिल्ली की खाली जगह…
और दिल धड़क उठा।

वो बोली - 
टुक-टुक… अगर तुम पास आ गए…तो मैं कैसे बचूँगी?

कोने में तनय और मानव खड़े थे। उनकी आँखों में भी डर और चिंता थी। लेकिन शानवी की तरह…उन्हें भी पूरा विश्वास नहीं था कि क्या सच में ये बिल्ली इंसान है या कुछ और।
शानवी अब पूरी तरह डर चुकी थी। दिल की धड़कन इतनी तेज़ कि खुद को संभालना मुश्किल था।

वो बोली - 
मैं नहीं चाहती…कि वो वापस आए…
टुक-टुक… अगर तुम आ गए…तो मैं कैसे बचूँगी?

उसने खुद से कहा कि अब वो कभी बिल्ली को पास नहीं लाएगी।

🌅 सुबह का मोड़

अगली सुबह…शानवी धीरे-धीरे आँखें खोलती है। सपनों की झपकी अभी भी आँखों में थी।
लेकिन…वो जो देखती है…उसकी रूह तक ठिठक जाती है।
टुक-टुक वहीं बिस्तर पर बैठा था। उसकी छोटी सफेद आँखें…
सीधे शानवी की आँखों में टिकी हुई थीं। शानवी का सारा शरीर ठंडा पड़ गया। हाथ काँपने लगे। और दिल की धड़कन कुछ पल के लिए रुक सी गई।

वो बोली - 
क्यों… क्यों वापस आया?
क्या… क्या वो मुझे अपने साथ ले जाना चाहता है?

टुक-टुक बस बैठा था। कोई म्याऊं नहीं। कोई हलचल नहीं।
लेकिन उसकी आँखों में…कुछ ऐसा था जो शानवी को भयानक तरीके से डराने के लिए काफी था।

🌫️ शानवी का डर

शानवी धीरे-धीरे बिस्तर से उठी। पाँव काँप रहे थे।बहवा में हल्की ठंडक थी।

वो मन ही मन बोली - 
टुक-टुक… अगर तुम  यहाँ हो…तो मैं कैसे सामना करूँगी?

उसने पलटकर देखा। वो अब भी वहीं बैठा था। बिल्कुल सावधान, समझदार और मासूम आँखों वाला। शानवी का दिल बैठ गया।

वो खुद को संभालते हुए सोचने लगी —
कहाँ से आया…और क्यों मेरे पास?
क्या सच में… मैं अब सुरक्षित नहीं हूँ?

शानवी अब पूरी तरह डर गई थी। उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं। दिल धड़क रहा था। वो बिल्ली को छू भी नहीं पा रही थी। हर बार जैसे उसका हाथ बढ़ता, वो खुद ही पीछे खींच लेती।

शानवी बोली - 
टुक-टुक… नहीं… अब नहीं… मैं… मैं डर गई हूँ…

उसने तुरंत अपने फोन को उठाया।

वो बोली - 
मानव…

उसकी आवाज़ कांप रही थी वो बोली - 
तुम जल्दी आओ… कुछ हुआ है… टुक-टुक यहाँ है…
पर कुछ अजीब है… मुझे डर लग रहा है…

फोन के दूसरी तरफ मानव ने तुरंत जवाब दिया—
ठीक है… मैं और तनय तुरंत आ रहे हैं।
तुम डर मत, मैं अब पहुँच रहा हूँ।

⏳ कुछ ही मिनटों में

दरवाज़ा खुला। मानव अंदर घुसा। पाँव तेज़-तेज़ हिले।

तनय बोला - 
शानवी… क्या हुआ? टुक-टुक कहाँ है?

शानवी ने काँपते हुए मोबाइल रख दिया और बोली - 
वो… वही… वहीं बिस्तर पर…
लेकिन… कुछ अलग… कुछ अजीब कर रहा है…

मानव ने धीरे से देखा। और तभी उसने भी महसूस किया—
बिल्ली…उसके पैरों की हरकतें…आँखों का expression…
कुछ असामान्य था। सिर्फ बिल्ली नहीं लग रही थी।

शानवी ने पीछे हटते हुए कहा—
मुझे डर लग रहा है… मैं नहीं छू सकती…

मानव ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला—
शांत हो जाओ… मैं यहाँ हूँ।
अब कुछ नहीं होगा।

लेकिन उस कमरे में…चुप्पी थी। सिर्फ सफेद बिल्ली और तीन इंसानों के बीच सन्नाटा। टुक-टुक बस वहीं बैठा था। सावधान।
जैसे कुछ छुपा रहा हो।

आपको क्या लगता है -
क्या शानवी उससे ऐसे ही डरती रहेगी या साहस जुटाएगी ?